Showing posts with label Social Movements (आंदोलन). Show all posts
Showing posts with label Social Movements (आंदोलन). Show all posts

Thursday, October 18, 2012

अपनी तार्किक परिणतियों तक पहुँच गये अण्णा मण्डली और रामदेव के आन्दोलन


आन्ना और रामदेव के आन्दोलनों की "आँधी" शान्त होने के बाद अजकल केजरीवाल अपनी संसदीय राजनीति के लिये जनता के बीच अपना वोट बैंक बनाने की कोशिशों में लगे हैं। इसी क्रम में केजरीवाल कुछ घोटालों को भी लोगों के सामने ला चुके हैं, जिनमें संसदीय राजनिति करने वाले पक्ष-विपक्ष के नेता और उनके सहयोगी उद्योगपति सहित कई चेहरे शामिल हैं। कुछ लोगों को यह सारी घटनायें काफ़ी क्रांतिकारी लग रहीं हैं, और रोज सुबह अख़बारों में और पूरे दिन टीवी पर इन "क्रांतिकारी" कारनमों की खबरें देखी जा सकती हैं। ऐसे में एक छोटी सी टिप्पणी डालना इस पूरी "क्रांतिकारी कार्यवाही" के समय और इस परिघटना दोनों के अनुकूल होगा।

जब तक आमूल बदलाव का कोई क्रान्तिकारी विकल्प नहीं होगा तब तक ऐसे प्रहसन चलते ही रहेंगे

