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Thursday, January 15, 2015

क्या राजनीति करना सिर्फ जनता की मेहनत पर पलने वाले देश के "ठेकेदारों" और शेयर-मार्केट के दलालों का काम है ?

Published in Mazdoor Bigul, January 2015
(http://www.mazdoorbigul.net/archives/6636



सबसे निकृष्ट अशिक्षित व्यक्ति वह होता है जो राजनीतिक रूप से अशिक्षित होता है। वह सुनता नहीं, बोलता नहीं, राजनीतिक सरगर्मियों में हिस्सा नहीं लेता। वह नहीं जानता कि ज़िन्दगी की क़ीमत, सब्जियों, मछली, आटा, जूते और दवाओं के दाम तथा मक़ान का किराया यह सब कुछ राजनीतिक फैसलों पर निर्भर करता है। राजनीतिक अशिक्षित व्यक्ति इतना घामड़ होता है कि इस बात पर घमण्ड करता है और छाती फुलाकर कहता है कि वह राजनीति से नफ़रत करता है। वह कूढ़मगज़ नहीं जानता कि उसकी राजनीतिक अज्ञानता एक वेश्या, एक परित्यक्त बच्चे और चोरों में सबसे बुरे चोर एक बुरे राजनीतिज्ञ को जन्म देती है जो भ्रष्ट तथा राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का टुकड़खोर चाकर होता है।
- बेर्टोल्ट ब्रेष्ट (जर्मन चिन्तक, कवि, नाटककार)
पिछले कुछ महीनों से देश में राजनीतिक उठा-पटक का दौर लगातार जारी है, लोकसभा चुनाव से लेकर कई राज्यों में विधानसभा के चुनावों तक कभी एक तो कभी दूसरी पार्टी के नेता खुद को जनता की सभी समस्याओं का समाधान करने वाले मसीहा के रूप में प्रस्तुत करके चुनाव जीत कर सत्ता हथिया चुके हैं। इसी क्रम में अगले "मसीहा" दिल्ली में होने वाले चुनाव में उभरना शुरू हो चुके हैं। इन सभी चुनावी सरगर्मियों के बीच आंकड़ों की तरफ ध्यान दें तो हालत यह है कि देश में हर साल एक करोड़ नये काम करने वाले नौजवान श्रम के बाजार में आ रहे हैं, जिनमें से सिर्फ 5 लाख को ही स्थाई काम मिलता हैं, जबकि बाकी 95 लाख बेरोज़गारी में या कहीं सब्जी-भाजी बेंचकर या दिहाड़ी करके किसी तरह जीते हुये काम की तलाश में भटकते रहते हैं (Report on Third Annual Employment & Unemployment Survey 2012-13)। इन्हीं बेरोज़गार नोजवानों के सहारे मेक इन इंडिया के नाम पर सरकार की तरफ से पूरी दुनिया के पूँजीपतियों को मुनाफ़ा कमाने का न्यौता दिया जा रहा है और निवेश के लिये अच्छा-माहौल बनाने के नाम पर कई सरकारी उपक्रमों, जैसे ओ.एन.जी.सी. और रेलवे को भी निजी लूट के लिये खोल दिया गया है। साथ ही मज़दूरों के बचे-खुचे कानूनों को लागू करना तो दूर बल्कि इन कानूनों को बदलकर निष्प्रभावी बनाने की कोशिशें तेज हो चुकी हैं जिससे पूँजी का निवेश करने वाले देशी-विदेशी पूँजीपतियों को किसी समस्या का सामना न करना पड़े।

