Friday, March 22, 2013

भगतसिंह और उनके साथी क्रांतिकारियों के विचारों की सान पर . . .


भगतसिंह (28 सितम्बर 1907 - 23 मार्च 1931)
शहीदों के सपनों को याद करते हुए!
भगतसिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों द्वारा भारत की आज़ादी के संघर्ष के दौरान इस्तेमाल किये गये यह दो शब्द आज भी हर न्यायप्रिय इंसान की आत्मा को झकझोर देते हैं। इन शहीदों के यह शब्द हमें सोचने के लिये मजबूर करते हैं कि आज आज़ादी के 66 साल बाद भी हर तरफ़ मौज़ूद बेकारी, गै़र-बराबरी और ग़रीबी का क्या कारण है? और हमारे सामने एक सवाल खड़ा हो जाता है कि इन शहीदों के सपने क्या थे और वे समाज और आज़ादी के बारे में क्या सोचते थे? भगसिंह को ज़्यादातर लोग असेम्बली में बम फेंकने वाले एक जोशली क्रान्तिकारी नौजवान के रूप में तो जानते हैं, लेकिन एक विचारक के रूप में लोग उन्हें नहीं जानते। उनके विचार, उनके सिद्धान्त आज भी ज़्यादातर लोगों के लिये अनजान हैं। असेम्बली में बम फेंकने के बाद जेल में रहते हुये भगतसिंह और उनके साथियों ने अनेक पुस्तकों का अध्ययन कियाइस दौरान भगतसिंह ने कई महत्वपूर्ण लेख लिखे जो 1986 में प्रकाशित किये गये। इन लेखों में भगतसिंह के क्रान्ति और समाज के निर्माण के बारे में उनके सारे मत बिल्कुल स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। जेल में रहकर अध्ययन करते हुये भगत सिंह वैज्ञानिक समाजवाद को अपना चुके थे और अपने अन्तिम दिनों में रूसी क्रान्तिकारी नेता लेनिन का जीवन परिचय पढ़ रहे थे। वह सोवियत यूनियन में हुई समाजवादी सर्वहारा क्रान्ति से अत्यधिक प्रभावित थे। इसका अन्दाज़ा जेल से उनके द्वारा लिखे गये एक पत्र से लगाया जा सकता है, "लेनिन-दिवस के अवसर पर हम सोवियत रूस में हो रहे महान अनुभव और साथी लेनिन की सफलता को आगे बढ़ाने के लिये अपनी दिली मुबारक़बाद भेजते हैं। हम अपने को विश्व-क्रान्तिकारी आन्दोलन से जोड़ना चाहते हैं। मज़दूर राज की जीत हो।"
भगतसिंह और उनके साथी कैसी आज़ादी की बात कर रहे थे और कैसा समाज चाहते थे उसकी एक झलक अदालत में दिये गये उनके इस बयान में भी देखने को मिलती है,
"क्रांति से हमारा अभिप्रय है अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।

समाज का मुख्य अंग होते हुये भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिये मुहताज हैं। दुनियाभर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढकनेभर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा-सी बातों के लिये लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।

यह भयानक असमानता और ज़बरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनियाँ को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिये जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक का़यम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।

सभ्यता का यह प्रसाद यदि समय रहते सँभाला न गया तो शीघ्र ही चरमराकर बैठ जायेगा। देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। और जो लोग इस बात को महसूस करते हैं उनका कर्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धान्तों पर समाज का पुनर्निर्माण करें। जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जिसे साम्राज्यवाद कहते हैं, समाप्त नहीं कर दिया जाता तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असम्भव है...।"
व्यवस्था में जिस आमूल परिवर्तन की बात भगतसिंह कर रहे थे उसका अर्थ था एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण जहाँ एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के शोषण को असम्भव बना दिया जाये। वह एक ऐसे समाज के निर्माण का सपना देख रहे थे जहाँ सारे सम्बन्ध समानता पर आधारित हों और हर व्यक्ति को उसकी मेहनत का पूरा हक़ मिले। इसी क्रम में उस समय सत्ता हस्तानान्तरण हस्तान्तरण के लिये बेचैन और जनता की स्वत:स्फूर्त शक्ति को अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिये इस्तेमाल कर रही कांग्रेस के बारे में भगतसिंह का कहना था कि सत्ता हस्तानान्तरण से दलित-उत्पीड़ि‍त जनता के जीवन में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा जब तक एक देश द्वारा दूसरे देश और एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के शोषण का समर्थन करने वाली व्यवस्था को ध्वस्त करके एक समानतावादी व्यवस्था की नींव नहीं रखी जायेगी। उनका मानना था कि तब तक मेहनतकश जनता का संघर्ष चलता रहेता। आज 66 साल के पूँजीवादी शासन में लगातार