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Saturday, May 19, 2012

On the name of Art !!

Some people of some section in our society remain busy in "enjoying" "art", and many "artists" are daily taking birth in our society, and lot of entertainment is presented before people for 24 hours daily so that they can pass their time. We can say that most of the middle class people are surrounded with a lot of "art" for entertainment. On this type of entertainment we need to take a deeper look on some more detailed part of art. Here are few points from the Essay 'Aesthetic Relations of Art to Reality' written by Nicholas G. Chernyshevsky in 1853 ( Rest you can read the complete article here ) :
"Sphere of art is not limited only to beauty and its so-called moments, but embraces everything in reality (in nature and in life) that is of interest to man not as a scholar but as an ordinary human being; that which is of common interest in life – such is the content of art."
"The relation of art to life is the same as that of history; the only difference in content is that history, in its account of the life of mankind, is concerned mainly with factual truth, whereas art gives us stories about the lives of men in which the place of factual truth is taken by faithfulness to psychological and moral truth. The first function of history is to reproduce life; the second, which is not performed by all historians, is to explain it."

Saturday, November 12, 2011

"क्या करें" -चार्नेशेवेश्की ["इन दिनो तीसरा विकल्प जोर पकड़ रहा है"]

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चार्नेशेवेश्की (Chernyshevsky) के कुछ विचार, उपन्यास "क्या करें" से,
"वह ऐसी लक्षणिक स्थिति में पहुँच चुका था, जिसका सामना न किसी ढुलमुल को ही करना पड़ता है, बल्कि पूर्ण रूप से उन्मुक्त भावना वाले या पूरे के पूरे राष्ट्रों को अपने इतिहाश के दौरान करना पड़ता है। . . . . . . लोग एक ही दिशा में केवल इसलिए धक्कामुक्की करते हैं, क्योंकि उन्हें कोई ऐसी आवाज सुनाई नहीं पड़ती जो कहे - "अरे किसी दूसरे रास्ते जाने की कोशिश क्यों नहीं करते तुम ?" यह इशारा समझते ही पूरी की पूरी जनता पलट जाती है और विपरीत दिशा की और चल पड़ती है।"
"वह अपने साधारण जीवन से ही सन्तोष कर लेती और अर्थहीन आस्तित्व का जीवन जीने लगती । ऐसा समय भी था जब विलक्षण युवतियों और विलक्षण युवकों का भविष्य यही था -वे सब अच्छे-भले बुजुर्गों में बदल जाते थे और व्यर्थ ही अपना जीवन जीते थे। कभी दुनिया की ऐसी ही रीति थी, तब ऐसे भले लोग कम थे, जो इसे बदलने की सोचते। कोई भी मनुष्य अपने आस्तित्व को कुंठित किए बिना अकेला नहीं रह सकता। या तो निर्जीव बन जाओ अथवा नीचता से समझौता कर लो" . . . "इन दिनो तीसरा विकल्प जोर पकड़ रहा है -शालीन लोग एकजुट होने लगे हैं, प्रतिवर्ष उनकी बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए यह अपरिहार्य ही है। समय आएगा जब यह सामान्य रीति हो जाएगा, और समय बीत जाने पर यह नियम सार्वजनिक हो जाएगा, क्योंकि तब केवल शालीन लोग ही होंगे।"

Thursday, April 7, 2011

A Sketch of the Future Drawn by Chernyshevsky

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निकोलाई चर्नेविश्की के कुछ शब्दों में (From Novel "What is to be Done" by Nikolai Chernyshevsky):