इन सभी सरगर्मियों के बीच अक्सर छात्रों और मज़दूरों के बीच एनजीओ, धार्मिक संगठनों, बाबाओं, धर्मगुरुओं जैसे अनेक माध्यमों से यह प्रचार किया है कि उन्हें राजनीति के चक्कर में पड़कर अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिये और अपने काम पर ध्यान देना चाहिये। साथ ही सभी धर्मों के कोई न कई राजनीतिक या गैर-राजनीतिक संगठन भी पूरे देश में मौजूद हैं जो अपने-अपने धर्म के नाम पर देश के बेरोजगार नौजवानों और मज़दूरों के बीच फूट डाल कर मूल मुद्दों से उनका ध्यान भटकाने काम करते हैं। सभी गैर-राजनीतिक छात्रों-युवाओं को इन गैर-राजनीतिक सद्विचारों पर काफी संजीदगी से सोचने और इनमें अन्तर्निहित सच की पड़ताल करने की जरूरत है।
सबसे पहले मज़दूरों के गैर राजनीतिक बने रहने की बात करें तो फैक्टरियों, दफ्तरों और कम्पनियों में मज़दूरी के रूप में जो वेतन उन्हें दिया जाता है और काम की परिस्थितियाँ निर्धारित करने के लिये जो कानून बने हैं उनको लागू करवाने का काम प्रशासन द्वारा किया जाता है। और इन कानूनों को बनाने और उन्हें लागू करने में आने वाली समस्याओं का समाधान करने का काम सत्ता में मौज़ूद राजनीतिक पार्टियों के निर्देश पर होता है। मज़दूरों के जीवन में हर पल मौजूद इस राजनीतिक दख़ल के बावजूद उन्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश की जाती है कि राजनीति उनके जीवन से अलग कोई पराई वस्तु है, और राजनीति कुछ विशेष लोगों का काम हैं। आज हमारे देश के पूँजीवादी संसदीय जनतन्त्र की राजनीति में यह एक अधकचरा सच भी है, क्योंकि वोट बैंक की राजनीति में ज्यादातर पैसे के दम पर चुनाव लड़ा जाता है जिसमें ठेकेदारों, दलालों और बड़े-बड़े पूँजीपतियों के पैसों पर खड़ी की गईं राजनीतिक पार्टियों के सिवाय आम लोगों के लिये कोई स्थान नहीं होता। लेकिन इसके अलावा राजनीति सिर्फ वोट डालकर सरकार चुनना ही नहीं है, इतिहास की थोड़ी भी जानकारी रखने वाले व्यक्ति को इतना पता होगा कि राजनीति से सर छुपाकर गुलामों की तरह काम करके आज तक जनता ने कुछ भी हासिल नहीं किया है। गुलामी और सम्राज्यवाद-सामन्तवाद से लेकर वर्तमान पूँजीवादी समाज में आने तक जो भी अधिकार आज हमें मिले हैं वे सभी समय-समय पर पूरी दुनिया की मेहनतकश जनता के किसी न किसी संगठित राजनीतिक संघर्ष और आन्दोलनों के दम पर हासिल किये गये हैं।
लेकिन पूँजी के दम पर खड़ी की गईं अनेक राजनीतिक पार्टियाँ लोगों के सामने उनके मसीहाओं को खड़ा कर अपने शातिर कार्यकर्ताओं के सहारे समाज के कोने-कोने में मज़दूरों-नौजवानों को गुमराह करने के लिये उन्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि राजनीति में समय लगाना समय की बर्बादी है, सिर झुकाकर कारखानों और फैक्टरियों में अपना समय बेंचते रहोंऔर आगर काम नहीं करोगे तो खाओगे क्या”, “बाकी सारी जिम्मेदारी नेताओं पर छोड़ दो। बचपन से इस तरह के भ्रामक प्रचार के साये में पले बढ़े लोगों पर इसका असर जरूर पड़ता है जो मज़दूरों-नौजवानों को राजनीतिक रूप से उदासीन एक वेतन गुलाम में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ता।
