२३ मार्च 2011 ! !
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ब्रिटिश सरकार नें डरके 23 मार्च 1931 को फाँसी दी थी
ज्यादातर लोग सोच रहे होंगे, कि क्या हो गया, ये तो हर साल आता है? अब अगर कोई इन लोगों से उम्मीद करे कि ये अपने रोजमर्रा के छोटे से जीवन से बहार निकल कर देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चारो और मची लूट खसोट को रोकने के लिए कुछ करेंगे तो शायद यह एक मजाक जैसा लगेगा |
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लेकिन फिर भी आज २३ मार्च, शहीद दिवस, के दिन जब पूरे देश के “नौजवान” क्रिकेट में "व्यस्त" है, और ज्यादातर यह भी नहीं जानते कि २३ मार्च १९३१ को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गयी थी; जब कि पूरा पूंजीवादी मीडिया कभी इसकी चर्चा नहीं करता, तो कम से कम हमें अपनें प्रयास से ही कुछ लोगों के कानों तक कुछ जानकारी पहुंचा देनी चाहिए | इस सब के साथ-साथ हमारे आसपास कुछ और भी हो रहा हैं, जैसे नेताशाही घोटाले करनें में व्यस्त है !! अफसारशाही घूसखोरी में व्यस्त है!! पूंजीवादी मुनाफाखोरी में व्यस्त हैं !! और साम्राज्यवादी दुसरे देशों के उद्योगों को लूटने में व्यस्त हैं !! और जनता . . . . !!
हो सकता है कि कुछ लोग जो अपनी रोजमर्रा की छोटी-छोटी समस्यायों के लिए सरकार को कोसनें के अलावा और कुछ भी नहीं करते, वे सायद कायरता सूचक अपनी बेबुनियाद बहसों से आगे बढकर कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में भी सोच सकें |
ज्यादातर लोग बहस करते हुए दिखाते हैं कि उस पूंजीपति ने एक बड़ा घर बना लिया ! उस विशिष्ट व्यक्ति नें कुछ और पैसे जमा कर लिए! सचिन नें एक और शतक बना लिया!.... लेकिन ये लोग उन अनेक लोगों के बारे में भूल चुके हैं जिनकी कुर्बानी की बदौलत आज ये हम विदेशी शोषण और खुली तानाशाही से आज़ाद होकर चैन की साँस ले पा रहे हैं, और जिनकी बदौलत "Indian and Dogs not allowed" वाले पोस्टर अब नहीं दिखाते | लेकिन फिर भी मेहनतकश जनता के शोषण की परिस्थितियां लगातार बदतर होती जा रहीं है| जिसके कारण आज-कल चोर और धोकेबाज़ (ये सच किसी से छिपा नहीं है! और जिसे यह भी नहीं पता उसको भारत का नागरिक कहलानें का कोई अधिकार नहीं !!) नेताशाही, अफसरशाही और पूंजीपति वर्ग को इन क्रांतिकारी शहीदों के नाम से डर लगता है; लेकिन क्यों लगता है ? क्योकि कहीं इन शहीदो के साम्यवाद के विचार जिनको वे अपने छोटे से जीवन काल में समझ चुके थे, वे विचार कही जनता के कानों में न पड़ जाएँ नहीं तो जनता उनकी चोरी को पकड़ लेगी और उनकी लूट-खसोट ज्यादा नहीं चल पयेगी !!
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"आज जिस आज़ादी का उपभोग हम कर रहे हैं उसकी भव्य इमारत की बुनियाद डालने में . . . कितने ही ज्ञात तथा अज्ञात क्रांतिकारियों ने अपना रक्त और मांस गला दिया था| . . . क्या हम उसका उचित सम्मान कर रहे हैं?" (pg. १३१ संस्मृतियाँ शिव वर्मा)
"बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में जहाँ एक तरफ देश की क्रांतिकारी शक्तियाँ करवटें बदल रही थीं और मजदूर तथा किसान जनता कुछ कर गुजरने के लिए कसमसा रही थी वहीँ देशद्रोही राजभक्त प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ हिन्दुओं और मुसलमानों को लड़ाकर जनता को पथ विमुख करने का प्रयास कर रही थीं| उसका विरोध करते हुए हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देकर घोषणा-पत्र में धार्मिक अन्ध-विशवास पर तीखा प्रहार किया गया था|" . . . ". .. हम भारतवासी क्या कर रहे हैं? पीपल की एक डाल टूटते ही हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं चोटिल हो उठती हैं| बुतों को तोड़ने वाले मुसलमानों कि ताजिये नाम के कागज़ के बुत का एक कोना फटते ही अल्लाह का प्रकोप जाग उठता है और फिर वह नापाक हिन्दुओं के खून से कम किसी वस्तु से संतुष्ट नहीं होता| मनुष्य को पशुओं से अधिक महत्व दिया जाना चाहिए लेकिन यहाँ भारत में वे लोग पवित्र पशु के नाम पर एक-दुसरे का सर फोड़ते हैं|" (pg. १५८ संस्मृतियाँ शिव वर्मा)