हाल के दिनों में भ्रष्टाचार मिटाने का नारा उछालने वाले दोनों आन्दोलनों के अलग-अलग तरह के जमावड़े पिछले दिनों दिल्ली में आगे-पीछे लगभग एक साथ ही हुए और दोनों ही इसी बीच अपनी-अपनी तार्किक परिणतियों तक पहुँच गये। बाबा रामदेव की ”महाक्रान्ति” की घोषणा तो रामलीला मैदान से चलकर अम्बेडकर स्टेडियम में सिमट गयी। अब शायद वे इस ”महा” क्रान्ति के फुस्स होने के बाद डीलक्स क्रान्ति, सुपरडीलक्स क्रान्ति या फिर श्रीश्री108क्रान्ति का नारा देंगे। एन.जी.ओ. के मठाधीशों आदि को लेकर भ्रष्टाचार विरोध की दूसरी मुहिम चला रही अण्णा हज़ारे-अरविन्द केजरीवाल मण्डली की तथाकथित ”दूसरी आज़ादी की लड़ाई” भी बीच में ही बिला गयी। वैसे शायद वे भूल गये थे कि ”दूसरी आज़ादी” की लड़ाई एक बार पहले भी 1974 के जेपी आन्दोलन के समय यह देश देख चुका है जिसके नतीजे के तौर पर कांग्रेस की जगह जनता पार्टी की सरकार बनी थी जो जल्दी ही नेताओं की आपसी सिरफुटौवल के चलते बिखर गयी। यह मण्डली तो अब टूट भी चुकी है। अण्णा रूठकर वापस रालेगण सिद्धी में अपने गाँव सिधार गये हैं और केजरीवाल एण्ड कम्पनी (अब तक बिना नाम की) पार्टी बनाकर संसदीय सुअरबाड़े में घुसने की कवायदों में जुट गये हैं।
पूँजीवादी लूट-खसोट, अत्याचार और उसके साथ-साथ पलने वाले भ्रष्टाचार से तंग आम जनता के सामने जब तक वास्तविक बदलाव का कोई ठोस विकल्प नहीं होगा तब तक ऐसी जोकरी चलती रहेगी। हर कुछ वर्ष के अन्तराल पर कोई मदारी जनता को उसके कष्टों से मुक्ति दिलाने के लिए कोई नया नुस्खा दिखाता हुआ थोड़े समय के लिए मंच पर तमाशा दिखाकर ग़ायब हो जायेगा और जनता को पहले से भी अधिक भ्रमित और निराश कर जायेगा।
भ्रष्टाचार मिटाने के रामबाण नुस्खे के तौर ये लोग जिस जन लोकपाल की माँग कर रहे हैं उसके बारे में सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज मारकण्डेय काटजू का कहना है कि देश के सभी विभागों को लोकपाल के दायरे में लाने के लिये कम से कम एक लाख लोगों का स्टाफ चाहिए। ज़ाहिर है, ईमानदारी का सर्टिफिकेट पाये हुए एक लाख लोगों की भरती अपनेआप में एक भारी कठिन काम होगा, और फिर इस भारी-भरकम नौकरशाही को भ्रष्ट होने से रोकने के लिए एक और ‘सुपर जन लोकपाल’ टाइप संस्था की दरकार होगी। जन लोकपाल को सरकारी नियंत्रण से मुक्त स्वायत्त संस्था बना देने से उसकी पवित्रता की गारण्टी नहीं हो जायेगी। यदि स्वायत्तता की ही बात होती तो देश की न्यायपालिका तो स्वायत्त ही है, मगर न्यायपालिका में नीचे से लेकर ऊपर तक व्याप्त भ्रष्टाचार से कौन परिचित नहीं होगा। अण्णा के आन्दोलन से ही जुड़े पूर्व कानून मन्त्री शान्तिभूषण का कहना है कि उच्चतम न्यायालय के 16 में से कम से कम 8 मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे (एन.डी.टी.वी, 16 सितम्बर, 2010)। ऐसे में यह कैसे सम्भव होगा कि पूँजीवादी आर्थिक सम्बन्धों के बीच रहकर यह संस्था और इसमें चुने गये लोग भ्रष्ट नहीं होंगे। इस तरह की माँगे मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने वाले कुछ लोगों को कुछ समय के लिये प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन उससे अधिक इससे ठोस रूप में और कुछ भी हासिल नहीं हो सकता।
पूँजीवादी समाज जिस बुनियाद पर खड़ा है वह अपने आप में भ्रष्टाचार है — यानी अतिरिक्त मूल्य के रूप में मज़दूरों की मेहनत की लूट जिसे इस समाज में क़ानूनी माना जाता है। ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की होड़ में सारे पूँजीपति बने-बनाये नियमों-क़ानूनों को भी तोड़ने, मज़दूरों को न्यूनतम क़ानूनी अधिकारों से भी वंचित करने, टैक्स चोरी करने और नेताओं-अफसरों को ख़रीदने में लग जाते हैं। ज़ाहिर है, फिर लुटेरों के सेवक भी सदाचारी नहीं हो सकते। पूँजीवाद इसके बिना चल ही नहीं सकता है और कोई भी पूँजीवादी देश इसका अपवाद नहीं है। लूट पर टिके उत्पादन सम्बन्धों की सेवा करने के लिए बनायी जाने वाली कोई भी संस्था चाहे वह स्वायत्त हो या न हो उसे भ्रष्टाचार से नहीं बचाया जा सकता।
केजरीवाल एण्ड कम्पनी की दूसरी माँग है कि ग्राम पंचायतों को ज्यादा अधिकार दिया जाये और ग्राम स्वराज्य को साकार बनाया जाये जो उनके मुताबिक भ्रष्टाचार ख़त्म करने का एक और अचूक नुस्खा है। अपनी किताब ‘स्वराज्य’ में केजरीवाल ने लिखा है कि पंचायतों में कलक्टर के माध्यम से सरकारों का बहुत हस्तक्षेप होता है इसीलिए वे ईमानदारी से काम नहीं कर पातीं।
