Thursday, May 17, 2018

Excerpts of Analysis about Inner Struggle of Isolated Individuals from Dostoevsky's Work by Georg Lukacs

"These works have become even more topical and more fresh as time goes on."

(Read Full Article : Dostoevsky by Georg Lukacs 1949 at: https://www.marxists.org/archive/lukacs/works/1949/dostoyevsky.htm)


Chekhov made a definitive statement about this whole matter when he drew a sharp distinction between “the solution of a question and the correct putting of the question. Only the last is required of the artist." In Anna Karenina and Onegin not a single question is solved yet these works satisfy us fully only because all questions are put in them correctly.”
This insight is particularly important for a judgment of Dostoevsky for many – even most – of his political and social answers are false, have nothing to do with present-day reality or with the striving of the best today. They were obsolete, even reactionary, when they were pronounced.
Still, Dostoevsky is a writer of world eminence. For he knew how during a crisis of his country and the whole human race, to put questions in an imaginatively decisive sense. He created men whose destiny and inner life, whose conflicts and interrelations with other characters, whose attraction and rejection of men and ideas illuminated all the deepest questions of that age, sooner, more deeply, and more widely than in average life itself. This imaginative anticipation of the spiritual and moral development of the civilized world assured the powerful and lasting effect of Dostoevsky’s works. These works have become even more topical and more fresh as time goes on.
The experiment with oneself, the execution of an action not so much for the sake of the contents and effects of the action, but in order to know oneself once for all, in depth, to the very bottom, is one of the main human problems of the bourgeois and intellectual world of the nineteenth and twentieth centuries.
Only when this individualism turns inward – when it fails to find an Archimedean point either in current social aims or in the spontaneous urge of an egotistical ambition – does the problem of Dostoevsky’s experiments arise.
All these cases, however diverse, have something important in common. First of all, they are without exception the actions of lonely men – men who are completely dependent on themselves as they understand life and their environment, who live so deeply and intensely in themselves that the soul of others remains to them forever an unknown country. The other man is to them only a strange and menacing power which either subjugates them or becomes subject to them. . . Isolation, separation, loneliness reduces the relations among men to a struggle for superiority or inferiority. The experiment is a sublimated spiritual form, a psychological turning inward of naked struggles for power.
But by this solitude, by this immersion of the subject in itself, the self becomes bottomless. There arises either the anarchy of Stavrogin, a loss of direction in all instincts, or the obsession of a Raskolnikov by an “idea.” A feeling, an aim, an ideal acquires absolute sovereignty over the soul of a man: I, you, all men disappear, turn into shadows, exist only subsumed under the “idea.”

Sunday, April 15, 2018

सचमुच, हम एक अँधेरे वक़्त में जी रहे हैं ! ! !


