Showing posts with label Howard Fast (हावर्ड फास्ट). Show all posts
Showing posts with label Howard Fast (हावर्ड फास्ट). Show all posts

Tuesday, January 1, 2013

हावर्ड फास्ट के उपन्यास आदिविद्रोही (Spartacus) का एक अंश


राजनीति और समाज की वर्गीय संरचना पर (ग्रैकस सिसेरो की बातचीत)
(ग्रैकस - रोम का राजनीतिज्ञ, सिसेरो - रोम के अभिजात वर्ग का एक प्रतिनिधि)
ग्रैकस ने अपनी भारी आवाज में कहा — ज़्यादातर। इतिहास धूर्तता और लोभ की सफ़ाई देने की कोशिश का नाम है। मगर यह सफ़ाई कभी ईमानदार नहीं होती। इसीलिए मैंन तुमसे राजनीति के विषय में पूछा। किसी ने वहाँ विला सारिया में यह बात कही थी कि स्पार्टकस की सेना में कोई राजनीति न थी। मगर ऐसा नहीं हो सकता।
सिसेरो मुस्कराया और बोला — तुम राजनीतिज्ञ हो इसीलिए मुझे बतलाओ कि राजनीतिज्ञ क्या होता है?
— चालबाज, ग्रैकस ने संक्षेप में उत्तर दिया।
— तुम और कुछ हो न हो स्पष्टवादी ज़रूर हो।
— मुझमें यही एक गुड़ है और यह एक बहुत मूल्यवान् गुड़ है। राजनीतिज्ञ के अन्दर इस चीज़ को देखकर लोग अक्सर इसको ईमानदारी समझने की भूल किया करते हैं। देखो हम लोग एक गणतन्त्र में रहते हैं। इसका मतलब है कि बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास कुछ भी नहीं है और मुट्ठी भर लोग ऐसे हैं जिनके पास बहुत कुछ है। और जिनके पास बहुत कुछ है उनकी रक्षा, उनका बचाव उन्हीं को करना है जिनके पास कुछ भी नहीं। इतना ही नहीं बल्कि वे लोग जिनके पास बहुत कुछ है उनको अपनी सम्पत्ति की रक्षा करनी होती है और इसलिए वे जिनके पास कुछ भी नहीं है, उनको तुम्हारे और मेरे और हमारे अच्छे मेज़बान एण्टोनियस की सम्पत्ति के लिए जान देने को तैयार रहना चाहिए। इसके साथ-ही-साथ यह भी है कि हमारी तरह के लोगों के पास बहुत से गुलाम होते हैं। ये गुलाम हमको पसन्द नहीं करते। हमको इस भ्रम का शिकार न होना चाहिए कि गुलाम अपने मालिकों को पसन्द करते हैं। वे नहीं करते और इसलिए गुलाम हमारी रक्षा गुलामों से नहीं कर सकते। इसलिए बहुत से लोग जिनके पास गुलाम नहीं है, उनको हमारे लिए जान देने को तैयार रहना चाहिए ताकि हम अपने गुलाम रख सकें। रोम के पास ढाई लाख सैनिक हैं। इन सैनिकों को विदेशों में जाने के लिए तैयार रहना चाहिए, इसके लिए तैयार रहना चाहिए कि मार्च करते-करते उनके पैर घिस जायें, कि वे गन्दगी में और ग़लाजत में रहें, कि वे खून में लोट लगायें — ताकि हम सुरक्षित रहें और आराम से जिन्दगी बितायें और अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति को बढ़ायें। जब ये सैनिक स्पार्टकस से लड़ने के लिए गये तो इनके पास कोई चीज़ न थी जिसकी कि वे रक्षा करते जैसी कि गुलामों के पास थी। आख़िर क्या चीज़ उनके पास थी जिसकी रक्षा करने के लिये वे स्पार्टकस से लड़ने गये थे? मगर तब भी गुलामों से लड़ते हुए वे हज़ारों की संख्या में मारे गये। हम इसके आगे भी जा सकते हैं। वे किसान जो गुलामों से लड़ते हुए मारे गये, सेना में