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Tuesday, March 3, 2015

देश की 50 फ़ीसदी युवा आबादी के सामने क्या है राजनीतिक-आर्थिक विकल्प

मुनाफाख़ोरी के सामने बाध्यता या नियोजित अर्थव्यवस्था का सूत्रपात
Published in Mazdoor Bigul, February 2015 : 

काम की तलाश कर रहे करोड़ों बेरोज़गार युवा, कारखानों में खटने वाले मज़दूर, खेती से उजड़ कर शहरों में आने वाले या आत्महत्या करने के लिये मज़बूर किसान, और रोजगार के सपने पाले करोड़ों  छात्र लम्बे समय से अपने हालात बदलने का इन्तजार कर रहे हैं। इन्तज़ार का यह सिलसिला आज़ादी मिलने के बाद आज तक जारी है। आज भारत की 50 फीसदी आबादी 25 साल से कम उम्र की है और देश के श्रम बाज़ार में हर साल एक करोड़ नये मज़दूरों की बढ़ोत्तरी हो रही है। लेकिन देश की पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था इस श्रम शक्ति को रोजगार देने में असमर्थ है जिससे आने वाले समय में बेरोज़गारों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि होने वाली है। वैसे भी वर्तमान में देश के 93 फीसदी से ज़्यादातर मज़दूर ठेके के तहत अनियमित रोज़गार पर बिना किसी संवैधानिक श्रम अधिकार के बदतर परिस्थितियों में काम करके अपने दिन गुज़ार रहे हैं।
इसी बीच एक आर्थिक सर्व में कहा गया है कि आने वाले सालों में देश की जीडीपी की आर्थिक विकास दर 8 फीसदी रहेगी। और इस विकास दर को हासिल करने के नाम पर सरकार देशी-विदेशी पूँजी के निवेश के लिये अनुकूल से अनुकूलतम महौल बनाने की बकालत कर रही है और आम बजट में भी इसके लिये पूरी कोशिश की गई है। लेकिन इस 8 फीसदी विकास के बदले में आम जनता के हालात कैसे होंगे इसके लिये देश की आर्थिक स्थिति से जुड़े सरकारी आंकड़ों को ठण्डे दिमाग से समझना होगा, जिसके आधार पर ही यह नतीजा निकाला जा सकता है कि निजी-पूँजी के निवेश से आम जनता को वास्तव में क्या मिलता है और निवेश करने वाले देश की प्राकृतिक सम्पदा और श्रम के शोषण के दम पर कितना मुनाफ़ा निचोड़ते हैं।
CSIR के एक सर्वेक्षण के अनुसार 2011-12 से 2017-18 तक, 8 सालों में लगभग 8.5 करोड़, यानि हर साल 1 करोड़ नये मज़दूरों की श्रम बाज़ार में बढ़ोत्तरी होगी। 2011-12 में 23.1 करोड़ मज़दूर दिहाड़ी करने, ठेला लगाने, या खेतों में काम करने जैसे अनियमित रोजगार में लगे हैं और 24 करोड़ उद्योगो में काम करने वाले मज़दूर है। यदि जीडीपी विकास की दर 6.5 प्रतिशत रहती है तो आने वाले 8 सालों में देश के उद्योगो में रोज़गार के मात्र 3.8 करोड़ नये मौके पैदा होंगे, जो पिछले 8 सालों की तुलना में 1.4 करोड़ (20 प्रतिशत) कम हैं। 2004-05 से 2011-12 के बीच आंकड़ों के अध्ययन से पता चलता है कि इन 8 सालों में देशी-विदेशी निवेश के चलते उद्योग क्षेत्र में 5.2 करोड़ नई नौकरियाँ पैदा हुईं, जबकि 3.7 करोड़ लोग अपने वर्तमान कामों से उजड़ गये। इसका अर्थ है कि 2004-05 से 2011-12 तक वास्तव में सिर्फ 1.5 करोड़ नये रोजगार के अवसर पैदा हुये, यानि हर साल सिर्फ 18 लाख।