इसी तरह छात्रों के बीच एक आम राय का प्रचार किया जाता है कि कॉलेज सिर्फ पढ़ाई करने के लिये होते हैं जहाँ राजनीति में समय बर्बाद नहीं करना चाहिये। लेकिन साथ ही यह भी कहा जाता है कि छात्र-नौजवान देश का भविष्य होते हैं। लेकिन क्या छात्र नौजवान देश का भविष्य सिर्फ इसलिये होते हैं कि चुपचाप स्कूल-कालेज में पढ़ाई करके किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करके कारखानों या आफिसों में सिर झुकाकर मशीनों की तरह काम करने में लग जाएँ? बिना यह जाने कि वे पढ़ कर जिस काम में विशेषज्ञता हासिल कर रहे हैं उसका क्या सामाजिक महत्व है, क्या उससे जनता का कुछ भला हो रहा है या सिर्फ पूँजी की जुगाली करने वाले कुछ मुठ्ठीभर लोगों की जेबें गरम हो रही हैं, जो जनता की मेहनत और प्राकृतिक संसाधनों को निचोड़ने के नये-नये तरीके इजाद करने में लगे हैं, और जो काम करने वाली व्यापक आबादी को उदासीन बनाकर और उन्हें आपस में बाँटकर खुद बिना किसी मेहनत के अय्याशी भरी जिन्दगी जी रहे हैं। जबकि दूसरी ओर देश-समाज की बड़ी आबादी बेरोजगारी, कुपोषण और शोषण की शिकार है। क्या छात्रों को ऐसे ही भविष्य के निर्माण के लिये प्रेरणा और शिक्षा दी जाती है जिससे कि आज का छात्र कल किसी कारखाने या आफिस में अराजनीतिक रूप से शिक्षित होकर कुछ लोगों के मुनाफे के लिये उत्पादन के काम में या सेवा करेन में लग जाये? क्या छात्रों को राजनीतिक रूप से अशिक्षित करके उन्हें अर्द्ध-शिक्षित उत्पादन मशीन नहीं बनाया जा रहा है।
छात्र और नौजवान देश का भविष्य होते हैं लेकिन उस तरह नहीं जैसा कि हमें आज बताया जाता है। छात्र और नौजवान भविष्य में खटने वाले मज़दूर ही नहीं होते हैं, बल्कि इतिहास बनाने वाले राजनीतिक रूप से सचेत मेहनतकश होते हैं, जो विज्ञान और तकनीकि विशेषज्ञता के साथ ही देश की राजनीति और संस्कृति को अपने काम से संगठित एकता बनाकर बदलते आये हैं और नये मुल्यों तथा नये विचारों का सूत्रापात करते हैं। आज छात्रों और मेहनतकश नौजवानों को यह नहीं बताया जाता उनकी सारी सृजनशीलता को पुरानी घिसी पिटी राजनीति, सामाजिक मूल्यों और संस्कृति के पाटों के बीच कुचला जा रहा है और एक उत्पादन मशीन तथा सिर झुकाकर आज्ञा पालन करने वाले रोबोट में बदलने का काम किया जा रहा है।
राजनीति पर अपनी इजारेदारी बनाये बैठें लोगों को लगता है कि यदि देश की युवा आबादी को राजनीतिक रूप से उदासीन और अशिक्षित कर दिया जायेगा तो वे बेरोजगार होकर काम की तलाश में भटकते रहेंगे, या किसी कारखाने में या किसी आफिस में किसी भी शर्त पर काम करने लगेंगे और कुछ मुठ्ठीभर देशी विदेशी पूँजीवादी-सम्राज्यवादी मुनाफाख़ोरों को देश की प्राकृतिक तथा मानव सम्पदा को खुले आम लूटते हुये देखते रहेंगे। एक सीमा तक वर्तमान प्रचार तन्त्र मज़दूरों और नौजवानों के बीच लम्पट और कूपमण्डूक संस्कृति के माध्यम से ऐसा करने में सफल भी हो रहा है। राजनीति में हिस्सा लेने के नाम पर कुछ राजनीतिक पार्टियॉ मिस-कॉल करके सदस्यता दे रही हैं, लेकिन मिस-काल करके समाज के भविष्य का ठेका किसी और को दे देना राजनीति नहीं हैं, बल्कि देश की मेहनतकश जनता के साथ एक मजाक है। इन सच्चाईयों के बीच भी यह सम्भव नहीं है कि देश की व्यापक आबादी को उसकी अपनी बदहाली के