केजरीवाल या तो बहुत भोले हैं या बहुत शातिर जो वे कहते हैं कि ग्राम पंचायतों को ज्यादा अधिकार देने से जनता के हाथों में सत्ता आ जायेगी। हर कोई जानता है कि पंचायतों पर धनी किसानों, गाँव के धनाढ्यों, दबंगों का कब्ज़ा है। पंचायती राज का ढाँचा लागू ही किया गया है ग्रामीण क्षेत्र के शासक वर्गों को सत्ता में भागीदार बनाने के लिए। गाँव में प्रधान वही चुना जाता है जो पैसे और डण्डे के दम पर वोट खरीद सकता है। ज्यादातर छोटे किसानों और मज़दूरों की उसमें कोई भागीदारी नहीं होती। हर पंचायती क्षेत्र में ज्यादातर धनी किसानों-कुलकों-दबंगों के परिवार के सदस्य या उनका कोई लग्गू-भग्गू ही चुनाव जीतता है। जब तक आर्थिक ढाँचे में कोई बदलाव न हो, तब तक कैसी भी चुनाव प्रणाली हो, आर्थिक रूप से ताक़तवर लोग ही चुनकर ऊपर जायेंगे। ऐसे में, पंचायतों को और अधिक अधिकार देने से केवल इतना ही होगा कि गाँवों में अमीरों और दबंगों के हाथ में और अधिक ताक़त आ जायेगी, और ख़ुशहाल किसानों की ख़ुशहाली थोड़ी और बढ़ जायेगी। गाँव के बहुसंख्यक ग़रीबों को इससे कुछ हासिल नहीं होने वाला है।
इन लोगों की तीसरी माँग है कि जनता के पास किसी भी जन-प्रतिनिधि को चुनने और उसे वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए। इस आर्थिक व्यवस्था के भीतर प्रतिनिधि चुनने की चाहे कोई भी प्रक्रिया अपनायी जाये फिर भी आर्थिक रूप से विशेषाधिकार प्राप्त लोग ही चुनकर ऊपर पहुँचते हैं। इसका अनुमान वर्तमान संसद से ही लगाया जा सकता है जहाँ चुने गये 543 संसद सदस्यों में से 315 यानी लगभग 60 प्रतिशत करोड़पति हैं, जो उद्योगपति, बिल्डर, व्यापारी या शेयर-ब्रोकर जैसी पृष्ठभूमि के हैं। बुनियादी आर्थिक ढाँचे में बदलाव किये बिना चुनाव प्रणाली में कोई भी सुधार वास्तव में बेमतलब ही होगा।
टीम अण्णा की एक और माँग यह थी कि सरकार से 15 भ्रष्ट मन्त्रियों को हटाया जाना चाहिए। उनसे किसी ने यह नहीं पूछा कि ऐसा कैसे सम्भव है कि जो दूसरे ”सदाचारी” लोग मन्त्री बनाये जायेंगे वे भ्रष्ट नहीं होंगे। इस तरह की माँगों से अण्णा टीम लोगों के सामने यह सिद्ध करने की कोशिश करती है कि वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था अपनेआप में ग़लत नहीं है, सिर्फ कुछ ”गन्दे” लोगों को हटाकर साफ़-सुथरे लोगों को सत्ता में लाने की आवश्यकता है जो पूरी ईमानदारी से अपना काम करें। अण्णा ऐसे मौकों पर नैतिकता और सदाचार की नसीहत देकर भ्रष्टाचार को समाप्त करने की बात करने लगते हैं। लेकिन यहाँ भी वह पूरी आर्थिक व्यवस्था पर कोई टिप्पणी नहीं करते। पूँजीवाद में काला धन सफेद धन से ही पैदा होता है। पूँजीवादी सरकार वास्तव में पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी होती है जो पूँजी को मैनेज करती है जिससे मज़दूरों का अतिरिक्त श्रम निचोड़कर मुनाफा पैदा करने की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती रहे। पूँजीवादी आर्थिक सम्बन्धों में यदि क़ानून के हिसाब से बिल्कुल भ्रष्टाचार ना हो (हालाँकि भ्रष्टाचार-मुक्त पूँजीवाद एक मिथक है), तब भी मुनाफे के लिए मज़दूरों को निचोड़ना अपनेआप में एक लूट है। सभी क़ानूनी दायरों के भीतर रहते हुए भी करोड़ों मेहनतकश लोग अपने अधिकारों से बेदखल कर दिये जाते हैं। वास्तव में पूँजीवादी व्यवस्था अपने आप में एक भ्रष्टाचार है, पूरी दुनिया में दो नम्बर के कामों और टैक्स चोरी के बिना किसी भी पूँजीवादी व्यवस्था का अस्तित्व हो ही नहीं सकता।
अब काले धन और सफेद धन की बात करते हैं, जिसके बारे में  भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ने वाले ये महारथी काफी तीखे तेवर दिखाते हैं। वास्तव में काले धन और सफेद धन का आपस में उलटफेर होता ही रहता है। काला धन कभी सफेद हो जाता है और सफेद धन किन्हीं स्थितियों में काला धन माना जा सकता है। हवाला, वायदा कारोबार, लॉबीईंग और तस्करी के साथ फिल्म और मनोरंजन उद्योग में लगने वाला धन, खेल उद्योग में लगा धन और सट्टेबाज़ी, हथियारों की ख़रीद-फरोख्त में दिया जाने वाला कमीशन जैसे अनेक उदाहरण हैं जो पूरी दुनिया के स्तर पर देखें तो कहीं क़ानूनी दायरे के अन्दर माने जाते हैं, तो कहीं ग़ैर-कानूनी माने जाते हैं। उदारीकरण और भूमण्डलीकरण के वर्तमान दौर में पूरी दुनिया के देशों के बीच में पूँजी का निर्बाध आदान-प्रदान होता है। इस पूँजी का कोई प्रमाण नहीं होता कि वह काली है या सफेद। आज भारत में एफ.डी.आई. में जो पैसा लग रहा है उसका कोई प्रमाण किसी के पास नहीं है कि उसका स्रोत क्या है। ऐसा ही नशीली दवाओं के खरबों डॉलर के कारोबार में भी है, जो कहीं पर ग़ैरकानूनी रूप से तस्करी के माध्यम से बेची जाती हैं और कहीं इनकी बिक्री वैधनिक रूप से होती है। इन सभी कारणों से काले धन और सफेद धन के बीच आज कोई विभाजक रेखा नहीं खींची जा सकती है। काले धन का अनुत्पादक पूँजी से भी गहरा रिश्ता है।
