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Monday, June 17, 2013

Tragedy of IT Professionals!!



Reality behind hiring and firing: To create a reserved army of labor!
A shadow of recession is also felt in the IT sector of India. A lot of highly paid middle class IT professionals (who don't think that they are workers!!) are getting affected from the impact of economic slowdown and recession in European countries.
Impact of this slowdown is reflected in the life of middle class people because money companies are going for job-cut to save their profit.
Now, even if recession may not be there, but still many IT companies time by time terminate some of their employees to "maintain" (!!) the standard of their work force!!
It is what IT companies tell to their employees and we all are told till now...
Now, from the point of Marxist analysis, the situation is totally different.
Now we see what the reality of job-cutting is, and maintaining the work "standard" of employees. It can be understood with a very simple example. Suppose a company need 100 workers to some work, so it hires 100. After some time it terminates 10 out of them on the name of "not up to mark work quality"!! Now, there remain only 90 workers. So, what will be the situation of these remaining 90 workers? As 10 workers were fired due to "not up to mark work", remaining workers will feel a pressure to maintain their work quality "up to mark". Why these workers feel pressure? Because they don't have any guarantee of employment to earn high wages. What does it mean? It means that they have to work overnight to maintain the “quality of their work”, attend office in weekends, take less leaves etc. It means, indirectly they are forced to do more work in the same wages. So, practically these 90 workers will be doing the work of 100 workers or in many cases more than 100 workers.
So, in one statement we say about management process, "Hire 100 workers, terminate 10 out of them on the name of 'bad performers', and then let the work of more than 110 workers done by remaining 90 workers." This is the reality of reserved or surplus labor force (either physical or intellectual) in any capitalist system.
As quantity of intellectual work cannot be measured and there is no proper way to judge day to day productivity of intellectual labor. In this case IT companies cannot put direct supervisory pressure on their workers to increase productivity, as it is done in other industries. So termination of “under performers” and announcing it in front of other workers is a good, and only, way for these IT companies to develop fear and create an indirect psychological pressure on their workers to regulate the productivity. This also disciplines workers, and profit generation goes on smoothly and uninterrupted.
This indirect pressure on the workers, which is not clearly understandable to them, is one of the reasons why a lot of working population around the world is suffering from the decease of depression. And, now this pressure is also experienced by newly developing middle class of our country, because impact of recession in developed countries like Europe and USA is also impacting the employment of IT professionals in India.
In the words of bourgeoisie “philosophers” it is called management of labor (to make profit). And this is the truth behind success of businessmen like Narayan Murty, Ajim Premji etc. But many workers ask why no one talk about it? The answer is simple that present education system, social institutions and other sources of knowledge and propaganda try to create an illusion in the mind of people to hide the reality. It is a reason why individual “successful” personalities who are making great profit, are promoted by whole media and newspapers, and praised by bourgeoisie ideologue so that they become role-model for all workers and workers keep dreaming to become Murty-Premji. This illusion is necessary for the capitalist class and capitalist society to exist. This is a way how intellectual class of the society is so very well politically fooled.
It is also true because under capitalist production relations intellectual production in the IT industries is exactly same as in the other production industries. So the social position of these intellectual workers (IT professionals) is almost same as other physical workers who are working overnights 12 to 16 hours day and night to earn very little, not enough to maintain themselves and their family. Except intellectual workers are paid more wedges than physical laborers due to higher “value” of their work. But, the tragedy with this section of the society is that neither they have much political awareness nor their class character allows them to join working class in their struggle for liberation of whole mankind from the slavery of capital.
There is a lot more to be exposed about IT industries. This is just a corner of the real picture of the conditions of working class, but there is a whole picture to unfold.

Sunday, March 10, 2013

भारत में लगातार चौड़ी होती असमानता की खाई और जनता की बर्बादी की कीमत पर हो रहे विकास पर एक नज़र ! !