बढ़ रही जनता की बदहाली और शोषण अत्याचारों की घटनाओं से भगतसिंह की बातें सही सिद्ध हो चुकी है। भगत सिंह और उनके साथियों ने फाँसी से तीन दिन पहले 20 मार्च 1931 को गवर्नर को लिखे गए पत्र में कहा था, "यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने (भारतीय) जनता और श्रमिकों की आय पर अपना एकाधिकार कर रखा है चाहे एसे व्यक्ति अंग्रेज पूँजीपति और अंग्रेज या सर्वथा भारतीय ही हों, उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है। चाहे शुद्ध भारतीय पूँजीपतियों द्वारा ही निर्धनों का खू़न चूसा जा रहा हो तो भी इस स्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता।"
भगतसिंह मज़दूरों के क्रान्तिकारी संघर्ष के मार्क्सवादी सिद्धान्त के क़रीब पहुँच चुके थे और उन्होंने एक संगठित मज़दूर आन्दोलन के माध्यम से क्रान्तिकारी परिवर्तन के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का नौजवानों से आह्वान किया था। 19 अक्टूबर 1929 को जेल से विद्यार्थियों के नाम लिखे गये अपने पत्र में भगतसिंह ने कहा था, "नौजवानों को क्रान्ति का यह सन्देश देश के कोने-कोने में पहुँचाना है, फ़ैक्‍ट्री-कारखानों के क्षेत्रों में, गन्दी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रान्ति की अलख जगानी होगी जिससे आज़ादी आयेगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा।" वह सिर्फ़ साम्राज्यवादी शोषण का ही विरोध नहीं करते थे, बल्कि उनका मानना था कि जब तक समाज असमानता पर खड़ा रहेगा तब तक मेहनतकश जनता की स्थिति नहीं बदल सकती, "स्वतन्त्रता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। श्रमिक वर्ग ही समाज का वास्तविक पोषक है, जनता की सर्वोपरि सत्ता की स्थापना श्रमिक वर्ग का अन्तिम लक्ष्य है।"
भगतसिंह ने अपने सभी विचारों में व्यवस्था परिवर्तन और आर्थिक एवं राजनीतिक क्रान्ति खड़ी करने के लिये जनता को जागरुक करने और मेहनकश वर्ग को संगठित करने के लिये वर्ग-चेतना के विकास पर जोर दिया था। भगतसिंह के शब्दों में, "संगठनबद्ध हो जाओ। स्वयं कोशिशें किये बिना कुछ भी न मिल सकेगा। संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दो।... यह पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी का असली करण है। तुम असली सर्वहारा हो... संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ हानि न होगी। बस गु़लामी की जंज़ीरें कट जायेंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बग़ावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होने वाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आन्दोलन से क्रान्ति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रान्ति के लिये कमर कस लो। तुम ही देश के मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो..."
सत्ता हथियाने के लिये लोगों को जाति और धर्म के नाम पर आपस में लड़ा कर अपना राजनीतिक फ़ायदा उठाने वाले लोगों का भी भगतसिंह ने खुला विरोध किया है। आपने आरम्भिक दिनों में लिखे गये लेख 'अछूत का सवाल' और जेल में अपने अन्तिम दिनों में लिखे गये 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' लेख में भगतसिंह ने असमानता का पक्ष पोषण करने वाली अनेक धार्मिक कुरीतियों तथा और जातीय असमानताओं तथा छुआ-छूत का खुलकर विरोध किया। ग़रीब मेहनतकश जनता को उनकी बदहाली के बारे में बेख़बर रखने के लिये धर्म और जाति का भ्रम फैलाने वाली सम्प्रदायिक ताक़तों और शोषण सम्बन्धों तथा मालिकों के हितों की हिफ़ाजत करने वाली राजनीति के बारे में भगतसिंह ने सीधे कहा था, "लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की ज़रूरत है। ग़रीब मेहनतकशों और किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़कर कुछ न करना चाहिए। ... कलकत्ते के दंगों में एक बात बहुत ख़ुशी की सुनने में आयी। वह यह कि वहाँ दंगों में ट्रेड यूनियनों के मज़दूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े फोरम से क़ारख़ानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्ग-चेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है। 1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है, इसमें दूसरे का कोई दख़ल नहीं। न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए, क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता।"
