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Tuesday, November 29, 2016

पूँजीवाद की कालिख को हटाकर सफेदी लाने के प्रयासों पर एक नज़र

यूँ तो  पूँजीवादी अर्थव्यस्था में पूरा काला धन सफेद हो जाये तब भी समाज की मेहनत-मज़दूरी करने वाली आबादी का भविष्य अन्धकारमय बना रहेगा, उसे रोज़गार की गारण्टी नहीं मिल सकती और जहाँ रोज़गार मिला भी है उसकी स्थिति ऐसी होगी जो एक दिहाड़ी गुलाम से अधिक नहीं होगी, जो एक मुनाफ़ा पैदा करने की एक मशीन से अधिक महत्व नहीं रखता, जैसा कि अभी हो रहा है। काम करने वाले मज़दूर अगर लाइन मे धक्के खाकर नहीं तो फैक्टरियों में जानवारों जैसी बदतर हालत में लगे रहते है।
नोटबन्दी के बाद टीवी और अख़बारों को देख कर कुछ लोग सोच रहे थे कि सारे अपराधी बर्बाद हो जायेंगे, काला धन रखने वाले सारे मुनाफ़ाखोर तबाह हो जायेंगे, आतंकवादियों को मिलने वाले काले धन को स्रोतो पर रोक लग जायेगी, और  भ्रष्टाचार करने वालों के बीच खौफ फैल जायेगा, और 50 दिन के अन्दर जनता का रामराज्य आने वाला है। ऐसा सोचने वाले कई लोगों को 28 नबम्बर को एक सदमा तो लगा ही होगा।
देश की करोड़ों जनता को बैंकों के सामने भिखारी बनाने के बाद अब काले धन को सफेद करने के लिये एक डिटर्जेंट लोकसभा में पारित कर दिया गया है। सड़कों पर जनता की बर्बादी का हवाला देने वाली नौटंकीबाज़ बिरोधी पार्टियाँ भी इस बिल पर कुछ नहीं बोलीं, और सबकी सहमति से बिल पास हो गया। कर संशोधन विधेयक के बाद अब काले धन में सरकार और भ्रष्टाचारियों के बीच 50-50 का हिस्सा हो गया और काले धन के साथ-साथ इन अपराधियों के सारे अपराध भी साफ सफेद हो गये। हमें सोचना चाहिये कि क्या यही है उनके सपनों का भारत, जहाँ अपराधियों के पास जमा सम्पत्ति को 50-50 करने के लिये आनन-फानन में एक बिल पास कर दिया जाता है, और आम जनता को उसके खुद के पैसे निकालने के लिये सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया जाता है।
व्यवस्था के चरित्र के आधार पर हमारा आकलन तो पहले से यही था, लेकिन सरकार के ऊपर अन्ध-श्रद्धा रखने वाले या प्रचार मीडिया के बहकावे में आकर कुतर्क करने वाले कुछ अन्ध-भक्तों को भी अब समझ में आ गया होगा कि नोटबन्दी के पीछे वास्तव में सरकार की नीयत क्या है। लूट और शोषण पर टिकी व्यवस्था के संयोजक कितनी चालाकी से जनता को गुमराह करते हैं यह अब खुल के सामने आ रहा है।
(सारे तथ्यों के साथ आगे एक और लेख डालूँगा तब तक सभी लोग अपनी अपनी राय दें...)

Thursday, June 25, 2015

देश और समाज के बारे में सोचने वाले राजनीतिक अनुगामियों (Political Followers) से कुछ महत्वपूर्ण सवाल



