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Sunday, December 21, 2014

स्तालिन कालीन सोवियत यूनियन के इतिहास के कुछ तथ्य और नये खुलासों पर एक नज़र

Published in Mazdoor Bigul, January 2015

दुनिया भर के साम्राज्यवादी देशों के आका आधे-अधूरे तथ्यों के माध्यम से स्तालिन-काल में मेहनतकश जनता की संगठित ताकत द्वारा हासिल सफलताओं को बदनाम करने और विभ्रम की स्थिति पैदा करने के हर सम्भव प्रयास करते रहे हैं। लेकिन इस सारे प्रपोगेण्डा के बावजूद 8 मई 2014 में डीफेन्स-वन (http://www.defenseone.com) के एक सर्वे में रूस के 55 फीसदी नौजवानों का मानना था कि वे सोवियत यूनियन का न होना उनके लिये दुर्भाग्य है (देखें - Poll: More Than Half of Russians Want the Soviet Union Back)। समाजवादी निर्माण के उस दौर और उसका नेतृत्व करने वाले सर्वहारा के नेता स्तालिन को समझने के लिये सभी पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर इतिहास के इस काल के अब तक ज्ञात सभी तथ्यों को एक साथ रखकर संजीदगी से नज़र डालने की जरूरत है। (सभी श्रोतों की सूची अंत में देखें)
1.       स्तालिन काल की घटनाओं पर एक नज़र
1917 में अक्टूबर क्रान्ति के बाद सोवियत यूनियन में समाजवादी निर्माण के पहले एतिहासिक प्रयोग के दौरान लेनिन और फिर स्तालिन के नेतृत्व में सर्वहारा की संगठित शक्ति ने प्रतिक्रांतिकारियों द्वारा क्रान्ति का तख्तापलट करने के मंसूबों पर पानी फेरने से लेकर द्वितीय-विश्व युद्ध तक पूरी दुनिया को हिटलर और फासीवाद से मुक्ति दिलाने में अभूतपूर्व सफलता के साथ नेतृत्व किया था। स्तालिन काल में समाजवादी सोवियत यूनियन में जनता के जीवन स्तर में गुणात्मक वृद्धि हुई, बेरोजगारी और गरीबी जैसे पूँजीवादी बीमारियों को जड़ से समाप्त कर कर दिया गया था, महिलाओं को समाज में बराबरी का दर्जा किसी भी अन्य पूँजीवादी देश से बेहतर रूप में मिला हुआ था, शिक्षा का समान अधिकार हर व्यक्ति को मिल चुका था और नाममात्र की जनसंख्या अशिक्षित बची थी, औद्योगिक-तकनीकि तथा वैज्ञानिक विकास के क्षेत्र में सोवियत यूनियन अनेक सफलताएँ हासिल कर रहा था। सोवियत यूनियन के समाजवादी प्रयोगों ने पूरी दुनिया की मेहनतकश जनता के सामने यह सिद्ध कर दिया था कि सर्वहारा वर्ग की समाजवादी सत्ता, जो एक वर्गहीन समाज के निर्माण के लिये संघर्षरत है, मानव समाज के विकास में सभी पुराने वर्ग समाजों की तुलना में एक लम्बी अग्रवर्ती छलांग है।
सोवियत यूनियन के बारे में आज कई नये तथ्यों का सामने आ चुका है। अमेरिकी रिसर्चर ग्रोवर फ़र और रूसी अनुसंधानकर्ता यूरी जोखोव जैसे कई इतिहासकारों ने स्तालिन कालीन सोवियत यूनियन के परालेखों (archive) के अध्ययन के आधार पर अनेक सबूतों के साथ खुलासे किये हैं। इन दस्तावेजों के आधार पर उस दौर में हुईं व्यवहारिक गलतियों की प्रष्ठभूमि समझने में मदद मिलती है कि किन परिस्थितियों में पार्टी में मौजूद पूँजीवादी तत्वों के विरुद्ध स्तालिन के नेतृत्व में संघर्ष किया जा रहा था। चूँकी सोवियत यूनियन में पहली बार समाजवादी निर्माण का प्रयोग