अनेक आंकड़ों, तथ्यों और मन्त्रियों-नेताओं के बयानों को सुन और देख कर कोई भी यह सोच सकता है कि भारत काफ़ी तेज गति से विकास के ट्रेक पर आगे बढ़ता चला जा रहा है, और एकता तथा अखण्डता की एक मिसाल प्रस्तुत कर रहा है। लेकिन जब असलियत पर नज़र जाती है तो विकास की सच्ची तस्वीर सामने आ जाती है जो पानी के एक बुलबुले की तरह है जहाँ करोड़ों लोगों के जीवन की बर्बादी की कीमत पर कुछ लोगों को विकास के साथ सारे ऐशों आराम के साधन उपलब्ध कराये जा रहे हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय पूँजीवादी-साम्राज्यवादी वैश्वीकरण नीतियों के अनुरूप योजनायें बनाते हुये भारत की सरकार ने पिछले 20 सालों से देश के बाज़ार को वैश्विक बाज़ार के लिये लगातार अधिक खुला बनाया है, और पूँजी के खुले प्रवाह के लिये निवेश में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों को लागू किया है। इन नीतियों को लागू करने के लिये श्रम कानूनों को लगातार लचीला बनाने के नाम पर मज़दूरों के सभी अधिकारों की एक-एक कर तितांजलि दे दी गई है। इस "विकास" को हासिल करने के लिये सरकार नीतियाँ में फेरबदल करते हुये देशी-विदेशी व्यापारिक संस्थाओं और उद्योगपतियों को कई प्रकार की सब्सिडी मुहैया करवाती है और कई तरह की छूटे देती है। इन नीतियों के लागू करने का परिणाम यह है कि आज नौजवानों में बेरोज़गारी चरम सीमा पर है, मज़दूरों की और ज़्यादा दुर्गति हुई है, जनता के कष्ट और बढ़े हैं, गरीबों को और अधिक गरीबी में धकेल दिया गया है, और पूरे देश के स्तर पर किसानों में आत्महत्यों का सिलसिला आनवतर जारी रहा है।
विकास और उन्नति के नाम पर लागू की जा रहीं इन नीतियों के परिणामस्वरूप स्थिति यह है कि देश के कुल 46 करोड़ मज़दूर आबादी में से 93 प्रतिशत, अर्थात 43 करोड़ मज़दूरों को असंगठित क्षेत्र में धकेल दिया गया है, जहा वे बिना किसी कानूनी सुरक्षा के गुलामों जैसी परिस्थितियों में काम करने के लिये मज़बूर हैं (जबकि यह आंकड़ा 2007 का है)। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार इस पूरे परिवर्तन के दौरान देश में अमीरों-गरीबों के बीच असमानता दो-गुना बड़ चुकी है। और ऊपर के 10 प्रतिशत लोगों की आय नीचले स्तर पर जीने वाले 10 प्रतिशत लोगों की आय से 12 गुना अधिक है, जो कि बीस साल पहले 6 गुना थी। इसी के साथ शहरी अमीरों और ग्रमीण अमीरों के बीच भी असमानता मौज़ूद है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार शहरों में रहने वाले अमीर ग्रामीण अमीरों से 221 प्रतिशत अधिक खर्च करते हैं। विकास के चलते जनता की दुर्गति का सिलसिला यहीं नहीं थमता। एक सरकारी आंकड़े के अनुसार देश में हर एक घण्टे में दो लोग आत्महत्या करते हैं, जिसमें आदिवासी, महिलाओं और दलितों से सम्बन्धित आंकड़े शामिल नहीं हैं, इसके साध ही देश की 15 से 49 साल की महिलाओं की मौत का एक सबसे बड़ा कारण है आत्महत्या। इसी साल मार्च में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार जनता को मिलने वाली स्वास्थ सुविधाओं के मामले में भारत पड़ोसी देशों श्रीलंका, बग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल से भी खराब स्थिति में है। इसके बावज़ूद भारत दुनिया में स्वास्थ सुविधाओं पर सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से एक है। (India in healthcare hall of shame, ranked worst peers and neighbours, टाइम्स आफ इण्डिया, Mar 5, 2013)
एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की 45 करोड़ जनता गरीबी रेखा के नीचे जी रही है, जिसका अर्थ है कि यह आबादी भुखमरी ही कगार पर बस किसी तरह जिन्दा हैं। इन गरीबों की प्रति दिन की आय 12 रु से भी कम होती है। इतनी आमदनी मे कोई मूलभूत सुविधा तो बहुत दूर की बात है, बल्कि एक व्यक्ति को किसी तरह सिर्फ जीन्दा बने रहने के लिये भी संघर्ष करना पड़ता है, और वह भी तब जब यह मान लिया जाये कि वह व्यक्ति कभी बीमार नहीं पड़ेगा और जानवरों की तरह सभी मौसम बर्दाश्त कर लेगा!
एक तरफ गरीबी लगातार बड़ रही है, वहीं दूसरी ओर समाज के एक छोटे हिस्सें का प्रतिनिधित्व करने वाले उद्योगपतियों, लोकसभा के सदस्यों, न्यायपालिका में काम करने वाले लोगों, नेताओं, सरकारी अधिकारियों और बाबुओं के घरों में पैसों के अम्बार (कानूनी और गैर कानूनी सभी श्रोतों से) लगातार ऊँचे होते जा रहे हैं। आम जनता की इस बर्बादी के बीच दूसरी तरफ भारत "तरक्की" भी कर रहा है! 120 करोड़ आबादी वाले भारत के पूँजीवादी जनतन्त्र में 100 सबसे अमीर लोगों की कुल सम्पत्ति पूरे देश के कुल वार्षिक उत्पादन के एक चौथाई के बराबर है। फोर्ब्स पत्रिका द्वारा जारी की गई दुनिया के 61 देशों में अरबपतियों की संख्या की एक सूची में भारत चौथे नम्बर पर है। भारत के इन अरबपतियों की कुल सम्पत्ति 250 अरब है, जिसकी तुलना में जर्मनी और जापान के अमीर अरबपतियों को गरीब माना जा सकता है। इन अरबपतियों के साथ ही भारत में दो लाख करोड़पति भी हैं जो बड़ी-बड़ी कम्पनियों, बैंकों और शेयर-बाजार को "मैनेज" करने का काम करते हैं।
देश में उपभोग करने वाली एक छोटी आबादी को चकाचौध में डूबाने के लिये और अमेरिका-जापान से लेकर यूरोप तक पूरी दुनिया की पूँजी को मुनाफ़े का बेहतर बाज़ार उपलब्ध करवाने के लिये जनता के कई अधिकारों को छीन लिया गया है। इसके कई उदाहरण आज हमारे सामने हैं कि जगह-जगह शोषण-उत्पीणन के विरुद्ध और अपने जनवादी अधिकारों के लिये होने वाले मज़दूर आन्दोलनों और जन-आन्दोलनों के माध्यम से उठने वाली जनता की आवाज को दबाने के लिये पुलिस-प्रशासन का इस्तेमाल अब खुले रूप में किया जाने लगा है। कश्मीर से लेकर देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में जनता के ऊपर सैन्य शासन के साथ ही अब मज़दूर इलाकों में भी मालिकों के कहने पर पुलिस जब चाहे फ़ासीवादी तरीके से मज़दूरों का दमन करती है और उनमें आतंक फैलाती है। यह सब इसलिये किया जाता है जिससे देश के कुछ अमीरों को जनता की बदहाली और शोषण के बदले में "विकास" की चमक-दमक और सुख-सुविधाओं के उपभोग के लिये एक "सुरक्षित माहौल" दिया जा सके!
