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Friday, August 30, 2019

WhoWas Tolstoy - A Short Para by Gorky

I am posting this short paragraph written about Tolstoy by Russian writer Gorky. All who don't know who was Tolstoy, can read it and know him, as long as they know who Gorky was.
"I once saw him as, perhaps, no one has ever seen him. I was walking over to him at Gaspra along the coast, and behind Yussupor’s estate, on the shore among the stones I saw his smallish, angular figure in a gray, crumpled, ragged suit and crumpled hat. He was sitting with his head on his hands, the wind blowing the silvery hairs of his beard through his fingers: he was looking into the distance out to sea, and the little greenish waves rolled up obediently to his feet and fondled them as they were telling something about themselves to the old magician. It was a day of sun and cloud, and the shadows of the clouds glided over the stones, and with the stones the old man grew now bright and now dark. The bowlders were large, riven by cracks and covered with smelly seaweed; there had been a high tide. He, too, seemed to me like an old stone come to life, who knows all the beginnings and the ends of things, who considers when and what will be the end of the stone, of the grasses of the earth, of the waters of the sea, and of the whole universe from the pebble to the sun. And the sea is part of his soul, and everything around him comes from him, out of him. In the musing motionlessness of the old man I felt something fateful, magical, something which went down into the darkness beneath him and stretched up like a search-light into the blue emptiness above the earth; as though it were he, his concentrated will, which was drawing the waves to him and repelling them, which was ruling the movements of cloud and shadow, which was stirring the stones to life. Suddenly, in a moment of madness, I felt, “It is possible, he will get up, wave his hand, and the sea will become solid and glassy, the stones will begin to move and cry out, everything around him will come to life, acquire a voice, and speak in their different voices of themselves, of him, against him.” I cannot express in words what I felt rather than thought at that moment; in my soul there was joy and fear, and then everything blended in one happy thought: “I am not an orphan on the earth, so long as this man lives on it.”
“Reminiscences of Leo Nikolaevich Tolstoy” By Maxim Gorky

Wednesday, March 8, 2017

समाज के घटियापन और हर एक व्यक्ति के कर्म के बारे में मक्सिम गोर्की के कुछ व्यक्तिगत अनुभव

"अपने आप में छोटी विजय भी आदमी को अधिक प्रबल बनाती है।" - मक्सिम गोर्की
आज कल के नौजवान जो एक दायरे से आगे सोचने में अक्षम हैं क्योंकि वे जिस सामाजिक सांचे ढांचे में पल बढ़ रहे हैं वह उन्हें अतार्किक बनाकर मुनाफे के लिये बिना कोई सवाल उठाये काम में लगे रहने वाली एक मशीन बनाने की एक पूरी फैक्टरी है। कुछ ऐसे हालात का वर्णन गोर्की ने 20वीं सदी के रूस में अपने जीनव के बारे में किया है, गोर्की के ये अनुभव काम करने वाले हर एक नौजवान को जानने चाहिये । गोर्की की पुस्तक सृजन-प्रकिया और शिल्प के बारे में से,
ऐसा लगता था मानो मैं एक घने वन में रास्ता भूल गया हूँ जिसमें चारों ओर हवा से गिरे हुए बहुत से पेड़ हैं, घनी झाड़ियां और सड़े हुये पत्ते हैं जिनमें मैं घुटनों तक धंसा जा रहा हूँ।
बहुते से यूवकों के सामने एसे शब्द आते होंगे जो उसकी कल्पना में वैसी ही चालक शक्ति भर देतें होंगे, जैसे अनुकूल हवा जहाज़ के पाल में।
जीवन के घटियापन तथा निष्ठरता का भय मैंने बहुत अच्छी तरह अनुभव किया था, मैंने आत्महत्या की चेष्टा भी की जिसे मैं बहुत दिनों तक गहरी लज्जा तथा आत्मघृणा की भावना के बिना याद नहीं कर सकता था।
मुझे उस डर से छुटकारा तब मिला जब मैंने यह जान लिया कि लोग उतने बुरे नहीं होते जितने अज्ञान होते हैं, कि मैं उनसे या जीवन से नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक तथा अन्य प्रकार की अज्ञानता, जीवन के समक्ष अपनी निराश्रयता तथा असहायता के कारण भयभीत हूँ। स्थिति वास्तव में यही थी। मैं समझता हूँ कि आपको इस बाते पे अच्छी तरह विचार करना चाहिये क्योंकि आपमें से कुछ लोग जो विवाप और शिकायत करते हैं उसका कारण इसके सिवा कुछ नहीं है कि उनमें जीवन के समक्ष निराश्रयता की भवना है, पुराना संसार मानव को बाहर तथा अन्दर से उत्पीड़ित करने के लिये जिन सब चीजों का प्रयोग करता है उनके विरुद्ध लड़ने की अपनी क्षमता में विश्वास का अभाव है।
"आपको अपने आपमे तथा अपनी शक्ति में विश्वास की भावना पैदा करनी चाहिये, और विश्वास बाधाओं को कुचलने तथा संकल्प को दृढ़ करने से प्राप्त होता है। आपको सीखना होगा कि कैसे अपने आपमें कखा अपने आसपास से अतीत की घटिया तथा धृणित विरासत को निकाल फेंकें।
"प्रत्येक वस्तु जो वास्तव में मूल्यवान है, स्थाई रूप से उपयोगी तथा सुन्दर है, जिसे मनुष्य ने विज्ञान, कला तथा प्रविधि के क्षेत्र में प्राप्त किया है, वह ऐसे व्यक्तियों की उपलब्धि है जो अवर्णनीय रूप से कठिन स्थितियों में, समाजकी अत्यंत अज्ञानता, चर्च के भयंकर द्वेषभाव, पूँजीपतियों को धनलिप्सा, तथा कला और विज्ञानों के संरक्षकों की सनकी माँगों के बातावरण में काम करते रहे थे।