किया जा रहा था जिसका कोई अनुभव मौजूद नहीं था, ऐसे में उस समय स्तालिन पार्टी में पैदा हो रहे षडयन्त्रकारियों और पूँजीवादी पथगामियों के पैदा होने की विचारधारात्मक जमीन नहीं तलाश सके। स्तालिन ने कुछ उसूली भूलें की और कुछ व्यावहारिक कार्यों के दौरान गलतियाँ हुई, और कुछ गलतियों से बचा जा सकता था। ग्रोवर फर ने उपनी पुस्तक जनवाद के लिये स्तालिन का संघर्ष के दो खण्डों में स्तालिन के दौर में पार्टी के भीतर जो संघर्ष चल रहे थे उनका संदर्भ सहित विवरणों का खुलासा किया है।
1.       1920 में सोवियत यूनियन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं कांग्रेस में हारने के बाद कई विरोधी तत्व उस समय नेतृत्व में मौजूद नेताओं की हत्या करने और तख्तापलट की षणयंत्रकारी कोशिशें कर रहे थे। ख्रुश्चेव ने अपने गुप्त भाषण में सारी गलतियों का दोष स्तालिन पर लगाया, लेकिन 1930 से 1938 के बीच सोवियत यूनियन में नेतृत्व को बदनाम करने के लिये जनता के दमन की षणयंत्रकारियों की गतिविधियाँ चल रहीं थीं उनका कहीं जिक्र नहीं किया गया। (बिन्दु 47, 57,जनवाद के लिये स्तालिन का संघर्ष खण्ड-2”, ग्रोवर फर)
2.       दस्ताबेजों में मिले सबूतों के आधार पर ग्रोवर फर ने खुलासा किया है कि द्व्तीय विश्व-युद्ध से पहले 1930 से 1938 के बीच और विश्व युद्ध के बाद अपनी मृत्यु से पहले तक स्तालिन राज्य पर से पार्टी के प्रत्यक्ष नियन्त्रण को समाप्त करने के लिये संघर्ष कर रहे थे। उनका प्रस्ताव था कि नेतृत्व के चुनाव के लिये गुप्त मतदान होना चाहिये, जिससे व्यापक जन-समर्थन वाले नेताओं को नेतृत्व में लाया जा सके। पार्टी में पहले से मौजूद नेतृत्व के उन लोगों के लिये, जो अपने व्यक्तिगत हितो के चलते विशेष-अधिकारों का एक घेरा तैयार कर चुके थे, स्तालिन का यह कदम खतरनाक होता, यही कारण था कि यह प्रस्ताव पारित नहीं हो सका। (बिन्दु 113-119, जनवाद के लिये स्तालिन का संघर्ष खण्ड-1”, ग्रोवर फर.)
3.       विश्व युद्ध की समाप्ति के दौर में 1947 में स्तालिन और पोलित-ब्यूरो में उनका समर्थन करने वाले सदस्यों ने पार्टी नेतृत्व में मौजूद विशेषाधिकार प्रप्त लोगों के विरुद्ध संघर्ष करते हुये पार्टी को राज्य के प्रत्यक्ष नियन्त्रण से हटाने और जनवादी चुनावी प्रणाली लागू का प्रस्ताव पुनः रखा था जो लागू नहीं हो सका। 1952 में सोवियत यूनियन की कम्युनिस्ट पार्टी की 19वी कांग्रेस में अन्तिम बार स्तालिन ने इसका प्रयास किया, लेकिन इस कांग्रेस की रिपोर्ट का कोई जिक्र ख्रुश्चेव ने अपने गुप्त भाषण में नहीं  किया और आज तक यह रिपोर्ट तक प्रकाशित नहीं की गई है। इस कांग्रेस में स्तालिन के भाषण का एक छोटा हिस्सा ही आज तक प्रकाशित किया गया है, जिसके अनुसार स्तालिन पार्टी के पद और संगठनात्मक ढाँचे में बदलाव करना चाहते थे। इन्हीं बदलावों के तहत स्तालिन ने पार्टी के महासचिव का पद समाप्त करने और खुद महासचिव के पद से इस्तीफा देकर 10 पार्टी सचिवों में से एक का हिस्सा बनने का प्रस्ताव रखा था। यदि स्तालिन के प्रस्ताव लागू कर दिये जाते तो उस समय राज्य के नियन्त्रण में मौजूद विशेषाधिकार प्रप्त पूँजीवादी पथगामियों और षडयन्त्रकारियों का सत्ता में रहना मुश्किल हो जाता। (बिन्दु 2,16, 17, 19, 21 ,जनवाद के लिये स्तालिन का संघर्ष खण्ड-2”, ग्रोवर फर)