पूँजीवाद अपनी आन्तरिक गति से लगातार भ्रष्टाचार पैदा करता रहता है और फिर जब वह सारी सीमाओं को तोड़ने लगता है और व्यवस्था के लिए मुश्किल पैदा करने लगता है तो समय-समय पर उसे नियन्त्रित करने के प्रयास भी इसी व्यवस्था के भीतर से होते हैं। ऐसे में कभी-कभी कोई मसीहा, कोई श्रीमान सुथरा जी (मिस्टर क्लीन) डिर्जेण्ट और पोंछा लेकर पूँजीवाद पर लगे खून और कालिख़ के ध्ब्बों को साफ़ करने में जुट जाते हैं। साम्राज्यवादी पूँजी से संचालित एन.जी.ओ. ”सभ्य समाज” (सिविल सोसायटी) के साथ मिलकर पूँजीवाद की एक सुरक्षा पंक्ति का काम करते हैं। लेकिन वर्तमान में वैश्विक स्तर पर पूँजीवादी व्यवस्था मन्दी की चपेट में है, और आसमान छूती महँगाई और बेरोज़गारी आदि के कारण जन-आन्दोलनों का दबाव लगातार बना हुआ है। ऐसे में इस दबाव को कम करने के लिये सेफ्टी वाल्व का काम करने वाले एन.जी.ओ. अभी व्यवस्था की सुरक्षा पंक्ति की भूमिका नहीं निभा पा रहे हैं। ऐसे में ये आन्दोलन वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने की भूमिका बख़ूबी निभा रहे हैं।
आज की परिस्थितियों में भारत की वामपन्थी सुधारवादी राजनीतिक पार्टियों के प्रति जनता में बढ़ रहे अविश्वास के कारण वे पूँजीवाद की दूसरी सुरक्षा पंक्ति का काम करने में ज्यादा सफल नहीं हो पा रही हैं। इसलिए ”सभ्य समाज” के इस तरह के आन्दोलनों के कन्धों पर यह कार्यभार आ पड़ा है कि वे देश की जनता में व्याप्त असन्तोष को कम करने के लिए आगे आयें। ऐसे में इस पंचमेल खिचड़ी द्वारा भ्रष्टाचार विरोध में खड़ा किया गया यह आन्दोलन पूँजीवादी व्यवस्था के लिए दूसरी सुरक्षा पंक्ति का कार्यभार बख़ूबी निभा रहा है।
इस आन्दोलन का जो अन्त हुआ उससे अलग हो ही नहीं सकता था। इसकी सम्भावनाएँ अब समाप्त हो रही थीं और बुर्जुआ संसदीय राजनीति की बन्द गली में इसे मुड़ना ही था। आने वाला वक्त बतायेगा कि मुख्यधारा की राजनीति में एक बटखरे से ज्यादा इनकी कोई भूमिका बन भी पायेगी या नहीं।
इस आन्दोलन से वर्तमान सत्ता के पक्ष में एक सहायता तो यह हुई कि लोगों में यह भ्रम फैला कि देश की मुख्य समस्या भ्रष्टाचार ही है। दूसरी ओर अण्णा आन्दोलन की असफलता भी सत्ता के लिए एक सफलता है, जो लोगों के बीच पस्ती पैदा करने का काम करेगी और लोगों के बीच एक सामान्य निराशावादी धारणा को बल मिलेगा कि किसी भी आन्दोलनों से कुछ हासिल नहीं हो सकता क्योंकि अन्त में ये सभी आन्दोलन बुर्जुआ संसदीय राजनीति के दायरे में जाकर समाप्त हो जाते हैं।
अण्णा टीम के बाद अब रामदेव की रामलीला की बात करते हैं। अपने टीवी चैनल पर लगातार प्रचार करने के बाद रामदेव ने विदेशी बैंकों में जमा भारत के 400 लाख करोड़ रुपये को देश में वापस लाने के नारे के साथ अपना आन्दोलन शुरू किया था। पिछले 9 अगस्त 2012 को अनेक लोकरंजक नारों के साथ रामलीला मैदान में रामदेव ने गरमागरम बातों और दावों के साथ आन्दोलन शुरू किया जो 15 अगस्त को एक प्रहसन के रूप में समाप्त हो गया और अन्धी देशभक्ति और धर्मान्‍धता से लैस रामदेव के समर्थक वापस अपने-अपने घरों को लौट गये। रामदेव देश के बाहर बैंकों में मौजूद काले धन को वापस लाने की बात करते हैं, लेकिन देश के भीतर जो काला धन मौजूद है उसके बारे में कुछ नहीं बोलते। पूरे देश में मठों और मन्दिरों में, पूँजीपतियों और व्यापारियों के गोदामों में, नेताओं और नेताओं के चमचों के पास, सरकारी अफसरशाहों, इंजीनियरों, यहाँ तक कि चपरासियों और बिजली के मीटर रीडरों तक के घरों में करोड़ों की सम्पत्ति मिलती है। यह सारा काला धन जो देश के अन्दर मौजूद है उसकी मात्रा देश के बाहर मौजूद काले धन के भी कहीं ज्यादा है। रामदेव इस धन को बाहर निकलवाने की बात कभी नहीं करते। ख़ुद उनका 1100 करोड़ रुपये का व्यापारिक साम्राज्य काले धन की बुनियाद पर खड़ा है, इसके गम्भीर आरोप उन पर लगते रहे हैं। उत्तराखण्ड में किसानों की सैकड़ों एकड़ ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा, मध्यप्रदेश में करोड़ों की अचल सम्पत्ति, स्कॉटलैण्ड में एक पूरा टापू ख़रीदना और स्वदेशी की बात करते-करते विदेशी कम्पनी ही ख़रीद लेना बाबा की कुछ ख़ास लीलाओं  में शामिल हैं। कांग्रेस सरकार बदले के लिए भी उनके ख़िलाफ जाँच की कार्रवाई कर रही हो तो भी इतने थोड़े समय में इतना बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लेना सवाल तो खड़े करता ही है। धर्म और पूँजी का इतना अच्छा मिश्रण कम ही देखने को मिलता है।