हम एक भयानक दौर से गुज़र रहे हैं। एक ऐसा दौर जहाँ समाज का एक हिस्सा मानवीय संवेदनाओं, मानवीय नैतिकता और मानुष्य कहलाने की काबिलियत से वंचित होकर एक भीड़ के रूप में या एक रुग्ण मानसिकता वाले अपराधी के रूप में जघन्य अपराध और अमानवीय कृत्यों का खुले आम समर्थन कर रहा है, या एक मूक-दर्शक चुप्पी साधे हुये अन्याय को बढ़ावा दे रहा है।
समाज का एक हिस्सा मानुष्य कहलाने की काबिलियत से कितना नीचे गिर चुका है इसका जीता-जागता उदाहरण है कि आज के नेता एक भीड़ को साथ लेकर उन अपराधियों के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे हैं जिन पर नाबालिग बच्चियों और महिलाओं के विरुद्ध निर्मम हिंसा-हत्या-बलात्कार जैसे घिनौने आरोप हैं। इसी भीड़ में कुछ ऐसे लोग भी हैं जो चुप हैं, शान्त हैं, और उन्हें लगता है कि एक 8 साल की बच्ची की हत्या के विरोध में जो प्रदर्शन हो रहे हैं वह राजनीतिक रूप से सरकार के विरुद्ध प्रेरित हैं इसलिये उन्हें उसका समर्थन नहीं करना चाहिये।
ऐसे ही कुछ उदाहरण मैंने 10 से 12 अप्रैल के बीच देखे जिन्हें साझा करने से रोक नहीं पा रहा हूँ।  11 से 12 अप्रैल के बीच सोसल मीडिया और लोगों की बातचीत पर एक नज़र डालने पर पता चलता है कि देश भर के कई क्रान्तिकारी-साहित्यिक संगठन, और जनपक्षधर नागरिक देश में महिलाओं के विरुद्ध बढ़ रही हिंसा और बलात्कार की घटनाओं के विरोध में शड़कों पर प्रदर्शन कर रहे थे और कर्यवाही की माँग कर रहे थे। लेकिन इसी दौरान भाजपा के कट्टर समर्थक बलात्कारियों के समर्थन में प्रदर्शन कर रहे थे, यूपी की पुसिस के अधिकारी एक अपराधी नेता को माननीयबता रहे थे, और सोसल मीडिया पर कुछ ढुलमुल लोग इन्हें शेयर कर रहे थे। इन्हीं के प्रभाव में सरकार का समर्थन करने वाले कुछ पढ़े-लिखे मध्य-वर्ग के लोगों की फेसबुक वाल पर मैंने देखा कि वे बलात्कार और महिलाओं के विरुद्ध हिसा के विरोध में नगरिकों द्वारा किये जा रहे प्रदर्शनों को लेकर राजनीतिक रूप से प्रेरित’, कांग्रेस की राजनीतिक या हिंदू-मुसलमान की बातें कर रहे थे। लेकिन सरकार का समर्थक करने वाले इन लोगों के बीच एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं था जो इस हिंसा और उसका समर्थन करने वाले भाजपा के नेताओं का विरोध कर रहा हो।
लेकिन इसके बाद एक आश्चर्यजनक घटना घटी और जब उत्तर-प्रदेश में हाईकोर्ट के आदेश के बाद भाजपा नेता को हिरासत में लिया गया और काफी विरोध प्रदर्शनों के बाद शाम को स्वयं प्रधानपन्त्री मोदी ने इन घटनाओं की निंदा की तो उन सभी भाजपा समर्थकों में, जो शाम तक इन घटनाओं में लिप्त अपराधियों और उनका बचाव करने वाले नेताओं-वकीलों का समर्थन कर रहे थे, उन सभी के बीच कठुआ और उन्नाओ की घटनाओं का विरोध करने की होड़ लग गई। अचानकर ऐसा क्या हुआ कि इन सारे लोगों की अन्तर्तमा और नैतिकता जाग उठी? लेकिन बास्तव में ऐसा कुछ नहीं हुआ, न ही इनकी नौतिकता पर कोई प्रभाव पड़ा और न ही इनके विचारों पर, बल्कि इसाका सीधा जबाव है कि देश की एक बड़ी आबादी को अन्धी भीड़ में तब्दील किया जा रहा है। जिसका अपना कोई स्व-विवेक नहीं है, जो नेताओं के बयानों से यह निर्धारित करती है कि क्या सही है और क्या गलत। जो उपने अन्तर्मन से यह निर्णय करने में असमर्थ है कि मानवीय मूल्यों के आधार पर सही क्या और गलत क्या होना चाहिये।
वास्तव में यह एक सोचनीय दौर है, जहाँ अन्ध-भक्ति और व्यक्ति पूजा के अंधेरे ने देश के व्यापक जन-समुदाय को अपना गुलाम बना लिया है जो कभी आपराधिक हिंसा, निर्मम अपराध और घिनौनी मानशिकता के समर्थने में खड़ा दिखता है तो कभी खुद को धर्म और जाति के नाम पर लोगों को आपस में लड़ाने के राजनीतिक मंसूबों का समर्थन करता नज़र आता है। हम सच में एक अंधेर दौर से गुज़र रहे हैं।

सचमुच, मैं एक अँधेरे वक़्त में जीता हूँ!
सीधा शब्द निर्बोध हैं।
बिना शिकन पडा माथा
लापरवाही का निशान।
हँसने वाले को ख़ौफ़नाक ख़बर
अभी तक बस मिली नहीं है।

कैसा है ये वक़्त, कि
पेड़ों की बातें करना लगभग ज़ुर्म है
क्योंकि उसमें कितनी ही दरिंदगियों पर ख़ामोशी शामिल है !
बेफ़िक्र सड़क के उस पार जानेवाला
अपने दोस्तों की पहुँच से बाहर तो नहीं चला गया
जो मुसीबतज़दा हैं?

मुझसे कहा जाता है : तुम खाओ-पीओ ! ख़ुश रहो कि
ये तुम्हें नसीब हैं।
पर मैं कैसे खाऊँ, कैसे पीऊँ, जबकि
अपना हर कौर किसी भूखे से छीनता हूँ, और
मेरे पानी के गिलास के लिए कोई प्यासा तड़प रहा हो ?
फिर भी मैं खाता हूँ और पीता हूँ।

चाव से मैं ज्ञानी बना होता
पुरानी पोथियों में लिखा है, ज्ञानी क्या होता है :
दुनिया के झगड़े से अलग रहना और
अपना थोड़ा सा वक़्त
बिना डर के गुजार लेना
हिंसा के बिना भी निभा लेना
बुराई का जवाब भलाई से देना
अपने अरमान पूरा न करना, बल्कि उन्हें भूल जाना
ये समझे जाते ज्ञानी के तौर-तरीके।
यह सब मुझसे नहीं होता :
सचमुच, मैं एक अँधेरे वक़्त में जीता हूँ!

बर्टोल ब्रेख़्त (रचनाकाल : 1934-38)

Sunday, March 11, 2018

मेहनत की लूट के दम पर किसका विकास और कैसा विकास??