अलग-अलग राजनीतिक और आर्थिक विचारों का समर्थन करने वाले लोग हर समाज में होते रहे हैं और वर्तमान पूँजीवादी जनतन्त्र व्यवस्था में भी हैं। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में एक बात सबसे अलग है, जो पुरानी सामन्ती, गुलामी और औपनिवेशिक व्यवस्थओं में नहीं थी, कि पूँजीवाद में अलग-अलग राजनीतिक-आर्थिक विचारों का समर्थन करने की ज्यादा स्वतन्त्रता लोगों को मिली हुई है। और यही कारण है कि आज कोई मोदी का समर्थन कर रहा है और कोई केजरीवाल का और कोई कांग्रेस का समर्थन कर रहा है।
मोदी का समर्थन करने वाले कई लोग जब मेरा ब्लॉग पढ़ते हैं तो कहते हैं कि मैं मोदी का समर्थन क्यों नहीं करता, यही बात कोजरीवाल के समर्थक भी कहते हैं, और ऐसे ही विचार कुछ और लोगों के समर्थक भी व्यक्त करते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि समाज का एक अंग होने के नाते हमें किसी एक राजनीतिक पार्टी या व्यक्ति का समर्थन करने या उसका फालोअर बनने से पहले कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में सोचना होगा। देश की जनता कोई भी सरकार क्यों चुनती है, इसका सिर्फ एकमात्र जबाव यही है कि लोग वर्तमान समय में अपने सामने मौजूद समस्याओं का समाधान चाहते हैं। और जब एक पार्टी की सरकार से सभी उम्मीदें खत्म हो जाती हैं तो लोग दूसरी पार्टी को आजमाने की कोशिश करते हैं। और यह क्रम काफी लम्बे समय (लगभग 66 साल) से चल रहा है। ऐसा नहीं है कि लोगों के जीवन स्तर में इन सालों में कोई भी बदलाव नहीं हुआ है, लेकिन थोड़ा बदलाव होने के साथ असमानता में काफी इजाफा हुआ है, और समाज के एक छोटे हिस्से के सापेक्ष रखकर देखें तो आम लोगों का जीवन-स्तर पीछे गया है।
अब ऐसी परिस्थितियों में हर जागरूक नागरिक के लिये ज्यादा ज़रूरी है कि समाज में आम जनता की जो मुख्य समस्यायें हैं सबसे पहले उनके बारे में सोचे। जैसे, एक काम करने वाला व्यक्ति सबसे पहले अपने काम की परिस्थितियों के बारे में सोचता है, एक किसान अपनी गरीबी और खेती की खराब हालत के बारे में सोचता है, और हमारे देश की महिलायें जिनके ऊपर बुर्का और पर्दे में घर के अन्दर रहने जैसे अमानवीय परिस्थितियों रहना पड़ता है और जिन्हें अपनी मर्जी से काम करने, निर्णय लेने, और घर से बाहर निकलने पर भी पाबन्दी है वे किसी भी और बात से पहले समाज में अपनी दोयम दर्जे की परिस्थितियों के बारे में सोचती हैं। अब हर एक व्यक्ति, चाहे वह किसी भी परिस्थिति में जी रहा हो, समाज का एक हिस्सा होने और समाज पर निर्भर्ता के कारण उसका नैतिक दायित्व बनता है कि वह अपने आसपास मौजूद दमित-उत्पीणित व्यापक आबादी के जिन्दगी से जुड़ी सभी ठोस परिस्थितियों का विश्लेषण लोगों के सामने लाने की कोशिश करे, और यह रेखांकित करे कि किसी भी सरकार द्वारा बनाई जा रही नीतियों से जनता की समस्याओं पर क्या असर हो रहा है।
आज हमारे देश की व्यापक जनता की मुख्य समस्यायें हैं लगातार बढ़ रही बेरोजगारी, गरीबी और कुपोषण, चिकित्सा सुविधाओं का घोर अभाव, शिक्षा का बाजारीकरण, सट्टेबाजों-दलालों के फायदे के लिये बनाई जा रही नीतियों के चलते लगातार बढ़ा जा रही सामाजिक-आर्थिक असमानता, निजी मुनाफे के लिये लुटाई जा रही देश की प्रकृतिक सम्पदा, अनेक कम्पनियों में ठेके पर काम करने वाले मेहनतकश लोगों की काम की बदतर परिस्थितियाँ, गाँव में गरीब किसानों के बदहाल हालत और उनके द्वारा की जा रही आत्महत्याएँ, महिलाओं के प्रति होने वाला भेदभाव-हिंसा और उनके प्रति समाज का असंवेदनशील रवैया, जाति और धर्म के नाम पर लोगों को आपस में लड़ाने की अमानवीय कोशिशे, मुनाफाख़ोरी और अराजकता के कारण बहसीपने से की जा रही वातावरण की बर्बादी, आदि। समस्याओं की यह फेहरिस्त काफी लम्बी है, लेकिन हम इतनी समस्याओं के आधार पर अपने समाज की स्थिति का थोड़ा अंदाज लगा सकते हैं। (आने वाले समय के बारे में कुछ आंकड़ों को विस्तार से समझने के लिये देखें - http://sparkofchange.blogspot.com/2015/03/50.html)
अब इन परिस्थितियों के रहते किसी एक नेता का समर्थन करने की कोई आवश्यकता ही नज़र नहीं आती। मुख्य सवाल तो यह है कि क्या कोई नेता या कोई राजनीतिक पार्टी, जो जनता की सेवा और विकास के वायदे करती है, वह वास्तव में जनता की समस्याओं के लिये जमीनी स्तर पर कुछ कर भी रही है, या सिर्फ पब्लिशिटी-स्टण्ट्स के रूप मे कुछ नारे उछालकर लोगों का ध्यान उनकी समस्याओं से भटकाने की कोशिश कर रही है। इसका जबाव हर सोचने समझने वाले व्यक्ति को खुद तलाश करना पड़ेगा। और जिस दिन जबाव मिल जायेगा तो यह बिल्कुल स्पष्ट हो जायेगा क्या वास्तव में किसी एक नेता या पार्टी का समर्थक बनने की जरूरत है, या समाज की हर समस्या को रेखांकित (underline) करके लोगों का ध्यान उसकी ओर खींचने, और चाहे कोई भी सरकार हो, उसे उन समस्याओं के सुधारने के लिये ठोस काम करने का दबाव बनाने की आवश्यकता है।
आगली पोस्ट में जारी . . .