4.       सोवियत यूनियन के उस पूरे ऐतिहासिक दौर में स्तालिन द्वारा चलाये जा रहे संघर्षों की रोशनी में इन घटनाओं का विश्लेषण तथा सबूतों के आधार पर ग्रोवर फर ने मार्च 1953 में हुई स्तालिन की मृत्यु के बारे में लिखा है, दौरा पड़ने के बाद या तो स्तालिन को उनके दफ्तर में मरने के लिये छोड़ दिया गया था या जहर देकर उनकी हत्या की गई थी। (बिन्दु 43,जनवाद के लिये स्तालिन का संघर्ष खण्ड-2”, ग्रोवर फर)।
5.    स्तालिन की मृत्यु के बाद सोवियत यूनियन का भविष्य पूरी तरह से पार्टी नेतृत्व के हाथों में आ गया। और इसने राज्य और आर्थिक क्षेत्र के सभी पदों पर अपनी इजारेदारी सुनिश्चित कर ली और पूरी तरह से किसी भी पूँजीवादी राज्य की तरह परजीवी के रूप में खुद को सत्ता में स्थापित कर लिया। ख्रुश्चेव, गोर्बाचेव, येल्तसिन से लेकर पुतिन तक यही इजारेदार नेतृत्व आज तक रूस की सत्ता में मौजूद है जिन्होंने लम्बे समय तक अति-विशिष्ट कार्यकर्ताओं के रूप में सोवियत यूनियन की मेहनतकश जनता को निचोड़ा। (बिन्दु 45, 46, वही)
इस पूरे दौर का घटनाक्रम दर्शाता है कि अक्टूबर 1917 में क्रान्ति होने के बाद सोवियत यूनियन में पार्टी के अन्दर विशेषाधिकार प्राप्त पूँजीवादी पथगामी लगातार पैदा हो रहे थे और पहले समाजवादी राज्य की रक्षा में इन भ्रष्ट तत्वों के विरुद्ध स्तालिन के दौर में लगातार संघर्ष चलाया गया। लेकिन संघर्ष के सही विचारधारात्मक स्वरूप का विस्तार न कर पाने के कारण पूरा भरोसा राज्य के पदाधिकारियों पर किया गया और उनकी मदद से सजा देने का काम किया गया जिससे पार्टी में मौजूद षडयन्त्रकारियों को अतिशय रूप से सजा देकर स्तालिन तथा राज्य को बदनाम करने का मौका मिल गया। इन सभी ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर देखें तो पार्टी और दुश्मन तथा जनता के बीच अन्तरविरोधों को हल करने की जो विचारधारात्मक समझ चीनी पार्टी ने महान बहस में प्रस्तुत की वह सही है कि स्तालिन उस दौर में इन अन्तरविरोधों को हल करने की सही लाइन विकसित नहीं कर सके, यह स्तालिन की गलती नहीं बल्कि उस दौर की एक व्यवहारिक सीमा थी।
2.       सोवियत यूनियन की 20वीं पार्टी कांग्रेस (1956) में ख्रुश्चेव के गुप्त भाषण से आरम्भ स्तालिन काल के दौरान हासिल सफलताओं को झूठे तथ्यों के आधार पर बदनाम करने का सिलसिला, जो आज भी जारी है।
स्तालिन काल का मूल्यांकन और उस दैर के बारे में अब जितने खुलासे हुये हैं उनके आधार पर हम ख्रुश्चेव के गुप्त भाषण के पीछे छिपे मूल मकसद को समझ सकते हैं। स्तालिन काल की महान सफलताओं में स्तालिन के नेतृत्व की मान्यता के रहते ख्रुश्चेव के चारो और संगठित हुए विशेषाधिकार प्राप्त भ्रष्ट गुटों और पूँजीवादी पथगामियों के लिये अपनी संशोधनवादी मार्क्सवाद-लेनिनवाद विरोधी नीतियाँ लागू करना सम्भव नहीं होता। ऐसी स्थिति में पार्टी के नेतृत्व पर काबिज इस संशोधनवादी गुट के लिये जरूरी था अपनी सर्वहारा विरोधी सुधारवादी नीतियों पर पर्दा डालने के लिये पहले स्तालिन और स्तालिन के पूरे दौर को बदनाम करता। 