Thursday, July 24, 2014

क्यों जरूरी है पूँजीवाद-सम्राज्यवाद पोषित हिंसा-उत्पीड़न और समाज में हो रहे हर अपराध का विरोध??



"Against every injustice"

आज-कल सूचना के अनेक माध्यम हमारे सामने हैं और सभी माध्यमों से हमें लगातार खबरें मिल रही हैं कि पूरी दुनिया के कई हिस्सों में हिंसा-बमबारी-बलात्कार जैसी अनेक घटनाओं में मासूम लोगों की हत्याएँ हो रही हैं। कुछ लोग इन नृंशक घटनाओं के बारे में थोड़ा-बहुत सोच भी रहे हैं, लेकिन ज्यादातर लोग इनके बारे में उदासीन हैं। उनके लिये यह सभी घटनायें मात्र एक खबर से अधिक महत्व नहीं रखतीं। इसी तरह के कई लोग, जो सिर्फ गप्पबाजी और खोखली बातों के सिवाय कभी अपने सुविधा के घोसले से एक पैर भी बाहर नहीं निकालते, सोसल मीडिया पर बिन माँग सुझाव दे रहे हैं और स्वघोषित उपदेशक बनने का प्रयास कर रहे हैं। इनकी चर्चा आगे करेंगे। ऐसे लोगों के लिये क्या कहा जाये। यह कबूतरों की तरह हैं जो घरों के जंगलों और चारदीवारी में घोंसले बनाकर रहते हैं, उन्हें क्या पता कि आसमान से दुनिया कैसी दिखती है और वहां से कितने नये आयामों को देखा जा सकता है, वे तो इसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। कई लोग जो अनजाने में कबूतर बने हुये हैं, उनके साथ सभी को सहानुभूति रखनी चाहिये और कोशिश करनी चाहिये कि वे चाहरदीवारी से बाहर निकल कर दुनिया की सच्चाई को देख सकें, लेकिन जान-बूझ कर ऐसा सोचने वालों के बारे में तो एक ही बात कही जा सकती है कि मूर्खता, संवेदनहीनता और बेशर्मी की भी हद होती है!!
इसी बीच गाजा-पट्टी पर जारी हिंसा की घटनाओं पर खबरें आ रही हैं कि इस्राइली बमबारी में हो रही फिलिस्तीनी नागरिकों की हत्याओं के विरुद्ध यू.एन. में लाये गये जाँच प्रस्ताव में भारत ने भी ब्रिक्स देशों के साथ इस्राइल के खिलाफ जाँच के समर्थन में वोट किया हैं (देखें - यहाँ)। (इस खबर को सुनकर कई गैर-सेक्युलर लोग अपने पुराने स्टैण्ड पर शर्मिन्दा जरूर हो रहे होंगे!!)
पिछले कुछ दिनों से गाज़ा पट्टी में बच्चों और नागरिकों की बमबारी में हत्या के खिलाफ लगातार पूरी दुनिया के जनपक्षधर नागरिकों-बुद्धिजीनियों द्वारा प्रदर्शन किये जा रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे लोग भी हैं जो कोई पुरानी घटना को लेकर दूसरों को "सुझाव" दे रहे हैं कि, "इन लोगों को देश की इतनी समस्याएँ नहीं दिखतीं, हमें उनपर पहले बोलना चाहिये बाद में दुनिया के बारे में सोचना चाहिये..."। अब इन कुंएँ के मेंढकों को कौन यह समझाये कि देश के हर कोने में आम जनता की समस्याओं के प्रति लगातार अनेक विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उन्हें इसके बारे में कुछ ख़बर नहीं है तो इसके लिये उन्हें अपनी जानकारी के दायरे और सीमा के बारे में खुद सोचना चाहिये कि अब तक उनकी आँखें बन्द क्यों हैं? ऐसी सोच रखने वाले लोग पहले देश के बाहर हो रहे अन्याय से मुँह चुराते हैं, फिर अपने राज्य के बाहर होने वाले अन्याय से भी जी चुराने लगते हैं, फिर अपने शहर या गाँव के बाहर होने वाले अन्याय से भी यह कह कर मुँह मोंड़ लेते हैं कि यह उनके घर में थोड़े ही हुआ है, और फिर घर में घुस जाते हैं!! और अन्त में जब सामाजिक अन्याय का असर ऐसी मानसिकता वाले लोगों के घरों के अन्दर तक पहुँचने लगता है तब वे खुद शर्म से मुँह छुपाने की जगह ढूँढ़ते दिखते हैं!!