इस सच्चाई के बावज़ूद यदि किसी पुँजीवादी अर्थशास्त्री की तरह कल्पना करें कि आने वाले 8 सालों में खेती और स्व-रोजगार में लगा एक भी मज़दूर अपने काम से नहीं उजड़ेगा तब भी 8.5 करोड़ नये श्रमिकों में से 3.8 करोड़ को ही रोज़गार मिल सकेगा और 5.7 करोड़ तब भी बेरोज़गार ही रह जाएँगे। तथ्यों की रोशनी में सच्चाई को देखें तो 2012-13 में खेती और स्व-रोजगार से जुड़े कामों से में होने वाला कुल उत्पादन देश की जीडीपी का सिर्फ 13.7 प्रतिशत है, जिसपर देश के लगभग 50 फीसदी मज़दूरों की आजीविका निर्भर है, जो देशी-विदेशी पूँजी निवेश के विस्तार के साथ लगातार उजड़ रहे हैं (Agriculture's share in GDP declines to 13.7% in 2012-13, Economic Times, 30 August 2013) (Agriculture Sector, 4 Dec, 2014, Ministry of External Affairs, Govt. of India)। इस परिस्थिति में यदि आने वाले समय में उजड़ने वाले मज़दूरों का सिलसिला पिछले सालों के बराबर भी रहेगा तो 2011-12 से 2017-18 तक कम से कम 3.7 करोड़ मज़दूर अपने वर्तमान कामों से उजड़ जाएँगे। ऐसी स्थिति में शहरों की ओर उद्योंगों में काम की तलाश में आने आने वाले कुल मज़दूरों की संख्या 12.2 करोड़ होगी 8.5 करोड़ नये और 3.7 करोड़ स्व-रोजगार या खेती से उजड़े हुए जिनमें से सिर्फ 3.8 करोड़ को रोजगार मिल सकेगा और बाकी 8.4 करोड़ मज़दूर ऐसे होंगे जिनके पास कोई काम नहीं होगा। यानि 8.5 करोड़ नये मज़दूर बज़ार में आएँगे और सिर्फ 10 लाख नये लोगों को उद्योगों में काम मिलेगा, बाकी बचे हुये मज़दूर अपने जीवन-यापन के लिये रेड़ी लगाने, दिहाड़ी करने या सब्ज़ियाँ बेचने जैसे काम करने के लिये मज़बूर होंगे और चाहे वे कितने भी कुशल और योग्य हों।
पूँजीवादी विकास के साथ आम जनता के लिये रोज़गार के अवसर लगातार कम हो रहे हैं जिसे आंकड़ों के आधार पर सरलता से समझा जा सकता है। 2011-12 में भारत में 10 लाख मूल्य का उत्पादन करने के लिये मज़दूरों की संख्या 2004-05 की तुलना में आधी हो चुकी है। वर्तमान में आईटी सेक्टर में 1 से दो लोग 10 लाख मूल्य सालाना का उत्पादन करते हैं और यह संख्या लगातार व्युत्क्रमानुपाती ढंग से बढ़ रही जिसके कारण अभी हाल ही में खड़े हुये आई.टी. सेक्टर में भी रोज़गार के अवसर कम हुये हैं और कुशल मज़दूरों की आवश्यकता घटी है। मुनाफ़ा केन्द्रित उत्पादन के तहत आटोमेशन और टेक्नोलाजी के विकास के साथ मज़दूरों की माँग  लगातार कम हो रही है जिससे आम मेहनतकश जनता के लिये रोज़गार के विकल्प कम हो रहे हैं। हर नई टेक्नोलॉजी और आटोमेशन की नई खोज के साथ कम श्रम शक्ति का स्तेमाल करके बढ़ा अतिरिक्त मूल्य, यानि बढ़ा मुनाफ़ा, पैदा करना भी आसान हो रहा है। एक ओर पूँजीपति वर्ग की सम्पत्ति मे बढ़ोत्तरी और शेयर बाज़ार में तेजी की दर बढ़ती जायेगी, तो दूसरी ओर श्रम के बाज़ार में अतिरिक्त-श्रम के रूप में बेरोज़गार मज़दूरों की संख्या बढ़ती