1953 में स्तालिन की मृत्यु के बाद ख्रुश्चेव ने 1956 तक सोवियत यूनियन की कम्युनिस्ट पार्टी के अन्दर इस संशोधनवादी खेमें के समर्थन के आधार का विस्तार किया और 1956 की 20वीं पार्टी कांग्रेस में अपना गुप्त भाषण पढ़ा जिसमें व्यक्ति पूजा समाप्त करने के नाम पर स्तालिन पर अनेक झूठे आरोप लगाये और सोवियत यूनियन के समाजवादी संक्रमण के दैरान हुई सभी गलतियों के लिये स्तालिन को दोषी ठहरा कर उनका पूर्ण निषेध कर दिया ।
अपने भाषण में स्तालिन पर कीचड़ उझाल कर ख्रुश्चेव ने सर्वहारा वर्ग के नेता के रूप में स्तालिन को ही नहीं बल्कि उस पूरे दौर में लागू की गई नीतियों, सर्वहारा अधिनायकत्व और समाजवादी संक्रमण के मूल मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धान्त को पूरी दुनिया में बदनाम करने की कोशिश की। जिसने पूरी विश्व के कम्युनिस्ट आन्दोलनों में सैद्धान्तिक स्तर पर एक विभ्रम की स्थिति पैदा कर दी थी। इस वक्तव्य के माध्यम से ख्रुश्चेव ने समाजवाद को बदनाम करने का एक और मौका साम्राज्यवादियों की झोली में डाल दिया।
लेनिन ने अपने दौर में आन्दोलन में मौज़ूद गलत प्रवृत्तियों के प्रति बहसों का हवाला देते हुये कहा था कि कभी-कभी गरुड़ मुर्गियों से नीचे उड़ सकते हैं, लेकिन मुर्गियाँ कभी भी गरुण की ऊँचाई तक नहीं उठ सकतीं। (म.ब., पृष्ठ 93) इस उद्धरण को स्तालिन और ख्रुश्चेव के संदर्भ में आसानी से समझा जा सकता है। चीनी पार्टी ने ख्रुश्चेव द्वारा स्तालिन के पूर्ण निषेध के पीछे मूल कारण के बारे में कहा था, स्तालिन के प्रति इस गाली-गलौज में, ख्रुश्चेव, दरअसल, सोवियत व्यवस्था और राज्य की अन्धाधुन्ध भर्त्सना कर रहे हैं। इस संदर्भ में उनका भाषण काउत्सी, त्रात्स्की, टीटो और जिलास जैसे भगोड़ों की भाषा से किसी भी तरह कमजोर नहीं, बल्कि वास्तव में, उनसे भी तीक्ष्ण है। (म.ब., पृष्ठ 97)
ख्रुश्चेव ने अपने गुप्त वक्तव्य में स्तालिन को हत्यारा, निरंकुश शासक”, "इतिहास का सबसे बड़ा तानाशाह" जैसे संबोनों से नवाजा था और व्यक्ति-पूजा के अनेक आरोप लगाये थे। आज यह पर्दा हट चुका है कि स्तालिन पर ख्रुश्चेव ने अपने गुप्त भाषण में जो भी आरोप लगाये थे सारे झूठ थे। इसका विस्तृत विवरण तथ्यों के साथ ग्रोवर फ़र की पुस्तक ख्रुश्चेव के 61 छूठ में देखा जा सकता है, जो पूरी सोवियत यूनियन के लेखागार के दस्तावेजों में मिले तथ्यों के अध्ययन पर आधारित है।
पूरी दुनिया में आज तक आधुनिक संशोधनवादी, त्रात्स्कीपन्थी, आराजकतावादी ख्रुश्चेव द्वारा तैयार किये गये "स्तालिन की गलतियों" के पर्दे की आड़ लेकर सर्वहारा वर्ग के साथ अपनी गद्दारी को छुपाने का काम कर रहे हैं। सर्वहारा वर्ग के प्रति ख्रुश्चेव की इस गद्दारी के झण्डे को उठाकर पूरी दुनिया के साम्राज्यवादी-पूँजीवादी आज तक कम्युनिस्ट आन्दोलनों को बदनाम करने और पूँजीवादी समाज में दमन-उत्पीड़न से जूझ रही मेहनतकश जनता के बीच समाजवाद के प्रति संदेह पैदा करने के लिये हर संभव कोशिश में लगे हैं, ताकि आने वाले समय में कम्युनिस्ट आन्दोलनों को दिग्भ्रमित किया जा सके और व्यापक मेहनतकश जनता की लूटमार और शोषण पर खड़े अपने स्वर्ग के टापू को उजड़ने से बचाया जा सके।