जिस तरह मज़दूरों और किसानों को जातियों और धर्मों के नाम पर बाँटा जाता है, और उनकी एकजुट ताक़त को कमज़ोर किया जाता रहा है, वह वास्तव में पूँजीवादी सत्ता की मदद करता है जो कि पूँजी के हितों पर आपस में मज़दूरों के विरुद्ध एकजुट होते हैं। एक ओर सच्चाई यह है कि पूरे देश के हर जाति और हर धर्म के मज़दूरों की सबसे बड़ी आबादी एक जैसी स्थिति में काम करने के लिये मजबूर है, एक जैसी स्थिति में मज़दूर बस्तियों में रहती है। ऐसे में जाति और धर्म की पुरानी कुरीतियाँ टूट रही हैं, लेकिन अभी भी कई जगह मालिक और पूँजीपतियों के दलाल नेता हिन्दू-मुसलमान, बिहार-महाराष्ट्र या ऊँची और नीची जाति जैसे जनविरोधी नारे लगाकर मज़दूरों की ताक़त को कमज़ोर करने में सफल हो जाते हैं। व्यवस्था परिवर्तन के लिये क्रान्ति का जो आह्वान भगतसिंह ने किया था उसका उद्धेश्य था हर प्रकार के शोषण को अन्त करना और हर असमानता सूचक और लोगों के बीच भेदभाव करने वाली धार्मिक और जातीय रूढ़ियो का समाज से समूल नाश करना, और इनके आधार पर किये जाने वाले साम्प्रदायिक जाति-छुआछूत-शोषण जैसी हर चीज का अन्त करना। भगतसिंह ने कहा था, "धार्मिक अन्धविश्वास और कट्टरपन हमारी प्रगति में बहुत बड़े बाधक हैं। वे हमारे रास्ते के रोड़े साबित हुए हैं और हमें उनसे हर हालत में छुटकारा पा लेना चाहिये। 'जो चीज़ आज़ाद विचारों को बरदाश्त नहीं कर सकती उसे समाप्त हो जाना चाहिए।' इस काम के लिये सभी समुदायों के क्रन्तिकारी उत्साह वाले नौजवानों की आवश्यकता है।"
धार्मिक कट्टरपन्थी राजनीति का विरोध करने के साथ ही भगतसिंह सामाजिक मूल्यों में व्याप्त धर्म  के यथास्थितिवादी और भाग्यवादी विचारों एवं स्वर्ग-नर्क जैसे अन्धविश्वासों का भी विरोध करते थे। भगतसिंह का कहना था, "धर्म का रास्ता अकर्मण्यता का रास्ता है, सब कुछ भगवान के सहारे छोड़ हाथ पे हाथ रखकर बैठ जाने का रास्ता है, निष्काम कर्म की आड़ में भाग्यवाद की घुट्टी पिला कर देश के नौजवानों को सुलानें का रास्ता। मैं इस जगत को मिथ्या नहीं मनाता। मेरे लिए इस धरती को छोड़ कर न कोई दूसरी दुनिया है न स्वर्ग। आज थोड़े-से व्यक्तियों ने अपने स्वार्थ के लिए इस धरती को नरक बना डाला है। शोषकों तथा दूसरों को गु़लाम रखने वालो को समाप्त कर हमें इस पवित्र भूमि पर फिर से स्वर्ग की स्थापना करनी पड़ेगी।"
आज जहाँ एक ओर देश की अर्थव्यवस्था लगातार उछाल पर है वहीं दूसरी ओर देश की 80 फ़ीसदी मेहनत-मज़दूरी करने वाली आबादी बेरोज़ग़ारी और घोर शोषण की हालत में जीने के लिये मजबूर है और देश की 77 फ़ीसदी आबादी रोजाना 20 रुपयों से भी कम आमदनी पर जी रही है। वर्तमान पूँजीवादी सत्ता द्वारा लगातार ठेकाकरण को बढ़ावा देने और श्रम का़नूनों को तिलांजलि देने के बाद आज पूरे देश की 93 फ़ीसदी मज़दूर आबादी बिना किसी श्रम क़ानून के ठेके पर काम कर रही है। ऐसी स्थिति में मज़दूरों के शोषण की नींव पर खड़ी वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था को चुनौती देने के लिये भगतसिंह के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि तब थे जब कि भारत ब्रिटेन का उपनिवेश था। भगतसिंह का नाम आज भी भारत के हर कोने में जनता पर होने वाले जुल्म-अन्याय और शोषण के विरुद्ध जनता की आवाज़ का उसी स्तर पर प्रतिनिधित्व करता है जितना की तब करता था। यही कारण है कि आज कई दशाब्दियाँ बीत जाने के बाद भी वर्तमान सत्ता उनके विचारों को जनता की नज़रों से छुपाकर रखने के पूरे प्रयास करती है। और इसी डर से उस समय सत्ता पर क़ाबिज़ साम्राज्यवादी सत्ता और सत्ता हस्तानान्तरण की माँग कर रही कांग्रेस भी पूरे देश में बढ़ रहे उनके विचारों से घबरा गई थी।
अन्त में भगत सिंह के शब्दों में, "जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिये एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रूरत होती है, अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है।... लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को ग़लत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इन्सान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिये यह ज़रूरी है कि क्रान्ति की स्पिरिट ताज़ा की जाये, ताकि इन्सानियत की रूह में हरकत पैदा हो।
"... क्रांति मानवजाति का जन्मजात अधिकार है जिसका अपहरण नहीं किया जा सकता।... प्रगति के समर्थक प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह पुराने विश्वास से सम्बन्धित हर बात की आलोचना करे, उसमें अविश्वास करे और उसे चुनौती दे।... निर्माण के लिए ध्वंस ज़रूरी ही नहीं, अनिवार्य है।"

Sunday, March 10, 2013

भारत में लगातार चौड़ी होती असमानता की खाई और जनता की बर्बादी की कीमत पर हो रहे विकास पर एक नज़र ! !