24 जुलाई की कारपोरेट मीडिया की खबरों के अनुसार इस्राइल के सैन्य हमलों में पिछले दो दिनों से हर घण्टे एक बच्चा मारा जा रहा है, और अब तक कुल 720 से अधिक मारे जा चुके हैं जिनमें 150 से ज्यादा मासूम बच्चे और महिलायें तथा निहत्थे नागरिक हैं, जबकि इस्राइल के कुल 27 सैनिक हमलों में मरे हैं। इन आंकड़ों से कोई भी अन्दाज लगा सकता है कि कौन हत्यायें कर रहा है और कौन अपना बचाव। क्या इस्राइल इन निहत्थे लोगों से अपना बचाव कर रहा है, या मासूम बच्चों को मार कर हमास का बदला ले रहा है? सैन्य युद्ध तो हथियारों और सैनिकों या आतंकियों से लड़े जाते हैं, निहत्थे बच्चों और महिलाओं से तो नहीं। और यदि कोई बच्चों-महिलाओं की इन हत्याओं का समर्थन करता है तो यह शर्मनाक होगा। लेकिन पूरी कार्पोरेट मीडिया में ऐसा प्रकट करने की कोशिश की जा रही है कि इस्राइल अपनी आत्मरक्षा के लिये बच्चों-महिलाओं की हत्या कर रहा है!!
इसी के बीच अज-कल महिलाओं के विरुद्ध लगातार हो रही हिंसा की कई घटनाओं और पितृसत्तात्मक मूल्यों के विरुद्ध देश के कई स्थानों पर लगातार प्रदर्शन किये जा रहे हैं, और पिछले कई सालों से महिला-विरोधी मानसिकता के खिलाफ लगातार जनता के बीच से कई लोग खड़े होते रहे हैं, और सांस्कृतिक रूप से पूरे समाज में प्रचार किया जाता रहा है। अब इन "खोखले" उपदेश देने वाले लोगों को, जिनमें से कई खुद भी महिलाविरोधी मानसिकता वाले हैं, उन्हें कैसे समझाया जाये कि वे कितनी अज्ञानता में जी रहे हैं, कि उन्हें पूरे देश और दुनिया में जो भी प्रगतिशील घटित हो रहा है उसके बारे में कुछ भी नहीं पता। उनकी जानकारी का स्रोत तो टीवी और अखबार हैं, जो पैसे वालों के हाथ में उनके हिसाब से खबरों का प्रसारण करते हैं।
गाजा की घटना पर चुप्पी साधे और दूसरों को उपदेश देने वाले कुछ लोगों का तो यह भी कहना है कि मुसलमान जेहाद के नाम पर कई देशों में आतंक फैला रहे हैं, या मुसलमानों ने किसी देश में दूसरे धर्म के लोगों के प्रति भी कभी (यहाँ पर यह लोग तोड़ मरोड़ कर आधे-अधूरे इतिहास का हवाला भी देने की कोशिश करते हैं!!) हिंसा की थी इसलिये वे विरोध नहीं करेंगे। लेकिन इनके इस तर्क के पीछे सोच क्या है, उसपर हमें सोचने की जरूरत हैं। क्या यह लोग सोचते हैं कि आतंकवादी कुछ लोग या कुछ संगठन नहीं बल्कि पूरी कौम होती है? यदि कोई ऐसा सोचता है तो यह बड़ी ही बर्बर, गैर-जिम्मेदाराना और असंवेदनशील सोच है जो किसी भी सामाज के लिये बड़ी खतरनाक है। कोई भी इंसान चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो, यदि वह अपना धर्म और जाति देख कर किसी अन्याय का विरोध करता है तो उसकी स्थिति बड़ी सोचनीय है, ऐसे  विचारों की व्यापक स्तर पर आलोचना की जानी चाहिये। चाहे किसी भी धर्म या जाति या कौम के विरुद्ध कोई अन्याय कहीं भी हो रहा होहर एक व्यक्ति को उसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिये।
यदि एक देश-क्षेत्र या दौर में किसी जाति के  कुछ लोग या कुछ संगठन (सत्ता में हों या सत्ता के बाहर) आतंकवाद फैला रहे हैं या रहे थे, तो इसके आधार पर कोई भी इंसाफ़पसन्द व्यक्ति उसी जाति के मासूम बच्चों और नागरिकों का किसी  दूसरे देश, क्षेत्र या दौर में किसी और जाति के द्वारा किये जा रहे नरसंहार के विरोध से मना नहीं कर सकता।  ऐसी सोच के बारे में राहुल संकृत्यायन के यह शब्द बिल्कुल अनुकूल हैं कि मजहब तो है सिखाता आपस में बैर करना, और आज-कल कई कूपमण्डूक लोग राहुल इस कथन को सही सिद्ध करने में काफी सक्रियता से हिस्सा ले रहे हैं!!