उनके होने का सबसे पहला कारण यह है कि जागीरदारों ने उनको खेतों से खदेड़ दिया है। गुलामों को लेकर जो बड़ी—बड़ी जागीरें चलती थीं जिनमें बड़े पैमाने पर खेती होती थी उन्होंने उन किसानों को एकदम भिखमंगा बना दिया है, ऐसा भिखमंगा जिसके पास जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं; और फिर मज़ा यह है कि इन्हीं जागीरों की हिफ़ाजत के लिए वे किसान जान देते हैं। इसको देख कर कहने का जी होता है कि वाह, यह तो हद हो गई! क्योंकि मेरे प्यारे दोस्त सिसेरो, जरा सोचो कि अगर गुलाम विजयी होते तो इससे हमारे बहादुर रोमन सैनिक का क्या नुक़सान होता? सच बात तो यह है कि उन गुलामों को हमारे इन रोमन सैनिकों की बड़ी सख्त जरूरत होती क्योंकि ज़मीन की जुताई के लिए गुलाम खुद काफ़ी न होंगे। ज़मीन इतनी काफ़ी होगी कि सबको पूरी पड़ जाए और तब हमारे इस रोमन सैनिक के पास वह चीज़ होगी जिसका सपना वह सबसे ज़्यादा देखा करता है, जमीन का उसका अपना टुकड़ा और उसका निज का छोटा सा मकान। मगर तब भी वह अपने ही सपने को नष्ट करने के लिए लड़ने को चला जाता है। किसलिए? इसीलिए कि सोलह गुलाम मेरे जैसे एक मोटे थुलथुल बुड्ढे खूसट को गद्देदार पालकी में बिठाकर ढोते फिरें! क्या तुम कह सकते हो कि मैं जो कुछ कह रहा हूँ झूठ कह रहा हूँ?
— मेरा ख़याल है कि जो कुछ तुम कह रहे हो अगर वह किसी साधारण आदमी ने बीच चौक में खड़े होकर कहा होता तो हमने उसे सलीब पर चढ़ा दिया होता।
— सिसेरो सिसेरो, ग्रैकस हँसा, मैं क्या इसे अपने लिए धमकी समझूँ? मैं बहुत मोटा और भारी और बुड्ढा हूँ, मुझे सलीब पर चढाना मुमकिन न होगा। और फिर यह तो बताओ कि सच को सुनकर तुम इतना घबरा क्यों जाते हो? दूसरों से झूठ बोलना ज़रूरी है मगर क्या यह ज़रूरी है कि हम खुद अपने ही
झूठ पर विश्वास करें
?
— यह तुम्हारा ख़याल है। मगर तुम इस बुनियादी सवाल को छोड़ जाते हो — क्या कोई आदमी किसी दूसरे आदमी जैसा ही होता है या उससे भिन्न होता है? तुम्हारे इस छोटे से भाषण में यही असंगति है। तुम पहले से यह मानकर चलते हो कि सब आदमी बिलकुल एक से होते हैं। मैं इस बात को नहीं मानता। मैं मानता हूँ कि श्रेष्ठ लोगों का अपना एक वर्ग होता है, ऐसे लोग जो दूसरों से ऊँचे होते हैं। बहस की चीज़ यह नहीं है कि उनको ईश्वर ने ऐसा बनाया या परिस्थितियों ने। मगर इतना है कि उन लोगों में शासन करने की योग्यता होती है। और चूँकि उनमें शासन करने की योग्यता होती है इसीलिए वे शासन करते हैं। और बाक़ी लोग भेंड़—बकरियों के समान होते हैं इसलिए उनका आचरण भी भेंड़—बकरियों के समान होता है। देखो न तुम एक सूत्र पेस करते हो; असल मुश्किल तो उसकी व्याख्या करने में होती है। तुम समाज की एक तस्वीर पेश करते हो, लेकिन अगर सच्चाई भी तुम्हारी तस्वीर ही की तरह असंगत होती, तो समूचा ढाँचा एक ही दिन में भरभरा पड़ा होता। तुम क्यों यह नहीं बतला पाते कि वह कौन सी चीज़ है जो इस असंगत पहेली को समेटकर रक्खे हुए है और गिरने नहीं देती।