धार्मिक कट्टरपन्थ की राजनीतिक करने वाले संघ और भाजपा के पास आज कोई ठोस चुनावी मुद्दे नहीं बचे हैं, राम मन्दिर का मुद्दा आगे नहीं बढ़ पा रहा है, और संघ क्षरण एवं विघटन के दौर से गुजर रहा है। ऐसे में रामदेव का आन्दोलन संघ की धार्मिक कट्टरपन्थ की राजनीति के लिए एक उम्मीद जगा रहा है। वैश्विक स्तर पर पूँजीवाद आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है और भारत भी इस संकट के प्रभाव से अछूता नहीं रह गया है। ऐसी स्थिति में पीले, बीमार चेहरे वाले मध्यवर्ग के हताश नौजवानों का एक बड़ा हिस्सा अलगाव का शिकार है, जो किसी भी नारे के पीछे बिना सोचे-समझे चल पड़ता है। मध्यवर्ग का यही हिस्सा रामदेव जैसे बहरूपियों के नारों के बहकावे में आकर दक्षिणपन्थी राजनीति की सेवा में जा खड़ा होता है। रामदेव के आन्दोलन के दौरान संसदीय राजनीति के क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर वोट बैंक की राजनीति करने वाले कई बड़े खिलाड़ी इसके समर्थन में मंच पर आकर जनता के समक्ष अपनी-अपनी बात कह गये। मुलायम सिंह, मायावती, प्रकाश सिंह बादल, चौटाला जैसे जो लोग रामदेव के समर्थन में पहुँचे वे सभी अपने अपने क्षेत्र में भ्रष्टाचार और काले धन के सम्राट हैं। इनके साथ ही संघ और नरेन्द्र मोदी भी इनके गले में अपनी बाँहें डाले हुए दिखे।
काले धन से जुड़ी रामदेव की माँगें किसी प्रहसन के मंच पर एक मसखरे के ऊलजुलूल संवादों से ज्यादा और कुछ भी नहीं हैं। यह तर्कहीन नारेबाज़ी समाज के कूपमण्डूक, चर्बी चढ़े मध्यवर्ग की कुछ श्रेणियों को तो प्रभावित कर सकती है लेकिन समाज के संजीदा लोगों में इसकी ज्यादा साख नहीं है। इस प्रकार के सभी लोकरंजक नारे आजकल की निराशा और पस्ती की स्थिति में जनता के एक हिस्से को प्रभावित कर रहे हैं। रामदेव के आन्दोलन के दौरान जिस तरह भगवे झण्डों को फहराया गया, रामदेव और उसके समर्थकों का केसरिया चोला, और ”स्‍वदेशी”, ”भारत माता की जय” और ”विश्वगुरु भारत” के जो नारे लगाये गये वे सभी सम्मिलित रूप से संघ की हिन्दू धार्मिक कट्टरपन्थी राजनीति में एक नयी जान पूँफकने का काम कर रहे हैं जिसका फायदा भाजपा को ही होगा। केजरीवाल के पार्टी बनाने से भाजपा नाख़ुश है क्योंकि उसे लग रहा है कि कांग्रेस विरोधी वोट काटकर यह पार्टी चुनाव में तो उसे ही नुकसान पहुँचायेगी। दूसरी ओर, रामदेव के कारनामों से कुल मिलाकर चुनाव में भाजपा को फायदा मिलने की उम्मीद है। इसीलिए दिल्ली में रामदेव के मंच पर भाजपा के अध्यक्ष नितिन गडकरी पहुँचकर रामदेव के पैर छू रहे थे।
आज बढ़ते आर्थिक संकट के कारण लोगों में पनपते असन्तोष के माहौल में ये आन्दोलन जनता के बीच भ्रम पैदा कर रहे हैं, और जनता के सामने कोई क्रान्तिकारी विकल्प न होने के चलते लोकरंजक नारे देकर उन्हें अपने प्रभाव में ले रहे हैं। आर्थिक ढाँचे में कोई बदलाव किये बिना सिर्फ सामाजिक-राजनीतिक ढाँचे को बदलकर किसी समाधान की बात करना हास्यास्पद है। पूँजीवादी व्यवस्था के तार-तार कुर्ते में पैबन्द लगाने की कोशिश करने वाले हर आन्दोलन को यह व्यवस्था अपने हित में अपना और अपने मुताबिक ढाल लेती है जो व्यवस्था के वर्ग चरित्र पर पर्दा डालने में उसकी मदद करता है। आर्थिक ढाँचे में आमूलगामी बदलाव मेहनतकश जनता के क्रान्तिकारी आन्दोलन के द्वारा राज-काज, समाज और उत्पादन के पूरे ढाँचे को बदलकर ही लाया जा सकता है। ऐसे बदलाव का कोई भी कार्यक्रम साम्राज्यवादी और पूँजीवादी शक्तियों द्वारा देश के संसाधनों और जनता की मेहनत की कमाई की लूट पर तुरन्त रोक लगायेगा। यह देश में निवेश की गयी सभी विदेशी कम्पनियों की पूँजी को तुरन्त ज़ब्त करेगा और सभी विदेशी कर्जों को रद्द कर देगा, देश के सभी मठों-मन्दिरों, वक्फ बोर्डों, चर्चों आदि के पास मौजूद खरबों की सम्पत्ति को ज़ब्त कर सामाजिक काम में लगायेगा, देश के सभी बड़े कारख़ानों का प्रबन्धन तुरन्त मज़दूरों की चुनी हुई कमेटियों को सौंप देगा, हर काम करने लायक व्यक्ति को काम करने का अधिकार देगा और काम करने की बाध्यता लागू करेगा, समाज के हर व्यक्ति को रोटी, कपड़ा, शिक्षा, चिकित्सा और घर की सारी मूलभूत सुविधाओं का अधिकार सुनिश्चित करेगा। इस प्रकार तृणमूल स्तर पर आर्थिक सम्बन्धों में परिवर्तन की माँग के बिना सारे नारे यूटोपियाई और भ्रामक हैं जो जनता को बदलाव की इच्छा से विमुख करते हैं और वर्तमान जर्जर पूँजीवादी व्यवस्था में पैबन्द लगाकर उसे चलाने की प्रतिक्रयावादी मानसिकता को बढ़ावा देते हैं।