इतिहास को देखा जाये तो हर जाति और धर्म में कुछ लोग, कभी सत्ता में होते हुये तो कभी सत्ता से  बाहर रहकर बेगुनाहों को मारते रहे हैं, जिसका सबसे भयानक उदाहरण है नाजी फासिस्टों द्वारा याहूदियों का नरसंहार। अलग-अलग देशों में भी इसी तरह एक जाति द्वारा दूसरी जाति के लोगों के खिलाफ धार्मिक-जातीय हिंसात्मक कार्यवाहियाँ की जाती रही हैं, और आज भी हो रहा है। जातीय या या धार्मिक हिंसा के पीछे मुख्य कारण क्या थे इनके बारे में विस्तार से समझने की जरूरत हैं, जो इस छोटी टिप्पणी में नहीं दिया जा सकता। यहाँ हम अपना विषय अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना क्यों जरूरी है तक ही सीमित रखेंगे। इन सभी घटनाओं का विस्तृत अध्ययन करने के लिये जरूरी है कि  इनके पीछे मौजूद वर्गीय शक्तियों का विश्लेषम किया जाये और सम्राज्यवादी-पूँजीवादी  ताकतों के मंसूबों और वर्ग हितों को मेहनतकश जनता के सामने उजागर किया जाये। वर्गों में बंटे  दुनिया में कोई भी राजनीतिक घटना वर्ग हितों से स्वतन्त्र नहीं हो सकती।
यह सिर्फ भारत की बात नहीं है, बल्कि पूरी  दुनिया के किसी भी देश में यदि अल्पसंख्यकों के प्रति धर्म-जाति-सम्प्रदाय के नाम पर  हिंसा होती है तो हर जन-पक्षधर इंसान को उसका विरोध करना चाहिये। मानवीय अधिकारों के समर्थक सभी लोगों को फासिस्टों, सम्राज्यवादी सेनाओं या आतंकवादियों द्वारा निर्दोष लोगों  की धर्म या युद्ध के नाम पर जो हत्याएँ की जा रही हैं  उन सभी का हर स्तर पर विरोध करना  चाहिये| यह जरूरी है - और इसी कड़ी में गाजा में निर्दोष फिलिस्तीनी नागरिकों की  हत्या का भी विरोध जरूरी है, साथ ही अपने तात्कालिक समाज की बात करें तो लगातार बढ़ रही महिला विरोधी हिंसा और अपराधों की हर एक घटना का सड़कों पर विरोध और पितृसत्तात्मक मूल्यों को चुनौती दी जानी चाहिये।
अभी कुछ लोगों ने कश्मीरी पण्डितों या तमिलों के विरुद्ध हुई हिंसा का विरोध करने का सवाल उठाया था, तो ऐसे लोगों से मेरा कहना यही है कि इसका भी हर सम्भव विरोध जरूरी था और आज भी है। और इस तरह की घटनाओं में सिर्फ हिन्दुओं को ही नहीं बल्कि मुसलमानो, सिखों, इसाइयों या याहूदियों सभी को विरोध करने के लिये आगे आना चाहिये।
किसी भी धर्म की हर ऐसी कट्टरपन्थी-मानवद्वेशी ताकतों का विरोध किया जाना चाहिये जो लोगों को आपस में जाति या धर्म के नाम पर बाँट कर पूँजीवीवादी-सम्राज्यवादी लूट के प्रति लोगों को उदासीन बनाने का काम करती हैं। फिर चाहे वह महिलाओं के प्रति पुरुषवादी नजरिये तथा आपराधिक गतिविधियों के तहत होने वाली हिंसा हो, गाजा में मासूम लोगों की बमबारी में हो रही हत्या हो, शिया-सुन्नी के नाम पर आतंकवादियों द्वारा धर्म के नाम पर की जाने वाली हिंसा हो, या किसी भी देश तथा क्षेत्र में अल्पसंख्यकों के प्रति बहुसंख्यकों द्वारा होने वाला अन्याय हो।  हर स्थिति में सही  स्टैण्ड यही है कि बेगुनाह लोगों के प्रति होने वाली हर प्रकार की  हिंसा का खुला विरोध किया जाये चाहे वह किसी भी देश, जाति, धर्म या समुदाय के प्रति  हो।  इसके लिये लोगों को धर्मों-जातियों से ऊपर उठकर एक वर्ग भावना के साथ हर सामाजिक अन्याय के विरुद्ध  अपनी आवाजें उठानी होंगी। 