Source : www.entitleblog.org
(मज़दूर बिगुल, फ़रवरी 2018 में प्रकाशित
असली मुद्दों को कस के पकड़ रहो और काल्पनिक मुद्दों के झूठ को समझो।,  

आज देश की मुनाफ़ा केन्द्रित लूट का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जनवरी 2018 की ऑक्सफ़ेम इण्टरनेशनल संस्था की एक रिपोर्ट के अनुसार 2017 में देश में पैदा हुई कुल सम्पत्ति का 73 प्रतिशत हिस्सा देश के 1 प्रतिशत अमीरों ने हाथों में केन्द्रित हो गया है। इसके साथ 2016 के आँकड़े देखें तो पूँजीवादी नीतियों ने ग़रीब मज़दूरों की मेहनत से पैदा होने वाली देश की कुल सम्पत्ति का 58.4 फ़ीसदी हिस्सा 1% अमीरों के हाथों में केन्द्रित कर दिया है। 2010 से 2014 के बीच यूपीए के कार्यकाल में 3 सालों के दौरान देश की कुल सम्पत्ति का अमीरों के हाथों में केन्द्रीकरण 40.3% से 49% हो गया था, जो 2014 से 2016 के बीच मोदी सरकार के 3 सालों में 9.4% और बढ़ चुका है (1)। एक ऐसे देश में जहाँ 5 साल से कम उम्र का हर दूसरा बच्चा कुपोषण का शिकार है, जहाँ नौजवान महिलाओं की आधी से अधिक आबादी एनेमिक है (2), जहाँ ग़रीबी और भुखमरी के शिकार लोगों की संख्या दुनिया में सबसे ज़्यादा है (3), और जो देश ग़रीबी रेखा की सूची में 119 देशों में 100वें स्थान पर हो (4), उस देश में सम्पत्ति का ऐसा केन्द्रीकरण कोई स्वभाविक प्रक्रिया नहीं है। बल्कि पूँजी संचय के हर एक फ़ीसदी बढ़ोत्तरी के लिए देश के करोड़ों मज़दूरों की एक-एक हड्डी को निचोड़ लिया जाता है और करोड़ों और नौजवानों को बेरोज़गारी में भटकने के लिए सड़क पर धकेल दिया जाता है। आज़ादी से आज तक जनता का सारे संसाधनों से बेदख़ली और खुले निजीकरण का परिणाम यह है कि भारत जैसे अति-पिछड़े पूँजीवादी देश में 90 प्रतिशत से अधिक मज़दूर आबादी अनियमित मज़दूरी में लगी है, जो अनिश्चित भविष्य के ख़ौफ़ में हिंसक कार्य परिस्थितियों में काम करने के लिए मज़बूर है, जिनके पास कोई नियमित रोज़गार नहीं है (5)। देश की आम जनता की सापेक्ष जीवन परिस्थितियाँ लगातार बद से बदतर हो रही हैं, इसके हालिया उदाहरण मार्च 2017 में जारी मानवीय विकास सूचकांक है। लगातार विकासकर रहा भारत 188 देशों की इस सूची में 131वें स्थान पर खिसक गया है। मानवीय विकास  के जो मानक ध्यान में रखे गये हैं, उनमें मुख्य हैं एक लम्बा और स्वस्थ जीवन, ज्ञान की पहुँच, और एक सम्माननीय जीवन स्तर। और इन मानकों के आधार पर भारत अपने नागरिकों को एक अच्छा जीवन स्तर देने में श्रीलंका से भी पिछड़ा हुआ है। जबकि पूँजी की आपराधिक लूट के दम पर मज़दूरों के परजीवी के रूप में अरबपतियों की संख्या यहाँ सबसे तेज़ी से बढ़ रही है (6)
आँकड़ों में व्यक्त इस घोर असमानता का व्यावहारिक रूप से समाज की व्यापक आबादी पर क्या प्रभाव पड़ता है उसके एक उदाहरण पर नज़र डालते हैं। गुड़गाँव के एक औद्योगिक क्षेत्र के पास एक मज़दूर बस्ती में हज़ारों मज़दूर रहते हैं, जो मारुती और होण्डा जैसी बड़ी कम्पनियों और उनके लिए पुर्जे बनाने वाली अनेक छोटी-छोटी कम्पनियों में मज़दूरी करते हैं। इस बस्ती में अन्दर जाने पर हम देखेंगे कि यहाँ बनी लाॅजों के 10×10 फि़ट के गन्दे कमरों में एक साथ 4 से 6 मज़दूर रहते हैं जो कमरे पर सिर्फ़ खाने और सोने के लिए आते हैं। इसके सिवाय ज़्यादातर मज़दूर दो शिफ़्टों में काम करने के लिए सप्ताह के सातों दिन 12 से 16 घण्टे कम्पनी में बिताते हैं, जिसके बदले में उन्हें 6 से 14 हज़ार मज़दूरी मिलती है जो गुड़गाँव जैसे शहर में परिवार के साथ रहने के लिए बहुत कम है। इन मज़दूर इलाक़ों में कोई सरकारी सुविधाएँ नहीं होतीं और ये इलाक़े डेंगू-चिकनगुनिया से सैकड़ों मज़दूरों की जान निगल जाते हैं। इस इलाक़े के सामने मुख्य गली में हर समय गन्दे नाले का पानी और कूड़े का ढेर पड़ा रहता है, जिससे अपनी महँगी कारें ले जाते समय मध्यवर्ग के कई व्यक्ति नाक-भौं सिकोड़ते दिखते हैं, क्योंकि उनकी कार उस नाले के पानी से गन्दी हो जाती है। लेकिन हज़ारों मज़दूर उसी कूड़े के ठेर के ऊपर से नाले के पानी को पैदल पार कर मारुति और होण्डा में बड़ी-बड़ी लग्ज़री कारें बनाने के लिए 12 से 16 घण्टे काम करने जाते हैं। ऊपर देश की सम्पत्ति के केन्द्रीकरण और समाज में व्याप्त असमानता के जो आँकड़े हम देख चुके हैं, यह तस्वीर इन आँकड़ों की ज़मीनी सच्चाई की एक छोटी-सी झलक है।