श्रोत सूची:
1.   महान बहस, पीपुल्स पब्लिसिंग हाउस, अन्तरराष्ट्रीय प्रकाशन
2.   Documents of Great Debate (3 Volumes), International Publication
3.   Political Economy (Sangai Political Text Book)
4.   Khrushchev Lied by Grover Furr
5.   "Stalin and the Struggle for Democratic Reform, Part 1 and 2” by Grover Furr
6.   Documents of Great Proletarian Cultural Revolutions and Great Leap Forward on http://www.revcom.us
7.   http://www.thisiscommunism.org/
8.   Documents of marxist.org
9.   Reject the Revisionist Theses of the XX Congress of the Communist Party of the Soviet Union and the Anti-Marxist Stand of Krushchev's Group! Uphold Marxism-Leninism!” by Enver Hoxha, Moscow, 16 November, 1960

Sunday, September 14, 2014

भविष्य में समाजिक व्यवस्था और मानव चेतना के पुनर्निर्माण का एक एतिहासिक प्रयोग - “महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति”

(सोवियत यूनियन के समाजवादी प्रयोग के अनुभवों का समाहार और असमानता से समानतावादी समाज की ओर ऐतिहासिक विकास का एक महान प्रयोग)
आज भले ही देश में निजी और सरकारी विद्यालयों के बीच अमीरों और गरीबों के बच्चों के लिए शिक्षा के स्तरों में जमीन और आसमान का अन्तर हो (!) लेकिन शिक्षा को बेहतर बनाने के लिये बड़े-बड़े नेताओं और शिक्षाविदों की ओर से कई बयान जारी किये जा रहे हैं। और भले ही देश के करोड़ों ग्रेजुएट नौजवान बेरोगारी या रोजगार की अनिश्तिता में जी रहे हैं हों (!) लेकिन छात्रों को उनकी जिम्मेदारियाँ याद दिलाने को लेकर अनेक नसीहतें दी जा रही हैं। इसी तरह की कई दिमागी उठा-पटक और राजनीतिक प्रेपोगेण्डा के बीच एक जनतन्त्र का नागरिक होने के कारण हमारी सबसे जरूरी जिम्मेदारी है कि हम सदियों से चले आ रहे अपने देश के सामंती-उपनिवेशीय और पिछड़ी पूँजीवादी सोच के दायरे से बाहर निकल कर नई दिशा में सोचें और उन गुलामी को बेड़ियों को दृढ़ता के साथ तोड़ने का प्रयास करें जो सम्राज्यवादी-पूँजीवादी उन्मुख मुनाफ़ा केन्द्रित नीतियों के माध्यम से जनता के ऊपर थोपी जा रही हैं।

सामाजिक प्रयोगों के इतिहास को पढ़ते हुये कुछ दिन पहले 1963-1964 में सोवियत यूनियन और समाजवादी चीनी के बीच चली महान बहस को पढ़ने का मौका मिला, और उसके संदर्भों को खोजते हुये 1966 से 1976 तक चीन में चली महान सर्वहारा सांस्क्रतिक क्रान्ति की घटनाओं और इतिहास के बारे में कुछ किताबों और बेवसाइटों से उस दौर में समाजवादी चीन में हुये प्रयोगों के बारे कई महत्वपूर्ण जानकारियाँ मिली (सभी स्रोतों की सूची लेख के अन्त में है)। इस दौर की ऐतिहासिक घटनाओं को पढ़कर हमारे सामने उस दौर का जो चित्र उभर कर सामने आता है उससे स्पष्ट रूप से यह समझ में आ जाता है कि समाज की आम जनता की अपार शक्ति को राजनीतिक रूप से  देश के निर्माण के लिये संगठित कर सर्वहारा सांस्क्रतिक क्रान्ति ने पूरी दुनिया के सामने यह सिद्ध किया कि जनता को अपनी मुक्ति के लिये किसी मशीहा की जरूरत नहीं होती।
