Monday, February 17, 2014

केजरीवाल का "भ्रष्टाचार" मुक्त पूँजीवाद . . .

केजरीवाल ने कहा है कि वह पूँजीवाद के खिलाफ बिल्कुल नहीं हैं, सिर्फ "क्रोनी" पूँजीवाद के खिलाफ हैं। लेकिन चाहे क्रोनी पूँजीवाद हो या स्वतंत्र प्रतियोगिता वाला भलापूँजीवाद, दोनों ही स्थिति में शोषण हमेशा मज़दूरों को ही झेलना पड़ेगा, जो देश की सबसे व्यापक आबादी हैं।
केजरीवाल ने कहा है, "he is 'not against capitalism but against crony capitalism.'" he want to govern to "providing security, justice and a corruption-free administration." further he says, "policies have to be made on a proactive basis that encourage, rather than discourage business" [http://zeenews.india.com/news/nation/aap-against-crony-capitalism-says-arvind-kejriwal-at-cii_912057.html]
केजरीवाल की बात माने तो, अगर एक सिपाही जो 100 रुपया घूस माँगता है (जो उसकी बिना काम की कमाई होगी) तो वह भ्रष्ट है, लेकिन अगर कोई पूँजीपति अपनी पूँजी लगाकर "ईमानदारी" से अनेक मज़दूरों की मेहनत पर खुद बिना कोई काम किये अरबों रूपया कमाता है, तो यह भ्रष्टाचार नहीं है। ऐसा लगता है कि केजरीवाल पूँजी को काफी अहमियत देते हैं, और पूँजी के सामने मेहनत को बहुत ही तुच्छ समझते हैं!
केजरीवाल की माने तो मुनाफा केन्द्रित उत्पादन सम्बन्धों पर खड़ी पूँजीवादी व्यवस्था के अलावा और कोई विकल्प हमारे सामने नहीं है?? यानि पूँजीवाद ही आर्थिक-सामाजिक (अ)व्यवस्था का अंतिम सत्य है, इसके सिवाय और कोई विकल्प नहीं हो सकता??? यानि, आने वाली सभी पीड़ियों में पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धों पर आधारित समाज ही रहेगा, जहाँ कुछ लोग अपने मुनाफे के लिये दूसरों से काम करबाके उनका शोषण करते रहेंगे...
ऐसे में पूँजी लगाकर काम किये बिना अरबों की सम्पत्ति कमाने और दूसरों की मेहनत पर अय्याशी करने वाले सभी देशी-विदेशी बैंकर-उद्योगपति-ठेकेदार केजरीवाल का शुक्रिया किये बिना नहीं रह रहे होंगे। क्योकि काम करने वाली आम जनता को पूँजीवाद के बारे में भ्रमित करने का इससे (केजरीवाल के भले रूप से) बेहतर माध्यम और कोई नहीं हो सकता था।
अब बीजेपी और कांग्रेस की नीतियों और श्री केजरीवाल की नीतियों मे किस आधार पर अन्तर किया जाए ? ?
कोई नवउदारवादी नीतियों को लागू करने की बात करता है, और कोई स्वतन्त्र पूँजीवाद की बात करता है, और दोनों ही मेहनत करने वाले लोगों को भ्रमित करके पूँजीवाद को मैनेज करने का काम करते हैं। लेकिन पूँजीवाद के विकल्प की बात कोई गलती से भी नहीं करता, न ही मेहनत करने वालों के शोषण को रोकने की कोई बात करता है, ज्यादा से ज्यादा खैरात बाँटने के बायदे कर देते हैं...
यही है श्री केजरीवाल का स्वराजऔर जनता का राज”??
एक बहुत पुरानी कहावत है कि बगुला अगर हंस बनने की कोशिश करे तो ज्यादा दिन छुपा नहीं रह सकता, उसकी सच्चाई सामने आ ही जाती है.
अन्दर से तो सारे एक जैसे ही हैं.

Thursday, December 19, 2013

विशेषाधिकारों के हनन और मूल अधिकारों के हनन पर कुछ ज़रूरी सवाल "?"