ऐसी हैं विकासशीलदेश के स्वतन्त्रउजरती गुलामों के जीवन स्तर की परिस्थितियाँ। और इन्हीं परिस्थितियों से उत्पन्न होते हैं व्यापक जनता के राजनीतिक मुद्दे। लेकिन कहीं भी इन मुद्दों का कोई जि़क्र होता नहीं दिखता। टीवी, अख़बारों और मध्यवर्ग की चाय-पर-चर्चा में इनमें से एक भी मुद्दा कभी नहीं उठता। सम्पत्ति और देश के सभी साधन पैदा करने वाले इन करोड़ों मज़दूरों की बदहाल जि़न्दगी का चेहरा कभी हमें अख़बारों, टीवी और अन्ना-केजरीवाल जैसे मध्यवर्ग-केन्द्रित राजनीतिक धड़ों या जातीय मुद्दों को उठाने वाले आन्दोलनों में सामने नहीं आने दिया जाता। यहाँ तक कि प्रतिक्रियावादी संगठन मज़दूरों की नयी पीढ़ी को व्हाट्सएप, फ़ेसबुक जैसी सोशल मीडिया, या प्रत्यक्ष सभाओं और प्रचार के अन्य माध्यमों से मज़दूर बस्तियों में इन मुद्दों से बेख़बर रखने के हर कोशिश में लगे हैं। पूँजी की चापलूसी करने वाले ये गुट जनता को दिग्भ्रमित करने के लिए हर स्तर पर झूठे प्रेपोगेण्डा में लगे हुए हैं। काल्पनिक समस्याओं के समाधान के लिए गढ़ी जा रही खोखली व्याख्याओं से अपनी वैचारिक समझ को भ्रष्ट होने से बचाने के लिए यह ज़रूरी है कि व्यापक स्तर पर लोग राजनीतिक चेतना और समाज के वास्तविक हालात की समझ से लैस हों, जिन्हें प्रतिक्रियावादी प्रेपोगेण्डा से गुमराह न किया जा सके। जो यह समझ सकें कि देश और समाज की बहुसंख्यक आबादी के जीवन की परिस्थितियाँ क्या हैं, और उन्हें सुधारने के लिए वास्तविक मूलभूत मुद्दे क्या हैं, ग़रीबों की गाढ़ी मेहनत से बने देश में उन्हें सभी सुविधाओं से बेदख़ल होकर क्यों रहना पड़ रहा है, बढ़ती ग़रीबी और अमीरी की खाई के बीच देश की आर्थिक और सामाजिक असमानता का मूल कारण क्या है, देश में बेरोज़गारी की स्थिति क्या है, देश की व्यापक मेहनतकश मज़दूर और किसान आबादी की दयनीय जीवन स्थिति का कारण क्या है और शहरों में काम करने वाले करोड़ों मज़दूरों की परिस्थितियाँ कितनी वीभत्स हैं, करोड़ों बेरोज़गार कितना मानसिक उत्पीड़न झेल रहे हैं और किसी भी शर्त पर पूँजी की गुलामी करने पर मज़बूर हैं।
चुने गये नेताओं द्वारा गढ़े जाने वाले खोखले चुनावी नारों की जुमलेबाजी और सरकारों द्वारा लागू की जाने वाली  नीतियों और राजनीतिक स्टण्ट्स में क्या एक भी ऐसी नीति है जिससे मेहनत के सहारे जीने वाली व्यापक ग़रीब जनता की जीवन परिस्थितियों में कोई सुधार होगा और आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा भविष्य मिल सकेगा, जहाँ रोज़गार की अनिश्चितता न हो और हर एक व्यक्ति को एक सम्मानित जीवन जीने का मौक़ा मिले सके। थोड़ी भी राजनीतिक चेतना रखने और सबके लिए समानता एवं स्वतन्त्रता के हिमायती जागरूक नागरिक यह महसूस कर सकते हैं कि पूरे समाज में एक ऐसा माहौल बन रहा है जिसमें तर्क करने वालों और असमानता भरे पूरे सामाजिक ढाँचे पर सवाल उठाने वाले विचारों को दबाया जा सके। सच को चाहे कितना भी तोड़ने-मरोड़ने की कोशिश की जाये, उसे छुपाया नहीं जा सकता, करोड़ों मज़दूरों की जीवन परिस्थितियाँ उन्हें स्वयं उनके मुद्दों के बारे में शिक्षित कर देती हैं, जिन्हें भटकाने के लिए भिन्न-भिन्न मनगढ़न्त तर्क और मुद्दे गढ़े जा रहे हैं।
References:
1.     The top 1 per cent of India’s population owns 58.4 per cent of the country’s wealth, as per the Global Wealth Databook 2016 released by Credit Suisse Research Institute. The wealth share of India’s richest has seen a sharp surge from 53 per cent share in 2015 and 49 per cent share in 2014. (Global Wealth Databook 2016: 58.4 per cent of India’s wealth with top 1 per cent of country’s population. Indian Express, 24 Nov 2016)
(Share of the top 10 per cent in total national income in 2016 in India was 55 per cent, The Hindu BusinessLine, Graphs, The Hindu 23 Sep 2017)
2.        Malnutrition is still a serious problem for India: report, (The Hindu, 6 Nov 2017)
3.        India has highest number of people living below poverty line: World Bank, (Businesstoday October 3, 2016)
4.        India 100th on global hunger index, trails North Korea, Bangladesh,( The Hindu, 12 Oct 2017)
6.     India slips in human development index, The Hindu, 23 March 2017