जायेगी, जिससे श्रम-शक्ति का मूल्य घटेगा और कार्यक्षेत्र में मज़दूरों का खुला शोषण, काम की बदतर परिस्थितियाँ और मज़दूर परिवारों की बर्बादी भी बढ़ती जायेगी। अपराध, नैतिक पतन, वैश्यावृत्ति, और लम्पट तबकों में भी बढ़ोत्तरी होगी। कुशल मज़दूरों की आवश्यकता घटने के साथ आने वाले समय में कई और क्षेत्रों में भी ठेकाकरण को बढ़ावा दिया जायेगा और बचे-खुचे मज़दूर अधिकार भी विकास की भेंट कर दिये जाएँगे। एक आंकड़े के अनुसार यदि पूँजीवादी लूट के बीच कामों से उजड़ने वाले मज़दूरों की संख्या और बेरोजगारी की दर वर्तमान गति से बढ़ती रही तो 2016 तक दुनिया के सबसे अमीर 1 फीसदी लोगों के पास बाकी बचे 99 फीसदी लोगों की सम्पत्ति के बराबर सम्पत्ति हो जाएगी।। (1% के पास 99% से ज़्यादा की संपत्ति, BBC, 15 जनवरी 2015)
इन आंकड़ों से पूँजीवादी अर्थशास्त्रियों, जीडीपी या शेयर बाजार के विकास के लिये नारेबाज़ी करने वाले राजनेताओं का यह दावा कि पूँजी का निवेश (चाहे देशी हो या विदेशी) बढ़ने से रोज़गार बढ़ेगा कोरी बकवास सिद्ध हो जाता है। क्योंकि पूँजी निवेश जितने लोगों को रोजगार देता है उससे अधिक उजड़ जाते हैं। आर्थिक उत्पादन की मौजूदा परजीवी मंजिल में जहाँ किसी भी कीमत पर मुनाफ़ा कमाने की होड़ देशी-विदेशी पूँजीपतियों के बीच जारी है, यदि कोई यह कहता है कि पूँजी-निवेश को खुला बढ़ावा देने से जनता का विकास होगा तो उसे या तो समाज की जमीनी हकीकत का अन्दाज नहीं है या वह जानबूझ कर झूठ बोल रहा है। इन परिस्थियतियों को नियन्त्रित करने के लिये वर्तमान पूँजीवादी सरकार ज्यादा से ज़्यादा कुछ एनजीओ के माध्यम से या नरेगा जैसी कुछ कल्याणकारी योजनायें बनाकर समाज में बढ़ रहे अशंतोष और गुस्से को शान्त करने की कोशिश कर सकती है, उससे अधिक करने की क्षमता वर्तमान पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में नहीं है।
Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्रों में 29 साल या उससे अधिक उम्र के हर चार ग्रेजुएट में से एक (16.3 प्रतिशत) बेरोज़गार हैं (Jobs report gloomy, prospects worst for graduates, shows all-India govt data , Indian Express, 1 April 2014)। कुशल मज़दूरों की बात करें तो देश में हर साल 7 लाख इंजीनियर रोजगार की तलाश में आ रहे हैं जिनमें से 2011-12 में 1.05 लाख को नौकरी मिल पाती है जबकि 2017-18 में यह संख्या घटकर 55,000 रह जायेगी और इंजीनियरिंग के डिग्री धारकों की संख्या में बढ़ोत्तरी होगी (New IT Jobs Set to Fall by 50% in Four Years: Crisil, NDTV Profit, 10 November, 2014)
वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था रोज़गार पैदा करने में असमर्थ है और समाज के लोगों पर भार बन चुकी है। बावज़ूद इसके, मज़दूरों के संगठित न होने के कारण दलाल मज़दूर यूनियनों की मौजूदगी में खुली मुनाफ़ाखोरी और प्रकृति की बर्बादी जारी है। व्यवस्था के परजीवी चरित्र को छुपाने और बेरोज़गार नौजवानों को गुमराह करने के लिये आज-कल प्रचार किया जा रहा है कि भारत में 47 फीसदी ग्रेजुयेट (कुशल मज़दूर) रोज़गार देने के काबिल नहीं है उन्हें और कुशल बनाने की ज़रूरत है (The Hindu, 26 June 2013)। इस प्रचार से दिग्भ्रमित होकर कई मज़दूर जिन्हें रोजगार मिला होता है, वे अपने आप को दूसरों की तुलना में अधिक कुशल मान बैठते हैं। लेकिन यह सच्चाई ज्यादा दिन छुपी नहीं रह सकती और आज-कल तो यह सामने आने भी लगी है। इसका एक उदाहरण अभी हल ही में टी.सी.एस. और नोकिया जैसी आई.टी. कम्पनियों द्वारा अनुभवी श्रमिकों को निकाले जाने की घटना से समझा जा सकता है।
ऊपर आँकड़ों से हम देख चुके हैं कि देश में बेरोज़गारी लगातार बढ़ रही है, पढ़े-लिखे ग्रेजुएट और तकनीकि शिक्षा प्राप्त लाखों युवा काम की तलाश में भटक रहे हैं और खेती-बाड़ी से उजड़ कर गाँव के करोड़ों नौजवान काम की तलाश में शहरों की ओर आ रहे हैं। समाज के दो विपरीत छोरों पर गैर-बराबरी की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही और विकल्पहीनता की स्थिति में देश की व्यापक मेहनतकश, किसान तथा नौजवान आबादी किसी विकल्प की तलाश कर रही है। पिछले दिनों देश और राज्यों में एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी की सरकारों का जीतना इस बात का उदाहरण है कि जनता बदलाव के लिये विकल्प ढूँढ़ रही है। आने वाले समय में श्रम और पूँजी का यह अन्तर्विरोध और तीक्ष्ण होगा, और समाज की व्यापक आबादी जो मेहनतकश मज़दूर-किसान और छात्र हैं, वे अपने अधिकारों के लिये, यानि रोजगार और सम्माननीय काम की परिस्थितियों के लिये संगठित होकर सड़कों पर आयेंगे। इन परिस्थितियों में जनता को मूल मुद्दों से भटकाने के लिये हिन्दू-मुसलमान के नाम पर, दलित-व्राह्मण के नाम पर या बिहारी-मराठी-बंगाली के नाम पर एक दूसरे के खिलाफ भड़काकर उन्हें आपस में बाँटने के प्रयास भी बढ़ते जाएँगे। वर्तमान में धार्मिक उन्माद को बढ़ाने और लोगों को आपस में लड़ाने के लिये उकसाने की कोशिशें लगातार हो रही हैं। हर मेहनत करने वाले इंसान को यह अच्छी तरह से समझ लेना चाहिये कि आपस में लड़ाने वाली हर ताक़त विरोध करना ज़रुरी है ताकि देश की व्यापक आबादी आपनी वास्तविक माँगों के लिये संगठित होकर आगे आये जिससे समाज के हालात वास्तव में बदले जा सके।

References:
1)     Of Growth & Missed Opportunity , April 2014
2)      CRISIL Inside, January 2014
3)     Jobs report gloomy, prospects worst for graduates , Indian Express, 1 April 2014)
4)     New IT Jobs Set to Fall by 50% in Four Years: Crisil, NDTV Profit, 10 November, 2014
8)     Employment and Unemployment Situation in India, NSSO,  June 2011-June 2012
9)     Nearly 47 per cent graduates in India unemployable, The Hindu, 26 June 2013

Saturday, January 31, 2015

क्या दिल्ली में सरकार बदलने से वास्तव में बदलेंगे जनता के हालात ?