"हर युग के शासक विचार शासक वर्ग के विचार होते हैं, यानी जो वर्ग समाज की शासक भौतिक शक्ति है, वही समाज की शासक बौद्धिक शक्ति भी होता है। जिस वर्ग के पास भौतिक उत्पादन के साधन होते हैं, वही मानसिक उत्पादन के साधनों पर भी नियन्त्रण रखता है, जिसके नतीजे के तौर पर, आम तौर पर कहें तो वे लोग जिनके पास मानसिक उत्पादन के साधन नहीं होते हैं, वेशासक वर्ग के अधीन हो जाते हैं।" -कार्ल मार्क्स
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आज कई दिनों से कई अख़बारों में एक मुख्य खबर आ रही है कि अमेरिका में एक भारतीय राजदूत के साथ किये गये अपमान के जबाब में कड़ी कार्यवाही की माँग की जा रही है। ऐसा लग रहा है कि पूरा देश इस अपमान का बदला लेना चाहता है। खैर दूसरे देश में विशेषाधिकार प्राप्त देश के किसी नागरिक के अपमान का सवाल उठाया जा सकता है, जिसकी चर्चा विशेष लोग कर ही रहे हैं। लेकिन इस घटना का आम लोगों के सामने अपना एक अलग महत्व भी है जिसकी चर्चा हमें करनें की आवश्यकता है।
बुर्जुआ समाज में आम लोगों को यह अहसास दिलाने का प्रयास किया जाता है कि पूरी दुनिया के पूँजीवादी राष्ट्रों के बीच कुछ कानून बने हैं, और यह यह अत्यन्त स्वाभाविक है कि एसे में समाज के कुछ लोगों को विशेषाधिकार प्राप्त हैं। और यदि इन विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के विशेष अधिकारों पर किसी भी रूप में थोड़ी भी गड़बड़ होती है, तो आम लोगों को, जिन्हें कोई विशेष अधिकार नहीं हैं, जो हर दिन जद्दोजहद करने के बाद भी आराम से जीने के अधिकार से वंचित हैं, उन्हें भी इन विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के विशेष अधिकारों की रक्षा के लिये प्रोटेस्ट करना चाहिये।
कई लोग कहते हैं कि यदि किसी दूसरे देश द्वारा देश के एक विशेष व्यक्ति के अधिकारों का हनन होता है तो यह पूरे देश का अपमान है, और पूरे देश में सबसे बड़ी संख्या आम लोगों की होती है। परन्तु फिर एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है, जिसकी तरफ विशेषाधिकारों के इन्हीं रक्षकों का कोई ध्यान नहीं जाता, कि कई विदेशी कम्पनियाँ हमारे देश में ही आकर यहाँ के देशी विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के साध मिलकर यहाँ के आम लोगों से गुलामों की तरह काम लेती हैं, और कई क़ानूनों का उल्लंघन करती हैं, जो कि आम लोगों के लिये देश में ही बने होते हैं। लेकिन फिर लोगों को यह अहसास दिलाया जाता है कि यदि विदेशी कम्पनियाँ देश में आकर आम आदमी को निचोड़ भी लें, तब भी कोई खास चिन्ता की बात नहीं है। क्योंकि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में मुनाफ़ा कमाने का सभी को अधिकार मिला हुआ है। दूसरू ओर यदि एक विशेषाधिकार प्राप्त इंसान को विदेश में उसके अपराध की भी सजा दे दी जाए तो विशेषाधिकार प्राप्त लोग ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं कि इस अपमान के विरोध में उन आम लोगों को भी अपनी आवाज़ उठानी चाहिये जो अपने ही देश में कई अपमान झेलते हुये जी रहे हैं। जैसे बेरोज़गारी, गरीबी, रोज़गार की अनिश्चितता के कारण किसी भी शर्त पर काम करने की मज़बूरी, खुद देशी प्रशासन द्वारा कहीं भी और कभी भी मार-पीट से लेकर बिना कई तरह की आम-अधिकार हनन की कार्यवाहियाँ (इसके भी कई उदाहरण हैं, जिनमें से एक मारुति के मज़दूरों के साथ पुलिस द्वारा की गईं कार्यवाहियों की पूरी रिपोर्ट PUDR ने दी हुई है, शोषण का पहिया, जून 2013)।
इन सभी घटनाओं पर सभी लोग काफी शान्त रहते हैं। भले ही आम लोगों के कई आम अधिकारों का भी हर रोज हनन होता रहता हो, भले भी आम लोगों के जनवादी अधिकार तो दूर आम नागरिक अधिकार भी छीन लिये जाते हों, लेकिन सत्ताधारी लोग कभी इसके ऊपर कोई टिप्पणी तक नहीं करते और मीडिया के कानों में कोई आहट तक नहीं होती। इसके अनेक उदाहरण हैं, जैसे भोपाल गैस कांड के शिकार लोगों का न्याय, AFSPA के तहत लोगों के जनवादी अधिकारों का हनन।
विशेष और आम लोगों के लिये बने कानून और अधिकारों के मामले में अमल करने का यह विरोधाभास हमारे सामने वर्तमान पूँजीवादी, अमानवतावादी और गैर-जनवादी संस्क्रति तथा समाज में व्याप्त असमानता को वैध ठहराने की गलत कोशिश का आभास कराता है।