"पुस्तकों से मनुष्यों के बारे में मुझे ऐसी बातों का ज्ञान हो सकता है जो मैंने पहले उसमें नहीं देखी थीं या नहीं जानता था। जीवन के बुरे पहलू को भी आदमी को उसी तरह जानना चाहिये जिस तरह अच्छे पहलू को। आदमी को अधिक से अधिक ज्ञान होना चाहिये। आदमी का अनुभव जितना विविध होगा, उसकी उड़ान उतनी उतनी ही ऊँची तथा दृष्टि क्षेत्र व्यापक होगा।

Friday, March 3, 2017

नौजवानों, लेखकों और कलाकारों के संदर्भ में - मक्सिम गोर्की के कुछ शब्द (Maxim Gorky Quotes)

कलाकार अपने देश तथा वर्ग का संवेदनशील ग्रहणकर्ता है – उसका कान, आँख तथा हृदय है। वह अपने युग की आवाज है। उसका कर्तव्य है कि जितना कुछ जान सकता हो जाने और अतीत को वह जितनी भलीभाँति जानेगा, वर्तमान को उतना ही अधिक अच्छी तरह समझेगा और उतनी ही गहराई और सूक्ष्मता से वह हमारे समय की सर्वव्यापी क्रान्तिकारिता तथा उसके कार्यभार की व्यापाकता को बोधगम्य कर सकेगा। उसके लिये जनता के इतीहास का ज्ञान आवश्यक है और इसी प्रकार सामाजिक तथा राजनीतिक चिन्तन का ज्ञान भी।
मेरे लिये मानव से परे विचारों का कोई अस्तित्व नहीं है। मेरे नज़दीक मानव तथा एकमात्र मानव ही सभी वस्तुओं और विचारों का निर्माता है। चमत्कार वही करता है और वही प्रकृति की सभी शक्तियों का भावी स्वामीं है। हमारे इस संसार में जो भी अति सुन्दर है उसका निर्माण मानव श्रम, और उसके कुशल हाथों ने किया है। हमारे सभी भाव और विचार श्रम की प्रक्रिया में उत्पन्न होते हैं और यह ऐसी बात है, जिसकी कला, विज्ञान तथा प्रविधि का इतिहास पुष्टि करता है। विचार तथ्य के पीछे चलता है। मैं मानुष्य को इसी लिये प्रणाम करता हूँ कि इस संसार में मुझे कोई ऐसी चीज़ नहीं दिखाई देती जो उसके विवेक, उसकी कल्पनाशक्ति, उसके अनुमान का साकार रूप न हो।
यदि पावन वस्तु की चर्चा आवश्यक ही है, तो वह है अपने आपसे मानुष्य का असंतोष, उसकी यह आकांक्षा कि वह जैसा है उससे बेहतर बने। जिन्दगी की सारी गन्दगी के प्रति, जिसे उसने स्वयं जन्म दिया है, उसकी घृणा को भी मैं पवित्र मानता हूँ। ईर्षा, धनलिप्सा, अपराध, रोग, युद्ध तथा संसार में लोगों के बीच शत्रुता का अंत करने की उसकी इच्छा और उसके श्रम कों पवित्र मानता हूँ।

पुस्तक भी जीवन और मानव के समान ही है। वह भी एक सजीव तथा बोलता तथ्य है, और वह उन सब वस्तुओं की तुलना में जिनकी सृष्टि मनुष्य ने की है, या कर रहा है, सबसे कम वस्तु है।

Tuesday, May 24, 2016

गोर्की के लेख व्यक्तित्व का विघटन का एक अंश (फासीवाद के उभार और वर्तमान के व्यक्तियों को समझने के लिये) - A Quote by Maxim Gorky