Tuesday, February 10, 2015

दिल्ली चुनाव के नतीजों से एक लहर शान्त हो गई है और दूसरी लहर उठाई जा चुकी - यह कितने दिन टिकेगी?


दिल्ली के चुनावी नतीजों से एक बात तो काफी स्पष्ट हो गई है कि लोग बदलाव चाहते हैंझूठे वादे करके लोगों को और भ्रमित करना देश को लूट रहे कुछ मुठ्ठीभर लोगों के लिये मुश्किल हो रहा है। यही कारण है कि हर चुनाव में जनता के सामने खड़ी की जा रही फर्जी समस्याओँ और मशीहाओं के वादों से जनता का तेजी से मोहभंग हो रहा है। धर्म-जाति या अन्य गैर मुद्दों के नाम पर लोगों को मुख्य मुद्दे से भटकाने के प्रयास आज सफल नहीं हो रहे हैं।
सभी चुनावों के दौरान, और बाद में भी बिजली-पानी-सड़कों जैसे कुछ मुद्दे उठाकर कोई एक चुनाव जीत जाता है। लेकिन लोगों की जिन्दगी से जुड़े अहम मुद्दे गायब होते है। जनता के सबसे अहम मुद्दे क्या हैं यह समझना किसी भी राजनीतिक पार्टी की राजनीति को समझने के लिये बहुत ज़रूरी है। किशी भी राज्य की सबसे बड़ी आबादी काम करने वाले हैं, और हर काम करने वाले व्यक्ति के लिये उसके काम से जुड़े मुद्दे सबसे अहम होते हैं, जैसे हर व्यक्ति के लिये रोजगार का अधिकार और काम करने की बेहतर परिस्थितियों और जीने लायक वेतन की गारण्टी। यह मुद्दे सबसे महत्वपूर्ण इसलिये हैं क्योंकि इनसे हर व्यक्ति का हर दिन, हर घण्टे सामना होता है। लेकिन आज-कल चुनावी प्रचार में कोई भी पार्टी इन मुद्दों को नहीं उठाती। काम करने वाली बड़ी आबादी को भी, जो ठेके पर, दिहाड़ी पर या बेरोज़गारी में जीती है, उसे यह विश्वास दिला दिया जाता है कि काम के अलावा बाकी सभी मुद्दे उनके लिये भी ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं। लेकिन उसका पूरा जीवन काम, काम की परिस्थितियों और वेतन के इर्द गिर्द संघर्ष करते हुये कटता है।
यहाँ तक कि राष्ट्रीय स्तर पर मज़दूरों से गद्दारी कर चुकी लाल झण्डे वाली कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी, जो खुद तो काम करने वालों की कोई माँग उठाती नहीं हैं, इस बार दिल्ली दुनाव में खुले रूप से पूँजीपतियों की गोद में जा बैठी थीं।
हर चुनावी नतीजे के बाद यह सिद्ध हो रहा है लोग वास्तव में ऐसा बदलाव चाहते हैं जिससे उनकी जीने और काम करने की परिस्थितियाँ वास्तव में बदलें। अभी तक देश की व्यापक आबादी के सामने कोई ऐसा विकल्प खड़ा नहीं हो सका है जिसमें आम लोग खुद हिस्सेदारी करें और चीजों को बदलने के लिये अपनी पहलकदमी के साथ शामिल हों। लोग चाहते हैं कि उनके हालात वास्तव में बदलें, और एक ऐसी व्यवस्था खड़ी की जाये जहाँ हर व्यक्ति को सम्माननीय रोजगार मिल सके, हर व्यक्ति मेहनत करे और जहाँ किसी को भी मुनाफ़ाखोरी के दम पर बिना काम के सम्पत्ति इकठ्ठी करने का मौका न मिलता हो।
इनमें से शायद कोई भी बदलाव वर्तमान राजनीतिक परिपेक्ष में अभी नहीं हो रहा है। लेकिन वास्तविक बदलाव के लिये किसी कारगर विकल्प के आभाव में जनता कभी एक तो कभी दूसरा विकल्प आज़मा रही है। और विकल्पों के इन झूटे भ्रमों से लोगों का मोहभंग भी उतनी ही तेजी से हो रहा है।
भाजपा की लहर तो 9 महीनों में ही समाप्त हो चुकी है। देखते हैं कि आम आदमी पार्टी का भ्रम कितने दिनों में टूटेगा।
खुली मुनाफ़ाखोरी और पूँजीवादी विकास के साथ बढ़ती घोर असमानता देश के स्तर पर काम करने वाली मेहनतकश गरीब जनता और नौजवानों की परिस्थितियाँ किस तरह भयानक स्तर तक जा रही हैं, इसका अन्दाज शायद काफी लोगों को नहीं है, इसके बारे में सारे आंकड़ों के साथ अगले पोस्ट में यह सिद्ध करूँगा कि वास्तव में क्या बदलाव लोगों के लिये जरूरी है, जो सभी चाहते हैं, और जिसके बारे में कोई भी चुनावी राजनीतिक करने वाली पार्टी कुछ नहीं बोलती।


