Tuesday, January 24, 2012

भूखमरी और कुपोषण का मूल स्रोत: मुनाफ़ाखोर व्यवस्था का सच

कुछ दिन पहले भूख और कुपोषण पर नेशनल फाउन्डेसन (Hunger and Malnutrition (HUNGaMA) report by the Naandi Foundation) द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार भारत में पांच साल से कम उम्र के 42 प्रतिशत बच्चों का बजन सामान्य से कम है और वह कुपोषण के शिकार हैं (See point 4 at the end) प्रधानमंत्री ने इसपर "दुःख" प्रकट करते हुए कहा कि यह देश के लिए "शर्म" की बात है। पिछले दिनों यह खबर कई अखबारों में सुर्ख़ियों में रही और इस "शर्मनाक" सच्चाई पर कई बहसे होती रहीं।
लेकिन सवाल सिर्फ "दुःख" या "शर्म" का नहीं है!! मुख्य मुद्दा यह है कि कुपोषण और गरीबी से समाज में कौन प्रभावित है, और इसका कारण क्या है? स्कूलों में "मिड-डे मील" योजना को दुरुस्त करने के माध्यम से इस "समस्या का समाधान" करने की बात कहकर समस्या के मुख्य कारण से सभी का ध्यान भटकाने के लिए कुछ काल्पनिक कारणों को गढ़ा जाता है, और फिर उनकी रिपोर्टे बनाकर कुछ समाधान सुझा दिए जाते रहते हैं। यह काम एक लंबे समय से हो रहा है, और आज भी जारी है (इस रिपोर्ट में भी इस प्रकार का सुझाव दिया गया है) (See point 2 at the end)जिसका नतीजा यह सामने है कि 1990 के बाद देश में भूखे लोगों की संख्या के अमुपात में वृद्धि ही हुई है (See point 3 at the end)
अब कुछ आंकड़ो पर नज़र डालें तो उन्हें देखकर सच्चाई पर पड़ा हुआ पर्दा हट जाता है, जिसके अनुसार बच्चों के कुपोषण और नवजात शिशुओं की मृत्यु का मुख्य कारण उन्हें जन्म देने वाली माताओं में खून की कमीं और कुपोषण है (See point 2 at the end)। अब महिलाओं में कुपोषण का कारण जानने की कोशिश करें तो पता चलेगा कि यह ज्यादातर महिलायें, जो कुपोषिण की शिकार हैं, अपने परिवार सहित कारखानों या खोतों में मेहनत-मज़दूरी करके अपनी आजीविका कमाती हैं। और उनका पूरा परिवार मिलकर इतना नहीं कमा पाता कि खुद अपना और अपने बच्चों के लिए अच्छा भोजन और बीमारी में दवाइयां मुहैया करवा सके। जिसका नतीजा गरीबी और कुपोषण से लेकर भुखमरी तक पहुँचता है (इसके साथ लोगों को "शर्म" करने का एक कारण भी मिल जाता है!!)।
यदि किसी से सवाल किया जाए कि कि अनाज सहित सभी सामान और पूरे समाज के सभी संसाधन कैसे पैदा होते है, और कौन पैदा करता है, तो अपने सामान्य अनुभव से कोई भी यह बता सकता है, कि हर सामान का उत्पादन कारखानों और खेतों में होता है, जहाँ मज़दूर और किसान (या गरीब किसान जो दूसरों के खेत में मज़दूरी करता है) अपनी मेहनत से उत्पादन करते हैं, इसलिए हर चीज उनके श्रम से ही बनती है (See point 3 at the end)। और समाज का वह हिस्सा जो अपनी आवश्यकता की हर चीज ख़रीदने में सक्षम हैं, वह वस्तुओं को बनाने में लगे छुपे हुए अनेक लोगों के इस श्रम को कभी नहीं देखता। लेकिन, यदि देख पाता तो शायद खुद को इन कुपोषित, भूखे और बीमार गरीब बच्चों और उनके परवारों के लिए "शर्म" ही नहीं महसूस करता बल्कि स्वयं को परजीवी की स्थिति में भी न रहने देता, और ख़ुद को इसके लिए जिम्मेदार और अपराधी अवश्य महसूस करता... तब वह अपने आसपास मची लूट-खसोट को एक आलोचक की नज़र से सिर्फ देखता ही नहीं बल्कि उसको बदलने के लिए आगे भी आता...