Sunday, March 4, 2018

वामपंथी आंदोलन में संशोधनवाद और संसदगामी वामपंथी पार्टियों की राजनीति

(महान बहस के 50 वर्ष इलाहाबाद सेमीनार में प्रस्तुत आलेख का एक हिस्सा)
संसदीय राजनीति और वामपंथी संशोधनवाद के बारे में कई विभ्रम लोगों के बीच मौज़ूद हैं, जिन्हे विस्तार से समझा जाना चाहिये। संशोधनवाद के बारे में महान बहस के यह दो उद्धरण अत्यन्त सटीक हैं,
जब संसदीय संघर्ष और संघर्ष के दूसरे कानूनी रूपों को अपनाया जा सके और अपनाया जाना चीहिये, उस समय उन्हें अस्वीकार कर देना गलत है। लेकिन अगर कोई मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी कानूनपरस्ती या संसदीय जड़वामवाद का शिकार हो जाती है और संघर्ष को केवल उसी हद तक सीमित रखती है, जिस हत तक पूँजीपति वर्ग इजाजत देता है, तो इसका अनिवार्य परिणाम यह होगा कि वह सर्वहारा क्रान्ति और सर्वहारा अधिनायकत्व का परित्याग कर देगी। (आम दिशा के दस्तावेजों महान बहस, पृष्ठ 13)। यदि किसी खास परिस्थिति में कोई कम्युनिस्ट पार्टी संसद में सीटों का बहुमत प्राप्त भी कर ले या चुनाव में जीतने की वजह से सरकार में शामिल भी हो जाय, तो इससे संसद और सरकार का पूँजीवादी स्वरूप नहीं बदल जाएगा। पूँजीवादी संसदों या सरकारों पर निर्भर रह कर बुनियादी सामाजिक परिवर्तन करना बिलकुल असम्भव है। (म.ब.पृष्ठ 302)
त्रिपुरा में संसदगामी वामपंथियों की हार पर लेनिन का एक उद्धरण अत्यन्त सटीक है,

मज़दूर वर्ग के आन्दोलन के सक्रिय लोग, जो अवसरवादी रुझान का अनुसरण करते हैं, वे पूँजीपति वर्ग के स्वयं उसकी अपेक्षा अधिक अच्छे रक्षक होते हैं।” (लेनिन, म.ब. के पृष्ठ 249-250 से)
अक्टूबर क्रान्ति और सोवियत यूनियन के समाजवादी संक्रमण के अनुभव के आधार पर लेनिन और स्तालिन ने अपने मूल्यांकन में बताया था कि पूँजीवाद से समाजवाद में शान्तिपूर्ण संक्रमण कुछ विशेष परिस्थितियों में हो सकता है जब भविष्य में कोई ऐसा पूँजीवादी देश होगा जो चारो तरफ से समाजवादी देशों से घिरा हो और सर्वहारा वर्ग का चौतरफा दबाव उसपर हो तब वह शान्तिपूर्ण ढंग से सत्ता छोड़ देगाऔर किसी भी परिस्थिति में यह सम्भव नहीं है। (लेनिनवाद के मूल सिद्धान्त, स्तालिन)
21वीं सदी में आज वैश्विक स्तर पर हो रही घटनाओं का विश्लेषण करें तो साम्राज्यवाद लगातार दूसरे देशों में हस्तक्षेप के माध्यम से मेहनतकश जनता का बर्रबर दमन जारी रखने की कोशिशों में लगा हैऔर लगातार ज्यादा हिंसक रूप में सामने आ रहा है। अपने अन्तर्विरोधों के कारण जारी पूँजीवादी संकट के इस दौर में पूँजीवादी जनवाद का चरित्र भी लगातार अधिक फासीवादी होता जा रहा हैऐसी विश्व परिस्थितियों में संशोधनवाद को गम्भीरता से समझने की आवश्यकता है।

श्रोत सूची:
1.   महान बहस, पीपुल्स पब्लिसिंग हाउस, अन्तरराष्ट्रीय प्रकाशन
2.   Documents of Great Debate (3 Volumes), International Publication
3.   Political Economy (Sangai Political Text Book)

Saturday, February 17, 2018

Reading Anton Makarenko’s writing on Education and Family

While reading articles of Makarenko on education and upbringing of the children, many memories of people from our relatives, our friends and our own family strike on our conscious. Our own childhood come before our thoughts, and we try to find out how un-consciously a number of children are brought up and educated in our society where we had grown up, where we see so many crimes happening from inside the family to outside the society, where so many self-centric “educated” people are roaming around the streets and at elite workplaces in hunt for satisfying their ego. In such dangerous times it is an excellent article for every person who wants to understand the purpose of education, and also for all of us who try to give our attention to the education of whole society. This article will open a whole new window for our conscious understanding about the facts why so many children we have seen in our neighborhood, or at our relatives, who were not brought up as expected by their parents and family members.