वास्तविक कारण के बारे में हमेशा के लिये अंधेरे में धकेले रखा जये। पूँजीवाद के रहते जहाँ श्रम शक्ति एक माल हो, और जहाँ इंसान को बाजार में बिकने वाले माल में तब्दील कर दिया गया हो वहाँ छात्रों और मज़दूरों को राजनीतिक रूप से अशिक्षित बनाकर सिर झुकाकर काम करने वाली भेंड़ों में तब्दील करके नहीं रखा जा सकता। आने वाले समय में शोषक सम्बन्धों के कारण पैदा हुईं जीवन की बदतर परिस्थितियाँ बार-बार मज़दूरों, किसानों और नौजवानों को अपने अधिकारों के बारे में जानकारी हासिल करने के साथ संघर्षों के इतिहास को समझते हुए मुनाफ़ा-केन्द्रित पूँजीवादी व्यवस्था और समाज में व्याप्त दरियाकनूशी मान्यताओं और प्रचलनों को बदलने के लिये खुद आगे आने और व्यापक स्तर पर हर प्रकार के शोषण के विरुद्ध संगठित होने का आह्वान करती रहेंगी। और जैसा कि कई मज़दूर नेताओं ने कहा था, कि यह संघर्ष तब तक जारी रहेंगे जब तक शोषक सम्बन्धों को पूर्ण उन्मूलन नहीं हो जाता।

Wednesday, March 27, 2013

मक्सिम गोर्की — एक साहित्यिक - क्रान्तिकारी परिचय



मक्सिम गोर्की (28 मार्च 1868 18 जून 1936) को पूरी दुनिया में महान लेखक और समाजवादी यथार्थवाद के प्रवर्तक के रूप में जाना जाता है। रूस में ज़ारशाही के दौरान 1907 में हुई असफल क्रान्ति से लेकर 1917 में हुई अक्टूबर समाजवादी क्रान्ति और उसके बाद के समाजवादी निर्माण तक के लम्बे दौर में मक्सिम गोर्की नें अपनी कहानियों, नाटकों, लेखों और उपन्यासों के माध्यम से हर क़दम पर जनता को अपनी परिस्थितियों के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा दी। वह अपने समय में दबी-कुचली जनता के आत्मिक जीवन के भावों की आवाज़ बनकर उभरे। बीसवीं शताब्दी के आरम्भ से लेकर अक्टूबर क्रान्ति के बाद लगभग 40 वर्षों के दौरान गोर्की अपनी कलम से रूसी साहित्य और जनता में बदलाव के लिये एक नई ऊर्जा का संचार करते रहे। साथ ही उनका सारा सृजन भी जनता के जीवन और संघर्षों से करीब से जुड़ा रहा।
समाज के दबे कुचले वर्गों से बचपन से ही जीवन्त सम्पर्क में रहने वाले गोर्की के लेखन को उनके जीवन और उस समय के रूसी समाज के परिप्रेक्ष्‍य में रखकर देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि उनके साहित्यिक सृजन का स्रोत क्या था। गोर्की के माता-पिता बचपन में नहीं रहे थे और उनका बचपन अपनी नानी के यहाँ बीता जहाँ उन्हें एक रूसी मध्यवर्गीय परिवारिक माहौल मिला। नानी की मृत्यु के बाद सम्पत्ति को लेकर परिवार में लड़ाई-झगड़े होने लगे जिसके बाद गोर्की ने 13 साल की उम्र में घर छोड़ दिया और कई जगह काम बदलते हुये रूस के कई हिस्सों में घूमते रहे। इस दौरान उन्हें समाज को और क़रीब से देखने का मौका मिला और वह कई प्रकार के लोगों के सम्पर्क में आये। इस तरह गोर्की बचपन से ही एक मज़दूर के रूप में पले-बढ़े और घर में काम से लेकर बेकरी के क़ारख़ानों, जहाजों और खेतों तक कई काम करते उनका बचपन मेहनत और संघर्ष करते हुये बीता।