अनेक आंकड़ों, तथ्यों और मन्त्रियों-नेताओं के बयानों को सुन और देख कर कोई भी यह सोच सकता है कि भारत काफ़ी तेज गति से विकास के ट्रेक पर आगे बढ़ता चला जा रहा है, और एकता तथा अखण्डता की एक मिसाल प्रस्तुत कर रहा है। लेकिन जब असलियत पर नज़र जाती है तो विकास की सच्ची तस्वीर सामने आ जाती है जो पानी के एक बुलबुले की तरह है जहाँ करोड़ों लोगों के जीवन की बर्बादी की कीमत पर कुछ लोगों को विकास के साथ सारे ऐशों आराम के साधन उपलब्ध कराये जा रहे हैं।
अन्तर्राष्ट्रीय पूँजीवादी-साम्राज्यवादी वैश्वीकरण नीतियों के अनुरूप योजनायें बनाते हुये भारत की सरकार ने पिछले 20 सालों से देश के बाज़ार को वैश्विक बाज़ार के लिये लगातार अधिक खुला बनाया है, और पूँजी के खुले प्रवाह के लिये निवेश में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियों को लागू किया है। इन नीतियों को लागू करने के लिये श्रम कानूनों को लगातार लचीला बनाने के नाम पर मज़दूरों के सभी अधिकारों की एक-एक कर तितांजलि दे दी गई है। इस "विकास" को हासिल करने के लिये सरकार नीतियाँ में फेरबदल करते हुये देशी-विदेशी व्यापारिक संस्थाओं और उद्योगपतियों को कई प्रकार की सब्सिडी मुहैया करवाती है और कई तरह की छूटे देती है। इन नीतियों के लागू करने का परिणाम यह है कि आज नौजवानों में बेरोज़गारी चरम सीमा पर है, मज़दूरों की और ज़्यादा दुर्गति हुई है, जनता के कष्ट और बढ़े हैं, गरीबों को और अधिक गरीबी में धकेल दिया गया है, और पूरे देश के स्तर पर किसानों में आत्महत्यों का सिलसिला आनवतर जारी रहा है।
विकास और उन्नति के नाम पर लागू की जा रहीं इन नीतियों के परिणामस्वरूप स्थिति यह है कि देश के कुल 46 करोड़ मज़दूर आबादी में से 93 प्रतिशत, अर्थात 43 करोड़ मज़दूरों को असंगठित क्षेत्र में धकेल दिया गया है, जहा वे बिना किसी कानूनी सुरक्षा के गुलामों जैसी परिस्थितियों में काम करने के लिये मज़बूर हैं (जबकि यह आंकड़ा 2007 का है)। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार इस पूरे परिवर्तन के दौरान देश में अमीरों-गरीबों के बीच असमानता दो-गुना बड़ चुकी है। और ऊपर के 10 प्रतिशत लोगों की आय नीचले स्तर पर जीने वाले 10 प्रतिशत लोगों की आय से 12 गुना अधिक है, जो कि बीस साल पहले 6 गुना थी। इसी के साथ शहरी अमीरों और ग्रमीण अमीरों के बीच भी असमानता मौज़ूद है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार शहरों में रहने वाले अमीर ग्रामीण अमीरों से 221 प्रतिशत अधिक खर्च करते हैं। विकास के चलते जनता की दुर्गति का सिलसिला यहीं नहीं थमता। एक सरकारी आंकड़े के अनुसार देश में हर एक घण्टे में दो लोग आत्महत्या करते हैं, जिसमें आदिवासी, महिलाओं और दलितों से सम्बन्धित आंकड़े शामिल नहीं हैं, इसके साध ही देश की 15 से 49 साल की महिलाओं की मौत का एक सबसे बड़ा कारण है आत्महत्या। इसी साल मार्च में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार जनता को मिलने वाली स्वास्थ सुविधाओं के मामले में भारत पड़ोसी देशों श्रीलंका, बग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल से भी खराब स्थिति में है। इसके बावज़ूद भारत दुनिया में स्वास्थ सुविधाओं पर सबसे कम खर्च करने वाले देशों में से एक है। (India in healthcare hall of shame, ranked worst peers and neighbours, टाइम्स आफ इण्डिया, Mar 5, 2013)
एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की 45 करोड़ जनता गरीबी रेखा के नीचे जी रही है, जिसका अर्थ है कि यह आबादी भुखमरी ही कगार पर बस किसी तरह जिन्दा हैं। इन गरीबों की प्रति दिन की आय 12 रु से भी कम होती है। इतनी आमदनी मे कोई मूलभूत सुविधा तो बहुत दूर की बात है, बल्कि एक व्यक्ति को किसी तरह सिर्फ जीन्दा बने रहने के लिये भी संघर्ष करना पड़ता है, और वह भी तब जब यह मान लिया जाये कि वह व्यक्ति कभी बीमार नहीं पड़ेगा और जानवरों की तरह सभी मौसम बर्दाश्त कर लेगा!