एक बार फिर चुनावी राजनीति के नये-पुराने नेता जनता के सामने अपनी-अपनी प्रशंसा करके वोटरों को लुभाने में लगे हैं। चुनावी जुमलों के बीच आम जनता की ज़िन्दगी से जुड़े मुख्य मुद्दे, जिनके लिये देश के अस्सी फीसदी से अधिक नौजवानों, मज़दूरों और किसानों को हर दिन जद्दो-जहद करनी पड़ती है, सभी नेताओं की जुबान से ग़ायब हैं। एक कहता है कि मैं बनिया का बेटा हूँ मेरा सहयोग कीजिये मैं व्यापार करना आसान बना दूँगा (जिससे कि आम जनता की मेहनत की खुली लूट की जा सके), वहीं दूसरा कहता है कि मैं व्यापारी हूँ मेरा सहयोग कीजिये मैं  नये-नये उद्योग  लगाने के लिये सारे नियम सरल कर दूँगा (जिससे किसी भी शर्त पर लोगों को मुनाफ़ा बनाने के लिये काम पर रखा जा सके)। 
मौजूदा हालात पर एक नज़र डालें तो राजधानी के लाखों काम करने वाले मज़दूर किसी न किसी कम्पनी में ठेकेदारों के लिये रोज़ाना 12-16 घण्टे काम करके 4000 से 6000 महीना की मज़दूरी पाते हैं। इन लाखों लोगों के लिये कोई वायदे न तो ईमानदार नेता कर रहे हैं न ही "अनुभवी", न खुद को व्यापारी कहने वाला कुछ बोल रहा है न खुद को बनिया कहने वाला इसके बारे में कोई बात कर रहा है।
क्या इन आत्ममुग्ध नेताओं से कोई यह पूँछेगा कि देश के काम करने वाले मज़दूरों-किसानों और छात्रों-नौजवानों की माँगों के बारे में ये लोग क्या करने वाले हैं। पूरे देश की अर्थव्यवस्था में व्याप्त खुली मुनाफाख़ोरी और लूट पर अंकुश लगाने के लिये इन लोगों का क्या रुख़ है, और अमीरों-ग़रीबों के बीच लगातार चौड़ी होती असमानता को रोकने के लिये यह लोग क्या करेंगे? कोई भी नेता इन सवालों को न तो उठा रहा है न कुछ बोल रहा है।
एक पार्टी के नेता ने अभी कुछ दिन पहले रवीश कुमार को दिये एक इण्टरव्यू में कहा है कि लोगों में कुशलता नहीं हैं इसलिये वे बेरोज़गार हैंइसलिये यदि उनकी सरकार बनेगी तो वह लोगों में कुशलता के लिये नये सेण्टर बनायेंगे। इन जैसे नेता तो लगता है कि सरकारी आंकड़ें भी नहीं देखते। राजधानी की ही बात करें तो यहाँ काम करने वाले ज़्यादातर मज़दूर ठेके पर काम करते हैं, जो कपड़ा फ़ैक्टरी, सरिया बनाने वाले कारख़ानों, आटोमोबाइल बनाने वाली कंम्पनियों, दिहाड़ी मज़दूरी या ठेला लगाने जैसे काम करते हैं, और इन कामों के लिये उन्हें किसी विशेष कुशलता की आवश्यकता नहीं होती। और यदि कुशलता की ही बात करनी है तो देश में ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट छात्रों की बेरोजगारी के आंकड़े उठाकर देख लेना ही काफी है। एक आंकड़ा देखकर हम देश के करोड़ों "कुशल" मज़दूरों के हालात का अन्दाज लगा सकते हैं। जुलाई 2014 के New Indian Express की एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले तमिलनाडु में 84 लाख बेरोज़गार नोकरियाँ ढूँढ़ रहे हैं जिनमें से 18 लाख ग्रेजुएट हैं और 6 लाख पोस्ट-ग्रेजुएट, जिनमें से 2.1 लाख इंजीनियर हैं। (See at : 70% Engineering Graduates Unemployed in State)। ऐसे में बेरोज़गारी का कुशलता से कोई सम्बन्ध होनेे का सवाल ही नहीं उठता, इसका मुख्य कारण है कुछ लोगों के हितों के लिये खुला निजीकरण और मुनाफ़ाखोरी।
इस परिस्थिति में सिर्फ नारेबाज़ी के झाँसे में आकर अपने मशीहा चुनने से क्या आम इंसानों के जीवन पर वास्तव में कोई फर्क पड़ेगा? यह गंभीरता से सोचने वाला सवाल है।

Thursday, January 15, 2015

क्या राजनीति करना सिर्फ जनता की मेहनत पर पलने वाले देश के "ठेकेदारों" और शेयर-मार्केट के दलालों का काम है ?