आने वाले समय में बचपन के यह अनुभव ही उनके साहित्यिक रचनाओं का आधार बने और वह जनता के मुक्ति संघर्ष का हिस्सा बनकर उभरे। अपने पूरे साहित्यिक सृजन में गोर्की ने रूसी जीवन की कड़वी सच्चाई का यथार्थवादी चित्रण किसी व्यक्ति के दृष्टिकोंण से नहीं किया है, बल्कि वह उन परिस्थितियों को बदलने के लिये एक प्रेरणास्रोत की तरह पाठक के सामने प्रकट होते हैं। गोर्की के शब्दों में, "सत्य दया से अधिक महत्व रखता है। और आज मैं अपनी नहीं, वरन् दम घोंटनेवाले उस भयंकर वातावरण की कहानी लिखने बैठा हूँ, जिसमें साधारण रूसी जनता रहा करती थी और आज भी रहती है।" "पुरानी दुनिया अवश्य ही जानलेवा रोग से ग्रस्त है और हमें उस संसार से शीघ्रातिशीघ्र पिण्ड छुड़ा लेना चाहिये ताकि उसकी विषैली हवा कहीं हमें न लग जाये।"
बचपन में समय-समय पर गोर्की का परिचय उस समय के रूस में ज़ारशाही निरंकुशता एवं दमन उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष करने वाले क्रान्तिकारियों से होता रहा, जिनके जीवन का उनके ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा, "उन अनगिनत लोगों में से पहले व्यक्ति से मेरी मित्रता का अन्त हुआ, जो देश के सर्वश्रेष्ठ सपूत होते हुए भी अपने ही वतन में अजनबी से हैं..." इन लोगों के सम्पर्क ने गोर्की को किताबों से परिचित कराया। गोर्की की जीवन परिस्थितियों ने उन्हें किसी स्कूल या विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करने का कोई अवसर नहीं दिया, लेकिन उन्होंने स्वाध्याय और जनता से जुड़े रहकर प्राप्त अनुभव को अपनी शिक्षा का केन्द्र बनाया। गोर्की के शब्दों में, "मैं अपनी उपमा मधुमक्‍खी के छत्ते से दे सकता हूँ, जिसमें देश के अगणित साधारण प्राणियों ने अपने ज्ञान और दर्शन का मधु लाकर संचित किया है। सबों की बहुमूल्य देन से मेरे चरित्र का विकास हुआ। अक्सर देने वाले ने गन्दा और कड़वा मधु दिया, फिर भी था तो वह ज्ञान-मधु ही।"
गोर्की अपने बचपन में ही ज़ारशाही काल में रूसी जनता की ग़रीबी और उत्पीड़न को देख चुके थे और इस सच्चाई से अवगत हो चुके थे कि किस तरह उस समाज में एक बड़े हिस्से को दबे-कुचले तबकों के रूप में रहने और जानवरों की तरह जीवन व्यतीत करने के लिये मजबूर किया गया था, "मैं उनके बीच अपने आप को जलते अँगारों में डाल दिये गये जलते लोहे के टुकड़े की तरह महसूस करता था हर रोज मुझे अनेक तीखे अनुभव प्राप्त होते। मानव अपनी सम्पूर्ण नग्नता के साथ सामने आता था स्वार्थ और लोभ का पुतला बनकर। जीवन के प्रति उनका क्रोध, दुनिया की हर चीज़ के प्रति उनका उपहासजनक शत्रुता का भाव और साथ ही अपने प्रति उनका फक्कड़पन "
अपने साहित्यिक जीवन के आरम्भ में ही गोर्की का परिचय तोलस्तोय और चेखव जैसे रूस के महान यथार्थवादी लेखकों से हुआ। गोर्की शुरूआती दिनों से ही क्रान्तिकारी आन्दोलनों से जुड़े रहे। बाद में कम्युनिस्ट पार्टी बोल्शेविक में शामिल होकर जनता के संघर्षों में काफ़ी क़रीब से जुड़ गये और इसी दौरान उन्होंने पार्टी में शामिल मज़दूरों और क्रान्तिकारियों के जीवन और संघर्ष पर आधारित अपना विश्व प्रसिद्ध उपन्यास "माँ" (1906) लिखा जिसके बारे में लेनिन ने कहा था कि इसे पढ़कर उन सभी मज़दूरों को क्रान्ति के उद्देश्यों को समझने में मदद मिलेगी जो स्वत:स्फूर्त ढंग से आन्दोलन में शामिल हो गये हैं।