इतिहास का यह दौर समाजवादी प्रयोगों का वह दौर था जब सोवियत यूनियन और चीन की बड़ी आबादी के साथ दुनिया की कुल आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा समाजवादी व्यवस्था में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्क्रतिक स्तरों पर नये-नये भविष्योन्मुख प्रयोग कर रहा था। इसी दौरान सोवियत यूनियन में 1956 में स्तालिन की मृत्यु के बाद पहले से पैदा हो चुके विशेषाधिकार प्राप्त पदाधिकारी और जन-प्रतिनिधि ख्रुश्चेव के नेतृत्व से सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत करने में लगे थे और लगातार मज़दूर-विरोधी संशोधनवादी नीतियों को लागू कर रहे थे। इसी समय 1960 के दशक में समाजवादी चीन सोवियत यूनियन में हुई पूँजीवादी पुनर्स्थापना का विश्लेषण करते हुये वहाँ लागू की जा रहीं जन-विरोधी नीतियों की सैद्धान्तिक आलोचना भी कर रहा था जिसे महान बहस (1963-1964) और सर्वहारा सांस्क्रतिक क्रान्ति के दस्तावेजों में देखा जा सकता है।
इस दौर के (1960 से 1976 तक) चीन और रूस के हो रही घटनाओं के बारे में पूरी दुनिया के अखबारों में छापे जा रहे लेखों और विश्लेषणों को पढ़ें तो कई तथ्यों तथा प्रयोगों की तस्वीर उभर कर सामने आती है। उस दौर की चीनी पार्टी ने (जो उस समय मुख्यता वास्तविक अर्थों मे कम्युनिस्ट पार्टी थी) सोवियत यूनियन के समाजवादी समाज में पूँजीवादी पुनर्स्थापना की पूरी परिघटना का विश्लेषण करते हुये उसके कारणों की खोज की महान सर्वहारा सांस्क्रतिक क्रान्ति की भूमिका तैयार की। 1966 से लेकर 1976 में संशोधनवादियों द्वारा पूँजीवादी तख्तापलट तक चली महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति चीनी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा संचालित एक राजनीतिक विचारधारात्मक क्रान्ति थी जिसके दौरान व्यापक मेहनतकश जनता की भागीदारी का आह्वान करते हुए बहसों, आलोचना और राजनीतिक लामबंदी के साथ राजनीतिक सत्ता को विकेन्द्रीकृत करके वर्ग-संघर्ष को संचालित करने के लिये विशेषाधिकार प्राप्त भ्रष्ट तत्वों के ऊपर जनता का सर्वतोमुखी अधिनायकत्व लागू करने का पहला प्रयोग किया गया। शहरों से लेकर गाँवों तक, स्कूल तथा विश्वविद्यालयों के छात्रों, फेक्टरियों के मज़दूरों और सहकारी समितियों, महिला संगठनों तथा किसानों को अपने विचार अभिव्यक्त करने तथा सत्ता में मौजूद भ्रष्ट पदाधिकारियों की आलोचना को प्रोत्साहित करने के लिये भारी संख्या में बड़े-बड़े शब्दों वाले पोस्टरों, दीवार पत्रिकाओं और दीवार पर नारे लिखकर अपने विचार प्रकट करने का आह्वान किया गाया।