कुछ स्रोत –
1. India Backs Anti-Israel Vote: Can't Support Violation of International Norms, Say Sources
All India | Edited by Deepshikha Ghosh | Updated: July 24, 2014 11:03 IST

2. Israel bans radio advert listing names of children killed in Gaza
Human rights group B'Tselem will petition Israel's supreme court after advert was deemed to be 'politically controversial'

3. Scientists, doctors write an open letter condemning violence in Gaza
“Israel’s behaviour has insulted our humanity, intelligence, and dignity as well as our professional ethics and efforts. Even those of us who want to go and help are unable to reach Gaza due to the blockade. This “defensive aggression” of unlimited duration, extent, and intensity must be stopped.”
“We are appalled by the military onslaught on civilians in Gaza under the guise of punishing terrorists. This is the third large scale military assault on Gaza since 2008. Each time the death toll is borne mainly by innocent people in Gaza, especially women and children under the unacceptable pretext of Israel eradicating political parties and resistance to the occupation and siege they impose.”

4. Stephen Hawking joins academic boycott of Israel

Friday, July 4, 2014

मुनाफा केन्द्रित समाज में जनता के संघर्ष और उसके जीवन स्तर का सवाल

"किसी भी समाज में मेहनतकश जनता का जीवन स्तर उस समाज के संघर्ष के इतिहास से निर्धारित होता है"
-कार्ल मार्क्स
[अज-कल के दौर में सभी काम करने वालों के सोचने के लिये जरूरी बिन्दु]
 