ग्रैकस ने सिर हिलाया और कहा — उसको समेट कर रखनेवाला, उसको न गिरने देनेवाला मैं हूँ।
— तुम? अकेले तुम?
— सिसेरो, क्या तुम सचमुच मुझे गधा समझते हो? मैंने बहुत लम्बी और ख़तरों से भरी हुई ज़िन्दगी गुज़ारी है और मैं अब भी चोटी पर हूँ। तुमने थोड़ी देर पहले मुझसे पूँछा था कि राजनीतिज्ञ क्या होता है? राजनीतिज्ञ ही इस उल्टे सीधे मकान को खड़ा रखने वाला सीमेण्ट है। उच्च वंशों वाले स्वयं इस काम को नहीं कर सकते। पहली बात तो यह कि उनके सोचने का ढंग तुम्हारे जैसा है और रोम के नागरिकों को यह पसंद नहीं है कि कोई उनको भेड़—बकरी कहे। भेड़—बकरी वे नहीं हैं — जैसा कि एक न एक दिन तुम्हारी समझ में आयेगा। दूसरी बात यह है कि इस उच्चवंशीय व्यक्ति को इस साधारण नागरिक के बारे में कुछ भी नहीं मालूम। अगर यह चीज़ बुल्कुल उसी पर छोड़ दी जाए तो यह ढाँचा एक दिन में भरभरा पड़े। इसीलिए वह मेरे जैसे लोगों के पास आता है। वह हमारे बिना ज़िन्दा नहीं रह सकता। जो चीज़ नितान्द असंगत है हम असके अन्दर संगति पैदा करते हैं। हम लोगों को यह समझा देते हैं कि जीवन की सबसे बड़ी सार्थकता अमीरों के लिये मरने में है। हम अमीरों को समझा देते हैं कि उन्हें अपनी दौलत का कुछ हिस्सा छोड़ देना चाहिए ताकि बाक़ी को वे अपने पास रख सकें। हम जादूगर हैं। हम भ्रम की चादर फैला देते हैं और वह ऐसा भ्रम होता है जिससे कोई बच नहीं सकता। हम लोगों से कहते हैं, जनता से कहते हैं — तुम्हीं शक्ति हो। तुम्हारा वोट ही रोम की शक्ति और कीर्ति का श्रोत है। सारे संसार में केवल तुम्हीं स्वतन्त्र हो। तुम्हारी स्वतन्त्रता से बढ़कर मूल्यवान कोई भी चीज़ नहीं है, तुम्हारी सभ्यता से अधिक प्रशंसनीय कुछ भी नहीं। और तुम्हीं उसका नियन्त्रण करते हो; तुम्हीं शक्ति हो, तुम्हीं सत्ता हो। और तब वे हमारे उम्मीदवार के लिए वोट दे देते हैं। वे हमारी हार पर आँसू बहाते हैं, हमारी जीत पर खुशी से हँसते हैं। और अपने ऊपर गर्व अनुभव करते हैं और अपने को दूसरों से बढ़ा—चढ़ा समझते हैं क्योंकि वे गुलाम नहीं हैं। चाहे उनकी हालत कितनी ही नीचे गिरी हुई क्यों न हो, चाहे वे नालियों में ही क्यों न सोते हों, चाहे वे तलवार के खेल और घुड़दौड़ के मैदानों में सारे—सारे दिन लकड़ी की सस्ती सस्ती सीटों पर ही क्यों न बैठे रहते हों, चाहे वे अपने बच्चों के पैदा होते ही उनका गला क्यों न घोंट देते हों, चाहे उनकी बसर खैरात पर ही क्यों न होती हो और चाहे अपनी पैदाइश से लेकर मरने  तक एक रोज़ काम करने के लिए हाथ न उठाया हो, यह सब चाहे जो हो मगर इतना इत्मीनान क्या कम है कि वे गुलाम नहीं हैं! वे धूल हैं मगर हर वार जब वे किसी गुलाम को देखते हैं तो उनका अहम् जागता है औऱ वे अपने आप को गर्व से और शक्ति से भरा हुआ महसूस करते हैं। उस वक्त उनकी समझ में बस यही आता है कि वे रोम के नागरिक हैं और सारी दुनिया के लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं। और, सिसेरो, यह मेरी विशेष कला है। राजनीति को कभी तुच्छ मत समझना।