आगे बढ़ने से पहले स्रोत की तह तक जाने के लिए कुछ और आंकड़े देखते हैं। आज भारत में 40 प्रतिशत किसानो के पास खेती के लिए कोई जमीन नहीं हैं, और वह अपना श्रम बेंचने वाले मज़दूर हैं। गरीब किसानो का दूसरा बड़ा हिस्सा नाममात्र की जमीन पर खेती करता है। आज ग्रामीण क्षेत्र के यह दोनो हिस्से गाँवों से उजड़कर रोज़गार की तलाश में लगातार शहरों की ओर आ रहे हैं, जिन्हें संम्भालना भारत जैसी कमजोर पूँजीवादी व्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। यहाँ यदि मूल विषय से हटकर इस विषय को थोड़ा विस्तार से देखें तो यह सच्चाई भी माननी पड़ेगी कि गाँव से शहरों की ओर पलायन समस्या होने के साथ ही पूंजीवाद की ज़रूरत भी है। क्योंकि कारखानों के लिए मज़दूरों की जरूरत होती है, और जितने अधिक मज़दूर होंगे, उतना कम उनका वेतन देना पड़ेगा, और ज़्यादा मुनाफे के माध्यम से उतना अधिक संचय होगा। दूसरी ओर टेक्नोलाजी की प्रगति के साथ भूमंडलीकरण के दोर में विश्वस्तरीय प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए (समाज की आश्वाकता के लिए बिलकुल नहीं, जैसा कि कई लोग सोचते हैं!!) कुशल टेक्निकल और बोद्धिक श्रम करने वाले लोग चाहिए, जिसके लिए एक सीमा तक पूँजीवाद टेक्नीकल शिक्षा का प्रचार भी करता है, और मुनाफ़ा निचोड़ने के लिए नए तरीको का इज़ाद करता है। लेकिन यह सरा कार्य इतने अराजक तरीके से होता है, जिस पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं होता। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण लगातार बढ़ रही बेरोज़गारों और गरीबों की संख्या को देखकर समझा जा सकता है।
इसी के साथ जनता में भ्रम पैदा करके उनके श्रम से मुनाफ़ा निचोड़ने का काम जारी रखने के लिए कभी-कभी म.न.रे.गा. जैसी योजनायें बनायीं जाती हैं, जो पूंजीवाद के जीवन को बढ़ाने के लिए पैवंद का काम कराती हैं। लेकिन जमीनी वास्तविकता को देखा जाए तो इस पूरे परिपेक्ष में पूंजीवादी विचारकों और सरकार का हाल दलदल में फंसे उस व्यक्ति जैसा होता है, जो खुद को बचने के लिए जितने हाथ पैर चलता है उतना ही दलदल में फंसता जाता है। क्योंकि यह व्यवस्था किसानों का उजड़ना और मज़दूरो की तीव्र गति से बढ़ रही संख्या को रोक नहीं सकती और क्योंकि किसान के मज़दूर बनने के साथ ही वह कुंएँ का मेढक नहीं रह जाते और समाज को एक व्यापर दायरे में देखने और समझने लगते  है, इसलिए पूँजीवाद का विकल्प भी तलासते हैं। यह व्यवस्था बेरोज़गारी और गरीबी को भी कभी समाप्त नहीं कर सकती। क्योंकि पूँजी की सट्टेबाजी और सेयर बाजार के अड्डों पर एक स्वता स्फूर्त अराजकता और मुनाफ़ाखोरी की सत्ता शासन करती है। जिसके कारण मंदी और मंहगाई जैसी आर्थिक समस्याओं पर भी सरकार का कोई नियंत्रण नहीं रहता और आज लगातार छोटे मालिक तबाह हो रहे हैं, कई कारखाने बंद हर दिन बंद होते हैं और हर दिन बेरोजगारों की नई आबादी सड़कों पर काम ढूढती नज़र आती है। यहां इसके ज़्यादा विस्तार में जानें का स्थान नहीं है इसलिए इसे यहीं पर छोड़ देते हैं... लेकिन इन आंकड़ो से भी यही स्पष्ट होता है कि देश की 80 प्रतिशत से भी अधिक यह गरीब मज़दूरों और किसानो आबादी ही समाज का वह हिस्सा जो बदहाली का जीवन जीने के लिए