एक तरफ गरीबी लगातार बड़ रही है, वहीं दूसरी ओर समाज के एक छोटे हिस्सें का प्रतिनिधित्व करने वाले उद्योगपतियों, लोकसभा के सदस्यों, न्यायपालिका में काम करने वाले लोगों, नेताओं, सरकारी अधिकारियों और बाबुओं के घरों में पैसों के अम्बार (कानूनी और गैर कानूनी सभी श्रोतों से) लगातार ऊँचे होते जा रहे हैं। आम जनता की इस बर्बादी के बीच दूसरी तरफ भारत "तरक्की" भी कर रहा है! 120 करोड़ आबादी वाले भारत के पूँजीवादी जनतन्त्र में 100 सबसे अमीर लोगों की कुल सम्पत्ति पूरे देश के कुल वार्षिक उत्पादन के एक चौथाई के बराबर है। फोर्ब्स पत्रिका द्वारा जारी की गई दुनिया के 61 देशों में अरबपतियों की संख्या की एक सूची में भारत चौथे नम्बर पर है। भारत के इन अरबपतियों की कुल सम्पत्ति 250 अरब है, जिसकी तुलना में जर्मनी और जापान के अमीर अरबपतियों को गरीब माना जा सकता है। इन अरबपतियों के साथ ही भारत में दो लाख करोड़पति भी हैं जो बड़ी-बड़ी कम्पनियों, बैंकों और शेयर-बाजार को "मैनेज" करने का काम करते हैं।
देश में उपभोग करने वाली एक छोटी आबादी को चकाचौध में डूबाने के लिये और अमेरिका-जापान से लेकर यूरोप तक पूरी दुनिया की पूँजी को मुनाफ़े का बेहतर बाज़ार उपलब्ध करवाने के लिये जनता के कई अधिकारों को छीन लिया गया है। इसके कई उदाहरण आज हमारे सामने हैं कि जगह-जगह शोषण-उत्पीणन के विरुद्ध और अपने जनवादी अधिकारों के लिये होने वाले मज़दूर आन्दोलनों और जन-आन्दोलनों के माध्यम से उठने वाली जनता की आवाज को दबाने के लिये पुलिस-प्रशासन का इस्तेमाल अब खुले रूप में किया जाने लगा है। कश्मीर से लेकर देश के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में जनता के ऊपर सैन्य शासन के साथ ही अब मज़दूर इलाकों में भी मालिकों के कहने पर पुलिस जब चाहे फ़ासीवादी तरीके से मज़दूरों का दमन करती है और उनमें आतंक फैलाती है। यह सब इसलिये किया जाता है जिससे देश के कुछ अमीरों को जनता की बदहाली और शोषण के बदले में "विकास" की चमक-दमक और सुख-सुविधाओं के उपभोग के लिये एक "सुरक्षित माहौल" दिया जा सके!
इकोनामिक टाइम्स के अनुसार विकास की दौड़ में मध्यवर्ग की एक खाई-अघाई आबादी भी शामिल है, जो 16 करोड़ यानि कुल आबादी का 13.1 प्रतिशत हिस्सा है (इकोनामिक टाइम्स 6/2/2011)। मध्यवर्ग का यह हिस्सा विश्व पूँजीवादी कम्पनियों को अनेक विलासिता के सामानों को बेंचने के लिये एक बड़ा बाज़ार मुहैया कराता है। समाज का यह हिस्सा अमानवीय स्थिति तक माल अन्ध भक्ति का शिकार है, जिसमें टीवी और अखबारों में दिखाये जाने वाले विज्ञापन उन्हें कूपमण्डूक बनाने की कोई कशर नहीं छोड़ते। करोड़ों मेहनत करने वाले लोगों के खून पसीने से पैदा होने वाले सामानों पर ऐश करने वाले समाज के इस हिस्से को देश की 80 प्रतिशत जनता की गरीबी और बर्बादी तथा दमन-उत्पीड़न से कोई खास फर्क नहीं पड़ता, बल्कि यह समाज के दबे कुचले हिस्से को देश की प्रगति में बाधा मानता है। इसी मध्यवर्ग को अपने माल के एक बाज़ार के रूप में देखते हुये अमरीकी और यूरोपीय उद्योगपति बड़ी खुशी के साथ इसकी व्याख्या करते हैं कि यहाँ उनके उत्पादित माल और आटोमोबाइल के लिये एक बड़ा बाज़ार मौज़ूद है।