"व्यक्तिवाद जिस समय अपनी मृत्युशैया पर अन्तिम साँसें गिन रहा था, उस समय पूँजीवाद, अपनी इच्छा के विरुद्ध समष्टि की पुरनर्सृष्टि कर रहा था और सर्वहारा वर्ग को एक ठोस नैतिक शक्ति में बलात् ढाल रहा था। धीरे-धीरे, किन्तु क्रमशः बढ़ती हुई गति से, इस शक्ति को यह चेतना प्राप्त होती गई कि विश्व की महान् समष्टि-शक्ति होने के नाते स्वतंत्र रूप से जीवन का पुनर्निर्माण करने का दायित्व अस पर ही है।
व्यक्तिवादियों को इस शक्ति का उदय होना ऐसा लगता है जैसे क्षितिज पर तूफानी बादलों की काली घटा घिर आई हो। यह शक्ति उनको उतनी ही डरावनी लगती है, जितनी शारीरिक मृत्यु, क्योंकि उनके लिए यह सर्वहारा वर्ग, जो संसार में तो एक नया जीवन फूँकने के लिये कटिबद्ध है, लेकिन आत्मा के इन अभिजात प्रतिनिधियों के बीच अपनी सहानुभूति बाँटने का इरादा नहीं रखता। इस स्थिति के प्रति जागरूक होने के कारण यह सज्जन सर्वहारा वर्ग से दिली नफ़रत करते हैं।
आध्यात्मिक दरिद्रता की स्थिति में पहुँचकर, विसंगतियों में फँसकर और हमेंशा समृद्धि के आरामदेह कोने में शरण लेने की हास्यास्पद और दयनीय चेष्टाओं में पड़कर, व्यक्ति विघटित हो रहा है और उसकी मानसिकता निरन्तर क्षद्र से क्षुद्रतर होती जाती है। इस बात की अनुभूति से और निराशा के आतंक से घबराकर, जिसे वह चाहे स्वीकार करता हो या स्वयं अपने-आपसे छिपाता हो, व्यक्तिवाद विक्षिप्त की तरह मुक्ति की तलाश में इधर-उधर भटकता फिर रहा है, और कभी अधिभौतिक तत्वज्ञान में डुबकी लगाता है, कभी पापाचार के कीचड़ में धँस जाता है, कभी ईश्वर की खोज करता है, तो कभी शैतान में विश्वास करने लगता है। उसकी समस्त खोज और व्याकुलता उसकी आसन्न मृत्यु की पूर्वसूचक है, और उसके भविष्य की ओर संकेत करती है जिसकी स्पष्ट चेतना उसे चाहे न हो, लेकिन जिसका तीखे रूप से वह अनुभव करने लगा है। आज का व्यक्तिवादी एक घबराहट भरे अवसाद के चंगुल में फंस गया है। वह अपना आपा और विवेक खो बैठा है और जीवन पर अपनी पकड़ कायम रखने के लिये जी-तोड़ कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी शक्ति दम तोड़ रही है और अब उसके पास अपनी चालाकी और धूर्तता के अलावा और कोई सहारा नहीं रहा, जिसे कुछ लोग मूर्खों का विवेक कहते हैं। अपने पूर्व-व्यक्तित्व का मात्र खोल ओड़े, आत्मा में थकान और मन में व्यग्र करने वाली आशंकाएँ लिये, वह अब कभी समाजवाद से इश्क फ़रमाता है तो कभी पूँजीवाद की खुशामद करता है, जबकि उसके अन्दर आसन्न मौत की पूर्वचेतना, उसकी क्षुद्र और बीमार मैं के विघटन की रफ़्तार को और भी तेज कर देती है। उसकी निराशा अब अक्सर एक भयंकर अनास्था का रूप ले लेती है और व्यक्तिवादी कल तक जिसकी पूजा करता आया था आज उसको उन्मादी की तरह नकारने और जलाने लगता है, क्योंकि नकारात्मकता की स्वभाविक परिणति इस तरह की उच्छृंखलता और गुंडागर्दी में ही होती है। मैं इस शब्द का प्रयोग करके उन लोगों का अपमान नहीं करना चाहता जो पहले से ही अपमानित किये जा चुके है, न तिरस्कृत लोगों का तिरस्कार करना चाहता हूँ – ज़िन्दगी स्वयं बड़ी कठोरता से उनके साथ ऐसा व्यवहार करती रही है—नहीं, मेरा मन्तव्य केवल यह है कि उच्छृंखलता और गुंडागर्दी दरअसल व्यक्ति के चरम विघटन का अकाट्य प्रमाण पेश करती है। यह शायद कोई पुराना मानसिक रोग है जो अपर्याप्त सामाजिक पोषण के कारण पैदा होता है, ज्ञानेद्रियों की कोई बीमारी है जो धीरे-धीरे कुंठित और सुस्त होती जाती है और परिवेश से प्रप्त प्रभावों को पर्याप्त तीव्रता से ग्रहण नहीं कर पाती और इस तरह व्यक्ति में एक प्रकार की बौद्धिक संज्ञाहीनता पैदा हो जाती है।
उच्छृंखल या गुंडा व्यक्ति ऐसा प्राणी होता है जिसमें सामाजिकता लेशमात्र को भी नहीं होती है। वह ऐस प्राणी होता है जो अपने आस-पड़ोस की दुनिया के साथ कोई ताल्लुक महसूस नहीं करता. हर प्रकार के जीवन-मूल्यों के प्रति अचेत होता है और धीरे-धीरे अपने-आपको नष्ट होने से बचाने की सहज वृत्ति भी खो देता है और अपने जीवन की कीमत से भी बेख़बर हो जाता है।"
-व्यक्तित्व का विघटन, मक्सिम गोर्की

Sunday, November 1, 2015

गोर्की और मुक्तिबोध के दो उद्धरण (Two Quotes of Gorky and Muktibodh)