मज़बूर है, जिनकी संख्या लगातार बढ़ रही हैं, और जिसकी बदहाली, शोषण और काम की परिस्थितियाँ उसे एक अमूलगामी बदलाव के लिए लगातार शिक्षित कर रही हैं। लेकिन इतना सब कुछ स्पष्ट होने के बाबज़ूद आज भी कुछ लोग, जो एक निर्धारित सीमा के बाहर आकर नहीं सोचते, वह इस अराजकतावादी व्यवस्था के कारण पैदा होने वाली अनेक समस्याओं का समाधान करने में लगे रहते हैं, लेकिन इसके स्थान पर एक नियोजित व्यावस्था का विकल्प तलास करने की कभी कोशिश नहीं करते।
सभी आंकड़े अंत में हमें एक ही नतीजे पर पहुँचाते हैं, कि समाज के मेहनत करने वाले लोग, जो कभी गांव में और कभी शहर में अपना श्रम बेंचकर वेतन कमाते है, वह कभी थोड़े सी मज़दूरी में, तो कभी बेरोज़गारी के कारण या अनिश्चित आजीविका (मिलने या न मिलने) के कारण गरीबी में अपना जीते हैं, और यही उन कुपोषित बच्चों का स्रोत हैं, जिसके कारण अंरराष्ट्रीय स्तर पर "सभ्य समाज" के "चमकते" देश की "छवि खराब" होने से कुछ लोग "आँसू" बहाते नज़र आते हैं। ध्यान देने वाली सच्चाई यह है कि जनता के सबसे बड़े हिस्से की इस बदहाली का कारण संसाधनों की कमीं नहीं है (जिन्हें वह खुद पैदा करते हैं), बल्कि वह व्यवस्था है जहां वह अपनी सारी मेहनत अपने लिए या समाज के अपने जैसे दूसरे लोगों के लिए नहीं करते, बल्कि दूसरों के मुनाफे के लिए करते हैं। ऐसे में सिर्फ कुपोषण के शिकार बच्चों के लिए "दुःखी" होना या "शर्म" करना किस हद तक सही है, जबकि शर्मनाक सच्चाइयों की गंगा अपने स्रोत से निकल लगातार कर फैलती जा रही है।
ज कुछ भावनात्मक आंकड़ों को देखकर शर्मसार होने और "दुःख" से आँसू बहाने वाले अनेक "सभ्य लोगों" के संदर्भ में तोल्स्तोय के उपन्यास युद्ध और शांति की एक लाइन याद आ जाती है, जो उन्होंने कुछ इसी प्रकार के संदर्भ में लिखी है, कि "उनका हाल उस काउन्टेस जैसा था जो बछड़े को अपने सामने मरते हुए देख कर पछाड़ खाकर बेहोश हो जाती है, और शाम को अपने खाने की मेंज पर उसी बछड़े के गोस्त को बड़े चाव के साथ खाती है....." (Such magnanimity and sensibility are like the magnanimity and sensibility of a lady who faints when she sees a calf being killed: she is so kind-hearted that she can’t look at blood, but enjoys eating the calf served up with sauce.")
हमें मानना होगा कि अपने सामने किसी घटना को देखकर भावुक होने और अप्रत्यक्ष रूप में उसी से अपना मनोरंजन करने के अपने चरित्र को, छुपी हुई सच्चाई जानने और समझने के बाद भी, हम जारी नहीं रख सकते। अब नचे के सभी आंकड़ो पर एक नज़र डालें तो हमें पता चल जाएगा कि पूँजीवादी व्यवस्था का वर्तमान और भविष्य कितना अंधकारमय है, जिसे बदला न गया तो कितने और लोगों को हर रोज हो रही अप्रत्क्ष हिंसा का शिकार होना पड़ेगा, और सभ्य लोग सच्चाई को जाने बिना कभी "शर्मसार" तो कभी "दुःखी" होते रहेंगे,
स्रोत सूची:
1. भारत में हर दिन 4 करोड़ से अधिक पुरूष, महिलायें और बच्चे भूखे सोते हैं (Guardian, 4 Aprl 2011)। 52% विवाहित महिलायें और 72% शिशु खून की कमी से पीड़ित हैं। (NFHS Report, Times Of India, Jan 15, 2012)। पुरूषों और महिलाओं की इस समस्या को सरकार "मिड-डे मील" योजना से कैसे हल करेगी!!!