Thursday, January 6, 2011

उपन्यास आदिविद्रोही (Spartacus) के कुछ उध्दरण

हावर्ड फास्ट के उपन्यास आदिविद्रोही (Spartacus) से कुछ उध्दरण:
"इन्सानों को जब तुमने जानवर बना दिया तब फिर वे फरिश्तों की तरह नहीं सोच सकते." - 91.2
"न्याय था मजबूत के हाथ का एक औजार जिसे वह जैसे चाहे इस्तेमाल करे और नैतिकता थी कमजोर के मन की एक भ्रांति, वैसी ही भ्रांति जैसे भगवान." - 153.2
"कुछ लोन उस बिंदु पर पहुँच जाते हैं जहाँ वे अपने आप से कहने लगते हैं -अगर मैं ये काम नहीं करता तो मेरे जिंदा रहनें की न तो कोई जरुरत है और न उसमें कोई तुक ही है- और जब बहुत सारे लोग उस बिंदु पर पहुँच जाते हैं तो धरती काँपने लगती है." - 174.2
"महान व्यक्ति हर रोज सवेरे अपनी महानता का चोगा पहन लेते हैं क्योंकि रात के वक्त तो महान व्यक्ति भी दूसरे साधारण जनों की तरह हो जाते हैं और उनमें से कुछ बहुत घ्रणित काम करते हैं और कुछ रोते हैं और कुछ मौत के डर से और अपने चारों तरफ के अंधेरे से भी ज्यादा घटाटोप अंधेरे के डर से दुबके-सिमटे रहते हैं." - 210.1
"ग़ुलाम तुम्हारा खाता है और मर जाता है मगर यह मज़दूर अपने आपको सोने मे बदल देते हैं. और फिर मुझे इसकी भी फ़िक्र नहीं करनी पड़ती कि उन्हे क्या खिलाऊँ और कहाँ रख्खूँ." - 321.4
"आशा किसके लिये? और कहाँ हैं आज वे आशाएँ. क्या तुम नहीं देखती कि दुनिया में कोई दूसरा तरीका इसके अलावा नहीं है और न कभी होगा - कि मजबूत कमजोर पर राज करे." 361.5
"कथाएँ लोककथाएँ बन गयीं और लोककथाओं नें प्रतीकों का रूप ले लिया मगर उत्पीड़कों के बिरुद्ध उत्पीड़ितों का युद्ध बराबर चलता रहा. . . और जब तक आदमी मेहनत करेगा और कुछ थोड़े से लोग उसकी मेहनत का फल उनसे छीन कर हड़प जायँगे, तब तक स्पार्टकस के नाम को लोग याद करेंगे - . . . " - 361.3
उपन्यास "आदिविद्रोही" (Spartacus) का ऐतिहासिक विश्लेषण: उपन्यास की कहानी ३०० इ.प़ू. में रोम के ग़ुलाम विद्रोह को लेकर लिखी गई है,  कि किस तरह एक ग़ुलाम, स्पार्टकस के नेतृत्व में गुलामों ने मिलकर रोम साम्राज्य के खिलाफ अपनी आज़ादी के लिए विद्रोह किया | इस बिद्रोह में ग़ुलामों की हार होती है, जिन्हें रोमन सेना कुचल देती है, और उन्हें सजा के प्रतीक के रूप में ज़िन्दा सलीबों पर लटका दिया जाता है | परन्तु, इसके बाद का इतिहास हर व्यक्ति को पता है, कि अंततः कई शताब्दीयों तक शंघर्ष के बाद दास व्यवस्था का अंत हो गया .... | {1}
अनेक अन्य जन-संघर्षों का इतिहास अलग-अलग रूपों, परिस्थितियों और समय के अनुरूप ऐसा ही था; जिसमें दबी कुचली जनता (शोषित वर्गों) नें संगठित होकर शोषण के शासनों को क्रांतिकारी तरीके से ध्वस्त करके नई समाजिक व्यवस्था का निर्माण किया, और मानव सभ्यता को नयी मंजिलों में पहुँचाया | {2}
__________
{1] मार्क्स और एंगेल्स के शब्दों में, "Hitherto, every form of society has been based . . . on the antagonism of oppressing and oppressed classes."
{2} इसी एतिहासिक भौतिकवादी संबंध में मार्क्स और एंगेल्स ने लिखा है "The [written] history of all hitherto existing society is the history of class struggles."

Popular Posts