कभी-कभी कुछ ऐसे नैजवान मिलते हैं जो वर्तमान व्यवस्था के वैचारिक दमनकारी चरित्र के प्रति अलगाव से खुद को उत्पीणित महसूस करते हैं। लेकिन कुछ सकारात्मक कर पाने की जगह पर उनके आस-पास का माहौल उनके विचारों और व्यक्तित्व को हर स्तर पर कुचल कर एक कायर भीड़ में तब्दील कर रहा है। आज ऐसे नौजवानों को सही दिशा में सोचने और लम्पट भीड़ में सामिल हो जाने से रोकने के लिये सबसे पहली आवश्यकता तो यह है कि हर स्तर पर नये भविष्योन्मुख प्रगतिशील मूल्यों को उनके बीच पहुँचाया जाये और उन्हें एस संजीदा इंसान बनने के लिये प्रेरित किया जाये।
जैसा कि गोर्की ने आज से 80 साल पहले रूस के बारे में कहा था जो हमारे वर्तमान समाज में नोजवानों की स्थिति के बारे में काफी सटीक विवरण प्रस्तुत करता है,
जीवन की ठोस हक़ीकत इस बात की अधिकाअधिक पुष्टि कर रही है कि वर्तमान स्थिति में चैन का जीवन सम्भव नहीं, कूपमण्डूकी खुशहाली स्थाई नहीं हो सकती क्योंकि उस प्रकार की खुशहाली के आधार समस्त संसार से खत्म होते जा रहे हैं। .. समस्त संसार कूपमण्डूक झुँझलाहट, उदासी तथा आतंक के चंगुल में है; धनी कूपमण्डूक उदास होकर इस निरर्थक आशा से मनोरंजन का सहारा ले रहा है कि इससे वह आनेवाले कल के भय को दबा सकेगा; और इसलिये अश्लील भोग-विलास की अस्वस्थ लालसा, मैथुनिक विपथन और अपराध तथा आत्महत्याओं का चक्र चलता है। पुरानी दुनिया अवश्य ही जानलेवा रोग से ग्रस्त है और हमें उस संसार से शीघ्रतिशीघ्र अपना पिण्ड छुड़ा लेना चाहिये ताकि उसकी विषैली हवा कहीं हमें न लग जाये।
बीस वर्षों तक मैंने बापों और बेटोंमें शत्रुता के ऐसे अशिष्ट दृश्य देखे, उस प्रकार की विचारधारात्मक शत्रुता के नहीं, जिसका तुर्गनेव ने सुन्दर वर्णन किया है, बल्कि हर दिन की ऐसी पाषविक शत्रुता जो निजी सम्पत्ति की भावना रखने वाला बाप ऐसी भावना वाले बेटे के प्रति अनुभव करता है। ज्यों ही उस युग का युवक जीवन की समस्याओं में गहरी दिलचस्पी या अपने जानलेवा और असभ्य वातावरण के प्रति आलोचनात्मक होने की स्वाभाविक प्रवृत्ति प्रकट करता तो जागरूक बाप आलोचनात्मक प्रवृत्ति के व्यक्तित्व के चारों ओर शत्रुता का वातावरण खड़ा कर देते, युगों से चली आने वाली परम्परा से विश्वासघात का संदेह पैदा होता और इन सबके साथ सत्य का उपदेश आवश्यक था जो घूँसे, डण्डे, कोड़े या छड़ी की सहायता से दिया जाता। इस उपदेशका अन्त सामान्यतया इस तरह होता कि बेचारा विपदाग्रस्त व्यक्ति आदिम मानव की स्थिति में पहुँचा दिया जाता यानि बाप खुद अपने बेटों को अपनी कूपमण्डूकता प्रदान करते।”( लेखनकला और रचनाकौशल, गोर्की)
ऐसे में मुक्तिबोध का यह उद्धरण अत्यन्त सटीक है,
यदि व्यक्ति में मनुष्यता है तो, निश्चय ही वह अपने जीवन में प्रप्त वास्तविक मूर्त आदर्शों और लक्ष्यों की तरफ़ बढ़ेगा, उसे बढ़ना पड़ेगा। अपने जीवन की भीतरी तथा बाहरी प्रेरणाएँ उसे लक्ष्योन्मुक बनायेंगी ही, उन आदर्शों की और ठेलेंगी। वह अपने जीवन के अनुभवों का वैज्ञानिक अवलेकन करता रहेगा, और अपने तथा दूसरों के अनुभवों से वह सीखगा ही, उसे सीखना पड़ेगा। किन्तु - और यह सबसे बड़ा किन्तु है- आदमीं में इतनी मनुष्यता रहती ही नहीं। साथ ही उसका आभाव भी कभी नहीं होता। किसी में वह कम होती है, किसी में में ज़्यादा, किसी में बहुत ज़्यादा। जिसमें जितनी अधिक मनुष्यता होती है, उसका वास्तविक सामाजिक संघर्ष भी उसे अधिक से अधिक सिखलाता है, और उसे विकास के नये रास्ते बतलाता है। जिस प्रकार वैज्ञानिक दृष्टिकोंण के कारण हमारी समझ बढ़ती है, उसी प्रकार हमारी भीतरी मनुष्यता के कारण हमारा वैज्ञानिक दृष्टिकोंण भी लक्ष्ययुक्त आदर्शमय होता है। फलतः, उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण का एक जीवन-व्यापी औचित्य सिद्ध होता है। यद दृष्टिकोंण निश्चय ही यान्त्रिक नहीं है। यान्त्रिकता परस्पर सम्बन्धों को, तथा जीवन प्रक्रियाओं के भीतरी गति श्रोत को, नहीं देखती, विकास को नहीं देखती। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वस्तुतः, यथार्थवादी दृष्टिकोण है, जो अपनी लक्ष्योन्मुखता के कारण ही तथ्य-संग्रह करता है। जिसकी जितनी बड़ी मनुष्यता होगी, निश्चय ही वह मनुष्य-जीवन के बारे में अधिक-से-अधिक ज्ञान रखेगा तथा उसे नवीन बनाता रहेगा।
मुश्किल यह है कि यह मनुष्यता अपनी लक्ष्य-प्रप्ति के लिये जिन संघर्षों की ओर व्यक्ति को ले जाना चाहती है, उस तरफ़ बहुत बार वह मुड़ता ही नहीं। और अगर मुड़ता है, तो गिरता-पड़ता। फलतः ज्ञान, इच्छा और क्रिया का सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाता, न वह हो सकता है। मनुष्यता के संदर्भ के बिना यदि ज्ञान, इच्छा तथा क्रिया में सामंजस्य स्थापित भी हो, तो वह लक्ष्यहीन सामंजस्य है। रीता सारसम्य है। प्रत्येक काल में मनुष्यता के साम्मुख, अपने उद्धार के कुछ विशेष लक्ष्य रहे हैं। उन लक्ष्यों की और जिस आदमी की भतरी मनुष्यता व्यावहारित सामाजिक क्षेत्र में जैसा और जितना संघर्ष करती है, उसी के अनुसार वह मनुष्य अपना अन्तर्वाह्य सन्तुलन और सामंजस्य स्थापित कर सकता है। निश्चय ही, स्वभाव-भेदानुसार मनुष्य के विभिन्न पक्षों का संयोजन तथा संतुलन भी भिन्न होगा। मनुष्यता के संघर्ष में पड़े हुए एक कलाकार का आन्तरिक संतुलन एक नेता के भीतरी सन्तुलन से निश्चय ही भिन्न होगा। किन्तु आन्तरिक सामंजस्य लक्ष्यहीन भी हो सकता है। उदाहरणतः, महाबलशाली स्वेच्छाचारी शासक अपने ज्ञान तथा इच्छानुसार, जनता-विरोधी कार्य भी कर सकता है।  उसमें विघटन नहीं होता । विघटन की क्रिया तो उन लोगों में सर्वाधिक होती है जो न पूरे लक्ष्यवान होते हैं, न गत-लक्ष्य; जो अधकचरे होते हैं और प्रवृत्तियों के वशीभूत होकर इधर-उधर भागते फिरते हैं।
सामंजस्य का प्रश्न मनुष्यता के सम्मुख उपस्थित अपने उद्धार के प्रधान लक्ष्यों के लिये चलनेवाले संघर्ष का प्रश्न है। वह जितना आत्मगत प्रश्न है, उससे कहीं ज्यादा वह सामाजिक प्रश्न है।” (कामायनी एक पुनर्विचार, मुक्तिबोध)