नीचे मैं Reference के लिये आम आदमी पार्टी काे Manifesto के सारे बिन्दु दे रहा हूँ :


These are 20 agenda of AAP. I don’t found anything related to education and employment, contractual workers, ensuring labour laws, monitoring of working hours, increasing wages.
(Reference: Highlights of AAP's manifesto, The Hindu, 31 January 2015)
1. Make Delhi a hub for education, tourism, trade and service sector ensuring employment generation.
2. 15 lakh cameras to be installed to improve women's safety.
3. Retirement age for Delhi Government employees to remain 60, will bring housing and cashless health scheme for them.
4. Stop dumping of industrial waste and sewerage into Yamuna.
5. Promote generic drugs, give security to doctors.
6. Every village will have school and hospital, no forcible land acquisitions.
7. Farmers to be provided subsidised seeds and fertilisers.
8. Reduce VAT in the Capital, to check evasion and inflation.
9. Education system to produce job providers not job seekers.
10. Citizens' Lad Funds will be introduced, people will decide how to spend money meant for their development.
11. Ensure free lifeline water of up to 20 kiloliters (20,000 liters) to every household per month.
12. Build 2 lakh toilets across Delhi: about 1.5 lakh toilets in slums and JJ clusters and 50,000 toilets in public area.
13. Build 500 new schools with a special focus on secondary and senior secondary schools.
14. Create 900 new Primary Health Centers (PHCs) and 30,000 more beds in Delhi hospitals.
15. Set up Mahila Suraksha Dal or Women’s Security Force made up of a 10,000 strong Home Guard.
16. Make Wi-Fi freely available in public spaces across Delhi.
17. Fill 55,000 vacancies in the Delhi government and autonomous bodies of the Delhi Government.
18. Delhi Ridge will be protected from encroachment and deforestation.
19. Prevent drug trafficking by means of tight monitoring and ensuring strict punishment for the guilty.
20. Initiate a universal and non-contributory old age pension system.

Friday, April 18, 2014

सभी चुनावी पार्टियों के "विकास" नारों की असलियत में छिपी है जनता की हर ! !