इकोनामिक टाइम्स के अनुसार विकास की दौड़ में मध्यवर्ग की एक खाई-अघाई आबादी भी शामिल है, जो 16 करोड़ यानि कुल आबादी का 13.1 प्रतिशत हिस्सा है (इकोनामिक टाइम्स 6/2/2011)। मध्यवर्ग का यह हिस्सा विश्व पूँजीवादी कम्पनियों को अनेक विलासिता के सामानों को बेंचने के लिये एक बड़ा बाज़ार मुहैया कराता है। समाज का यह हिस्सा अमानवीय स्थिति तक माल अन्ध भक्ति का शिकार है, जिसमें टीवी और अखबारों में दिखाये जाने वाले विज्ञापन उन्हें कूपमण्डूक बनाने की कोई कशर नहीं छोड़ते। करोड़ों मेहनत करने वाले लोगों के खून पसीने से पैदा होने वाले सामानों पर ऐश करने वाले समाज के इस हिस्से को देश की 80 प्रतिशत जनता की गरीबी और बर्बादी तथा दमन-उत्पीड़न से कोई खास फर्क नहीं पड़ता, बल्कि यह समाज के दबे कुचले हिस्से को देश की प्रगति में बाधा मानता है। इसी मध्यवर्ग को अपने माल के एक बाज़ार के रूप में देखते हुये अमरीकी और यूरोपीय उद्योगपति बड़ी खुशी के साथ इसकी व्याख्या करते हैं कि यहाँ उनके उत्पादित माल और आटोमोबाइल के लिये एक बड़ा बाज़ार मौज़ूद है।
आगे कुछ और आँकड़ों पर नज़र डालने से असमानता और विकास की भयावह स्थिति और साफ़ हो जायेगी। युनीइटेड नेसन्स डेवलपमेण्ट प्रोग्राम ने मानवीय विकास सूचकांक में भारत को 146 देशों की सूची में 129 वें स्थान पर रखा गया है, जिसमें लिंग भेद के मानक भी शामिल हैं। ह्यूमन डेवलपमेण्ट रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग 30 साल पहले भारत की लोग बेहतर जीवन गुजारते थे। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार पिछले 30 सालों के अन्तराल में गरीबों की संख्या में कोई कमीं नहीं हुई है (इंडिया टुडे, 22-10-11)। भारत के ही सरकारी आंकड़े के अनुसार देश की 77 प्रतिशत जनता (लगभग 84 करोड़ लोग) गरीबी में जी रही है, जो प्रति दिन 20 रूपयों से भी कम पर अपना गुज़ारा करती है। हमारे देश में दुनिया के किसी भी हिस्से से अधिक, 46 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। भारत की एक तिहाई आबादी भूखमरी की शिकार है और यहाँ हर दूसरे बच्चे का वजन सामान्य से कम है और वह कुपोषण का शिकार है। ग्लोबल भूख सूचकांक के आधार पर बनी 88 देशों की सूची में भारत 73वें स्थान पर है जो पिछले साल से 6 स्थान नीचे है। 2012 के मल्टीडायमेसनल गरीबी सूचकांक के अनुशार बिहार, छत्तिशगढ़, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 42 करोड़ लोग गरीबी के शिकार हैं।
एक संस्था ओ.ई.सी.डी. के अनुसार भारत की प्रगति का नतीजा जनता की बदहाली के रूप मे इस प्रकार है कि आज यहाँ पूरी दुनिया के सबसे अधिर ग़रीब लोग रहते हैं। यही बजह है कि जनता की मेहनत और समाज के संसाधनों को लूट के चलते कुछ अम्बानी जैसे कुछ लोग कई-कई मंजिला मकान बनाकर अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने में भी कोई शर्म महसूस नहीं करते।
भारत के पूँजीवादी जनतन्त्र में हो रहे विकास की असली तस्वीर यही है, जहाँ जनता की बर्बादी और मेहनत करने वालों के अधिकारों को छीनकर देश के कुछ मुट्ठी भर उद्योगपतियों, अमीरों, नेताओं, सरकारी नौकरशाहों को आरामतलब जिन्दगी मुहैया कराई जा रही है, और देशी विदेशी पूँजीपतियों को मुनाफ़ा निचोड़ने के लिये खुली छूट दे दी गई है।  
इन परिस्थिति की जानकारी होते हुये कोई संजीदा व्यक्ति सामान्य जीवन जीना स्वीकार नहीं कर सकता। यह समय इन परिस्थितियों पर विचार करने का ही नहीं, बल्कि इनके कारणों को जड़ से समाप्त करने के लिये उठ खड़े होने का है। आज सिर्फ सोचना ही नहीं, बल्कि परिस्थितियों को बदलने के प्रयास भी करने होंगे जहाँ सही मायने में पूरी व्यवस्था पर जनता का नियंत्रण हो जिससे हर मेहनत करने वाले व्यक्ति को उसकी मेहनत का पूरा हक मिल सके।

