Thursday, August 13, 2026

Is the right to education limited merely to enrolment and the quality of teaching, or does it encompass something much larger?


बेहतर शिक्षा के लिए बढ़ते छात्र आंदोलनों (Gen Alpha) का एक विहंगावलोकन
क्या शिक्षा का अधिकार केवल विद्यालय में नामांकन और शिक्षण की गुणवत्ता तक सीमित है, या इसका दायरा इससे कहीं अधिक व्यापक है? हम युवा छात्रों के बढ़ते आंदोलनों को देख रहे हैं। इन छात्रों को अक्सर Gen Alpha के रूप में संबोधित किया जाता है। वे बेहतर विद्यालयों, बेहतर शैक्षणिक बुनियादी ढाँचे और ज्ञान प्राप्त करने की अपनी दैनिक यात्रा के लिए आवश्यक मूलभूत परिस्थितियों की माँग कर रहे हैं। लेकिन शायद हमें इस विषय को थोड़ा और गहराई से देखने की आवश्यकता है: एक शिक्षा व्यवस्था वास्तव में कैसे काम करती है? कक्षा के बाहर क्या होता है—भोजन, स्वास्थ्य, सुरक्षा, परिवहन, किताबें, कपड़े, परिवार की आय, तकनीक तक पहुँच और विद्यालय में बने रहने की क्षमता? शिक्षा समाज से अलग-थलग कोई व्यवस्था नहीं है। वह समाज की सामाजिक और आर्थिक संरचना से गहराई से जुड़ी हुई है। इसलिए शिक्षा के संकट को समझने के लिए हमें केवल नामांकन और परीक्षा परिणामों से आगे देखना होगा और उस पूरे तंत्र को समझना होगा जो यह निर्धारित करता है कि किसे सीखने का अवसर मिलता है, कौन अपनी शिक्षा जारी रख पाता है और अंततः किसे बेहतर जीवन बनाने का अवसर प्राप्त होता है। शिक्षा केवल नामांकन से कहीं अधिक है बच्चों के नामांकन और शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़े आँकड़े आज सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में आ रहे हैं। लेकिन भारत में शिक्षा का प्रश्न इससे कहीं बड़ा है कि “कितने बच्चे विद्यालय में नामांकित हैं?” या “सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता कैसी है?” जमीनी स्तर पर हमें कुछ और बुनियादी सवाल पूछने होंगे: क्या एक गरीब बच्चा पर्याप्त भोजन प्राप्त कर सकता है → सुरक्षित विद्यालय तक पहुँच सकता है → किताबों, कपड़ों और परिवहन का खर्च उठा सकता है → स्वस्थ रह सकता है → किशोरावस्था तक अपनी शिक्षा जारी रख सकता है → समय से पहले दिहाड़ी, कृषि या ठेका मजदूरी में जाने से बच सकता है → आवश्यक कौशल हासिल कर सकता है → बेहतर रोजगार प्राप्त कर सकता है → और अंततः अपने अधिकारों को समझकर उनके लिए आवाज उठा सकता है? यदि इस पूरी श्रृंखला की कोई एक कड़ी भी टूट जाती है, तो औपचारिक नामांकन के बावजूद आर्थिक असुरक्षा बनी रह सकती है। भारत में प्राथमिक शिक्षा में लगभग 10.4 करोड़ बच्चे हैं, लेकिन सकल नामांकन अनुपात (Gross Enrolment Ratio) माध्यमिक स्तर पर घटकर 78.7% और उच्च माध्यमिक स्तर पर केवल 58.4% रह जाता है। माध्यमिक स्तर पर विद्यालय छोड़ने की दर लगभग 11.5% है। NSS के आँकड़े यह भी बताते हैं कि जो लोग कभी विद्यालय में नामांकित हुए लेकिन बाद में पढ़ाई छोड़ दी, उनमें आर्थिक कठिनाइयाँ और आर्थिक गतिविधियों में भागीदारी शिक्षा छोड़ने के महत्वपूर्ण कारण थे। ग्रामीण पुरुषों के मामले में आर्थिक गतिविधि शिक्षा छोड़ने के प्रमुख कारणों में सबसे ऊपर थी। इस पूरी तस्वीर का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—शिक्षा की पहुँच और उपलब्धता। पिछले एक दशक में भारत में सरकारी विद्यालयों की संख्या लगभग 94,000 कम हुई है, जो 2014–15 में लगभग 11.07 लाख से घटकर 2024–25 में लगभग 10.13 लाख रह गई। इसका अर्थ यह नहीं है कि 94,000 विद्यालय सीधे तौर पर बंद कर दिए गए, क्योंकि इन आँकड़ों में विद्यालयों के विलय और युक्तिकरण (rationalisation) का प्रभाव भी शामिल है। लेकिन ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में विद्यालयों के विलय से एक गंभीर सवाल जरूर पैदा होता है—अब बच्चे को विद्यालय पहुँचने के लिए कितनी दूर जाना पड़ता है? क्या सुरक्षित और सस्ता परिवहन उपलब्ध है? और क्या बढ़ी हुई दूरी विशेष रूप से लड़कियों तथा गरीब परिवारों के बच्चों को अपनी शिक्षा जारी रखने से हतोत्साहित कर सकती है? इसलिए विद्यालयों की संख्या केवल प्रशासनिक आँकड़ा नहीं है; यह सीधे तौर पर यह निर्धारित कर सकती है कि किसी बच्चे के लिए शिक्षा वास्तव में कितनी सुलभ है। जहाँ 2014–15 से 2024–25 के बीच सरकारी विद्यालयों की संख्या लगभग 94,000 कम हुई, वहीं मान्यता प्राप्त निजी गैर-सहायता प्राप्त विद्यालयों (Private Unaided Recognised Schools) की संख्या लगभग 51,000 बढ़कर 2.88 लाख से 3.39 लाख हो गई। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि आज निजी गैर-सहायता प्राप्त विद्यालयों में कुल स्कूली विद्यार्थियों के लगभग 39% पढ़ रहे हैं। यह शिक्षा व्यवस्था में एक बड़े संरचनात्मक बदलाव की ओर संकेत करता है—शिक्षा तक पहुँच के लिए परिवारों की निजी व्यवस्था पर निर्भरता बढ़ रही है और इसके साथ शिक्षा की लागत का एक बड़ा हिस्सा परिवारों पर आ रहा है। इसलिए महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि निजी विद्यालय क्यों बढ़ रहे हैं, बल्कि यह भी है कि क्या सरकारी विद्यालयों के विलय, युक्तिकरण और सार्वजनिक शैक्षणिक बुनियादी ढाँचे के सिमटने के साथ-साथ शिक्षा का आर्थिक बोझ धीरे-धीरे परिवारों पर स्थानांतरित हो रहा है? इसलिए वास्तविक प्रश्न केवल यह नहीं है कि कितने बच्चे कक्षा 1 में प्रवेश लेते हैं, बल्कि यह है कि कितने बच्चे पूरी शैक्षणिक यात्रा तय कर पाते हैं और इतनी शिक्षा एवं कौशल हासिल कर पाते हैं कि कम वेतन वाली, असुरक्षित मजदूरी से बाहर निकल सकें—और अपने अधिकारों को समझने तथा उनके लिए आवाज उठाने की क्षमता विकसित कर सकें। शिक्षा केवल साक्षरता का विषय नहीं है। यह आर्थिक स्वतंत्रता, गरिमा और अपने अधिकारों के लिए बातचीत एवं संघर्ष करने की क्षमता का भी प्रश्न है।