10 वर्ष तक चली सांस्कृतिक क्रान्ति को दौरान चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में मेहनतकश जनता की अपार शक्ति ने आर्थिक जगत, सामाजिक संस्थाओं, संस्कृति और व्यक्ति केन्द्रित पूँजीवादी मूल्यों के रूपान्तरण के साथ-साथ पूँजीवादी पुनर्स्थापना को रोकने के लिये सत्ता में मौजूद कम्युनिस्ट पार्टी के रूपान्तरण के लिये कई प्रयोग किये। इस दौरान भ्रष्टाचार और विशेषाधिकारों के हिमायती प्रतिनिधियों तथा पदाधिकारियों के विरुद्ध संघर्ष की शुरूवात करते हुये व्यापक जनसमूह का अह्वान किया गया और जनता के सामने नारा दिया गया कि बुर्जुआ "मुख्यालयों को तहस-नहस कर दो" और "मुठ्ठीभर पूँजीवादी पथगामियों को, जो समाज को वापस पूँजीवाद के चंगुल में धकेलना चाहते हैं, उखाड़ फेंको"।
इस नारे का महत्व किसी भी पिछड़े पूँजीवादी देश के सन्दर्भ में समझा जा सकता है और हर देश को इस दौर में समाज के रूपान्तरण के लिये किये गये प्रयोगों को करीब से निरीक्षण करने की ज़रूरत है। चीन में सदियों से कलाकार, बुद्धिजीवी और विशेषज्ञ शहरों में संकेन्द्रित हो चुके थे और समाज की आम मेहनतकश जनता से कटे हुये थे। सांस्कृतिक क्रान्ति का एक उद्धेश्य चीन में सदियों से मौजूद इस सांस्कृतिक केन्द्रीकरण को तोड़ना था जिसके तहत कलाकारों, डाक्टरों, तकनीशियनों, वैज्ञानिकों तथा सभी तरह के शिक्षित लोगों को मज़दूरों और किसानों के बीच जाने और क्रांतिकारी आन्दोलनों में शामिल होने का आह्वान किया गया। 
समाज में मौजूद मानसिक श्रम और शारीरिक श्रम के बीच, शहरों और देहातों के बीच, उद्योगों और कृषि के बीच और पुरुष और महिलाओं के बीच अन्तर को समाप्त करने के लिये सामाजिक स्तर पर बहसों को प्रोत्साहित किया जाता था। नये समाजवादी मूल्यों का प्रसार करने और पूँजीवादी व्यक्तिवादी मान्यताओं के विरुद्ध संघर्ष करने के लिये "जनता को सेवा करो" और देहात की ओर चलो का नारा दिया गया और बड़ी संख्या में नौजवानों और विशेषज्ञों ने इस आह्वान का स्वागत किया। शिक्षा में आमूलगामी परिवर्तन किये गये, पहले शिक्षा और योग्याता को दूसरों से आगे रहने और दूसरों की तुलना में अधिक सुविधा और विशेषाधिकार प्राप्त करने का एक माध्मय माना जाता था, सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान शिक्षा और योग्यता को सामूहिक हितों के लिये प्रोत्साहित किया गयाफैक्टरियों में एक व्यक्ति द्वारा प्रबंधन को समाप्त कर दिया गया और उसकी जगह मज़दूरों, तकनीशियनों और कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यो की तीन-पक्षीय समितियों ने दैनिक प्रबंधन को अपने हाथ में ले लिया।
महान सर्वहारा क्रान्ति के दौरान व्यापक जनसमूह की भागीदारी को प्रोत्साहित करने तथा सही विचारों को परखने के लिये सार्वजनतिक बहसें आयोजित की जाती थीं, जिससे व्यक्तिवादी-पूँजीवादी विचारों को जनता के सामने रखकर उनपर वाद-विवाद किया जा सके। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान भ्रष्टाचार और स्वार्थी विचारों को व्यापक सामाजिक स्तर पर हतोत्साहित करने के लिये यह सिद्धान्त अपनाया गया कि सहयोगियो के साथ एकता को सुदृढ करो, ढुलमुल तत्वों को अपने पक्ष में लो, और भ्रष्ट तथा विशेषाधिकारों को बढ़ावा देने वाले विचारों के हिमायती तत्वों को सार्वजनिक वाद-विवाद करते हुये जनता के सामने उजागर करो और बहुमत के सामने अलगाव (Isolation) में डाल दो। सांस्कृतिक क्रान्ति के दौरान विचारधारात्मक संघर्ष के महत्व को रेखांकित करते हुये कहा गया कि राजनीतिक सत्ता को उखाड़ फेंकने से पहले अनिवार्य रूप से इस बात की कोशिश की जाती है कि ऊपरी ढांचे और विचारधारा पर अपना प्रभुत्व कायम कर लिया जाय, ताकि लोकमत तैयार किया जा सके, तथा यह बात क्रांतिकारी वर्गों और प्रतिक्रियावादी वर्गों दोनों पर लागू होती है।