आगे कुछ और आँकड़ों पर नज़र डालने से असमानता और विकास की भयावह स्थिति और साफ़ हो जायेगी। युनीइटेड नेसन्स डेवलपमेण्ट प्रोग्राम ने मानवीय विकास सूचकांक में भारत को 146 देशों की सूची में 129 वें स्थान पर रखा गया है, जिसमें लिंग भेद के मानक भी शामिल हैं। ह्यूमन डेवलपमेण्ट रिपोर्ट में कहा गया है कि लगभग 30 साल पहले भारत की लोग बेहतर जीवन गुजारते थे। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार पिछले 30 सालों के अन्तराल में गरीबों की संख्या में कोई कमीं नहीं हुई है (इंडिया टुडे, 22-10-11)। भारत के ही सरकारी आंकड़े के अनुसार देश की 77 प्रतिशत जनता (लगभग 84 करोड़ लोग) गरीबी में जी रही है, जो प्रति दिन 20 रूपयों से भी कम पर अपना गुज़ारा करती है। हमारे देश में दुनिया के किसी भी हिस्से से अधिक, 46 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। भारत की एक तिहाई आबादी भूखमरी की शिकार है और यहाँ हर दूसरे बच्चे का वजन सामान्य से कम है और वह कुपोषण का शिकार है। ग्लोबल भूख सूचकांक के आधार पर बनी 88 देशों की सूची में भारत 73वें स्थान पर है जो पिछले साल से 6 स्थान नीचे है। 2012 के मल्टीडायमेसनल गरीबी सूचकांक के अनुशार बिहार, छत्तिशगढ़, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में 42 करोड़ लोग गरीबी के शिकार हैं।
एक संस्था ओ.ई.सी.डी. के अनुसार भारत की प्रगति का नतीजा जनता की बदहाली के रूप मे इस प्रकार है कि आज यहाँ पूरी दुनिया के सबसे अधिर ग़रीब लोग रहते हैं। यही बजह है कि जनता की मेहनत और समाज के संसाधनों को लूट के चलते कुछ अम्बानी जैसे कुछ लोग कई-कई मंजिला मकान बनाकर अपनी अमीरी का प्रदर्शन करने में भी कोई शर्म महसूस नहीं करते।
भारत के पूँजीवादी जनतन्त्र में हो रहे विकास की असली तस्वीर यही है, जहाँ जनता की बर्बादी और मेहनत करने वालों के अधिकारों को छीनकर देश के कुछ मुट्ठी भर उद्योगपतियों, अमीरों, नेताओं, सरकारी नौकरशाहों को आरामतलब जिन्दगी मुहैया कराई जा रही है, और देशी विदेशी पूँजीपतियों को मुनाफ़ा निचोड़ने के लिये खुली छूट दे दी गई है।  
इन परिस्थिति की जानकारी होते हुये कोई संजीदा व्यक्ति सामान्य जीवन जीना स्वीकार नहीं कर सकता। यह समय इन परिस्थितियों पर विचार करने का ही नहीं, बल्कि इनके कारणों को जड़ से समाप्त करने के लिये उठ खड़े होने का है। आज सिर्फ सोचना ही नहीं, बल्कि परिस्थितियों को बदलने के प्रयास भी करने होंगे जहाँ सही मायने में पूरी व्यवस्था पर जनता का नियंत्रण हो जिससे हर मेहनत करने वाले व्यक्ति को उसकी मेहनत का पूरा हक मिल सके।

Monday, February 11, 2013

इलाहाबाद में कुंभ स्नान के दौरान भगदड़: यह मेला श्रद्धा का संगम है या लोगों के बीच यथास्थितिवादी धार्मिक अन्धविश्वास को बढ़ावा देने का माध्यम


कुछ दिनों से ऐसा प्रचार किया जा रहा है कि इलाहाबाद में चल रहा कुंभ मेला दुनियाँ के सबसे बड़े धार्मिक समारोह का प्रतीक है जिसपर हमें गर्व करना चाहिये। कुछ लोग इसे काफी बढ़ा-चढ़ा कर इसकी प्रशंसा कर रहे हैं। कल कुम्भ के इसी "पवित्र" समारोह में तीन करोड़ लोगों ने संगम पर डुबकी लगाई। संगम पर इस "पवित्र स्नान" के बाद धार्मिक भावना से ओत प्रोत श्रद्धालु रेलवे स्टेशन पर पहुँचे, जहाँ भीड़ में भगदड़ मचने से 36 लोगों की मौत हो गई और कई घायल हैं।
36 लोगों की मौत हो जाना वास्तव में एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है। लेकिन यह घटना एक अन्य कारण से और भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है। और उस दूसरे दुर्भाग्यपूर्ण कारण के बारे में हर विचारशील व्यक्ति को सोचना होगा।
लोग इस मेले की बड़ी प्रशंसा कर रहे हैं। लेकिन एक बात हमें सोचनी चाहिये कि इस मेले में इतने लोग इकठ्ठे क्यों हुये। क्या यह कोई सामाजिक समारोह है, जहाँ सामाजिक भावना से लोग जमा होते हैं, या यह नदियों के प्रति लोगों की श्रद्धा का प्रतीक है, जिसके कारण लोग उनमें नहा कर अपनी श्रद्धा प्रकट करना चाहते हैं। इस दोनों कारणों पर कोई विमर्श करने से पहले एक तीसरे कारण पर बात करना ज़रूरी है, क्योंकि ज़्यादातर लोग इसी कारण से यहाँ जाते हैं।