शिक्षा की यह दुर्दशा केवल सरकार की विफलता नहीं है; यह हमारे व्यापक सामाजिक और बौद्धिक संस्थानों की भी विफलता है। जिन लोगों के पास शिक्षा, संसाधन और सामाजिक प्रभाव है, उनकी जिम्मेदारी है कि वे समाज के उन वर्गों के साथ खड़े हों जो आज भी बुनियादी शैक्षणिक अवसरों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, और माता-पिता तथा समुदायों को बेहतर विद्यालय, स्वास्थ्य सुविधाएँ, परिवहन, पोषण और सामाजिक बुनियादी ढाँचे की माँग के लिए संगठित करें।

लेकिन हमारे सार्वजनिक विमर्श का एक बड़ा हिस्सा आज भी धार्मिक कर्मकांड, पहचान, जाति और धर्म आधारित राजनीति में उलझा हुआ है, जबकि करोड़ों बच्चों के भविष्य को निर्धारित करने वाले इन बुनियादी सामाजिक और आर्थिक प्रश्नों पर अपेक्षाकृत कम और लगातार ध्यान दिया जाता है।

एक शिक्षित और प्रगतिशील समाज की वास्तविक परीक्षा इस बात से नहीं होती कि वह धर्म या पहचान पर कितनी जोरदार बहस करता है, बल्कि इस बात से होती है कि वह हर बच्चे को सीखने, विद्यालय में बने रहने, कौशल हासिल करने और गरिमा, आर्थिक स्वतंत्रता तथा अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने का कितना अवसर देता है।

--------------------------- Is the right to education limited merely to enrolment and the quality of teaching, or does it encompass something much larger? We are witnessing growing protests by young students, often described as Gen Alpha, demanding better schools, educational infrastructure, and the basic conditions necessary for their everyday pursuit of knowledge. But perhaps we need to look deeper: How is an education system actually supposed to function? What happens beyond the classroom—food, health, safety, transport, books, clothing, family income, access to technology and the ability to remain in school? Education does not exist in isolation. It is deeply interwoven with the social and economic structure of society. To understand the education crisis, therefore, we must look beyond enrolment and examination results and examine the entire ecosystem that determines who gets to learn, who is able to continue learning, and ultimately who gets the opportunity to build a better life. Education Is More Than Enrolment The statistics of children’s enrolment and the quality of education are becoming central to public debate. But India’s education question is much larger than “How many children are enrolled?” or “What is the quality of government schools?” At the grassroots level, we must ask: Can a poor child eat adequately → reach a safe school → afford books, clothes and transport → stay healthy → continue through adolescence → avoid premature entry into casual/agricultural/contract labour → acquire skills → find better employment → understand and exercise his/her rights? If any link breaks, formal enrolment can coexist with economic vulnerability. India has about 104 million children in primary education, but the Gross Enrolment Ratio falls to 78.7% at secondary level and just 58.4% at higher-secondary level. The secondary-school dropout rate is about 11.5%. The NSS also found that among those who had enrolled but were no longer attending, financial constraints and participation in economic activities were significant reasons for discontinuing education; for rural males, economic activity was the most commonly cited major reason. There is another important dimension: access and reachability. Over the last decade, the number of government schools in India has fallen by roughly 94,000, from about 11.07 lakh in 2014–15 to 10.13 lakh in 2024–25. This does not necessarily mean that 94,000 schools were physically shut down, as the figures also reflect mergers and rationalisation. But in rural and remote areas, the consolidation of schools can create a serious question of reachability and availability: How far does a child now have to travel to attend school? Is safe and affordable transport available? And does greater distance particularly discourage girls and children from poorer families from continuing their education? Thus, the number of schools is not merely an administrative statistic; it can directly influence whether education is physically accessible to a child. Source: UDISE+ 2014–15 and 2024–25, Ministry of Education. While the number of government schools fell by about 94,000 between 2014–15 and 2024–25, private unaided recognised schools increased by roughly 51,000—from 2.88 lakh to 3.39 lakh. More importantly, private unaided schools now account for about 39% of total school enrolment. This represents a major structural shift: education is increasingly being accessed through a private system in which families bear a significantly greater share of the cost. The important question, therefore, is not simply whether private schools are growing, but whether the withdrawal/consolidation of public-school infrastructure is simultaneously transferring the economic burden of education to families. So the real question is not merely how many children enter Class I, but how many make it through the entire educational pipeline with enough education and skills to escape low-paid, insecure labour—and gain the ability to understand and demand their rights. Education is not only about literacy. It is also about economic independence, dignity and bargaining power.