(From : www.desaarts.com)
संघर्ष के इस तथ्य के इर्द-गिर्द समाज का आर्थिक सामाजिक अवलोकन करने पर इन शब्दों का वास्तविक अर्थ समझा जा सकता है। इस सामान्य निरीक्षण में हम यह मानकर चलेंगे कि हमें यह पता है कि पूँजीवादी उत्पादन का आधार मज़दूरों के शोषण पर खड़ा होता है, और पूँजीवाद में वर्ग संघर्ष का अर्थ है कि मज़दूर अपना वेतन बढ़ाने के लिए और पूँजीपति अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए एक दूसरे से लगातार संघर्ष करते है (For detail visit: Here)। और मज़दूर यूनियन बनाकर लगातार इस संघर्ष को मजबूत करने का प्रयास करते है, जबकि पूँजीपति यूनियन न बन सके इसके लिए अनेक हथकंडे अपनाते हैं।
आगे बढ़ने से पहले इस संघर्ष से जनता के समाजिक जीवन स्तर पर पड़ने वाले प्रभाव को देखना होगा, जो यह समझने में मदद करेगा कि किसी समाज के वर्ग संघर्ष का इतिहास उसके पूरे मेहनतकश वर्ग के सामाजिक जीवन स्तर को किस प्रकार प्रभावित करता है। यदि पूँजीवादी जनतंत्र में मज़दूर और पूँजीपति के बीच चलने वाले संघर्ष को लें, जिसमें मज़दूरों को अपने ट्रेड यूनियन बनाकर हड़ताल करके दबाव बनाने का संवैधानिक अधिकार दिया जाता है, ('मज़दूरी, दाम और मुनाफा' लेख के नोट्स...)
1. मज़दूर अपका वेतन बढ़बाने के लिए हड़ताल करते हैं ताकि वे एक बेहतर जीवन स्तर पा सकें... या कहना चाहिए.. कि वे दूसरे दिन काम पर आने से पहले अपने श्रम का पुनर्उत्पादन थोड़ी अच्छी जीवन पर्स्थितियों में कर सकें।
2. और मान लें कि इस संघर्ष में मज़दूरों का वेतन बढ़ जाता है, तो वह अपनी बड़ी हुई कमाई को खाने और रोजमर्रा की वस्तुओं पर खर्च करेगा जिससे इन वस्तुओं की माँग बढ़ेगी और परिणाम स्वरूप बाज़ार में समान्य उपयोग की वस्तुओं की माँग बढ़ जाएगी।
4. इसी के सथ मज़दूरी बढ़ने से पूँजापति का हिस्सा घटेगा और उसका मुनाफा कम होगा,
5. मुनाफा कम होने से उनकी विलासिता मे खर्च होने वाले धन की मात्रा भी कम होगी, जिससे विलासिता के उत्पादों की माँग घटेगी,
3. सामान्य वस्तुओं की मांग बढ़ने के कारण उनका दाम कुछ समय के लिए बढ़ेगा,
4. विलासिता की वस्तुओं की माँग घटने से और सामान्य बस्तुओं की माँग बढ़ने से सामान्य वस्तुओं के उत्पादन में निवेश भी बढ़ेगा जिससे उनका दाम फिर कम हो जाएगा और सामान्य स्तर के आसपास बढ़ता-घटता रहेंगा।
5. अंतता विलासिता के सामान के उत्पादन में निवेस कम होगा और मज़दूरी बढ़ने के कारण मेहनतकश जनता का का जीवन स्तर बढ़ेगा जो अन्य पूँजीपतियों पर भी उसी जीवन स्तर के अनुशार वेतन देने का दबाब वनाएगा और अब उत्पादन का ज्यादा हिस्सा मज़दूर वर्ग को मिलेने लगेगा।
और यही उस कथन की व्याख्या है कि किसी भी समाज में जनता का जीवन स्तर उसके इतिहास के वर्ग संघर्ष पर निर्भर करता है, जिसके प्रत्यक्ष उदाहरण यूरोप और अमेरिका, और भारत जैसे देश है जिनमें संघर्षों का इतिहाश अलग-अलग होने के कारण जनता के जीवन स्तर में जमीन ओर आसमान का प्रत्यक्ष अन्तर दिखता है। एक तरफ अमेरिका की गरीबी रेखा का स्तर प्रति माह $1000 की आमदनी है, और भारत में गरीबी रेखा के लिए आवश्यक आमदनी लगभग $20 (900 रु) है; जबकि पूँजीपति वर्ग और सत्ताधारी पर्टियों के नेताओं के जीवन स्तर पर खर्च भारत में अमेरिका से अधिक ही होगा (Ref: America Statics, Indian Statics)
इसके साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पूँजीवादी जनतंत्र में सम्पत्ति के माध्यम से राज्य सत्ता के नियंत्रण में होने के कारण पूँजीपति पूजीवाद के स्वभाविक संचय से पैदा होने वाले संकट के समय में अनेक मज़दूरों को बेरोज़गारी और गरीबी में धकेलता रहता है । पूँजी के विश्वव्यापी इज़ारेदारी (Monopoly) के वर्तमान युग में पूँजीपति वर्ग इतना सक्षम है कि वह मज़दूरों को गुमराह करके, कानून बनाकर, बल प्रयोग करके, मज़दूरों के संगठन को तोड़कर और उनके बीच से उनके दलालों को खरीदकर श्रम पर पूँजी का अधिनायकत्व लगातार बनाए रखता है।
इस प्रकार मजदूरों को असंगठित रखकर पूँजीपति वर्ग पूँजी संचय की प्रक्रिया को जारी रखता है, और उत्पादन को लगातार केन्द्रत करता जाता है और अपने समर्थन का आधार तैयार करने के लिए, मध्य और उच्च वर्ग के बाजार में बेंचने के लिए, लगातार विलासिता के सामान का उत्पादन को बढ़ाता है, मज़दूरों के शोषण से पैदा होने वाले मुनाफे को इन विलसिता के उत्पादों के प्रचार में खर्च करता हैं जिसके तहत कोई उत्पादन न करने बाले अनेक श्रम के परजीवी पैदा होते हैं और मज़दूरों का शोषण लगातार बढ़ता है। पूरे समाज में मज़दूरो और पूँजीपतियों के जीवन स्तर का फ़ासला भी लगातार बढ़ता है। हम उदाहरण देख सकते हैं कि भारत जैसे राष्ट्र में एक तरफ करोड़पतियों की संख्या लगातार बढ़ रही है ओर दूसरी और बेरोजगारी और गरीबी के कारण जनता का सापेक्ष जीवन स्तर लगातार नीचे होता जा रहा है।
1990 में लागू निजीकरण और उदारीकरण की नीतियाँ को इसी प्रकार समझा जा सकता है, जिनके तहत श्रम कानूनों को ढीला करके पूरे मज़दूर वर्ग को (93 फीसदी) एक असंगठित क्षेत्र में ठेकाकरण के कामों में धकेल कर इस वर्ग संघर्ष को कुचलने का पूरा प्रयास किया गया, जो आज भी देशी और विदेशी पूँजीपतियों के लिए मुनाफे के लिए विश्व स्तर पर मज़दूरों के तीक्ष्ण शोषण को बरकरार रखने में लगा है।