यहाँ जाने वाले लोगों में जो लोग वर्तमान समाज में शोषित हैं, दलित-उत्पीड़ित हैं, और गरीबी में जी रहे हैं जिसके कारण वे दुखी हैं, वे इस अन्धविश्वासपूर्ण उम्मीद के साथ यहाँ पहुँचते हैं कि उनके जीवन में कुछ भला हो जायेगा। जैसा कि हम सभी को बचपन से हिन्दू धर्म की शिक्षा के अनुरूप पंडों-पुजारियों, टीवी के नाटकों, फिल्मों, और कई धार्मिक चैनलों के माध्यम से यह सिखाया और बताया जाता है कि किसी व्यक्ति विशेष की वर्तमान बदहाली का कारण उसके पुराने जन्मों के बुरे कर्म होते हैं। इसी के साथ यह भी बताया जाता है कि यदि कोई व्यक्ति संगम जैसी पवित्र (वैसे इस समय जितनी ग़न्दगी यहाँ होगी वह अंदाज़ लगाया जा सकता है) जगह पर कुंभ जैसे सु-अवसर पर (यह पवित्र क्यों है यह स्पष्ट नहीं बताया जाता) डुबकी लगायेगा तो उनके पुराने जन्म के कर्मों के सारे पाप धुल जायेंगे और स्वर्ग का सीधा रास्ता खुल जायेगा। लोगों को 'पिछले जन्म के पापों सो छुटकारा' और 'अगले जन्म में आराम का जीवन' पाने जैसे अन्धविश्वास के धार्मिक किस्से-कहानियों को इस स्तर तक लोगों के दिमाग में बिठाने की कोशिश की जाती है कि वे वर्तमान की अपनी बदहाली के बारे में कुछ देर के लिये भूल जाते हैं, और खुद को ही अपने पिछले जन्म के बुरे कर्मों के लिये दोषी मानने लगते हैं। ऐसे किस्से भी हमारे देश में प्रचारित किये जाते हैं कि मरने के बाद मोक्ष प्राप्त कर स्वर्ग में जाने के लिये कुम्भ में डुबकी लगाना अत्यंत आवश्यक है। इन सभी प्रवचनों में पिछले जन्म, अगले जन्म और मरने का बाद स्वर्ग की प्रप्ति पर अनेक विचार मौजूद हैं, लेकिन कहीं भी वर्तमान और इस जन्म की बदहाली से छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं बताया जाता।
खैर, यह तो समाज की सबसे बड़े हिस्से के बारे में बात हो गई जो गरीबी में जी रहा है। लेकिन मध्य-वर्ग के कुछ लोग, कुछ-एक छुटभैये ठेकेदार-दलाल-धूसखोर-मुनाफाखोर और छोटा-मोटा धन्धा करने वाले लोग यहाँ पहुँचते हैं जो सभी एक आराम का जीवन जीने में सक्षम हैं। इसका भी एक कारण है कि धर्म के प्रवचन हमें यह भी बताते हैं कि यहाँ पर डुबकी लगाने से लोगों के वर्तमान के सारे पाप (जो उन्होंने पूरी ज़िन्दगी में किये हैं) धुल जाते हैं। वर्तमान के इन पापों के धुलने से वर्तमान में व्यक्ति को क्या मिलता है यह नहीं बताया जाता! लेकिन यह बताया जाता है कि इसका फल अगले जन्म और मृत्यु के बाद अवश्य मिलता है। इसलिये किसी व्यक्ति ने अपने पूरे जीवन में कितने ही लोगों का शोषण किया हो, कितनी भी घूँस ली हो, उसकी व्यक्तिगत एशो-आराम के साधने जुटाने में कितने ही मेहनत करने वाले लोगों की जाने दाँव पर लगी हों, वह यदि एक बार स्नान कर लेता है तो मोक्ष प्राप्त करने का हक़दार बन जाता है! इसलिये समाज का एक वर्ग व्राह्मणों द्वारा निर्धारित पाप-पुण्य के सस्ते मानकों के अनुरूप मोक्ष की प्रप्ति के लिये यहाँ पहुँचता है।
कुछ लोग यह भी कह सकते हैं कि यह व्यक्तिगत श्रद्धा की बात हैं। लेकिन क्या हमें यह नहीं समझना और सोचना होगा कि इस प्रकार की व्यक्तिगत श्रद्धा का स्रोत क्या है। लोगों के विचारों में इस प्रकार की कूपमण्डूकता पूर्ण श्रद्धा क्यों घर करती है। उन्हें इस प्रकार की मानव-द्रोही बातें किसने सिखाईं कि उसकी खराब स्थिति का कारण उसके पुराने जन्म के बुरे कर्म हैं, न कि वर्तमान समाज की अमानवीय संरचना, जहाँ अनेक लोगों की मेहनत और बदहाली पर उनकी क़ब्रों पर कुछ मुठ्ठीभर सम्पत्ति के मालिक गुलछर्रे उड़ा रहे हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि यह एक सामाजिक समारोह है, लेकिन यहाँ पर जाने वाला कोई भी व्यक्ति सामूहिक भावना से नहीं जाता होगा। जहाँ तक मुझे लगता है यहाँ सारे लोग सिर्फ व्यक्तिगत भावनाओं और कामनाओं की पूर्ति के लिये ही जाते हैं। यहाँ जाने वाले लोगों का दूसरों से कोई लेना-देना नहीं