Saturday, August 8, 2015

Alcoholism and Crime in Capitalism: Some Views and Quotes



Maxim Gorky about Industrial Workers (from novel ‘Mother’):  “The day was swallowed up by the factory; the machine sucked out of men’s muscles as much vigor as it needed. The day was blotted out from life, not a trace of it left. Man same another imperceptible step towards his grace; But he saw close before his the delight of rest, the joys of the odorous tavern and he was satisfied… The accumulated exhaustion of years had robbed them of their appetites, and to be able to eat they drank, long and deep, goading on their feeble stomachs with the biting, burning lash of vodka… Returning home they quarreled with their wives, and often beat them, unsparing of their fists. The young people sat in the taverns of enjoyed evening parties at one another’s houses, played the accordion, sang vulgar songs devoid of beauty, danced, talked ribaldry and drank. Exhausted with toil, men drank swiftly, and in every heart there awoke and grew an incomprehensible sickly irritation, It demanded and outlet. Clutching disquieting sensation, they fell on one another for mare trifles, with the ferocity of beasts, breaking into bloody quarrels which sometimes ended in serious injury and on occasions even in murder.” (P.253)
A Journalist about Farmers in Villages: “For centuries heavy drinking seemed an indispensable and necessary part of life. The endless grey monotony of peasant life with its constant threat of famine and spice-breaking toil, the dirt and degradation of squalid city slums, stifling atmosphere of merchants’ homes – all this was an appropriate frame for ‘vodka,’ one of the few words.” (P.250)*
Conclusion in the words of Philosopher Friedrich Engels: “Worker drinks primarily to escape from the suffering of his daily existence under capitalism: “… he must have something to make work worth his trouble to make the prospect of the next day endurable… (He seeks) the certainty of forgetting for an hour or two the wretchedness and burden of life.” (P.252)*
*Books: How Capitalism Was Restored in the USSR