इस पूरी प्रक्रिया की रोशनी में देखने पर यह तो सभी को समझ में आ जाता है कि 1990 के बाद अपनाई गईं निजीकरण-उदारीकरण की नीतियाँ और श्रम कानूनों को कमजोर करने की चाल ने पूरे देश के ज्यादातर मज़दूरों को असंगठित क्षेत्र में धकेल दिया और उनके संगठनो को कमजोर बना दिया या मज़दूरों की ट्रेड यूनियनों के नेताओं को अपना दलाल बनाकर उन्हे असंगठित क्षेत्र के मड़दूरों से अलग कर दिया, और जिसका परिणाम है कि आज भारत की कुल मज़दूर आवादी का 93 फीसदी असंगठित है। यदि यह न किया गया होता तो मज़दूर संघर्ष के माध्यम से उत्पादन में मेहनतकश जनता का हिस्सा ज्यादा होता और कुछ मुठ्ठी भर लोगों को बहुमत के शोषण से मिलने वाली विलासिता पर भी नियंत्रण होता; और सरकार गरीबों का मज़ाक भी न उड़ा पाती। जबकि जनतंत्र में सभी सुविधायें जैसे चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार और आवास तो हर व्यक्ति का अधिकार होने चाहिए और राज्या की जिम्मेदारी होनी चाहिए, लेकिन वर्तमान समय में समाज के चुने हुए शासक सिर्फ एक गरीबी रेखा बनाकर पूँजीपतियों की सेवा में लगे रहना चाहते है और जनता छुपे रहना चाहते हैं।
ऐसे में समाज की पूरी व्यवस्था को जो मशीनों, उत्पादन और वितरण के चारो ओर बनीं हुई है उसकी वैज्ञानिक समझ को हर एक तक पहुँचाने के बाद ही किसी बेहतर समाज के निर्माण की बात सोची जा सकती है। और, क्योंकि पूँजीवाद स्वयं लगातार जनता को बदहाली में धकेलकर अपनी स्वभाविक रूप से अपनी तबाही की ओर बढ़ रहा है, इसलिए इसका समाधान सिर्फ एक ऐसी उत्पादन व्यवस्था के निर्माण में निहित है जिसमें उत्पादन के उपकरण जनता के नियंत्रण में हों और उत्पादन मुनाफे के लिए नहीं बल्कि आवश्यकता के लिए हो। यह सिर्फ तभी सम्भव है जब शोषित उत्पीड़ित जनता की सामूहिक सामाजिक चेतना को पूँजीवाद की सच्चाई का प्रत्यक्ष भण्डाफोड़ करते हुए विकशित किया जाए और उन्हे शिक्षित किया जाए कि वे अपने जनवादी अधिकारों के बारे में जागरूक हो सकें और उनको पाने के लिए संघर्ष कर सकें।
साम्राज्यवाद की भूमंडलीकरण की वर्तमान अवस्था मे यह पूँजीवादी व्यवस्था की सच्चाई है जिसको विस्तार से समझने के लिए कुछ-एक पुस्तकें पढ़नीं पड़ेंगी इसलिए आपको सोचने के लिए यहीं पर छोड़ कर लेख को समाप्त करना होगा...