Hindi Translation of the Book is available at Link: एक पुस्तक माता-पिता के लिए

There are total eight lectures available online on the below link. Here is the first article.
(All the highlights in the below article are done by readers.)
GENERAL CONDITIONS FOR BRINGING UP A FAMILY, 1951
By Makarenko


The most important part of our lives is bringing up our children. They are the future citizens of our country and of the world. They will create history! Our children are the future fathers and mothers who will, in their turn, rear children. They must grow up to be good citizens and good fathers and mothers.
And this is not all -- our children are our old age -- if they are well brought up we will have a happy old age but if they are badly reared we will experience sorrow and tears. We will suffer before other people and before our country for our guilt.
Dear parents, above all remember the great importance of this matter of child-rearing and your responsibility for it...
Now let us turn our attention to some questions of general significance. First: to bring up a child correctly and normally is much easier than to re-educate him. It is really not as hard as some people seem to think. Any parent is capable of bringing up his children rightly -- if he really wants to. And what a joyful, pleasant, happy task it is! Re-education is a different matter. If you have done a bad job, been thoughtless, lazy or neglectful, much will have to be done over again, corrected. And this task requires more wisdom and patience than we find in every parent. So again, we advise you, parents, do your task well from the very beginning....
Parents must remember too, that in the pre-revolutionary family the father had great power; children lived completely under his will, there was no escape for them from parental authority and some fathers treated their children cruelly. In. our family the organization is very different. Our daughters do not have to wait for their fathers to find them a husband!
The feelings of the children rule. Obviously, if parents are to have influence now, they must find new methods, the old ones may no longer be used.
In the old-type family everyone belonged to some class and the son of a peasant was a peasant too, the son of a worker, a worker. Now a broad range of choice opens before our children. Their decisions need not be made according to the economic situation of the family but on the basis of their own capabilities and preparation. Both parents and children understand this. Under such conditions, parental decrees (फरमान) are impossible. Guiding must be done by wiser, more subtle and cautious means.
Our family is no longer a paternal one. Our women enjoy the same rights as men, mothers have rights equal with fathers. The Soviet family is a collective, not a group under one-man rule. Yet in this collective the parents have certain recognized rights. From whence do they derive them?
Now we do not deceive (झूठ बोलना) children. Although a family is a collective of equal members of society, children and parents differ from one another. Parents guide the family; the children are being brought up in it.
Parents must clearly understand that they are not the sole, uncontrolled bosses but must act as the older, responsible members of a collective. A clear concept of this will be very helpful in the task of bringing up children....
The structure of a family is important. This is, in the main, within our control. Even if a family has material problems, it should not limit itself to one child. An only child becomes the center of attention and receives more care than is normal or beneficial.... Often an only child becomes a real despot -- parents find that they have brought up an egoist whether they wanted to or not.
A large, well-organized family accustoms the children from infancy to mutual relationships, gives them opportunities to experience love and friendship in various forms between older and younger children. In such a family, children learn that necessary tasks cannot be carried out alone but must be done together. They experience life in a collective at every step, in play and work. This is essential for Soviet children. In bourgeois society it was less important because that society was constructed on egoistic principles...
Incomplete families, where the parents have separated, have an unhealthy influence on children's bringing up. The children may become the subject of dispute between parents who detest one another and do not hide this from their children. We advise parents who, for some reason, decide to separate to think first of all about the children, to hide their hatred and resolve conflicts tactfully. Parents who truly love their children will try to prevent their mutual differences from reaching a complete break so that their children will not be placed in this difficult situation. Obviously, if the father has left his family he cannot bring up his children. If his influence is bad, better forget him. That is the honest way to do. Of course, he must continue as before to carry his material responsibilities for the care of the children.....
Our next question is the matter of goals.
Some families never think about this. Parents just live beside their children and hope that things will take care of themselves. They have no goals, noprogram. Results, under such conditions, will be casual, haphazard. Parents are often surprised to find that their children have grown up badly... No one can do a job well unless he knows what he wants to accomplish. You must clearly understand your own desires. Do you want to bring up a true Soviet citizen, an energetic, honest, learned human being, one devoted to his country, to the revolution, work-loving, kind and courteous? Or do you want your child to be narrow-minded, greedy, cowardly, some kind of crafty little business man? Think this over carefully... Then you will see what mistakes you are making and what is the best path to follow.
Remember! You did not bring your son or daughter into the world for your own pleasure alone! And always remember that a future citizen is in your charge. If you fail, the grief will not be yours alone. The whole country will suffer. And do not brush this aside! Do not consider this a tiresome argument! If your factory turned out damaged goods you would be ashamed. Isn't it much more shameful for you to give your country a spoiled or bad human being?
Family affairs cannot be separated from the affairs of society. Your activities at home or at work are reflected in your family. They should see you as a politically, civic-minded person and not separate this image from their image of you as parent. Whatever happens in our country will reach them through your feelings and thoughts. They should know what makes you happy or sad, what is going on at your plant, what kind of community activity you are involved in. They should be proud of your successes and your service to society. This will not be healthy pride, however, if it is only pride in your good clothes, your automobile or your hunting rifle.
Your own conduct is decisive. You are constantly educating your child-- even when you are not with him. Your manner of dress, how you treat your friends or enemies, even what you laugh at -- read in the paper -- all this has great meaning for the child. You may not even be aware that your thoughts are affecting him in unseen ways -- a change in your voice...
If you are coarse or boastful (अशिष्टघमंडी) at home or -- much worse -- if you are insulting to mother, there is no use thinking about bringing up your children. You are already bringing them up badly and no advice will help you.
The parent's own self-discipline -- control at every step -- this is the most important method of bringing up children correctly.
We often meet parents who believe that some sort of clever prescription exists for bringing up children and that they must find it. In their opinion, if they find this prescription they may bring up work-loving people, honest citizens. If only they can get it into their hands they will be able to work miracles and their child will grow up rightly.
There are no such miracles. No prescription will help if the personality of the person rearing the child has great faults. First pay attention to these faults.
There are no pedagogic tricks. Unfortunately, some people believe in them. One thinks up punishments, another some kind of prize, a third plays the clown at home to amuse the children, a fourth bribe with promises.
Bringing up children requires a serious, simple and sincere attitude. -- Laziness, cynicism, frivolity will doom your work to failure. -- Tricks prevent parents from seeing the real tasks, confuse them and waste time.
And how many parents love to complain about lack of time! Of course it is a good thing to be with your children. It would be too bad if you did not see them often. But this does not mean that parents should never take their eyes off the children. This sort of thing develops passivity, accustoms children too much to adult society, may result in precocity. (Parents like to brag about precocity but later they find that they were wrong to do so.)
Of course a parent should know what his child is doing, where he is. But the child must have freedom so that he will be subject to a variety of influences. Don't think that he can be fenced off even from harmful or negative ones. For, in life, he will meet temptations, strange and evil people and circumstances. A hothouse upbringing will never develop the ability to withstand them and to struggle against them. ---
Children must have help and direction from time to time.. but this does not mean that they should be led by the hand... So for bringing up your child it is not more time that you need but correct use of the little time you have.
The essence of child rearing does not....consist in your conversations with the child, in direct effect on him, but rather in the organization of the family, of your own life and the life of the child. In this matter there are no trifles... Good organization consists in not brushing aside small details...These details of life act as an influence regularly, daily, hourly... To guide and organize life is your responsible task.
In summary:
Try to bring up your child correctly so that you will not have to re-educate him, which is much harder.
Remember that you are leading a new Soviet family. As far as possible achieve the right structure of the family.
Set yourself a goal and program for the task of up-bringing.
Remember that the child is not only your joy but a future citizen and that you answer to the country for him. Above all a good citizen yourself and carry your civic feeling family.
Make severe demands on your own behaviour.
No need of hunting for tricks and formulas. Be serious, simple and sincere. Guide the child but do not protect him from life.
The main thing in the work of bringing up children is the organization of family life with careful attention to details.