Sunday, May 27, 2012

Illusions and Reality of Agitation Against Corruption: Slogan-Mongering to Divert Public Attention!

These days most of the agitations and slogans of anti-corruption movement are seems on hold. May be corruption fighters are on the way to make some plans for future agitations. So, it is a good time to think on the topic of corruption in detail, because when facebook posts and blogs are flooded with anti-corruption slogans, at that time most of the people who flow with this flood don't try to listen anything from others. Neither these people try to understand any logical points on the whole movement, nor do they try to understand the final result and outcome of all these agitation. So, now, when everything is calm and the anger of Indian middle class against corruption is in the process to cool down, it is right time to put a critical analysis of the anti-corruption movement leaded by social activist Anna Hazare and Kejriwal team and Yoga teacher Ramdev and his supporters.
Still we can see a lot of anti-corruption statements and slogans in newspapers, in facebook, and in other social networking sites. It is a signal how deeply this slogan mongering is influencing middle class people. During anti-corruption movement its organizer were talking about some problems, giving some facts and figures, and trying to influence people on their slogans, and finally drawing conclusion that corruption and black money are the two root cause responsible for every other problem, which are daily faced by crores of malnourished, unemployed and poor people. But, if we analyze the national situation with some logic we will find that corruption is also one of the many problems, which are continuously taking birth in the present capitalist system to serve the interest of the profiteers.
But, this whole movement blames that policies of the present political system need "enhancement"; and people who are implementing these policies are not doing their work with "honesty", so they need some monitoring for "proper" ruling of the system. And finally, it gives slogans to mobilize middle class people for "enhancement" of these policies to rule the system, and suggest another institution (Lokpal) to regulate the people who rule the system. Within this system these anti-corruption activists (who claim themselves as the representatives of the public!) never blame the system where everything is decided, ruled, and regulated on the interest of profit and ownership of the capital, where masses of the working people are indirectly as well as directly forced to work in the conditions, which are like animals. Only because they have nothing for their livelihood except selling their labor power to some property owner, same as other commodities are sold in the market. We can see a lot of example in the whole country where masses are living and working like animals to produce more and more profit for their owners. These "leaders" never expose this profit driven system before the eyes of public. They never tell that accumulation of resources in the normal process of capitalist mode of production and exchange is leading to the centralization of resources and means of the production in the hands of few people, who finally regulate every decision of the state with their interest —with or without corruption. Final aim and slogans of these people is to upgrade policies and bring honest people for the ruling of this system based on the exploitation of masses by few people for profit.
At the same time across the world whole capitalist imperialist system is facing the challenges of crises, and public protests are on rise against the anti-people policies of the ruling states. At this condition, when England was burning in the anger of public unrest and people of U.S.A., Egypt, Greek, Italy, France, Russia are protesting against rising unemployment, poverty and social insecurity, anti-people policies of the state; in that situation in India, everyday headlines of newspapers and TV channels were flashing with the slogans of anti-corruption movements, and statements of the members of "Team Anna" and their holy supporters. With these flashing all issues of the public, like unemployment, increasing rich-poor gap, inflation, poverty, inhuman work conditions, unavailability of healthcare and education etc. were made hidden behind omnipresent carpet of the anti-corruption movement. What better advantages can the present rulers of the capitalist system can get from the slogan and arguments of the "Team Anna" or "Team Baba"!!
If we see the class structure of the supporters who initiate this type of movement, they belong to middle and higher middle class. These people see corruption as the ...

Tuesday, August 16, 2011

अन्ना की गिरफ्तारी, स्वतंत्रता और जनवाद का हनन, और "सभ्य-समाज"

आज सुबह अन्ना हजारे के गिरफ्तार होने के बाद पूरी मीडिया और अखबारों में बयान आ रहे थे कि सरकार जनवादी अधिकारों और स्वतंत्रता का हनन कर रही है । आज भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस पूरे आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे अन्ना हजारे, जो अब तक सिर्फ भ्रष्टाचार को हर समस्या का आधार बता रहे थे, और जनता को विश्वास दिला रहे थे कि भ्रष्टाचार समाप्त होने के साथ ही सभी समस्याएँ भी दूर हो जाएँगी। लेकिन आज, जब अन्ना हजारे गिरफ्तार हुए तो सारा कार्य "संवैधानिक" तरीके से किया गया । भले ही बाद में उन्हें रिहा कर दिया जाये, फिर भी गिरफ्तारी संविधान के कानूनो के दायरे में ही हुई है । सरकार ने उनके आन्दोलन को सुरक्षा व्यवस्था के लिये खतरा बताकर जेपी पर्क में धारा 144 लगाई, और सुबह उन्हें जाते समय गिरफ्तार कर लिया । इस पूरी घटना में, जिसे जनवादी अधिकारो का हनन कहा जा रहा है, "भ्रष्टाचार" का कोई हाथ नहीं है, और सरकार हर चीज़ संविधान के कानूनों के अनुसार कर रही है । (Reference: NDTV India)
"सभ्य-समाज" (सिविल सोसाइटी) को साधारण जनता का मसीहा बनानें में लगे अन्ना जी, जो खुद भी "सभ्य-समाज" के एक प्रतिनिधि हैं, उन्हें और उनके जैसे अनेक "सभ्य-समाज" के लोगों को यह समझनें में काफी समय लग गया (ज़रूरी नहीं कि समझ ही गये हों, लेकिन हम मान लेते है!!) कि पूँजावादी जनवाद में शासक वर्ग हर समय जनता की स्वतंत्रता का हनन करता है । "सभ्य-समाज" के लोगों को यह बात कभी-कभी सिर्फ तब समझ में आती है जब मज़बूरी में राज्य़ सत्ता को उनके ऊपर थोड़ा सा बल प्रयोग करना पड़ता है ।
लेकिन, अन्ना हजारे जैसे "सभ्य-समाज" के लोग एक गरीब मज़दूर या किसान की स्वतंत्रता की सच्चाई को कभी नहीं समझ सकते, जिसका पूँजीवाद में एक गरीब व्यक्ति के लिये कोई मतलब नहीं है। जहाँ एक गरीब मज़दूर की स्वतंत्रता और जनवादी अधिकारों का हनन उसकी फ़ैक्टरी का एक सुपरवाइजर भी उसे गालियाँ देते हुए, उसपर भौतिक एवं मानशिक रूप से हिंसा करते हुये, हर दिन करता है। और एक गरीब व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके जनवादी अधिकार तो एक छुटभैया पुलिस के सिपाही के डंडे के सामने भी कोई मायने नहीं रखते। और यह सब भ्रष्टाचार के कारण नहीं बल्कि असमानता और शोषण पर आधारित समाज के भीतर सम्पत्ति के आधार पर होता है। जिसे व्यापक जनता को शिक्षित, आन्दोलिद और जन पहलतदमी पैदा किये बिना लागू नहीं किया जा सकता।
अन्ना हजारे जी शायद अब स्वतंत्रता की इस सच्चाई को समझ सकेंगे, लेकिन उन्हें और उनके जैसे "सभ्य-समाज" के अन्य लोगों को यह समझनें में काफी समय लगता है, और ज्यादातर तो अपने पूरे जीवन भर में यह नहीं समझ पाते, क्योंकि उन्हें कभी ऐसी अमानवीय परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता । लेकिन गरीब लोग (मज़दूर, किसान और बेरोजगार जनता), जिनकी स्वतंत्रता का रोज अनेक प्रकार से हनन होता है, उन्हे इसका अहसास व्यवहारिक जीवन में रोज होता है, जिसका एक बहुत ही छोटा सा नगण्य अहसास शायद अन्ना जी को आज सुबह हुआ होगा । लेकिन इन गरीब लोगों के पास न तो मीडिया का समर्थन है, और न ही "सभ्य-समाज" उनके साथ है, और उनकी हर आवाज़ को बिना किसी को पता चले दबा दिया जाता है। आन्ना हजारे के साथ तो हजारों लाखों की संख्या में जनता है, और पूरा पूँजीवादी मीडिया उनका साथ दे रहा है, लेकिन, एक व्यक्ति, यदि उसके पास पैसा न हो, तो उस अकेले व्यक्ति की स्वतंत्रता का अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
मैं इन्तजार कर रहा हूँ कि, कब "सभ्य-समाज" के लोगों को पूँजीवाद की इस सच्चाई का पता लगेगा और अन्ना हजारे कहेंगे कि पूँजीवादी जनतंत्र सम्पत्तिधारी वर्ग की तानाशाही होता है, जहाँ आम-जनता की स्वतंत्रता सिर्फ सम्पत्ति से निर्धारित होती है ।
[नोट: अभी ताजी खबर मिल रही है कि अन्ना को रिहा किया जा रहा है, और सरकार से बातचीत के बाद उनके रवैये में नरमी भी आई है!! (Reference: NDTV )]