आज भी, जबकि पूरी दुनिया के मज़दूर आन्दोलन ठहराव के शिकार हैं और प्रगति पर प्रतिरोध की स्थिति हावी है, ऐसे में गोर्की के उपन्यास और कहानियाँ पूरी दुनिया की जनता के संघर्षों के लिये अत्यन्त प्रासंगिक हैं। आज भी उनकी रचनायें पूरी दुनिया की मेहनतकश जनता को एक साम्यवादी समाज के निर्माण के लिये उठ खड़े होने और परिस्थितियों को बदल डालने के लिये संघर्ष करने, एक क्रान्तिकारी इच्छाशक्ति पैदा करने और सर्वहारा वर्ग चेतना को विकसित करने की प्रेरणा देती हैं। गोर्की का साहित्य हमारे मन में वर्तमान समाज में जनता की बदहाल परिस्थितियों के प्रति नफ़रत ही नहीं बल्कि उन परिस्थितियोँ के विरुद्ध संघर्ष करने और उन्हें बदलने की इच्छा भी पैदा करता है।
गोर्की अपने उपन्यास "माँ" में एक मज़दूर के शब्दों में विचार प्रकट करते हुये कहते हैं, "क्या हम सिर्फ़ यह सोचते हैं कि हमारा पेट भरा रहे? बिल्कुल नहीं" "हमें उन लोगों को जो हमारी गर्दन पर सवार हैं और हमारी आँखों पर पट्टियाँ बाँधे हुए हैं यह जता देना चाहिए कि हम सब कुछ देखते हैं।  हम न तो बेवक़ूफ़ हैं और न जानवर कि पेट भरने के अलावा और किसी बात की हमें चिन्ता ही न हो। हम इंसानो का सा जीवन बिताना चाहते हैं! हमें यह साबित कर देना चाहिए कि उन्होंने हमारे ऊपर खू़न पसीना एक करने का जो जीवन थोप रखा है, वह हमें बुद्धि में उनसे बढ़कर होने से रोक नहीं सकता!"
गोर्की ने रूस की दलित उत्पीड़ित जनता का जीवन जितने क़रीब से देखा था उतने ही स्पष्ट रूप से उसको अपने साहित्य में चित्रित किया और व्यापक जनसमुदाय को शिक्षित करने में एक अत्यन्त ऐतिहासिक भूमिका निभाई। अपनी आत्मकथा में गोर्की ने लिखा है, "दुनिया में अन्य कोई चीज़ आदमी को इतने भयानक रूप से पंगु नहीं बनाती जितना कि सहना और परिस्थितियों की बाध्यता स्वीकार कर उनके सामने सिर झुकाना।" गोर्की ने अपनी कहानियोँ, नाटकों, उपन्यासों और लेखों के माध्यम से समाज को सिर्फ़ चित्रित ही नहीं किया बल्कि उन्हें एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया, "क्या यह ज़रूरी है कि इस हद तक घिनौनी बातों का वर्णन किया जाये? हाँ, यह ज़रूरी है! यह इसलिये ज़रूरी है श्रीमान कि आप धोखे में न रहें, कहीं यह न समझने लगें कि इस तरह की बातें केवल बीते जमाने में हुआ करती थीं! आज भी आप मनगढ़न्त और काल्पनिक भयानकताओं में रस लेते हैं, सुन्दर ढंग से लिखी भयानक कहानियाँ और किस्से पढ़ने में आपको आनन्द आता है। रोंगटे खड़े कर देने वाली कल्पनाओं से आपके हृदय को सनसनाने और गुनगुनाने से आप ज़रा भी परहेज़ नहीं करते। लेकिन मैं सच्ची भयानकताओं से परिचित हूँ, आये दिन के जीवन की भयानकताओं से, और यह मेरा अवंचनीय अधिकार