Published in Mazdoor Bigul, January 2015
(http://www.mazdoorbigul.net/archives/6636



सबसे निकृष्ट अशिक्षित व्यक्ति वह होता है जो राजनीतिक रूप से अशिक्षित होता है। वह सुनता नहीं, बोलता नहीं, राजनीतिक सरगर्मियों में हिस्सा नहीं लेता। वह नहीं जानता कि ज़िन्दगी की क़ीमत, सब्जियों, मछली, आटा, जूते और दवाओं के दाम तथा मक़ान का किराया यह सब कुछ राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करता है। राजनीतिक अशिक्षित व्यक्ति इतना घामड़ होता है कि इस बात पर घमण्ड करता है और छाती फुलाकर कहता है कि वह राजनीति से नफ़रत करता है। वह कूढ़मगज़ नहीं जानता कि उसकी राजनीतिक अज्ञानता एक वेश्या, एक परित्यक्त बच्चे और चोरों में सबसे बुरे चोर एक बुरे राजनीतिज्ञ को जन्म देती है जो भ्रष्ट तथा राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का टुकड़खोर चाकर होता है।
- बेर्टोल्ट ब्रेष्ट (जर्मन चिन्तक, कवि, नाटककार)
पिछले कुछ महीनों से देश में राजनीतिक उठा-पटक का दौर लगातार जारी है, लोकसभा चुनाव से लेकर कई राज्यों में विधानसभा के चुनावों तक कभी एक तो कभी दूसरी पार्टी के नेता खुद को जनता की सभी समस्याओं का समाधान करने वाले मसीहा के रूप में प्रस्तुत करके चुनाव जीत कर सत्ता हथिया चुके हैं। इसी क्रम में अगले "मसीहा" दिल्ली में होने वाले चुनाव में उभरना शुरू हो चुके हैं। इन सभी चुनावी सरगर्मियों के बीच आंकड़ों की तरफ ध्यान दें तो हालत यह है कि देश में हर साल एक करोड़ नये काम करने वाले नौजवान श्रम के बाजार में आ रहे हैं, जिनमें से सिर्फ 5 लाख को ही स्थाई काम मिलता हैं, जबकि बाकी 95 लाख बेरोज़गारी में या कहीं सब्जी-भाजी बेंचकर या दिहाड़ी करके किसी तरह जीते हुये काम की तलाश में भटकते रहते हैं (Report on Third Annual Employment & Unemployment Survey 2012-13)। इन्हीं बेरोज़गार नोजवानों के सहारे मेक इन इंडिया के नाम पर सरकार की तरफ से पूरी दुनिया के पूँजीपतियों को मुनाफ़ा कमाने का न्यौता दिया जा रहा है और निवेश के लिये अच्छा-माहौल बनाने के नाम पर कई सरकारी उपक्रमों, जैसे ओ.एन.जी.सी. और रेलवे को भी निजी लूट के लिये खोल दिया गया है। साथ ही मज़दूरों के बचे-खुचे कानूनों को लागू करना तो दूर बल्कि इन कानूनों को बदलकर निष्प्रभावी बनाने की कोशिशें तेज हो चुकी हैं जिससे पूँजी का निवेश करने वाले देशी-विदेशी पूँजीपतियों को किसी समस्या का सामना न करना पड़े।

इन सभी सरगर्मियों के बीच अक्सर छात्रों और मज़दूरों के बीच एनजीओ, धार्मिक संगठनों, बाबाओं, धर्मगुरुओं जैसे अनेक माध्यमों से यह प्रचार किया है कि उन्हें राजनीति के चक्कर में पड़कर अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिये और अपने काम पर ध्यान देना चाहिये। साथ ही सभी धर्मों के कोई न कई राजनीतिक या गैर-राजनीतिक संगठन भी पूरे देश में मौजूद हैं जो अपने-अपने धर्म के नाम पर देश के बेरोजगार नौजवानों और मज़दूरों के बीच फूट डाल कर मूल मुद्दों से उनका ध्यान भटकाने काम करते हैं। सभी गैर-राजनीतिक छात्रों-युवाओं को इन गैर-राजनीतिक सद्विचारों पर काफी संजीदगी से सोचने और इनमें अन्तर्निहित सच की पड़ताल करने की जरूरत है।