This deteriorating condition of Indian education system is not merely a failure of the government; it is also a failure of our broader social and intellectual institutions. Those with education, resources and social influence have a responsibility to engage with the sections of society that struggle every day for basic educational opportunities, and to help organise parents and communities around demands for better schools, healthcare, transport, nutrition and social infrastructure. Yet much of our public discourse remains consumed by religious rituals, identity, caste and religion-based politics, while the everyday structural issues that determine the future of millions of children receive far less sustained attention. The real test of an educated and progressive society is not how loudly it debates religion or identity, but how effectively it ensures that every child can learn, remain in school, acquire skills, and grow up with dignity, economic independence and the ability to demand their rights.

References:
संदर्भ: UDISE+ 2024–25, शिक्षा मंत्रालय; NSS Household Social Consumption on Education, MoSPI; श्रम एवं रोजगार मंत्रालय.
UDISE+ 2024–25, Ministry of Education; NSS Household Social Consumption on Education, MoSPI; Ministry of Labour & Employment.
https://niti-dbim-dev.inroad.in/sites/default/files/2026-05/School-Education-System-in-India.pdf?utm_source=chatgpt.com #education #RightToEducation

Saturday, November 29, 2025

Some interesting short stories by Tolstoy to Read, Think and Relate with yur surrounding- Part1

तोलस्तोय की कुछ रोचक लघु कहानियाँ, जो हमारे एसपास के सामाजिक परवेश के बारे में हमें सोचने के लिये मज़बूर करती हैं।
(Some interesting short stories by Tolstoy)




From Book: Lev Tolstoy Stories For Children Hindi - PPH Publication

Wednesday, November 19, 2025

आर्टीफ़िशियल इण्टेलिजेंस और आटोमेशन के दौर में भारत के उद्योगपतियों का 90 घण्टे काम करवाने का सपना

 Published in : आह्वान पत्रिका (https://ahwanmag.com/archives/8288)

भारत के उद्योगपति आजकल सपना देख रहे हैं कि उसके मज़दूर बिना छुट्टी, बिना आराम किये हर हफ़्ते 90 घण्टे काम करते रहें। कुछ दिनों पहले इन्फोसिस के मालिक नारायणमूर्ति ने बयान दिया कि आईटी कम्पनियों में पाँच दिन के साप्ताहिक काम के निर्णय से उन्हें काफ़ी निराशा हुई थी और यदि उनकी बात मानी जाये तो मज़दूरों को देश की आर्थिक तरक्की के लिये हर हफ़्ते 70 घण्टे काम करना चाहिये। ओला कम्पनी का मालिक भावेश दो क़दम आगे बढ़कर मूर्ति के बयान का समर्थन करते हुए वर्तमान उद्योगपतियों की इच्छा को और भी स्पष्ट रूप से प्रकट करता है। उसका मानना है कि मज़दूरों को 140 घण्टे काम करना चाहिये और उन्हें कोई छुट्टी मिलनी ही नहीं चाहिये। इनके सुर में सुर मिलाते हुए लार्सन एण्ड टूब्रो के चेयरमैन एस. एन. सुब्रह्मण्यन का कहना है कि वह कर्मचारियों से सप्ताह में 90 घण्टे सातों दिन काम करवाना चाहते हैं। देश के कई राज्यों की सरकारों ने इस दिशा में क़ानून बनाने के प्रयास भी शुरु कर दिये हैं। इन उद्योगपतियों के अनुसार मज़दूरों को छुट्टी की क्या ज़रूरत है और अपने घर पर अपने बीबी-बच्चों, परिवार के साथ समय बिताकर वे क्या हासिल करते हैं, उन्हें “देश के निर्माण” के नाम पर इन उद्योगपतियों का बेहिसाब मुनाफ़ा बढ़ाने में अपने समय का बलिदान करना चाहिये। 90 घण्टे काम करने की माँग करने वाले ये उद्योगपति यह नहीं बताते कि देश के श्रम क़ानूनों के अनुसार यदि कोई मज़दूर 48 घण्टे से ज़्यादा काम करता है तो उसे हर घण्टे के हिसाब से दोगुना वेतन मिलना चाहिये।