Thursday, February 24, 2011

"पवित्र" पूँजीवाद: भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष के नाटक का एक नया राग

वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों में पूँजीवादी मीडिया और पूँजीवादी राजनीतिक संगठन कई घोटालों और भ्रष्टाचारों के खुलासे होने के कारण उछल कूद कर रहे हैं और राजनीति के पतन पर अपने विरोध का प्रदर्शन कर रहे है। पूँजीवादी व्यवस्था की इस बहती नदी में कई राजनीतिक संगठन पैदा हो गए हैं और "अपराधियों को सजा दिलाने के लिए", "काले धन को वापस लाने के लिए", "भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए" और "छोटी मुद्रा शुरू करके बड़ी रिश्वत रोकने के लिए" आदि जैसी अनेक माँगों को लेकर अभियान चला रहे है, आंदोलन कर रहे हैं और ज़ोरदार तरीकों से प्रदर्शन कर कर रहे हैं। ऐसा लग रहा है जैसे घोटाले की बारिश के बाद पूँजीवादी तालाब और गड्ढों के किनारों पर निकल कर अनेक मेढक भ्रष्टाचार के विरोध में टर्राने लगे हों।
अगर हम इनसे पूछे कि "भ्रष्टाचार" के विरोध से मेहनतकश जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा, जो काम के दौरान, काम के बाद रास्तों में, घरों से लेकर किसी भी अन्य सामाजिक स्थल तक, हर पल, पूँजीवादी शोषण का सामना कर रही है। ये लोग नहीं बताते कि शोषण और अत्याचार झेल रही मेहनतकश जनता के लिए इनके न्याय का स्वरूप क्या होगा? हम उनसे पूँछना चाहते है कि, "समस्यायें किसे हैं, पहला) पूँजीपति वर्ग को, जो श्रम का शोषण करके संसाधनों का संचय कर रहा हैं और जिसने अनेक लोगों को उनके कार्य और आजीविका से बेदख़ल करके सड़क पर फेंक दिया है? या दूसरा) पूँजीवादी राजनीतिज्ञो को, जो पूँजीवाद के सुगम संचालन के लिए पूँजी का प्रबंधन (मैनेज) और जनता का उत्पीड़न करने के लिए सदैव तैयार रहते हैं? या तीसरा) मध्य वर्ग और कुलीन वर्ग को, जिसे चैन की नाव में बैठ कर "बेचैनी" के साथ गरीबी की गंगा में मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा का विहार करने के लिए और दूसरों के श्रम पर जीने एवं मज़दूरों के शोषण का समर्थन करने के लिए प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रिश्वत दी जाती है?" या पूँजीवाद की ज़र्जर व्यवस्था में भ्रष्ट लोगों की कमी हो गई थी? पूँजीवाद के इन समर्थकों के लिए, जो पूँजीवाद को बचाने के लिए अपने घरों से बाहर निकल आए हैं, सारी समस्यायें सिर्फ "भ्रष्टाचार" के कारण मौजूद है। इसलिए वे चिल्लाते हैं, " भ्रष्टाचार के विरुद्ध हमारे साथ आइए।" ("और हम एक जादू की छड़ी घुमाएँगे और उसके बाद अन्य सभी समस्यायें ग़ायब हो जाएँगी!!")
यदि सीधे-सीधे कहें तो ये राजनीतिक संगठन भ्रष्टाचार विरोधी मांगों का ग्लूकोस देकर पूँजीवाद के राक्षस का जीवन थोड़ा और बढ़ना चाहते हैं| इन शब्दों को पढ़कर भ्रष्टाचार का विरोध करके "जनता" की "सेवा" करने वाले कई लोग गुस्से से अपनीं भौंहे ऊपर कर लेंगे और कई "भ्रष्टाचार" विरोधी इन तथ्यों को गलत सिद्ध करने के लिए अपने अनुमान के धनुष पर आलोचना के बाण रखकर चलानें लगेंगे, इन महारथियों को पूँजीवादी अखबारों और पत्रिकाओं के कुछ तथ्य देखने चाहिए,
पहला: भारत दस देशों के अरबपतियों की संख्या के बीच विश्व में शीर्ष से तीसरे स्थान पर है [टाइम्स लाइव, 30 सितम्बर 2010]। और भारत में अगले दस सालों में अरबपतियों की संख्या विश्व में सबसे ज्यादा होगी [सिलिकॉन इंडिया, मई 2008],