समाज के आर्थिक और वैचारिक रूपान्तरण के लिये व्यापक मेहनतकश जनता की इस तरह की राजनीतिक भागीदारी मानव इतिहास में इससे पहले कभी नहीं देखी गई थी। महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति में आर्थिक सम्बन्धों, राजनीतिक और सामाजिक संस्थाओं, और संस्क्रति, आदतों तथा विचारों को बदलने में इतिहास का सबसे मौलिक प्रयोग किया गया। महान सर्वहारा क्रान्ति ने 10 साल (1966 से 1976) तक चीन में पूँजीवाद की पुनर्स्थापना को रोके रखा और कई सामाजिक तथा संस्थागत बदलावों के साथ "जनता की सेवा करो" के आधार पर समाज को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई[References from - http://www.revcom.us]
1976 में चीनी सत्ता के संशोधनवादी तख्तापलट करने का बाद एक बार फिर सोवियत यूनियन के ख्रुश्चेवी संशोधनवाद के इतिहास को दोहराया गया और पूँजीवाद की पुनरस्थापना के लिये रास्ते खोल दिये गये चीन में संशोधनवादियों द्वारा तख्तापलट कर पूँजीवाद की पुनर्स्थापना के साथ सर्वहारा क्रान्तियों का पहला ऐतिहासिक चक्र पूरा हो चुका है, जिसका तर्कसंगत विश्लेषण व्यवहारिक और सैद्धान्तिक रूप से करने की जरूरत है। आज साम्राज्यवादी भूमण्डलीकरण के इस दौर में पूरी दुनिया के सोचने समझने वाले हर प्रगतिशील व्यक्ति के सामने एक चुनौती मौजूद है कि पूँजीवादी प्रचार तंत्र के माध्यम से लगातार किए जा रहे अनेक कूपमण्डूक, अवैज्ञानिक, नियतवादी, व्यक्तिवादी, अन्धविश्वासी तथा अतार्किक प्रचारों की सच्चाई को समझें। इसके लिये इतिहास में किये गये महान सर्वहारा क्रान्ति जैसे सामाजिक प्रयोगों को गहराई से समझने की ज़रूरत है ताकि आने वाले समय मे लोगों के बीच व्यक्तिवादी मुनाफाखोरी केन्द्रित मूल्यों की जगह जनवादी, समाजवादी तथा तार्किक विचारधारात्मक समझ को विकसित किया जा सके।
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श्रोत सूची:
1. Documents of Great Proletarian Cultural Revolutions and Great Leap Forward on http://www.revcom.us/
2. http://www.thisiscommunism.org/
3. The Truth About the Cultural Revolution, 
http://www.revcom.us/a/1251/communism_socialism_mao_china_facts.htm
4. महान बहस, पीपुल्स पब्लिसिंग हाउस, अन्तरराष्ट्रीय प्रकाशन
5. Documents of Great Debate (3 Volumes), International Publication
6. Political Economy (Sangai Political Text Book)
7. Khrushchev Lied by Grover Furr
8. "Stalin and the Struggle for Democratic Reform, Part 1 and 2” by Grover Furr
9. Documents of marxist.org

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