यही वजह है कि लगातार बयान देकर लोगों को एहसास कराया जा रहा है कि देश की तरक़्क़ी इसलिये नहीं हो रही क्योंकि मज़दूर कम काम करते हैं। लेकिन सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। गुड़गाँव में काम करने वाले मज़दूरों की हालत की सर्वे रिपोर्ट देखें तो इन इलाक़ों में रहने वाले मज़दूर आटोमोबाइल और टेक्सटाइल जैसे कई क्षेत्रों में ठेके पर, बिना किसी स्थायी नौकरी के, बिना सामाजिक सुरक्षा के सप्ताह के सातों दिन 14 से 18 घण्टे काम करते हैं, जिसके बदले में उन्हे 10 से 18 हज़ार मज़दूरी मिलती है। यह मेहनतकश, जो उत्पादन की नींव हैं, वे 14-18 घण्टे काम करने के बाद 6 से 10 घण्टे के लिये 10X10 फ़ीट के कमरे में आराम करने के लिये आते हैं, ताकि अगले दिन फिर 18 घण्टे के काम पर जा सकें।
आगे बढ़ने से पहले एक नज़र देश के कॉरपोरेट क्षेत्र में काम करने वाले सफ़ेदपोश कर्मचारियों की स्थिति पर भी डाल लेते हैं। भारत के आईटी क्षेत्र में 2023 से 2024 बीच नौकरियों में जुड़े नये कर्मचारियों के वेतन में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई, बल्कि कई क्षेत्रों में वेतन कम हो गया है। 2024 में कुल 15 लाख इंजीनियरिंग ग्रेजुएट कामगारों की क़तारों में जुड़ें जिनमें से 1.5 लाख को ही काम मिल सका, यानि देश का आईटी सेक्टर 90% नौजवानों को नौकरी नहीं दे पाता। लेकिन इसी बीच इन कम्पनियो के सीईओ का वेतन 2012 से 2022 के बीच औसतन 835% की दर से बढ़ा है, और 3.37 करोड़ से 31.5 करोड़ हो गया, जबकि नये कर्मचारियों के वेतन में इस दौरान सिर्फ़ 42% बढ़ोत्तरी हुई जो 2012 में 2.45 लाख की तुलना में 2022 में 3.55 लाख सालाना है। इसका अर्थ है कि इन कम्पनियों में सीईओ का वेतन कर्मचारियों के वेतन से 870 गुना अधिक है और 10 साल में बढ़ोत्तरी 20 गुना ज़्यादा हुई है। मज़दूरों की बदहाली के समुद्र में बसे सफ़ोदपोश नौकरी करने वाले मध्यवर्ग की अय्याशी के टापू अब धीरे-धीरे डूबने लगे हैं।
लगातार काम करने का परिणाम कम मज़दूरी और श्रम अधिकारों का उल्लंघन तो होता ही है बल्कि मौज़ूदा शत्रुतापूर्ण (hostile) उत्पादन व्यवस्था में मज़दूरों के लिये उनके मानवीय अस्तित्व को बनाये रखने का भी सवाल पैदा करता है। 2021 की विश्व स्वास्थ संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार लम्बे समय तक काम करने से पूरी दुनिया में साल 2000 से 2016 के बीच हृदय रोगों से होने वाली मौतों में 42 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। इनमें वे लोग शामिल हैं जो हर सप्ताह 55 घण्टों से ज़्यादा काम करते हैं। आई.एल.ओ. की रिपोर्ट के मुताबिक काम के घण्टों के मामले में सबसे ज़्यादा काम करवाने वाले देशों की सूची में भारत 13वें स्थान पर है। देश की 51 प्रतिशत आबादी 49 घण्टे सप्ताह काम करती है जो काम के घण्टों के मामले में दुनिया में दूसरे नम्बर पर है। जबकि 2024 के आँकड़े देखें तो प्रतिव्यक्ति आय के मामले में भारत दुनिया में 141वे पायदान पर है।
वहीं ग्लोबल हंगर इण्डेक्स के आँकड़ों के आधार पर भारत 122 देशों में 111वें स्थान पर है। पूरी दुनिया की तुलना में भारत में सबसे अधिक बच्चे (18.7 प्रतिशत) कुपोषण के शिकार है। विश्व बैंक के अनुसार दक्षिण एशिया में 39 करोड़ लोग ग़रीबी में जी रहे हैं, जिनका 40 फ़ीसदी अकेले भारत में मौज़ूद है। जनता की ऐसी बदहाल स्थिति के बीच 2019 में सरकार ने मौज़ूदा कम्पनियों का कॉरपोरेट टैक्स घटाकर 30% से 22% कर दिया, और नयी कम्पनियों का कॉरपोरेट टैक्स 25% से घटाकर 15% कर दिया। जिसका नतीज़ा है कि 2024-25 में कॉरपोरेट कर का हिस्सा जीएसटी (26.65%) और आयकर (30.91%) से भी कम (सिर्फ 26.5 फ़ीसदी) रहने वाला है। जिससे देश को 1 लाख करोड़ का राजस्व घाटा होगा, यानि 1 लाख करोड़ रुपया जनता से छीन कर कॉरपोरेट को बाँट दिया गया। इन बदलावों से पिछले चार साल में कॉरपोरेट के मुनाफ़े में चार गुना की बढ़ोत्तरी हुई है। 2024 में भारत अरबपतियों की संख्या के मामले में पूरी दुनिया में तीसरे स्थान पर पहुँच चुका है, जिनकी सम्पत्ति में पिछले एक साल में 42 फ़ीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है। इस दौरान मज़दूरों के वेतन और उनके जीवन स्तर में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई और न ही नये रोज़गार पैदा हुए। आज देश की 94 फ़ीसदी आबादी के पास कोई स्थायी नौकरी नहीं है, 40 फ़ीसदी काम करने वालों की महीने भर की कुल कमाई 6 हज़ार से भी कम है, और 50 फ़ीसदी की आबादी की आमदनी 15 हज़ार महीना से कम है। वहीं सरकारी नीतियो से खुली लूट के दम पर देश की एक प्रतिशत आबादी के पास देश की 40 फ़ीसदी सम्पत्ति केन्द्रित हो चुकी है और 2022-23 में देश की राष्ट्रीय आमदनी का 22 फ़ीसदी से अधिक हिस्सा देश के ऊपरे के एक प्रतिशत लोगों की जेब में चला गया। आज आज़ाद भारत में असमानता की खाई ब्रिटिश शासन काल से भी अधिक चौड़ी हो चुकी है, और यह दुनिया के किसी भी और देश से ज़्यादा है।