Tuesday, August 16, 2011

अन्ना की गिरफ्तारी, स्वतंत्रता और जनवाद का हनन, और "सभ्य-समाज"

आज सुबह अन्ना हजारे के गिरफ्तार होने के बाद पूरी मीडिया और अखबारों में बयान आ रहे थे कि सरकार जनवादी अधिकारों और स्वतंत्रता का हनन कर रही है । आज भ्रष्टाचार के विरुद्ध इस पूरे आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे अन्ना हजारे, जो अब तक सिर्फ भ्रष्टाचार को हर समस्या का आधार बता रहे थे, और जनता को विश्वास दिला रहे थे कि भ्रष्टाचार समाप्त होने के साथ ही सभी समस्याएँ भी दूर हो जाएँगी। लेकिन आज, जब अन्ना हजारे गिरफ्तार हुए तो सारा कार्य "संवैधानिक" तरीके से किया गया । भले ही बाद में उन्हें रिहा कर दिया जाये, फिर भी गिरफ्तारी संविधान के कानूनो के दायरे में ही हुई है । सरकार ने उनके आन्दोलन को सुरक्षा व्यवस्था के लिये खतरा बताकर जेपी पर्क में धारा 144 लगाई, और सुबह उन्हें जाते समय गिरफ्तार कर लिया । इस पूरी घटना में, जिसे जनवादी अधिकारो का हनन कहा जा रहा है, "भ्रष्टाचार" का कोई हाथ नहीं है, और सरकार हर चीज़ संविधान के कानूनों के अनुसार कर रही है । (Reference: NDTV India)
"सभ्य-समाज" (सिविल सोसाइटी) को साधारण जनता का मसीहा बनानें में लगे अन्ना जी, जो खुद भी "सभ्य-समाज" के एक प्रतिनिधि हैं, उन्हें और उनके जैसे अनेक "सभ्य-समाज" के लोगों को यह समझनें में काफी समय लग गया (ज़रूरी नहीं कि समझ ही गये हों, लेकिन हम मान लेते है!!) कि पूँजावादी जनवाद में शासक वर्ग हर समय जनता की स्वतंत्रता का हनन करता है । "सभ्य-समाज" के लोगों को यह बात कभी-कभी सिर्फ तब समझ में आती है जब मज़बूरी में राज्य़ सत्ता को उनके ऊपर थोड़ा सा बल प्रयोग करना पड़ता है ।
लेकिन, अन्ना हजारे जैसे "सभ्य-समाज" के लोग एक गरीब मज़दूर या किसान की स्वतंत्रता की सच्चाई को कभी नहीं समझ सकते, जिसका पूँजीवाद में एक गरीब व्यक्ति के लिये कोई मतलब नहीं हैजहाँ एक गरीब मज़दूर की स्वतंत्रता और जनवादी अधिकारों का हनन उसकी फ़ैक्टरी का एक सुपरवाइजर भी उसे गालियाँ देते हुए, उसपर भौतिक एवं मानशिक रूप से हिंसा करते हुये, हर दिन करता है। और एक गरीब व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके जनवादी अधिकार तो एक छुटभैया पुलिस के सिपाही के डंडे के सामने भी कोई मायने नहीं रखतेऔर यह सब भ्रष्टाचार के कारण नहीं बल्कि असमानता और शोषण पर आधारित समाज के भीतर सम्पत्ति के आधार पर होता है। जिसे व्यापक जनता को शिक्षित, आन्दोलिद और जन पहलतदमी पैदा किये बिना लागू नहीं किया जा सकता।
अन्ना हजारे जी शायद अब स्वतंत्रता की इस सच्चाई को समझ सकेंगे, लेकिन उन्हें और उनके जैसे "सभ्य-समाज" के अन्य लोगों को यह समझनें में काफी समय लगता है, और ज्यादातर तो अपने पूरे जीवन भर में यह नहीं समझ पाते, क्योंकि उन्हें कभी ऐसी अमानवीय परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता । लेकिन गरीब लोग (मज़दूर, किसान और बेरोजगार जनता), जिनकी स्वतंत्रता का रोज अनेक प्रकार से हनन होता है, उन्हे इसका अहसास व्यवहारिक जीवन में रोज होता है, जिसका एक बहुत ही छोटा सा नगण्य अहसास शायद अन्ना जी को आज सुबह हुआ होगा । लेकिन इन गरीब लोगों के पास न तो मीडिया का समर्थन है, और न ही "सभ्य-समाज" उनके साथ है, और उनकी हर आवाज़ को बिना किसी को पता चले दबा दिया जाता है। आन्ना हजारे के साथ तो हजारों लाखों की संख्या में जनता है, और पूरा पूँजीवादी मीडिया उनका साथ दे रहा है, लेकिन, एक व्यक्ति, यदि उसके पास पैसा न हो, तो उस अकेले व्यक्ति की स्वतंत्रता का अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है।
मैं इन्तजार कर रहा हूँ कि, कब "सभ्य-समाज" के लोगों को पूँजीवाद की इस सच्चाई का पता लगेगा और अन्ना हजारे कहेंगे कि पूँजीवादी जनतंत्र सम्पत्तिधारी वर्ग की तानाशाही होता है, जहाँ आम-जनता की स्वतंत्रता सिर्फ सम्पत्ति से निर्धारित होती है ।
[नोट: अभी ताजी खबर मिल रही है कि अन्ना को रिहा किया जा रहा है, और सरकार से बातचीत के बाद उनके रवैये में नरमी भी आई है!! (Reference: NDTV )]

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