Wednesday, March 27, 2013

मक्सिम गोर्की — एक साहित्यिक - क्रान्तिकारी परिचय



मक्सिम गोर्की (28 मार्च 1868 18 जून 1936) को पूरी दुनिया में महान लेखक और समाजवादी यथार्थवाद के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है। रूस में ज़ारशाही के दौरान 1907 में हुई असफल क्रान्ति से लेकर 1917 में हुई अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति और उसके बाद के समाजवादी निर्माण तक के लम्बे दौर में मक्सिम गोर्की नें अपनी कहानियों, नाटकों, लेखों और उपन्यासों के माध्यम से हर क़दम पर जनता को अपनी परिस्थितियों के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा दी। वह अपने समय में दबी-कुचली जनता के आत्मिक जीवन के भावों की आवाज़ बनकर उभरे। बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से लेकर अक्टूबर क्रान्ति के बाद लगभग 40 वर्षों के दौरान गोर्की अपनी कलम से रूसी साहित्य और जनता में बदलाव के लिये एक नई ऊर्जा का संचार करते रहे। साथ ही उनका सारा सृजन भी जनता के जीवन और संघर्षों से करीब से जुड़ा रहा।
समाज के दबे कुचले वर्गों से बचपन से ही जीवन्त सम्पर्क में रहने वाले गोर्की के लेखन को उनके जीवन और उस समय के रूसी समाज के परिप्रेक्ष्‍य में रखकर देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि उनके साहित्यिक सृजन का स्रोत क्या था। गोर्की के माता-पिता बचपन में नहीं रहे थे और उनका बचपन अपनी नानी के यहाँ बीता जहाँ उन्हें एक रूसी मध्यवर्गीय परिवारिक माहौल मिला। नानी की मृत्यु के बाद सम्पत्ति को लेकर परिवार में लड़ाई-झगड़े होने लगे जिसके बाद गोर्की ने 13 साल की उम्र में घर छोड़ दिया और कई जगह काम बदलते हुये रूस के कई हिस्सों में घूमते रहे। इस दौरान उन्हें समाज को और क़रीब से देखने का मौका मिला और वह कई प्रकार के लोगों के सम्पर्क में आये। इस तरह गोर्की बचपन से ही एक मज़दूर के रूप में पले-बढ़े और घर में काम से लेकर बेकरी के क़ारख़ानों, जहाजों और खेतों तक कई काम करते उनका बचपन मेहनत और संघर्ष करते हुये बीता।
आने वाले समय में बचपन के यह अनुभव ही उनके साहित्यिक रचनाओं का आधार बने और वह जनता के मुक्ति संघर्ष का हिस्सा बनकर उभरे। अपने पूरे साहित्यिक सृजन में गोर्की ने रूसी जीवन की कड़वी सच्चाई का यथार्थवादी चित्रण किसी व्यक्ति के दृष्टिकोंण से नहीं किया है, बल्कि वह उन परिस्थितियों को बदलने के लिये एक प्रेरणास्रोत की तरह पाठक के सामने प्रकट होते हैं। गोर्की के शब्दों में, "सत्य दया से अधिक महत्व रखता है। और आज मैं अपनी नहीं, वरन् दम घोंटनेवाले उस भयंकर वातावरण की कहानी लिखने बैठा हूँ, जिसमें साधारण रूसी जनता रहा करती थी और आज भी रहती है।" "पुरानी दुनिया अवश्य ही जानलेवा रोग से ग्रस्त है और हमें उस संसार से शीघ्रातिशीघ्र पिण्ड छुड़ा लेना चाहिये ताकि उसकी विषैली हवा कहीं हमें न लग जाये।"
बचपन में समय-समय पर गोर्की का परिचय उस समय के रूस में ज़ारशाही निरंकुशता एवं दमन उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष करने वाले क्रान्तिकारियों से होता रहा, जिनके जीवन का उनके ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा, "उन अनगिनत लोगों में से पहले व्यक्ति से मेरी मित्रता का अन्त हुआ, जो देश के सर्वश्रेष्ठ सपूत होते हुए भी अपने ही वतन में अजनबी से हैं..." इन लोगों के सम्पर्क ने गोर्की को किताबों से परिचित कराया। गोर्की की जीवन परिस्थितियों ने उन्हें किसी स्कूल या विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने का कोई अवसर नहीं दिया, लेकिन उन्होंने स्वाध्याय और जनता से जुड़े रहकर प्राप्त अनुभव को अपनी शिक्षा का केन्द्र बनाया। गोर्की के शब्दों में, "मैं अपनी उपमा मधुमक्‍खी के छत्ते से दे सकता हूँ, जिसमें देश के अगणित साधारण प्राणियों ने अपने ज्ञान और दर्शन का मधु लाकर संचित किया है। सबों की बहुमूल्य देन से मेरे चरित्र का विकास हुआ। अक्सर देने वाले ने गन्दा और कड़वा मधु दिया, फिर भी था तो वह ज्ञान-मधु ही।"
गोर्की अपने बचपन में ही ज़ारशाही काल में रूसी जनता की ग़रीबी और उत्पीड़न को देख चुके थे और इस सच्चाई से अवगत हो चुके थे कि किस तरह उस समाज में एक बड़े हिस्से को दबे-कुचले तबकों के रूप में रहने और जानवरों की तरह जीवन व्यतीत करने के लिये मजबूर किया गया था, "मैं उनके बीच अपने आप को जलते अँगारों में डाल दिये गये जलते लोहे के टुकड़े की तरह महसूस करता था हर रोज मुझे अनेक तीखे अनुभव प्राप्त होते। मानव अपनी सम्पूर्ण नग्नता के साथ सामने आता था स्वार्थ और लोभ का पुतला बनकर। जीवन के प्रति उनका क्रोध, दुनिया की हर चीज़ के प्रति उनका उपहासजनक शत्रुता का भाव और साथ ही अपने प्रति उनका फक्कड़पन "
अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में ही गोर्की का परिचय तोलस्तोय और चेखव जैसे रूस के महान यथार्थवादी लेखकों से हुआ। गोर्की शुरूआती दिनों से ही क्रान्तिकारी आन्दोलनों से जुड़े रहे। बाद में कम्युनिस्ट पार्टी बोल्शेविक में शामिल होकर जनता के संघर्षों में काफ़ी क़रीब से जुड़ गये और इसी दौरान उन्होंने पार्टी में शामिल मज़दूरों और क्रान्तिकारियों के जीवन और संघर्ष पर आधारित अपना विश्व प्रसिद्ध उपन्यास "माँ" (1906) लिखा जिसके बारे में लेनिन ने कहा था कि इसे पढ़कर उन सभी मज़दूरों को क्रान्ति के उद्देश्यों को समझने में मदद मिलेगी जो स्वत:स्फूर्त ढंग से आन्दोलन में शामिल हो गये हैं।