भारत में आय असमानता 2022-23
आय वर्गवयस्कों की संख्याआय में हिस्सा (%)आय सीमा
(रुपये में)
औसत आय
(रुपये में)
औसत से अनुपात
औसत92,23,44,83210002,34,5511.0
नीचे की 50%46,11,72,41615071,1630.3
मध्यवर्ती 40%36,89,37,93327.31,05,4131,65,2730.7
ऊपर की 10%9,22,34,48357.72,90,84813,52,9855.8
ऊपर की 1%92,23,44822.620,73,84653,00,54922.6
ऊपर की 0.1%9,22,3459.682,20,3792,24,58,44295.8
ऊपर की 0.01%92,2344.33,46,06,04410,18,14,669434.1
ऊपर की 0.001%9,2232.120,01,98,54848,51,96,8752068.6

एक तरफ पूरी दुनिया के उद्योगपति और टेक्निकल मीडिया वाले प्रचार कर रहे हैं कि ए.आई., यानि आर्टीफ़िशियल इण्टेलिजेंस (कृत्रिम बुद्धिमत्ता), के प्रचलन में आने के बाद आटोमेशन के क्षेत्र में नये स्तर की तरक़्क़ी हो रही है और आने वाले समय में काम करने वाले कर्मचारियों की काफ़ी कम संख्या की आवश्यकता होगी। यदि यह सच है तो नारायणमूर्ति या सुब्रह्मण्यन जैसे उद्योगपति 90 घण्टे काम करवाने की वकालत क्यों कर रहे हैं, वे ऐसा क्यों सोच रहे हैं कि उनकी कम्पनियों में काम करने वाले मज़दूर हर दिन बिना छुट्टी के, परिवार से अलग-थलग रहकर हर दिन 13 घण्टे काम में लगे रहें। इसे समझना इतना कठिन नहीं है। वास्तव में देखा जाये तो पूँजीवादी उत्पादन में मशीनों, उपकरणों या ए.आई. जैसे टूल्स का उपयोग श्रम की उत्पादकता को बढ़ा तो देते है, जिससे पूरे समाज के जीवन स्तर में उन्नति होती है, लेकिन यह मुनाफ़े का स्रोत नहीं होते। सामाजिक उत्पादन में मुनाफ़े का स्रोत मज़दूरों द्वारा उत्पादन में लगाया गया अतिरिक्त श्रम होता है। यानि मज़दूर जितना ज़्यादा देर तक काम करेंगे वे उतना ही अतिरिक्त उत्पादन करेंगे और उतना ही ज़्यादा मुनाफ़ा बढ़ेगा। पूँजीवादी उत्पादन में पैदा होने वाला सारा मुनाफ़ा मज़दूरों के श्रम के शोषण से पैदा होता है या कहा जाये कि मुनाफ़ा मज़दूरों के उस श्रम से पैदा होता है जिसे पूँजीवादी उत्पादन प्रक्रिया में पूँजीपति द्वारा हड़प लिया जाता है।
यदि सरल शब्दों में समझें तो उत्पादकता की वर्तमान अवस्था में यदि एक व्यक्ति किसी कम्पनी में 8 घण्टे काम करता है तो वह अपने वेतन के मूल्य के बराबर उत्पादन 2-3 घण्टे में ही कर लेता है और बचे हुए 5-10 घण्टे वह कम्पनी के मालिकों के मुनाफ़े के लिये काम करता है। यही कारण है कि आज भारत के उद्योगों के मालिक यह खुलकर बोल रहे हैं कि मज़दूरों को हर हफ्ते 90 घण्टे काम करना चाहिये जिससे पूँजीपतियों के मुनाफ़े की हवस को पूरा किया जा सके।
वास्तव में दुनिया के तमाम देशों में लागू आठ घण्टे काम का नियम वहाँ के शासक वर्गों की सदिच्छा या पूँजीपतियों की नेकनीयती के कारण नहीं, बल्कि मज़दूरों के संघर्षों के कारण लागू हुए। इनमें प्रमुख हैं – 1886 में शिकागो के मज़दूरो का 8 घण्टे काम, 8 घण्टे आराम और 8 घण्टे मनोरंजन के लिये संघर्ष का इतिहास, जिसे मई दिवस के रूप में आज भी पूरी दुनिया के मज़दूर याद करते हैं, और 1917 की रूस की समाजवादी क्रान्ति जिसके बाद निजी उत्पादन का पूरी तरह से सामाजीकरण कर दिया गया। एक सदी से भी पहले मज़दूरों की माँग थी कि 8 घण्टे काम के बदले में मज़दूरों को इतना वेतन मिलना चाहिये जिससे कि वे अपने परिवार को एक सम्माननीय जीवन स्तर दे सकें। इन ऐतिहासिक घटनाओं का प्रभाव पूरी दुनिया के मज़दूरों के जीवन स्तर पर पड़ा।
बढ़ती उत्पादकता का लोगों के जीवन स्तर पर कैसे सकारात्मक असर होगा इसके कुछ उदाहरण देखें तो जिन देशों में राज्यसत्त्ता पर पूँजीपति वर्ग से साथ मज़दूरों के संगठन भी अपना प्रभाव रखते हैं वहाँ काम के घण्टों को कम करने की क़वायद चल रही है। जैसे आस्ट्रेलिया, जापान, स्पेन, यूके जैसे कई देशों में हर सप्ताह 30 घण्टे और चार दिन काम के प्रयोग किये जा रहे हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि भूमण्डलीकरण के इस दौर में विकसित साम्राज्यवादी देश अपनी पूँजी वहाँ निवेश कर रहे हैं जहाँ सबसे सस्ता श्रम मौज़ूद हो। यदि भारत के मज़दूर सप्ताह में 70-90 घण्टे काम करते हैं तो इनके अतिरिक्त श्रम के शोषण से पैदा होने वाले मुनाफ़े के दम पर अमेरिका, जापान और यूरोपीय देशों के साम्राज्यवादी देश अपने मज़दूरों को कम घण्टे काम करने के बाद भी अच्छा वेतन देते है।