किसी के अधिकारों की सुरक्षा करना किसी भी राष्ट्र की ज़िम्मेदारी है, और यह होना भी चाहिये। लेकिन पूरे बुर्जुआ समाज में न्याय और अधिकारों की यह भावना सिर्फ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों तक ही क्यों सीमित रह जाती है, और सरकार, मीडिया या अन्य विशेषाधिकार प्रप्त लोग कभी आम लोगों के मूल अधिकारों तक के हनन का कभी कोई जबाब नहीं माँगते। ना ही कभी कोई नेता इसके विरुद्ध कोई आवाज़ उठाता है। और तो और, आम लोगों के बीच भी यह अहसास पैदा करने की कोशिश की जाती है कि आम लोगों के मूल अधिकारों का भी उतना महत्व नहीं है जितना कि खास लोगों के खाश अधिकारों का, इसलिये उसपर समय जाया करने की आवश्यकता नहीं है।
क्या यही होता है जनता का राज, और ऐसा ही होता है जनतन्त्र?? यह दूरगामी सवाल हैं, जिसपर सोचते रहने के साथ ही नहीं अमल करने की भी आवश्यकता है।

Wednesday, November 6, 2013

भारत का मंगल मिशन और आम लोगों के कुछ सवाल

किसी वैज्ञानिक खोज का महत्व और उसका प्रभाव केवल उसके सामाजिक महत्व पर निर्भर करता है
- डी.डी. कोसाम्बी
कल भारत के वैज्ञानिकों ने मंगल गृह पर एक उपग्रह भेजा जिसे हर जगह एक ऐतिहासिक घटना माना गया है। कहा जा रहा है कि यह कई  नये खगोलीय आयामों की खोज  के लिए देश के वैज्ञानिकों को आत्म निर्भर बनाने की और एक कदम है। हर जगह टीवी और अखबार में यह सुनने को मिल रहा रहा है। वैज्ञानिकों के लिए वास्तव में यह एक ऐतिहासिक घटना है। इसलिये इसके टेक्नीकल पक्ष पर बात नहीं करेंगे, क्योंकि टीवी देखकर सभी को समझ में आ गया होगा कि इस मिशन के क्या तकनीकि फायदे होने वाले हैं।
बल्कि हम कुछ ऐसे सवालों पर बात करेंगे जो देश के आम लोगों के दिमाग में उठ रहे हैं। और यह सवाल भी बिल्कुल जायज हैं। कल एक टीवी चैनेल पर और आज सुबह कुछ अखबारों ने कार्टून बनाकर जनता के इन सवालों को एक अभिव्यक्ति देने की कोशिश की है। ख़ैर कार्टून से कितनी अभिव्यक्ति हो सकती है इसे समझा जा सकता है!! सवाल यह नहीं है, जैसा कि कई लोग सोचते हैं, कि इस मिशन के लिए जो पैसा खर्च किया गया है वह कहीं और लगाया जाना चाहिए था, या यह मिशन होना ही नहीं चाहिए था, यह कहना दकियानूसी सोच होगी। हर वैज्ञानिक खोज का अपना महत्व होता है। वैसे भी हमारे देश में सम्पत्ति की कोई कमी नहीं है, यहाँ बड़ी मात्रा में सम्पत्ति तो मन्दिकों और मठों में बेकार पड़ी है, जिसे यदि जब्त कर लिया जाये तो विशालकाय परियोजनाएँ खड़ी की जा सकती हैं।
लेकिन, एक आम गरीब आदमीं के मन में, जो इस मिशन के फायदों के बारें में कुछ  खास नहीं जनता, और न ही उसके जीवन पर इसका कोई खास फर्क पड़ने वाला है, क्योंकि पता नहीं कितने उपग्रह मिशन देश के वैज्ञानिक प्रक्षेपित कर चुके हैं, लेकिन उसकी हालत वैसी की वैसी ही है। ऐसे में  हर आम इंसान के दिमाग में सवाल उठता है कि अगर विज्ञान  इतनी तरक्की कर चुका  है, और इतना सक्षम हो चुका  है कि दूसरे ग्रह पर पानी की खोज करने के लिये यान भेजे जा रहे हैं, तो देश के इतने लोगों कि जीवन की स्थिति इतनी ख़राब क्यों हैक्यों आज भी करोड़ों लोग अशिक्षित हैं, क्यों आज भी देश की व्यापक आबादी को 12 से 16 घण्टे काम करना पड़ता है, क्यों आज भी चिकित्सा के बिना कई लोग मर रहे हैं, और क्यों अनेक स्थानों पर लोगों से गुलामों कि तरह दबाव बनाकर काम  करवाया जा रहा है?? यह सवाल वैज्ञानिकों और पूँजीवादी शासकों के दिमाग में नहीं उठते इसलिये आम लोगों के दिमाग में इनका उठना लाज़मी है। सारे  रिफरेन्स यहाँ  नहीं दे रहा हूँ, यदि कोई विस्तार से जनता कि स्थिति को समझना चाहता है तो लिंक देखें