आज भी, जबकि पूरी दुनिया के मज़दूर आन्दोलन ठहराव के शिकार हैं और प्रगति पर प्रतिरोध की स्थिति हावी है, ऐसे में गोर्की के उपन्यास और कहानियाँ पूरी दुनिया की जनता के संघर्षों के लिये अत्यन्त प्रासंगिक हैं। आज भी उनकी रचनायें पूरी दुनिया की मेहनतकश जनता को एक साम्यवादी समाज के निर्माण के लिये उठ खड़े होने और परिस्थितियों को बदल डालने के लिये संघर्ष करने, एक क्रान्तिकारी इच्छाशक्ति पैदा करने और सर्वहारा वर्ग चेतना को विकसित करने की प्रेरणा देती हैं। गोर्की का साहित्य हमारे मन में वर्तमान समाज में जनता की बदहाल परिस्थितियों के प्रति नफ़रत ही नहीं बल्कि उन परिस्थितियोँ के विरुद्ध संघर्ष करने और उन्हें बदलने की इच्छा भी पैदा करता है।
गोर्की अपने उपन्यास "माँ" में एक मज़दूर के शब्दों में विचार प्रकट करते हुये कहते हैं, "क्या हम सिर्फ़ यह सोचते हैं कि हमारा पेट भरा रहे? बिल्कुल नहीं" "हमें उन लोगों को जो हमारी गर्दन पर सवार हैं और हमारी आँखों पर पट्टियाँ बाँधे हुए हैं यह जता देना चाहिए कि हम सब कुछ देखते हैं।  हम न तो बेवक़ूफ़ हैं और न जानवर कि पेट भरने के अलावा और किसी बात की हमें चिन्ता ही न हो। हम इंसानो का सा जीवन बिताना चाहते हैं! हमें यह साबित कर देना चाहिए कि उन्होंने हमारे ऊपर खू़न पसीना एक करने का जो जीवन थोप रखा है, वह हमें बुद्धि में उनसे बढ़कर होने से रोक नहीं सकता!"
गोर्की ने रूस की दलित उत्पीड़ित जनता का जीवन जितने क़रीब से देखा था उतने ही स्पष्ट रूप से उसको अपने साहित्य में चित्रित किया और व्यापक जनसमुदाय को शिक्षित करने में एक अत्यन्त ऐतिहासिक भूमिका निभाई। अपनी आत्मकथा में गोर्की ने लिखा है, "दुनिया में अन्य कोई चीज़ आदमी को इतने भयानक रूप से पंगु नहीं बनाती जितना कि सहना और परिस्थितियों की बाध्यता स्वीकार कर उनके सामने सिर झुकाना।" गोर्की ने अपनी कहानियोँ, नाटकों, उपन्यासों और लेखों के माध्यम से समाज को सिर्फ़ चित्रित ही नहीं किया बल्कि उन्हें एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया, "क्या यह ज़रूरी है कि इस हद तक घिनौनी बातों का वर्णन किया जाये? हाँ, यह ज़रूरी है! यह इसलिये ज़रूरी है श्रीमान कि आप धोखे में न रहें, कहीं यह न समझने लगें कि इस तरह की बातें केवल बीते जमाने में हुआ करती थीं! आज भी आप मनगढ़न्त और काल्पनिक भयानकताओं में रस लेते हैं, सुन्दर ढंग से लिखी भयानक कहानियाँ और किस्से पढ़ने में आपको आनन्द आता है। रोंगटे खड़े कर देने वाली कल्पनाओं से आपके हृदय को सनसनाने और गुनगुनाने से आप ज़रा भी परहेज़ नहीं करते। लेकिन मैं सच्ची भयानकताओं से परिचित हूँ, आये दिन के जीवन की भयानकताओं से, और यह मेरा अवंचनीय अधिकार है कि उनका वर्णन करके आपके हृदयों को कुरेदूं, उनमें चुभन पैदा करूँ ताकि आपको ठीक-ठीक पता चल जाये कि किस दुनिया में और किस तरह का जीवन आप बिताते हैं।" "कमीना और गन्दगी से भरा घिनौना जीवन है यह जो हम सब बिताते हैं।" "मैं मानव-जाति से प्रेम करता हूँ और चाहता हूँ कि उसे किसी भी तरह के दुःख न पहुँचाऊँ, परन्तु इसके लिये न तो हमें भावुकता का दामन पकड़ना चाहिये और न ही चमकीले शब्द-जाल और खू़बसूरत झूठ की टट्टी खड़ी करके जीवन के भयानक सत्य को हमें छिपाना चाहिये! ज़रूरी है कि हम जीवन की ओर मुँह करें और हमारे हृदय तथा मस्तिष्क में जो कुछ भी शुभ और मानवीय है, उसे जीवन में उड़ेल दें।"
एक भौतिकवादी होने के नाते गोर्की मनुष्यों के स्वभाव के लिये परिस्थितियों को ज़ि‍म्मेदार मानते थे और इसलिए वह जीवन की भौतिक परिस्थितियों को बदलने पर ज़ोर देते थे, "रूसी अपनी ग़रीबी और नीरसता के कारण ऐसा करते हैं। व्यथा और रंज उनके मनबहलाव के साधन हैं।" "जब जीवन की धारा एकरस बहती है तो बिपत्ति भी मन बहलाने का साधन बन जाती है। घर में आग लग जाना भी नवीनता का रस प्रदान करता है।"
गोर्की अपने समय के वर्तमान जीवन की आलोचना के साथ ही वर्ग समाज में प्रतिस्पर्धा की होड़ में होने वाले मनुष्यों के व्यक्तिगत विघटन की कड़ी आलोचना करते थे और उनका मानना था कि जब तक मेहनत करने वालों की मेहनत को कुछ परजीवी हड़पते रहेंगे तब तक समाज में शान्ति नहीं हो सकती, "समूचे वातावरण में एक-दूसरे को भक्षण करने की एक अराजक प्रक्रिया निरन्तर लागू है; सभी मनुष्य एक दूसरे के दुश्मन हैं; अपना-अपना पेट भरने की इस गन्दी लड़ाई में भाग लेने वाला हर आदमी सिर्फ़ अपनी ही सोचता है और अपने चारों ओर संदेह की दृष्टि से देखता है, ताकि पड़ोसी कही उसका गला न धर दबोचे। थकानें वाली इस पाशविक लड़ाई के भंवर में फंसकर बुद्धि की श्रेष्ठतम शक्तियाँ दूसरों से अपनी रक्षा करने मे ही नष्ट हो जाती हैं, मानव अनुभव की वह उपलब्धि जिसे "मैं" कहते हैं, एक अंधेरा तहख़ाना बन जाती है जिसके अन्दर अनुभव को और अधिक सम्रद्ध न करनें और पुराने अनुभव को तहख़ाने की दम घोंटनेवाली कोठरियों में बन्द रखने की क्षुद्र प्रवृत्तियाँ हावी रहती हैं। भरे पेट के अलावा आदमी को और क्या चाहिए? इस लक्ष्य को पाने के लिए मनुष्य अपने उच्चादर्शों से फिसलकर गिर गया है और ज़ख्मी होकर आँखें फाड़े, पीड़ा से चीखता और कराहता नीचे पड़ा है।"
जनता के मुक्तिसंघर्ष में पूरा विश्वास रखने वाले और एक क्रान्तिकारी के रूप में उस संघर्ष में शामिल रहते हुये जीवन के प्रति गोर्की का दृष्टिकोंण आशावाद और जनता में दृढ़ विश्वास से भरा हुआ था, "हमारे जीवन की यही विलक्षणता नहीं है कि वह बर्बरता और पाशविकता की मोटी तह में लिपटा हुआ है, बल्कि यह कि इस तह के नीचे से आलोकमय, सबल, सृजनात्मक और भलाई की शक्तियाँ विजयी होकर बाहर आ रही हैं और यह दृढ़ आशा पैदा कर रही हैं कि वह दिन दूर नहीं, जब हमारे देश की जनता के जीवन में सौंदर्य एवं आलोकपूर्ण मानवता का सूर्य उगेगा और अवश्य उगेगा।"