कल्पना कीजिये कि यदि समाज के लिये आवश्यक उत्पादन के लिये ज़रूरी आवश्यक श्रमकाल 2 घण्टे हो और काम करने लायक हर एक व्यक्ति को समाज की आवश्यकता को पूरा करने लिये उत्पादन के काम पर लगाया जाये हो तो हर व्यक्ति को सिर्फ 2 घण्टे काम करने की ज़रूरत पड़ेगी। बचे हुए समय में लोगों को स्वतन्त्रता मिलेगी कि वे अपनी इच्छा के अनुरूप कोई भी काम कर सकें। लोगों का बचा हुआ समय समाज में कई प्रकार के शैक्षिक फोरम बनाने के लिये प्रेरणा का काम करेगा जो कला-साहित्य की कार्यशालाओं और विज्ञान व अनुसन्धान के अध्ययन मण्डल जैसी अनेक जन संस्थाओं को जन्म देगा। पूँजीवाद में भी ऐसे शैक्षिक फोरम मौज़ूद हैं, लेकिन यह समाज के एक अत्यन्त छोटे हिस्से तक सीमित हैं, जहाँ समाज की 90 फ़ीसदी मेहनत करने वाली जनता और उनके बच्चों के लिये कोई स्थान नहीं होता। क्योंकि आज ज्ञान भी एक माल बना दिया गया है, जिसके पास सम्पत्ति है वही उसे ख़रीद सकता है। सोचिये यदि ज्ञान समाज के हर व्यक्ति के लिये उपलब्ध हो तो इस प्रकार के समाज में आने वाली नयी पीढ़ी को अपने मानसिक और शारीरिक विकास के लिये कितना उन्नत सामाजिक ढाँचा मिलेगा और वह कितने अनुसन्धान करने में सक्षम होगी। इसकी कल्पना करना इतना कठिन भी नहीं हैं, क्योंकि आइंस्टीन ने अपना महान सापेक्षता का सिद्धान्त एक क्लर्क की नौकरी करते हुए खोजा था। समाज के ढाँचे में आमूलगामी बदलाव से कितने मस्तिष्क पूँजीवादी ग़ुलामी से मुक्त होकर अनेक आइंस्टीन, मोजार्ट या विथोवन या न्यूटन, आर्यभट्ठ को जन्म देंगे। जो आज-कल की होस्टाइल पूँजीवादी व्यवस्था में मुनाफ़े की हवस को पूरा करने के बाद अपने जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं को पूरे करने में ही अपना पूरा जीवन खपा देते हैं। ये नयी पीढ़ियाँ कितने ही आविष्कार करने में सक्षम होंगी जिससे उत्पादकता को उन्नत से उन्नतर स्तर तक ले जाया जा सके और समाज के लिये आवश्यक श्रमकाल को एक घण्टे से भी कर किया जा सके। सोचिये कि एक श्रमिक, 1 से 2 घण्टा ए.आई. से लैस अत्याधुनिक फ़ैक्ट्री में सामाजिक उत्पादन के लिये शारीरिक श्रम करता है और फिर बचे हुये 21-22 घण्टों में विज्ञान मण्डलों मे, अध्य्यन सर्किल और फोरमों में अपना योगदान देता है, जो कि उसके शौक़ का हिस्सा बन चुका होगा, तो ब्रह्माण्ड के रहस्यों को समझने में, चिकित्सा और विज्ञान की उन्नति का स्तर कहाँ तक उठाया जा सकता है।
जब लोगों में यह विश्वास पैदा होगा, यह भावना होगी कि वे समाज के विकास के लिये काम कर रहे हैं, न कि किसी व्यक्ति के मुनाफ़े की हवस को पूरा करने के लिये, तो यह अन्ततः नये उत्पादन पद्धतियों, नये रिसर्च के लिये लोगों को व्यक्तिगत रूप से प्रोत्साहित करेगा, इसने कई उदाहरण इतिहास में सोवियत यूनियन में 1917 से 1950 के बीच, चीन में 1950 से 1976 के बीच देखे जा सकते हैं। यह एक अलग से विमर्श का विषय है।
आज सोचने का मुद्दा यह है कि क्या हम एक ऐसा भविष्य चाहते हैं जहाँ नारायणमूर्ति, सुब्रह्मण्यन या भावेश लैसे पूँजीवादी मुनाफ़ाजीवी आपकी आने वाली पीढियों को अपना मुनाफ़ा बढ़ाने के लिये एक रोबोट की तरह 90 घण्टे हफ्ते काम में धकेल दें या फिर एक ऐसी व्यवस्था जिसमें समाज व राज्यसत्ता हर एक व्यक्ति को एक ऐसा परिवेश प्रदान करे जहाँ समाज की आवश्यकताओ के लिये हर व्यक्ति हफ्ते में 10 से 15 घण्टे काम करने के बाद बचे हुए समय में अपनी रुचि के अनुरूप विज्ञान, कला, साहित्य और चिकित्सा के क्षेत्रों में अपना योगदान करने के स्वेच्छा से प्रोत्साहित हो और जहाँ जनता को जीवन के लिये आवश्यक हर चीज, जैसे शिक्षा, चिकित्सा, आवास आदि को मुहैया कराने की जिम्मेदारी राज्यसत्ता की हो।
अन्त में एक बार सोचिये कि देश निर्माण के इतने सारे महत्वपूर्ण मुद्दे छोड़ कर सरकार मन्दिर-मस्ज़िद के गड़े मुर्दे क्यों उखाड़ रही है, क्यों गोदी मीडिया हर पल हिन्दू-मुसलमान को मुद्दा बनाने की कोशिश में लगा रहता है और क्यों कोई भी धर्मगुरू मेहनतकश जनता की बदहाली को दूर करने या समाज में लगातार चौड़ी हो रही असमानता की खाई को खत्म करने की बात नहीं करते। यह समझना इतना कठिन नहीं है। अगली बार जब कोई आपसे धर्म की बात करे तो उसे ऊपर वर्णित आँकड़ें दिखाये जाने चाहिये और पूछना चाहिये कि इसके लिये वह क्या करना चाहेगा।