Saturday, June 28, 2014

अग्नि-दीक्षा (How The Steel Was Tempered) उपन्यास के लेखक और क्रान्तिकारी निकोलाई आस्त्रोविश्की की पुस्तक ‘जय जीवन’ के कुछ हिस्से


सोवियत यूनियन में महान समाजवादी निर्माण के दौर में आस्त्रोविश्की अथक मेहनत करते हुये अपनी बीमारी के कारण विस्तर से उठ भी नहीं सकते थे उस समय कुछ और न कर पाने की स्थिति में अग्नि-दीक्षा उपन्यास लिख रहे है। आस्त्रोविश्की (29 Sep 1904 – 22 Dec 1936) (Nikolai Astrovishki) के शब्दों में,
यदि इन्सान के पास-पड़ोस की जिन्द़गी भयावनी और उदास हो, तो वह अपने निजी सुख की शरण लेता है। उसकी खुशी सारी की सारी अपने परिवार में केन्द्रित रहती है – अर्थात् केवल व्यक्तिगत रुचियों के घेरे में रहती है। जब ऐसा हो, तो कोई भी निजी दुर्भाग्य (जैसे बीमारी, नौकरी छुट जाना इत्यादि) उसके जीवन में विषम संकट पैदा कर देता है। उस आदमी के लिए जीवन के कोई लक्ष्य नहीं रहता। वह एक मोमबत्ती की तरह बुझ जाता है। उसके सामने कोई लक्ष्य नहीं जिसके लिये वह प्रयास करे, क्योंकि उसके लक्ष्य केवल निजी जिन्द़गी तक सीमित होते हैं। उसके बाहर, उसके घर की चारदीवारी के बाहर, एक क्रूर जगत् बस रहा होता है। जिसमें सभी दुश्मन हैं। पूँजीवाद जान-बूझकर शत्रुता और विरोधाभाव का पोषण करता है। वह भयाकुल रहता है कि कहीं काम करने वाले लोक एकता न कर लें।
 मैं अपने आस-पास के लोगों को देखता हूँ – बैलों की तरह हस्ट-पुस्ट मगर मछलियों की तरह उनकी रगों में ठण्डा खून बहता है – निद्राग्रस्त, उदासीन, शिथिल, ऊबे हुए। उनकी बातों से कब्र की मिट्टी की बू आती है। मैं उनसे घ्रणा करता हूँ। मैं समझ नहीं सकता कि किस तरह स्वस्थ और तगड़े लोग, आज के उत्तेजनापूर्ण ज़माने में ऊब सकते हैं।...
कई लोग हैं जो केवल जिन्दाभर रहने से ही सन्तुष्ट हैं, केवल यही चाहते हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा देर तक जिन्दगी से चिपके रहें, और अपनी यथार्थ स्थिति पर आंखें मूँदे रहें।
कुछ वर्ष पहले एसी स्थिति को सहन करने मेरे लिये आसान था। उस समय मैं भी उसे उसी तरह झेलता जैसे अधिकांश लोग झेलते हैं। पर अब स्थिति बदल गई है।
कुछ लोग अपने रोग का इलाज आराम द्वारा करते हैं, और कुछ लोग काम द्वारा।
“Man's dearest possession is life. It is given to him but once, and he must live it so as to feel no torturing regrets for wasted years, never know the burning shame of a mean and petty past; so live that, dying he might say: all my life, all my strength were given to the finest cause in all the world- the fight for the Liberation of Mankind.”

Wednesday, June 11, 2014

"Let's try and avoid death in small doses" - Pablo Neruda

"Slow Death" by Pablo Neruda

He who becomes the slave of habit,
who follows the same routes every day,
who never changes pace,
who does not risk and change the color of his clothes,
who does not speak and does not experience,
dies slowly.
 
He or she who shuns passion,
who prefers black on white,
dotting ones "its" rather than a bundle of emotions, 
the kind that make your eyes glimmer,
that turn a yawn into a smile,
that make the heart pound in the face of mistakes and feelings,
dies slowly.
 
He or she who does not turn things topsy-turvy,
who is unhappy at work,
who does not risk certainty for uncertainty,
to thus follow a dream,
those who do not forego sound advice at least once in their lives,
die slowly.
 
He who does not travel, who does not read,
who does not listen to music,
who does not find grace in himself,
she who does not find grace in herself,
dies slowly.
 
He who slowly destroys his own self-esteem,
who does not allow himself to be helped,
who spends days on end complaining about his own bad luck, 
about the rain that never stops,
dies slowly.
 
He or she who abandon a project before starting it, 
who fail to ask questions on subjects he doesn't know, 
he or she who don't reply when they are asked something they do know,
die slowly.
 
Let's try and avoid death in small doses,
reminding oneself that being alive requires an effort far greater than 
the simple fact of breathing.
 
Only a burning patience will lead
to the attainment of a splendid happiness. 

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