है कि उनका वर्णन करके आपके हृदयों को कुरेदूं, उनमें चुभन पैदा करूँ ताकि आपको ठीक-ठीक पता चल जाये कि किस दुनिया में और किस तरह का जीवन आप बिताते हैं।" "कमीना और गन्दगी से भरा घिनौना जीवन है यह जो हम सब बिताते हैं।" "मैं मानव-जाति से प्रेम करता हूँ और चाहता हूँ कि उसे किसी भी तरह के दुःख न पहुँचाऊँ, परन्तु इसके लिये न तो हमें भावुकता का दामन पकड़ना चाहिये और न ही चमकीले शब्द-जाल और खू़बसूरत झूठ की टट्टी खड़ी करके जीवन के भयानक सत्य को हमें छिपाना चाहिये! ज़रूरी है कि हम जीवन की ओर मुँह करें और हमारे हृदय तथा मस्तिष्क में जो कुछ भी शुभ और मानवीय है, उसे जीवन में उड़ेल दें।"
एक भौतिकवादी होने के नाते गोर्की मनुष्यों के स्वभाव के लिये परिस्थितियों को ज़ि‍म्मेदार मानते थे और इसलिए वह जीवन की भौतिक परिस्थितियों को बदलने पर ज़ोर देते थे, "रूसी अपनी ग़रीबी और नीरसता के कारण ऐसा करते हैं। व्यथा और रंज उनके मनबहलाव के साधन हैं।" "जब जीवन की धारा एकरस बहती है तो बिपत्ति भी मन बहलाने का साधन बन जाती है। घर में आग लग जाना भी नवीनता का रस प्रदान करता है।"
गोर्की अपने समय के वर्तमान जीवन की आलोचना के साथ ही वर्ग समाज में प्रतिस्पर्धा की होड़ में होने वाले मनुष्यों के व्यक्तिगत विघटन की कड़ी आलोचना करते थे और उनका मानना था कि जब तक मेहनत करने वालों की मेहनत को कुछ परजीवी हड़पते रहेंगे तब तक समाज में शान्ति नहीं हो सकती, "समूचे वातावरण में एक-दूसरे को भक्षण करने की एक अराजक प्रक्रिया निरन्तर लागू है; सभी मनुष्य एक दूसरे के दुश्मन हैं; अपना-अपना पेट भरने की इस गन्दी लड़ाई में भाग लेने वाला हर आदमी सिर्फ़ अपनी ही सोचता है और अपने चारों ओर संदेह की दृष्टि से देखता है, ताकि पड़ोसी कही उसका गला न धर दबोचे। थकानें वाली इस पाशविक लड़ाई के भंवर में फंसकर बुद्धि की श्रेष्ठतम शक्तियाँ दूसरों से अपनी रक्षा करने मे ही नष्ट हो जाती हैं, मानव अनुभव की वह उपलब्धि जिसे "मैं" कहते हैं, एक अंधेरा तहख़ाना बन जाती है जिसके अन्दर अनुभव को और अधिक सम्रद्ध न करनें और पुराने अनुभव को तहख़ाने की दम घोंटनेवाली कोठरियों में बन्द रखने की क्षुद्र प्रवृत्तियाँ हावी रहती हैं। भरे पेट के अलावा आदमी को और क्या चाहिए? इस लक्ष्य को पाने के लिए मनुष्य अपने उच्चादर्शों से फिसलकर गिर गया है और ज़ख्मी होकर आँखें फाड़े, पीड़ा से चीखता और कराहता नीचे पड़ा है।"
जनता के मुक्तिसंघर्ष में पूरा विश्वास रखने वाले और एक क्रान्तिकारी के रूप में उस संघर्ष में शामिल रहते हुये जीवन के प्रति गोर्की का दृष्टिकोंण आशावाद और जनता में दृढ़ विश्वास से भरा हुआ था, "हमारे जीवन की यही विलक्षणता नहीं है कि वह बर्बरता और पाशविकता की मोटी तह में लिपटा हुआ है, बल्कि यह कि इस तह के नीचे से आलोकमय, सबल, सृजनात्मक और भलाई की शक्तियाँ विजयी होकर बाहर आ रही हैं और यह दृढ़ आशा पैदा कर रही हैं कि वह दिन दूर नहीं, जब हमारे देश की जनता के जीवन में सौंदर्य एवं आलोकपूर्ण मानवता का सूर्य उगेगा और अवश्य उगेगा।"