श्रोत-

1.        ‘I don’t believe in work-life balance’: Narayana Murthy stands firm on 70-hour workweek (https://indianexpress.com/article/trending/trending-in-india/narayana-murthy-work-life-balance-six-day-week-9673180/ )

वर्किंग आवर पर क्यों छिड़ी बहस, हफ़्ते में 90 घंटे काम करने से शरीर पर क्या होता है असर (https://www.bbc.com/hindi/articles/clynz3xdn7go)

Not 70... but 140, no weekends: Ola founder Bhavish Aggarwal opens new front on work-life balance debate (https://www.deccanherald.com/india/not-70-but-140-no-weekends-ola-founder-bhavish-aggarwal-opens-new-front-on-work-life-balance-debate-2748002 )

2.        https://www.thehindubusinessline.com/info-tech/stagnant-salaries-a-decade-of-flat-growth-for-it-freshers-in-india/article68748757.ece

3.        'Only 10% of India's 1.5 mn engineering graduates to secure jobs this year' https://www.business-standard.com/finance/personal-finance/only-10-of-india-s-1-5-mn-engineering-graduates-set-to-secure-jobs-this-yr-124091600127_1.html

4.        https://economictimes.indiatimes.com/tech/ites/little-change-in-salaries-of-entry-level-it-jobs-in-india/articleshow/46926459.cms?from=mdr

5.        Long working hours increasing deaths from heart disease and stroke: WHO, ILO (https://www.who.int/news/item/17-05-2021-long-working-hours-increasing-deaths-from-heart-disease-and-stroke-who-ilo )

6.        Economy_of_India https://en.wikipedia.org/wiki/Economy_of_India)

List Of Top 10 Countries With Longest Work Hours: Here's Where India Stands (https://www.ndtv.com/feature/list-of-top-10-countries-with-longest-work-hours-heres-where-india-stands-7451112)

7.        At 18.7%, India's child-wasting rate highest on hunger index,  https://timesofindia.indiatimes.com/india/at-18-7-indias-child-wasting-rate-highest-on-hunger-index/articleshow/104382065.cms

Malnutrition in India: Challenges and Community-Led Solutions, https://outreach-international.org/blog/malnutrition-in-india/#:~:text=India%20also%20has%20the%20highest,both%20poverty%20and%20systemic%20inequalities

Income and Wealth Inequality in India, 1922-2023: The Rise of the Billionaire Raj : Link- https://wid.world/www-site/uploads/2024/03/WorldInequalityLab_WP2024_09_Income-and-Wealth-Inequality-in-India-1922-2023_Final.pdf

Concern in Govt: Private sector profit at 15-year high but salaries stagnant (https://indianexpress.com/article/business/concern-in-govt-private-sector-profit-at-15-year-high-but-salaries-stagnant-9719816/ )