गोर्की का पूरा जीवन और उनका साहित्यिक कार्य पूरी दुनिया के मज़दूरों के लिये एक प्रेरणास्रोत है, और अन्याय के विरुद्ध क़दम-क़दम पर हमें संघर्ष करने के लिये प्रोत्साहित करता है। उनका मानना था, "पूँजीवादी समाज में कुल मिलाकर मनुष्य अपने अद्भुत सामर्थ्य को निरर्थक लक्ष्यों की प्रप्ति के लिये बर्बाद करता है। अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिये उसे गली में हाथों बल चलना पड़ता है, द्रुतगति के ऐसे रिकार्ड स्थापित करने पड़ते हैं जिनका कुछ कम या कुछ भी व्यावहारिक मूल्य नहीं होता, एक ही वक्त में बीसियों के साथ शतरंज के मैच खेलने, अद्भुत कलाबाजियाँ खाने और काव्य-रचना के झूठे चमत्कार प्रदर्शित करने पड़ते हैं, और साधारणतया हर प्रकार की ऐसी बेसिरपैर की हरकतें करनी पड़ती हैं जिनसे उकताये तथा ऊबे हुए लोगों को पुलकित किया जा सके।. . . . "

अक्टूबर क्रान्ति के बाद सोवियत यूनियन में गोर्की अपने अन्तिम दिनों तक समाजवादी खेमें के अनेक युवा लेखकों का जोश के साथ नेतृत्व कर रहे थे। "अग्नि-दीक्षा" उपन्यास के लेखक निकोलाई ओस्त्रोव्स्की ने 1936 में गोर्की के बारे में लिखा है, "हमारी टुकड़ी का कमाण्डर ऊंचे कद का, सफेद बालों वाला कमाण्डर कहता है: "इन घिसटनेवालों का क्या करूँ? पीछे कहीं बैठे नाश्ता कर रहे होंगे" अगले दस्ते से कहीं 50 मील पीछे होंगे। उनकी पाकशाला पीछे कहीं दलदल में धंस गई है। मेरे बालों को ये लज्जित कर रहे हैं।" यह मज़ाक है ज़रूर, मगर एक कड़वा मज़ाक, इसमें सचाई कम नहीं।" प्रसिद्ध और सम्मानप्राप्त, अपनी कला में सिद्धहस्त अपनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए, धीरे से बड़े गंभीर लहजे में
अन्त में गोर्की के ही शब्दों में, "मेरे लिये मानव से परे विचारों का कोई अस्तित्व नहीं है। मेरे नज़दीक मानव तथा एकमात्र मानव ही सभी वस्तुओं और सभी विचारों का निर्माता है। चमत्कार वही करता है और वही प्रकृति की सभी भावी शक्तियों का स्वामी है। हमारे इस संसार में जो कुछ अति सुन्दर है उनका निर्माण मानव श्रम, और उसके कुशल हाथों ने किया है। हमारे सभी भाव और विचार श्रम की प्रक्रिया में उत्पन्न होते हैं और यह ऐसी बात है, जिसकी कला, विज्ञान तथा प्रविधि का इतिहास पुष्टि करता है। विचार तथ्य के पीछे चलता है। मैं मानव को इसलिये प्रणाम करता हूँ कि इस संसार में कोई ऐसी चीज़ नहीं दिखाई देती जो उसके विवेक, उसकी कल्पनाशक्ति, उसके अनुमान का साकार रूप न हो।

"यदि "पावन" वस्तु की चर्चा आवश्यक ही है, तो वह है अपने आप से मानव का असन्तोष, उसकी यह आकांक्षा कि वह जैसा है उससे बेहतर बने। ज़ि‍न्दगी की सारी गन्दगी के प्रति जिसे उसने स्वयं जन्म दिया है, उसकी घ्रणा को मैं पवित्र मानता हूँ। ईष्या, धनलिप्सा, अपराध, रोग, युद्ध तथा संसार में लोगों बीच शत्रुता का अन्त करने की उसकी इच्छा और उसके श्रम को पवित्र मानता हूँ।"

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