दूसरा: भारत के ५५% लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करते हैं, [द टाइम्स ऑफ इंडिया, 15 जुलाई 2010]च और पूँजीवादी संकट के परिणाम स्वरूप विकासशील देशों में 64 लाख से अधिक लोगों को अत्यधिक गरीबी की कतारों में जुडनें (१.२५ $ से कम की आमदनी पर आजीविका) की संभावना है [विश्व बैंक रिपोर्ट 2010]
तीसरा: विश्व की एक तिहाई गरीब आबादी अकेले भारत में रहती है [द टाइम्स ऑफ इंडिया 27 अगस्त 2008, —नया वैश्विक गरीबी अनुमान — विश्व बैंक]
चौथा: भारत के १०,००० लोगों में से केवल ९ लोग (०.०००९ %) प्रति माह १०,००० रुपये से अधिक कमा पाते हैं [भारतीय 'मध्यम वर्ग' के अधिकांश.., द टाइम्स ऑफ इंडिया, 22 अगस्त 2010]|
पाँचवाँ: कई घोटालों के खुलासों से पता चला है कि सरकार पूँजीपति वर्ग के मुनाफे के लिए (बिना किसी भ्रष्टाचार के) अरबों रुपए "मदद" के लिए बांट देती है; और मेहनतकश जनता के श्रम से पैदा होने वाली राष्ट्रीय संपत्ति को पूँजीपतियों के बीच "सर्वश्रेष्ठ" तरीके से बांटने में "सक्षम" व्यक्तियों को मंत्रिमंडल में भेजा जाता है, (जिन्हे जनतंत्र का प्रतिनिधि कहा जाता हैं) | [घोटाले के संबंधित नेताओं, उध्योगपतियों और प्रशासनिक अधिकारियों के बयान और लेख —द टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिंदू, आउटलुक, फ्रंटलाअन]
इन सभी तथ्यों के साथ कई अन्य तथ्य भी उपलब्ध है और संसदीय चुनावी राजनीत के बारे में आज सभी मेहनतकाश यह जानते हैं| यदि इनको अपने काल्पनिक शक की दरिद्रता से छुटकारा पाना हो तो उन्हें देख सकते हैं? इस समय गुस्से में ऊपर चड़ी हुए अपनी भौंहें को भी नीचे झुक लेना चाहिए| मेहनतकश लोगों को इन "पवित्र" पूँजीपतियों से (जिनमें कुछ संत भी हैं) कहना चाहिए कि हमारे साथ आइए और सबके लिए शोषण रहित समानता के विचारों का प्रचार कीजिए, क्योंकि गरीब मजदूर और किसान, जो वास्तव मे शोषण और उत्पीड़न से घिरे हुए अपना पूरा जीवन गुजारते है, उनके पास कुछ नहीं होता। और मेहनतकश जनता को समानता का अधिकार सिर्फ वोट डालने के लिए ही दिया गया है, जिसके वाद उसको अलग कर दिया जाता है और सारे समाज (को लूटनें) की "जिम्मेंदारी" कुछ चुनें हुए लोगों के हाथ में आ जाती है। और इनके जैसे लोगों को भ्रष्टाचार को हर समस्या की जिम्मेदार ठहराकर खुद पूँजीवाद की सेवा (कानूनी भ्रष्टाचार) में तल्लीन होने का मौका मिल जाता हैं | {See: आज जन-तंत्र का स्वरूप क्या है}
कई अन्य छोटे-पूँजीवादी नेता, अर्थशास्त्री, और मध्यम वर्ग के बुद्धिजीवी जोरदार तरीके से सुझाव देते है कि "ईमानदार" लोगों को राजनीति के "नियंत्रण" में ले आओ और सब सही हो जाएगा; (इनकी नजरों मे हर पैसे बाला "ईमानदार" है!) और उत्पादन संबंधों को बदलने की कोई आवश्यकता नही पड़ेगी। अब, हमें इनसे कहना (बताना!) चाहिए कि हर व्यक्ति "ईमानदार जन्म लेता है" और समाज की भौतिक परिस्थतियो —पूँजी द्वारा श्रम के शोषण और मुनाफा केंद्रित सामाजिक उत्पादन संबंधों— के प्रभाव से भ्रष्ट हो जाता है।
समाज के इन "उद्धारकों" ने आपनीं माँगों मे "ईमीनदारी" (पूँजीवाद के प्रति) के साथ सामाजिक उत्पादन संबंधों और समाज के आर्थिक ढाँचे के प्रश्नो से किनारा कर लिया है और यह लोग पूँजीवाद की स्वाभाविक गतिकी से होने वाले पूँजी के संचय और संपत्ति के केंद्रीकरण के बारे में कुछ नहीं बोलते। शेयर बाजार के जुआघर में वित्तीय पूँजी को ऐसा ही छोड़ देते हैं। और पूँजी द्वारा श्रम की लूट के बारे में कभी बात नहीं करते एवं अत्यंत "आसान" समाधान देते हैं कि विनिमय के साधनों को नियंत्रित करो। वे चिल्लाते है कि मुद्रा के बड़े . . . .

Popular Posts