होता। जैसा कि यहाँ रहने वाले अनेक बाबा और पण्डे सन्यास लेकर समाज से अलग कटकर गैर-सामाजिक व्यक्ति के रूप में रहते हैं। यहाँ तक कि एक ही परिवार के सारे लोग भी एक दूसरे के लिये नहीं बल्कि अपने-अपने पाप धोने और "अपने  मोक्ष" लिये ही यहाँ जाते हें। ऐसे में इसे सामाजिक समारोह कहना बिल्कुल गलत है। यह धार्मिक विचारों के माध्यम से समाज में फ़ैलाये गये व्यक्तिगत अन्धविश्वासों और लोगों की अज्ञनता का एक प्रदर्शन मात्र ही कहा जा सकता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण कल मची भगदड़ है जिसमें 36 लोगों की मौत भी हो गई।
यहाँ पहुँचने वाले "श्रद्धालुओं" में नदियों के प्रति भी कोई श्रद्धा नहीं होती। इसका अन्दाज़ इसी से लगाया जा सकता है कि इस पूरे मेले के दौरान नदियों के पानी में गंदगी फैलाने की प्रक्रिया काफी बढ़ जाती है।
इन दोनो ही तथ्यों से थोड़ा सा तर्क इस्तेमाल करने वाला कोई भी व्यक्ति यह अन्दाज़ लगा सकता है कि इस प्रकार के सारे विचारों और अन्धविश्वासों का प्रचार इसलिये किया जाता है कि लोगों का ध्यान उनकी वर्तमान समस्याओं और बदहाली से हटाया जा सके। इन ह्वासोन्मुख-प्रगति विरोधी विचारों का फ़ायदा किसे होगा यह भी हम आसानी से समझ सकते हैं, कि जिस देश में 77 प्रतिशत लोग 20 रुपये प्रतिदिन से भी कम पर अपना गुजारा करने के लिये मज़बूर हैं, और दूसरी ओर करोड़पतियों की सम्पत्ति हनुमान की पूँछ की तरह बढ़ती जा रही है, ऐसे में इसका फ़ायदा किसे होगा। क्या इससे देश की 77 प्रतिशत गरीब बदहाल मेहनतकश जनता को कोई फ़ायदा होगा? नहीं। इसका एकमात्र फ़ायदा दूसरों की मेहनत की लूट पर पलने वाले सम्पत्तिधारियों को होगा, जो सिर्फ सम्पत्ति के मालिक होने के कारण हर प्रकार की मेहनत से दूर बिना किसी श्रम के दूसरों की मेहनत के सहारे जी रहे हैं।
आगें बढ़ने से पहले एक बात हमें ध्यान रखनी होगी की इस प्रकार के अंधविश्वास सिर्फ हिन्दू धर्म के माध्यम से ही नहीं,  बल्कि हर धर्म के लोगों के बीच जहाँ जनता बदहाली दमन उत्पीडन और शोषण में जीने के लिए मजबूर है वहां के शक्तिशाली सम्पत्तिधारी वर्ग  के लोग और मुल्ला-पण्डे-पुजारी सामान वर्गीय स्थिति होने के कारण इस प्रकार के धार्मिक उपदेशों का  उपयोग लोगों को स्वर्ग की प्राप्ति या क़यामत के दिन न्याय जैसे अंधविश्वास के प्रचार के लिए करते हैं इस तरह के धार्मिक उन्मादों में भगदडों का यह एक सिर्फ  एक उदाहरण नहीं है, मुसलमानों के हज और हिन्दुओं के चार-धाम जैसी कई और तीर्थ यात्राओं में  ऐसा ही हो चुका है इसका एक उदाहरण है १२ जनवरी २००६ में हज यात्रा में भगदड़ में हुई ३४५ लोगों की मौत खैर हम यहाँ एन सभी घटनाओं के विस्तार में नहीं जा सकते लेकिन सभी धर्मों की अंतर्वस्तु एक सामान है जिसपर एक आलोचनात्मक द्रष्टिकोण अपनाने की आवशयकता है
यह सोचने का विषय है और यह समय अत्यन्त उपयुक्त और महत्त्वपूर्ण है, कि भारत की जनता के रग-रग में धार्मिक अन्धविश्वास को किस हद तक घुसाने की कोशिश की जा रहा है, और लोगों को उनकी बदहाली में बनाये रखने के लिये इस तरह का धार्मिक क्रियाकलापों को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है। आज यह भी समझना होगा कि धार्मिक अन्धविश्वास के यह क्रियाकलाप सीधे तौर पर वर्तमान सम्पत्ति आधारित समाज में लोगों की बदहाली और उनके शोषण के असली कारणों पर पर्दा डालने के लिये अत्यधिक उपयोगी हैं, जो सीधे तौर पर समाज के ऊपरी तबकों को राहत पहुँचाता है, और दलित-उत्पीड़ित जनता को संघर्ष करने या अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदलने का बारे में सोचने से बिमुख करता और यथास्थितिवादी सोच को बढ़ावा देते हैं।

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