Monday, February 12, 2018

क्रान्तियों के बारे मे दोब्रूयोलोव और लेनिन के दो उद्धरण

"परिस्थितियां समाज में एक आवश्यकता को जन्म देती हैं। इस आवश्यकता को सब स्वीकार करते हैं, इस आवश्यकता की आम स्वीकृति के बाद यह जरूरी है कि वस्तुस्थिति में परिवर्तिन हो...।....चिन्तन मनन और वाद-विवाद के बाद क्रियाशीलता की श्रीगणेश होना चाहिये।... वर्षों से हमारे समाज ने क्या किया है? अब तक - कुछ नहीं।  उसने मनन-अध्ययन किया, विकसित हुआ, प्रवचनो को सुना, अपने विश्वासों के लिए संघर्ष के दौर में लगे आघातों पर सहानुभूति प्रकट की, कार्यक्षेत्र मे उतरने की तैयारी की, किन्तु किया कुछ नहीं! ढेर की ढेर सुन्दर भावनाओं-कल्पनाओं से लोगों के हृदय मस्तिष्क पट गए, समाज की वर्तमान व्यवस्था के बेतुकेपन और बेहूदगी का इतना पर्दाफाश किया गया कि पर्दाफाश करने के लिए कुछ रह ही नहीं गया। प्रतिवर्ष विशिष्ट, अपने-आप को 'चारों ओर की वास्तविकता से ऊंचा समझनेवाले', लोगों की संख्या बढ़ने लगी। ऐसा लगता था कि सीघ्र ही सब लोग वास्तविकता से ऊँचे उठ जायेंगे।...हमें ऐसे लोगों की आवश्यकता नहीं है।... हमें ऐसे लोगो की आवश्यकता है जो स्वयं हमें वास्तविकता को ऊंचा उठाना सिखायें, ताकि हम उसे उन संगत मानकों के स्तर पर ला सकें जिन्हें सब मानते और स्वीकार करते हैं।
- दोब्रूयोलोव (साहित्यिक आलोचक)
 