"कितना विचित्र यह नहीं कि कोइ व्यक्ति कहे, "मैं प्रसन्न हूँ।", और मानववादी तात्पर्य होता है, "मैं सभी को प्रसन्न होते देखना चाहता हूँ।" और दोनों बाते एक ही हैं।" (98.2)
"जीवन, प्रकृति और सामान्य विवेक एक दिशा में खींचते हैं, और पुस्तकें दूसरी दिशा में |" (109)
जहाँ तक इस बात का सवाल है कि लोगों की मूर्खता नई व्यवस्था की स्थापना में बाधक है, मै मानता हूँ कि वह बाधा है, लेकिन . . . . जैसे ही वह इसमें अपना कुछ लाभ देखेंगे जो वे पहले नहीं देख पाए तो तत्काल अक्लमन्द हो जाएँगे । उन्हे अक्ल पाने का अभी अवसर ही कहाँ मिला, लेकिन अवसर मिलते ही वे इसका पूरा-पूरा लाभ उठानें में देर नहीं लगाएँगे।” (114-115)
तरीकों का चुनाव परिस्थितियों के अनुसार किया जा सकता है, चरित्र के अनुसार नहीं ।” (119)
गौण व्यक्तियों अथवा लक्ष्यों के पीछे अपना समय बर्बाद मत करो, बल्कि मूलभूत की ओर, उसके निर्धारक तत्व कि ओर ध्यान दो, इससे गौण कार्य और लोग भी बदलेंगे हस्तक्षेप करके या न करके |” (285.1)
कोइ ऐसा शिखर नही कि जिस पर पहुँचा न जा सके; जिस पर केवल श्रेष्ठ ही आसीन हो सकता हो । मेरे अभागे मित्रों अपने पंक से उबरो, दिन के उजाले में आओ, प्राप्त स्वतंत्रता से खुश होओ, यह सहज है, अत्यन्त सम्मोहक है, बस कोशिस करके देखने की जरूरत है । देखो और सोचो, और ऐसी पुस्तकें पढ़ो जो शुध्द आनन्द, सद्गुण और सुख की चर्चा करती हैं ।” (314.2)
झोपड़ियों को ही देखनें वाला व्यक्ति, सामान्य भवन का चित्र देखकर उसे प्रसाद ही समझ बैठता है ।” (314.2)
हम सब लोगों का यही तो स्वभाव है कि दूसरो को भी अपने ही मानक से मापते हैं ।” (318.4)
किसी पुस्तक के किसी पात्र के बारे में कहा जाता है, "झूठ ने कभी उसके होठो को स्पर्श नहीं किया।", अथवा, "उसके ह्रदय में कोइ छल-कपट नहीं था।" पाठक सोचेगा, "कितना चकित कर देने वाला सद्गुण।", लेखक सोचेगा, "यह है नायक, जो सभी को चकित कर देगा।" पहला लिखते समय अंधा था दूसरा अब पढ़ते समय ।” (353.1)
हर किसी का स्वभाव अपना-अपना होता है, जबकि उत्तेजनशील व्यक्ति सावधानी से खीझता है, शान्त स्वभाव आकस्मिक उताबलेपन से बिद्रोह कर उठता है।” (400.1)
किसी खास स्वभाव वाले लोग किसी खास बात के लिए उस समय तक परवाह नहीं करते जब तक कि इससे उनके सामान्य जीवन पर प्रभाव नहीं पड़ता, जो कि उनके विचार में कहीं अधिक महात्वपूर्ण है।” (401.3)
मानव जाति अगर अपने विचार उन्मुक्त कर दे तो वह निश्चय ही दस गुना तेजी के साथ प्रगति करेगी।” (420.7)

Friday, March 25, 2011

"क्या करें", by चार्नेविश्की

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चार्नेविश्की द्वारा 1864 हर प्रगतिशाल व्यकित के लिए कहे नये ये शब्द जो उन्होनें भविष्य के वर्गहीन समाज
के निर्माण के लिए (Future which is yet to come) और वर्तमान समाज को सुन्दर बनानें के लिए लिखे थे,

"सभी को स्वाधीनता और श्रम का वरदान मिला होता है", और
"श्रम आनन्द को अपनीं शक्ति और ऊर्जा प्रदान  करता है।"
"भविष्य उज्वल और सुन्दर है। उससे प्रेम करो उसकी ओर अग्रसर होओ, उसके लिए काम करो, उसे निकट लाओ। भविष्य की जितनीं बातों को वर्तमान में ला सकते हो, उन्हे लाओ, तुम्हारा जीवन उतना ही उज्वल और भला,  उतना ही हर्षदाई और आनन्दमय होगा, जितना भविष्य तुम आपने वर्तमान में उतार सकोगे; इसी पर जीवन की गरिमा, इसका सुख-सौन्दर्य और सन्तोष निर्भर है।"
- Page-373 Novel "क्या करें", by चार्नेविश्की (Chernyshevsky)

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