सबसे पहले मज़दूरों के गैर राजनीतिक बने रहने की बात करें तो फैक्टरियों, दफ्तरों और कम्पनियों में मज़दूरी के रूप में जो वेतन उन्हें दिया जाता है और काम की परिस्थितियाँ निर्धारित करने के लिये जो कानून बने हैं उनको लागू करवाने का काम प्रशासन द्वारा किया जाता है। और इन कानूनों को बनाने और उन्हें लागू करने में आने वाली समस्याओं का समाधान करने का काम सत्ता में मौज़ूद राजनीतिक पार्टियों के निर्देश पर होता है। मज़दूरों के जीवन में हर पल मौजूद इस राजनीतिक दख़ल के बावजूद उन्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश की जाती है कि राजनीति उनके जीवन से अलग कोई पराई वस्तु है, और राजनीति कुछ विशेष लोगों का काम हैं। आज हमारे देश के पूँजीवादी संसदीय जनतन्त्र की राजनीति में यह एक अधकचरा सच भी है, क्योंकि वोट बैंक की राजनीति में ज्यादातर पैसे के दम पर चुनाव लड़ा जाता है जिसमें ठेकेदारों, दलालों और बड़े-बड़े पूँजीपतियों के पैसों पर खड़ी की गईं राजनीतिक पार्टियों के सिवाय आम लोगों के लिये कोई स्थान नहीं होता। लेकिन इसके अलावा राजनीति सिर्फ वोट डालकर सरकार चुनना ही नहीं है, इतिहास की थोड़ी भी जानकारी रखने वाले व्यक्ति को इतना पता होगा कि राजनीति से सर छुपाकर गुलामों की तरह काम करके आज तक जनता ने कुछ भी हासिल नहीं किया है। गुलामी और सम्राज्यवाद-सामन्तवाद से लेकर वर्तमान पूँजीवादी समाज में आने तक जो भी अधिकार आज हमें मिले हैं वे सभी समय-समय पर पूरी दुनिया की मेहनतकश जनता के किसी न किसी संगठित राजनीतिक संघर्ष और आन्दोलनों के दम पर हासिल किये गये हैं।
लेकिन पूँजी के दम पर खड़ी की गईं अनेक राजनीतिक पार्टियाँ लोगों के सामने उनके मसीहाओं को खड़ा कर अपने शातिर कार्यकर्ताओं के सहारे समाज के कोने-कोने में मज़दूरों-नौजवानों को गुमराह करने के लिये उन्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि राजनीति में समय लगाना समय की बर्बादी है, सिर झुकाकर कारखानों और फैक्टरियों में अपना समय बेंचते रहोंऔर आगर काम नहीं करोगे तो खाओगे क्या”, “बाकी सारी जिम्मेदारी नेताओं पर छोड़ दो। बचपन से इस तरह के भ्रामक प्रचार के साये में पले बढ़े लोगों पर इसका असर जरूर पड़ता है जो मज़दूरों-नौजवानों को राजनीतिक रूप से उदासीन एक वेतन गुलाम में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ता।
इसी तरह छात्रों के बीच एक आम राय का प्रचार किया जाता है कि कॉलेज सिर्फ पढ़ाई करने के लिये होते हैं जहाँ राजनीति में समय बर्बाद नहीं करना चाहिये। लेकिन साथ ही यह भी कहा जाता है कि छात्र-नौजवान देश का भविष्य होते हैं। लेकिन क्या छात्र नौजवान देश का भविष्य सिर्फ इसलिये होते हैं कि चुपचाप स्कूल-कालेज में पढ़ाई करके किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करके कारखानों या आफिसों में सिर झुकाकर मशीनों की तरह काम करने में लग जाएँ? बिना यह जाने कि वे पढ़ कर जिस काम में विशेषज्ञता हासिल कर रहे हैं उसका क्या सामाजिक महत्व है, क्या उससे जनता का कुछ भला हो रहा है या सिर्फ पूँजी की जुगाली करने वाले कुछ मुठ्ठीभर लोगों की जेबें गरम हो रही हैं, जो जनता की मेहनत और प्राकृतिक संसाधनों को निचोड़ने के नये-नये तरीके इजाद करने में लगे हैं, और जो काम करने वाली व्यापक आबादी को उदासीन बनाकर और उन्हें आपस में बाँटकर खुद बिना किसी मेहनत के अय्याशी भरी जिन्दगी जी रहे हैं। जबकि दूसरी ओर देश-समाज की बड़ी आबादी बेरोजगारी, कुपोषण और शोषण की शिकार है। क्या छात्रों को ऐसे ही भविष्य के निर्माण के लिये प्रेरणा और शिक्षा दी जाती है जिससे कि आज का छात्र कल किसी कारखाने या आफिस में अराजनीतिक रूप से शिक्षित होकर कुछ लोगों के मुनाफे के लिये उत्पादन के काम में या सेवा करेन में लग जाये? क्या छात्रों को राजनीतिक रूप से अशिक्षित करके उन्हें अर्द्ध-शिक्षित उत्पादन मशीन नहीं बनाया जा रहा है।