Corporates in India see 4x profit but keep salaries stagnant: Report (https://www.indiatoday.in/business/story/corporate-private-sector-companies-4x-profit-salaries-wages-stagnant-inflation-high-cea-nageswaran-2648775-2024-12-12

India 3rd in highest number of billionaires in '24, wealth up 42%: Report, https://www.business-standard.com/india-news/india-3rd-in-highest-number-of-billionaires-in-24-wealth-up-42-report-124120700495_1.html

Did corporate tax cuts increase wages, https://www.thehindu.com/business/Economy/corporate-tax-cuts-effects-india-us-wages/article68602594.ece

8.        Australia Working Time and 4-day Workweek:

https://www.jibble.io/labor-laws/australia-labour-laws/work-time-and-4-day-workweek

https://business.uq.edu.au/momentum/4-day-work-week

Sunday, March 23, 2025

साहिब का भारत (प्राण नेविल की किताब पढ़ते हुये शहीद दिवस पर कुछ गम्भीर विचार)

"क्रांति से हमारा अभिप्रय है —अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।".. "जहाँ मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, समाप्त कर दिया जाये

- भगत सिंंह (पूरा लेख यहाँ पढ़े)

आज क्रान्तिकारियों के शहादत दिवस पर हर एक नौजवान को संजीदगी के साथ यह समझना चाहिये कि इन क्रान्तिकियों ने देश के लिये अपनी कुर्बानी क्यों दी और वास्तव में आज़ादी का क्या अर्थ होता।

हाल ही में एक किताब को पढ़ने का मौका मिला, जिसका नाम है साहिब का भारत और लेखक हैं प्राण नेविल (Sahib’s India By Pran Nevile)। इसे पढ़ते समय हमें ब्रिटिश काल में देश में मौजूद असमानता और आम भारतीय लोगों की सामाजिक स्थिति और उनपर किये जाने वाले अत्याचारों की एक हल्की झलक मिलती है। ब्रिटिश राज में अंग्रेज और उनकी मुमाइंदगी करने वाले भारतीय, देश की आम जनता के साथ कैसा व्यवहार करते थे, और अपनी अय्याश जीवन-शैली के लिये किस तरह उनका शोषण करते थे जिसका कुछ वर्णन इस किताब में मिलता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि उपनिवेशवाद और सामंतवाद के उस दौर में देश की सत्ता पर काबिज अंग्रेजों और उनका साथ देने वाले सामंतो द्वारा भारत के मेहनतकश लोगों पर जो भी अत्याचार किये जाते थे वे सभी औपनिवेशिक और सामंती कानूनो के दायरे में अपराध नहीं माने जाते थे। इसका मुख्य कारण था कि इसे बनाने वाले वही लोग थो जो जनता का शोषण करते थे और खुद सत्ता पर काबिज थे। इस किताब में वर्णित अंग्रेज साहबों की अश्लील अय्याशी के दृश्यचित्र आपको यह सोचने के लिये मज़बूर कर देते हैं कि बहुसंख्यक आबादी के शोषण पर खड़ी व्यवस्था में कानूनो का वास्तविक मकसद सत्ता मे काबिज कुछ मुठ्ठीभर लोगों के विशेषाधिकारों की रक्षा करना होता है।

इन अंग्रेज साहबों के बारे में पढ़ते समय अनायास ही देश की उद्योगपतियों के बयान हमारी नज़रों को सामने तैरने लगते हैं जो अपने मज़दूरों से 90 घण्टे काम करवाने का सपना देख रहे हैं, ताकि अपनी अय्याशी के लिये और ज़्यादा सम्पत्ति जमा कर सकें। यह अनायास ही नहीं होगा यदि आने वाले दौर में देश की चुनी हुई सरकार श्रम कानूनों में बदलाव करके 90 घण्टे काम को भी वैद्धता प्रदान कर दे। आखिरकार सरकार किसका प्रतिनिधित्व करती है। कानून कौन बना रहा है और किसके लिये बनाये जा रहे हैं यह इस बात पर निर्भर करता है कि जनप्रतिनिधि किसकी नुमाइंदगी करते हैं। आज सत्ता पर काबिज लोग,वे किसके प्रतिनिधि हैं इसका अंदाज़ लगाने के लिये कोई कठिन प्रयास करने की ज़रूरत नहीं हैं।

यदि आप कुछ संजीदा समझ, और अन्ध-भक्ति के वर्तमान दौर में एक वैज्ञानिक विश्व-दृश्टिकोण बनाना चाहते हैं तो कई ज़रूरी किताबें है जिनके बारे में आपको जानने की ज़रूरत है और एक व्यापक विश्व-दृष्टि बनाने के लिये टीवी-सोशल मीडिया से हटकर अपने आस-पास मौज़ूद मजदूर बस्तियों में जाकर वहाँ रहने वाले मज़दूरों की जिन्दगी से रूबरू हो सकते हैं जो देश में उत्पादन होने वाली हर एक छोटी-बड़ी वस्तु के उत्पादन में लगे हैं। नहीं तो सुना है कि कई लोग मस्क के ग्रोक-एआई से सवाल पूछ कर ही सारी सच्चाई जानने की बचकाना कोशिश कर रहे हैं और सम्भव है कि आने वाले समय में उसे एआई क्रान्तिकारी घोषित कर दें।

इस किताब के कुछ पन्ने पढ़ने पर उपनिवेश दौर मे भारते के लोगों के शोषण की झलक देख सकते है-





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