"जब 'निचले वर्ग' पुराने तरीको को मानने से इनकार कर देते हैं, और 'ऊपरी-वर्ग' पुराने तरीके बनाए रखने में असफल हो जाते हैं -सिर्फ तभी क्रांतियों की जीत होती है।" . . . "क्रांतियां मेहनतकश और शोषित जनता द्वारा राजनीतिक संघर्ष में भाग लेने वालों की संख्या का दस गुना, यहां तक कि सौ गुना तीव्रता से विकसित होने का परिणाम होती हैं।" 
- लेनिन (रूसी क्रांतिकारी)

Monday, February 5, 2018

दुनिया की सबसे बढ़ी युवा आबादी के भविष्य का सवाल

35 प्रतिशत नौजवानों (10 से 24 वर्ष) के साथ हमारा देश पूरी दुनिया के किसी भी और देश की तुलना में सर्वाधिक युवा है। यह युवा आबादी एक असीम शक्ति का भण्डार है, जो देश को वास्तव में एक सपनों का देश बनाने की क्षमता रखती है। लेकिन कुछ मुठ्ठीभर लोगों के लिये मुनाफा पैदा करने की हवश पर टिकी पूरी आर्थिक-राजनीतिक व्यवस्था मे नोजवानों की यह असीम ताकत कभी रोज़गार के लिये भटकते हुये निराशा और हताशा की शिकार हो रही है, तो कहीं देश में मौज़ूद आराजक तत्व इन नौजवानों को उनके रोज़गार के सवालों से ध्यान हटाने के लिये उन्माद फैलाने वाली एक भीड़ में तब्दील करने का काम कर रहे हैं।
पिछले कुछ दिनों से नेताओं के बयानों को सुने तो ऐसा आभास होता है कि जब देश के नौजवान सरकारों से रोज़गार देने की बाद करते हैं तो कोई नेता कह रहा है कि सरकार सभी को नौकरियाँ नहीं दे सकती, तो कोईता है कि यदि कोई व्यक्ति, जो कहीं भी रोजगार न मिलने के कारण मज़बूरी में अपना परिवार पालने के लिये सड़क पर ठेला लगाकर चाय या पकोड़े बेचने के लिये मज़बूर है, तो वह उसके लिये मुहैया रोज़गार माना जाना चाहिये है। पूरी दुनिया में किसी भी देश में कोई भी राजनेता जो जनता की माँगों का नेतृत्व करता है वह ऐसी परिस्थितियों में काम करने को रोज़गार नहीं मान सकता। पूँजीवादी विकास की वर्तमान अवस्था में एक तरफ टेक्नोलाजी और आटोमेशन की अनेक खोजें हो रही हैं (लेकिन यह खोजें हथियारो या समाज के मुठ्ठीभर ईलीटों के  मनोरंजन की पूर्ती के इर्द-गिर्द केन्द्रित हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले साल देश में पैदा हुई 73 फीसदी सम्पत्ति देश की एक प्रतिशत आबादी के पास केन्द्रित हो गई।)और दूसरी तरफ आम मेहनतकश नौजवान रोजगार के आभाव में  सड़कों पर ठेले लगाने के लिये मज़बूर हैं। जबकि तकनीकि विकास समाज के हर व्यक्ति के जीवन को आरामदायक बनाने कि लिये होना चाहिये, लेकिन आज टेक्नोलाजी पूँजीवादी मुनाफें की हवश को शान्त करने का एक उपकरण मात्र बनकर रह गई है। जिसका परिणाम यह है कि जो नौजवान संगठित होकर अपने श्रम से बड़े-बड़ें कारखानों में विज्ञान और तकनीकि के नये-नये चमत्कार करने की क्षमता रखते हैं, नई खोजों और नये उपकरण बनाने की काबिलियत रखते हैं वो आज पूँजीवादी मुनाफा-केन्द्रित व्यस्था द्वारा जनित बेरोज़गारी के कारण ड़कों पर चाय और पकौड़ो की रेड़ी लगाने के लिये मज़बूर हैं या किसी ठेकेदार (इनमें मानशिक और शारिरिक दोनों प्रकार के काम निहित हैं) के मुनाफे के लिये औने-पाई की मज़दूरी पर काम करने के लिये मज़बूर हैं। इसे रोजगार नहीं बल्कि श्रम की लूट कहना ज्यादा सही है।
पिछले साल के आंकड़ों के अनुशार देश में कुल 140 लाख नौजवान 12वीं की परिक्षा में शामिल हुये थे। और हर साल यह संख्या बढ़ रही है। एक या दो साल बाद यह नौजवान काम की तलाश में होंगे, और हमें स्वयं से सवाल करना चाहिये कि क्या वर्तमान व्यवस्था जहाँ सारे सामाजिक उत्पादन के संसाधन और उपक्रमों को मुनाफ़ा कमाने के लिये निजी हाथों में सौंप दिया गया है,क्या वह हर साल काम की तलाश में श्रम के बाजार में आ रहे 1.4 करोड़  नौजवानों को रोज़गार देने की क्षमता रखती है।

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