गोर्की का पूरा जीवन और उनका साहित्यिक कार्य पूरी दुनिया के मज़दूरों के लिये एक प्रेरणास्रोत है, और अन्याय के विरुद्ध क़दम-क़दम पर हमें संघर्ष करने के लिये प्रोत्साहित करता है। उनका मानना था, "पूँजीवादी समाज में कुल मिलाकर मनुष्य अपने अद्भुत सामर्थ्य को निरर्थक लक्ष्यों की प्रप्ति के लिये बर्बाद करता है। अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिये उसे गली में हाथों बल चलना पड़ता है, द्रुतगति के ऐसे रिकार्ड स्थापित करने पड़ते हैं जिनका कुछ कम या कुछ भी व्यावहारिक मूल्य नहीं होता, एक ही वक्त में बीसियों के साथ शतरंज के मैच खेलने, अद्भुत कलाबाजियाँ खाने और काव्य-रचना के झूठे चमत्कार प्रदर्शित करने पड़ते हैं, और साधारणतया हर प्रकार की ऐसी बेसिरपैर की हरकतें करनी पड़ती हैं जिनसे उकताये तथा ऊबे हुए लोगों को पुलकित किया जा सके।. . . . "

अक्टूबर क्रान्ति के बाद सोवियत यूनियन में गोर्की अपने अन्तिम दिनों तक समाजवादी खेमें के अनेक युवा लेखकों का जोश के साथ नेतृत्व कर रहे थे। "अग्नि-दीक्षा" उपन्यास के लेखक निकोलाई ओस्त्रोव्स्की ने 1936 में गोर्की के बारे में लिखा है, "हमारी टुकड़ी का कमाण्डर ऊंचे कद का, सफेद बालों वाला कमाण्डर कहता है: "इन घिसटनेवालों का क्या करूँ? पीछे कहीं बैठे नाश्ता कर रहे होंगे" अगले दस्ते से कहीं 50 मील पीछे होंगे। उनकी पाकशाला पीछे कहीं दलदल में धंस गई है। मेरे बालों को ये लज्जित कर रहे हैं।" यह मज़ाक है ज़रूर, मगर एक कड़वा मज़ाक, इसमें सचाई कम नहीं।" प्रसिद्ध और सम्मानप्राप्त, अपनी कला में सिद्धहस्त अपनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए, धीरे से बड़े गंभीर लहजे में
अन्त में गोर्की के ही शब्दों में, "मेरे लिये मानव से परे विचारों का कोई अस्तित्व नहीं है। मेरे नज़दीक मानव तथा एकमात्र मानव ही सभी वस्तुओं और सभी विचारों का निर्माता है। चमत्कार वही करता है और वही प्रकृति की सभी भावी शक्तियों का स्वामी है। हमारे इस संसार में जो कुछ अति सुन्दर है उनका निर्माण मानव श्रम, और उसके कुशल हाथों ने किया है। हमारे सभी भाव और विचार श्रम की प्रक्रिया में उत्पन्न होते हैं और यह ऐसी बात है, जिसकी कला, विज्ञान तथा प्रविधि का इतिहास पुष्टि करता है। विचार तथ्य के पीछे चलता है। मैं मानव को इसलिये प्रणाम करता हूँ कि इस संसार में कोई ऐसी चीज़ नहीं दिखाई देती जो उसके विवेक, उसकी कल्पनाशक्ति, उसके अनुमान का साकार रूप न हो।

"यदि "पावन" वस्तु की चर्चा आवश्यक ही है, तो वह है अपने आप से मानव का असन्तोष, उसकी यह आकांक्षा कि वह जैसा है उससे बेहतर बने। ज़ि‍न्दगी की सारी गन्दगी के प्रति जिसे उसने स्वयं जन्म दिया है, उसकी घ्रणा को मैं पवित्र मानता हूँ। ईष्या, धनलिप्सा, अपराध, रोग, युद्ध तथा संसार में लोगों बीच शत्रुता का अन्त करने की उसकी इच्छा और उसके श्रम को पवित्र मानता हूँ।"

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