सामान्य स्थिति में जब लोगों से यह कहा जाता है कि अर्थव्यवस्था ख़राब है इसलिए उनकी हालत ख़राब है, तो एक बार वे इस झूठ पर विश्वास कर लेते हैं, लेकिन जब वह देखते हैं कि विज्ञान की मदद से क्या-क्या हो रहा है तो उनके दिमाग में फिर से वह सवाल उठ  खड़ा होता है, कि उन्हें एक भ्रम में रखा जा रहा है, वास्तव में हर व्यक्ति को जीने के सभी साधन आसानी से मिल सकते हैं, और यह बहुत आसानी से हो सकता है, लेकिन वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था में न तो यह सम्भव ही है, और न ही यह कभी ऐसा कर ही सकती है।
ऐसे में यह सवाल  उठाना बैहद ज़रूरी है। जिससे कम से कम लोगों में यह भ्रम तो ना रहे कि उनकी हालत किसी कमी के कारण या इंसानों की नाकाबिलियत के कारण खराब है, बल्कि वह इसलिये ख़राब है क्योंकि समाज की सारी सम्पदा पर कुछ मुनाफ़ा निचोड़ने वाले लोगों का कब्ज़ा है, और जो इस व्यवस्था को चला रहे हैं वे भी मुनाफा केन्द्रित इस व्यवस्था को बदलना नहीं चाहते।
विज्ञान  को समझने वाले लोगों को इसके बारे में थोड़ा अपने दिमाग पर जोर डालने कि जरूरत है, कि क्या विज्ञान सिर्फ यही है, क्या खोजें सिर्फ मनोरंजन और आत्म-तुष्टि के लिए ही होती हैं, या इन खोजों और विज्ञान  के विकास का कोई सामाजिक उपयोग भी होना चाहिए। और जितनी वैज्ञानिक प्रगति आज हो चुकी है क्या उससे ऐसा नहीं लगता कि लोगों को बर्बादी में धकेल कर आज भी उल्लू ही बनाया जा रहा है, यह कह कर कि संसाधनों कि कमीं है इसलिए उनकी हालत ख़राब है??
वास्तव में वर्तमान विज्ञान पूँजीवादी व्यवस्था के हितों के अनुरूप विकास कर रहा है, यह जनता के हितों के अनुरूप हो भी नहीं सकता। इस संकीर्ण दायरे से वैज्ञानिक प्रगति को तभी मुक्त किया जा सकता है जब राजनीतिक सत्ता का स्वरूप बदलेगा और समाज के आर्थिक सम्बन्धों को रूपान्तरित कर दिया जाएगा। तब तक यह सवाल लोगों के दिमाग में उठते रहेंगे।
महान वैज्ञानिक https://mail.google.com/mail/u/0/images/cleardot.gifडी डी कोशाम्बी ने लिखा है (नोट: अनुवाद न हो सकने के कारण इसे अंग्रेजी में ही डाल रहा हूँ, सटीक अनुवाद होते ही अपडेट कर दिया जाएगा),
“The weight, the significance of a scientific discovery depends solely upon its importance to society. A discovery made before it is socially necessary gains no weight and social necessity is often dependent for its recognition upon the class in power.
Only in science planned for the benefit of all mankind, not for bacteriological, atomic, psychological or other mass warfare can the scientist be really free. He belongs to the forefront of that great tradition by which mankind raised itself above the beasts, first gathering and storing, then growing its own food; finding sources of energy outside its muscular efforts in the taming of fire, harnessing animals, winds, water, electricity, and the atomic nucleus. But if he serves the class that grows food scientifically and then dumps it in the Ocean while millions starve all over the world, if he believes that the world is over-populated and the atom-bomb a blessing that will perpetuate his own comfort, he is moving in a retrograde orbit, on a level no beast could achieve, a level below that of a tribal witch-doctor.
“Science is also a social development; that the scientific method is not eternal and that science came into being only when the new class structure of the society made it necessary.”
(P.53-55, Science and Freedom, Exasperating Essays, by DD.Kosambi, PPH Ltd.)

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