नई सरकार के चुनाव के लिये मतदान शुरू हो चुका है और लोग बड़ी उम्मीदों के साथ वोट डाल रहे हैं। हर जगह आंकड़ों से पता चल रहा है कि वोट डालने वालों की संख्या बढ़ी है, क्योंकि वर्तमान व्यवस्था के अन्याय के प्रति लोगों में काफी गुस्सा है। इसी गुस्से का फायदा उठाकर 2011 में मध्य-वर्ग का भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक आन्दोलन शुरू हुआ था जिसके मुख्य केन्द्र में कुछ एनजीओ के साथ अन्ना हजारे थे। उस समय लोगों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की गई थी कि पूरे देश में करोड़ों लोगों की सभी समस्याओं, जैसे काम में ठेकाप्रथा, करोड़ों लोगों की बेरोज़गारी, किसानों की गरीबी के कारण होने वाली आत्महत्याएँ, और लगातार बढ़ रही असमानता का मुख्य और एकमात्र कारण भ्रष्टाचार है। इन "आन्दोलनकारियों" का समर्थन कर रहे प्रचारक बढ़-चढ़ कर यह प्रचार कर रहे थे कि जनता में व्याप्त असंतोष भी भ्रष्टाचार के प्रति गुस्से के कारण ही है। अन्ना हजारे के नेतृत्व में इन सिद्धान्तहीन प्रदर्शनों का एक दैर चला था, जिसे कोई "नई क्रान्ति की शुरुवात!!" कह रहा था तो कोई "अन्ना की आंधी!!"।
अन्ना की "आंधी" तो शान्त हो गई, और जैसा कि आँधी के बात होता है, अपने पीछे निराशा, पस्तहाली, भ्रम का कूड़ा-करकट और गन्दगी का एक ढेर छोड़ गई। अन्ना आन्दोलन की सच्चाई तो पहले ही सबके सामने आ चुकी है, और इसके द्वारा उठाये गये भ्रष्टाचार के मुद्दे को पूँजीवाद के हितों में बेहतरीन ढंग से को-आप्ट कर लिया गया है। अब सोचने का सवाल यह है कि इससे फायदा किसे हुआ?
पूँजीवादी मुनाफ़ाखोरी पर टिकी पूरी व्यवस्था की अराजकता के प्रति व्यापक जनता के असन्तोष को पूँजीवादी प्रचार तन्त्र और आन्दोलनों के माध्यम से धीरे-धीरे सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के विरोध में ढाला गया, और फिर सत्ताधारी पार्टी के दलदल से निकालकर इस असन्तोष को विपक्षी बीजेपी पार्टी के समर्थन तक ले जाकर कींचड़ में धकेल दिया गया, जिसकी सभी नीतियाँ कांग्रेस जैसी हैं। अन्ना आन्दोलन से पैदा हुई आप पार्टी भी भ्रष्टाचार के नाम पर सोचने समझने वाले एक तबके को लोकरंजक नारों से लुभाने और पूँजीवाद के प्रति लोगों को गुमराह करने का काम सतत कर रही है।
हर बयान में बीजेपी के नेता यह कह रहे हैं कि देश को एक "मज़बूत" सरकार की जरूरत है। उनका मज़बूत सरकार से यह मतलब नहीं है कि वह पूँजीपतियों और साम्राज्यवादी ताकतों पर दबाव बनाकर जनता की भलाई करेंगे, बल्कि उनका सीधा अर्थ होता है कि यदि कहीं भी जनता अपनी माँगे उठाये तो पूँजीपतियों के हित में उसका मजबूती के साथ दमन किया जाएगा। यही कारण है कि पूँजीपति खूब पैसा चुनावों में पार्टियों को दान दे रहे हैं।
किसी भी चुनावी संसदीय पार्टी ने जनता के हितों के लिये कोई ठोस योजना प्रस्तुत नहीं की है। सभी लोगों को यह विश्वास दिलाना चाह रहे हैं कि पूँजीवाद को बढ़ावा देने और मुनाफा केन्द्रित व्यवस्था को और बेहतर ढंग से मैनेज करने की जरूरत है, क्योंकि इसी थे थोड़ा बहुत मुनाफा रिस कर (Trickle Down) भूखे-नंगे गरूबों तक भी पहुँचेगा (कई सालों से ऐसा ही कहा जा रहा है और जनता की बर्बादी पर खरबपतियों की संख्या लगातार बढ़ रही है!!)।
चुनाव में वोट डालने वालों को यह नहीं पता कि यह उनकी नहीं बल्कि पूँजीवादी प्रचार तन्त्र की जीत है। यह जनता की हार है, क्योंकि व्यवस्था या पूँजीवादी लूट की नीतियों में बदलाव की उसकी इच्छा को विपक्षी पार्टी के समर्थन में मोड़ कर कुंद कर दिया गया है। सच्चे बदलाव की इस इच्छा को फिर से तेज होने में लम्बा समय लगेगा, और उस बीच लाखों बच्चे कुपोषण और भुखमरी के शिकार होंगे, करोड़ों मज़दूर काम करते हुये असमय मुनाफे की भेंट चढ़ जायेंगे, कई हजार किसान आत्महत्या कर लेंगे, और कई नौजवान बेरोज़गारी में सड़कों पर भटकते रहेंगे...

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