छात्र और नौजवान देश का भविष्य होते हैं लेकिन उस तरह नहीं जैसा कि हमें आज बताया जाता है। छात्र और नौजवान भविष्य में खटने वाले मज़दूर ही नहीं होते हैं, बल्कि इतिहास बनाने वाले राजनीतिक रूप से सचेत मेहनतकश होते हैं, जो विज्ञान और तकनीकि विशेषज्ञता के साथ ही देश की राजनीति और संस्कृति को अपने काम से संगठित एकता बनाकर बदलते आये हैं और नये मुल्यों तथा नये विचारों का सूत्रापात करते हैं। आज छात्रों और मेहनतकश नौजवानों को यह नहीं बताया जाता उनकी सारी सृजनशीलता को पुरानी घिसी पिटी राजनीति, सामाजिक मूल्यों और संस्कृति के पाटों के बीच कुचला जा रहा है और एक उत्पादन मशीन तथा सिर झुकाकर आज्ञा पालन करने वाले रोबोट में बदलने का काम किया जा रहा है।
राजनीति पर अपनी इजारेदारी बनाये बैठें लोगों को लगता है कि यदि देश की युवा आबादी को राजनीतिक रूप से उदासीन और अशिक्षित कर दिया जायेगा तो वे बेरोजगार होकर काम की तलाश में भटकते रहेंगे, या किसी कारखाने में या किसी आफिस में किसी भी शर्त पर काम करने लगेंगे और कुछ मुठ्ठीभर देशी विदेशी पूँजीवादी-सम्राज्यवादी मुनाफाख़ोरों को देश की प्राकृतिक तथा मानव सम्पदा को खुले आम लूटते हुये देखते रहेंगे। एक सीमा तक वर्तमान प्रचार तन्त्र मज़दूरों और नौजवानों के बीच लम्पट और कूपमण्डूक संस्कृति के माध्यम से ऐसा करने में सफल भी हो रहा है। राजनीति में हिस्सा लेने के नाम पर कुछ राजनीतिक पार्टियॉ मिस-कॉल करके सदस्यता दे रही हैं, लेकिन मिस-काल करके समाज के भविष्य का ठेका किसी और को दे देना राजनीति नहीं हैं, बल्कि देश की मेहनतकश जनता के साथ एक मजाक है। इन सच्चाईयों के बीच भी यह सम्भव नहीं है कि देश की व्यापक आबादी को उसकी अपनी बदहाली के वास्तविक कारण के बारे में हमेशा के लिये अंधेरे में धकेले रखा जये। पूँजीवाद के रहते जहाँ श्रम शक्ति एक माल हो, और जहाँ इंसान को बाजार में बिकने वाले माल में तब्दील कर दिया गया हो वहाँ छात्रों और मज़दूरों को राजनीतिक रूप से अशिक्षित बनाकर सिर झुकाकर काम करने वाली भेंड़ों में तब्दील करके नहीं रखा जा सकता। आने वाले समय में शोषक सम्बन्धों के कारण पैदा हुईं जीवन की बदतर परिस्थितियाँ बार-बार मज़दूरों, किसानों और नौजवानों को अपने अधिकारों के बारे में जानकारी हासिल करने के साथ संघर्षों के इतिहास को समझते हुए मुनाफ़ा-केन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था और समाज में व्याप्त दरियाकनूशी मान्यताओं और प्रचलनों को बदलने के लिये खुद आगे आने और व्यापक स्तर पर हर प्रकार के शोषण के विरुद्ध संगठित होने का आह्वान करती रहेंगी। और जैसा कि कई मज़दूर नेताओं ने कहा था, कि यह संघर्ष तब तक जारी रहेंगे जब तक शोषक सम्बन्धों को पूर्ण उन्मूलन नहीं हो जाता।

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