2. देश की 41 प्रतिशत ग्रामीण आवादी के पास कोई जमीन नहीं है (Guardian, 4 Aprl 2011)। यही 40 प्रतिशत ग्रमीण आबादी दूसरे के खेतों में काम करके अपना पेट भरने की कोशिश करती है और पूरे देश के साथ बाहर निर्यात करने के लिए अपनी मेहनत से अनाज पैदा करती है। यह लोग इस बात को नहीं जानते कि इनके द्वारा बैलों की तरह काम करने से पैदा होने वाले सामान पर ही कुछ लोग अय्याशी कर रहे है।
3. कुपोषण के मामले में भारत दुनिया के 80 देशों की सूची में 67वें स्थान पर है, । 1990 के बाद जनसंख्या में भूखे लोगों की संख्या में बृद्धि हुई है। (Times Of India, Jan 15, 2012)
4. 42 per cent of Indian children are underweight (The Hindu, January 10, 2012)

Friday, December 23, 2011

Understanding some of many lies from history

This small selection is shared from the research papers of Grover Furr, based on the study of Stalin era of the socialist. It is written by Grover Furr in reply to Roger Keeran's critique of his book "Khrushchev Lied" (Analysis of 61 Lies of Khrushchev). Grover Furr is a research scholar in Montclair State University, New Jersey.
His work exposed many lies of Khrushchev about Soviet Union in the epoch of Stalin, which were distorted in many ways after Stalin and misused by many historians, revisionists and whole media about socialist Russia to dishonor many greatest social and economic achievements of socialism in entire human history of development, with some mistakes, obviously (which we can only conclude today.).
I would like to share it among everyone who seriously thinks about present social-economical-political issues affecting life of every individual. And where every day millions of the lives of people across the world are destroyed and millions are forced to live in the conditions like hell. We must go through this article to look more real views of history in a better way. Once dust will be cleared from the mirror of history future will reflect in it more clearly.
In the light of these lies we can also analyze the present Indian social, political and economical conditions and made conclusions for future out of it.
Few selected paragraphs from it are posted here, all taken from  
Complete article present on: M Today
From the article:
Only the 61 so-called “revelations” are the subject of my study. These are the accusations that shook the world; that caused half the world’s communists (outside of the communist countries themselves) to quit their parties; that led directly to the Sino-Soviet split, and later to Gorbachev’s ideological smokescreen by which he justified the return to predatory capitalism and the breakup of the Soviet Union.
...
We have more than enough evidence today to prove that Khrushchev lied about many other matters as well.
I would have been much happier if my research had concluded that 25% of Khrushchev’s “revelations” about Stalin and Beria were false.
Over 50 years ago the worldwide communist movement was rebuilt in accordance with Khrushchev’s Speech and the many subsequent lies about Stalin by Khrushchev and his henchmen. To accept the fact that Khrushchev did virtually nothing but lie in this world-altering speech shakes the foundations of the political commitments that a great many people have held for a lifetime.
No wonder, then, that many find the truth is unpalatable. But it is the duty of Marxists to look the truth, no matter how disillusioning, squarely in the eye.
The only way to arrive at statements that approximate the truth is by the scientific process of research: mastering the secondary literature; identifying the primary source evidence; locating, obtaining, and studying that evidence; drawing correct conclusions, appropriately qualified, from that evidence. To pretend, or to suggest to others, that one can arrive at a truthful account of events by outlining what somebody – anybody -- “thinks”, is to substitute idealism for materialism.
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“Opinions”, “views”, and “what X thinks” where X is some “expert” -- whatever that means -- are to be studiously avoided! Remember Sherlock Holmes’ famous dictum:
It is a capital mistake to theorize before one has data. Insensibly one begins to twist facts to suit theories, instead of theories to suit facts. (“A Scandal in Bohemia”)
If Sir Arthur Conan Doyle, a man who believed in fairies, understood this principle materialists have no excuse for ignoring it! What we are greatly wanting is conclusions solidly founded upon an objective study of all the evidence.
....
We know that Khrushchev kept hidden from them much of the evidence we now have. A careful, objective researcher today – granted, there are precious few such – can learn much more than Molotov or Kaganovich ever knew about these events
….
In a private email to Keeran in October 2011 I tried to put this vital matter another way:
I think Stalin et al., like Lenin et al., and like Marx and Engels, were “the best.” None were ever better.
In my view Stalin and those who were closely associated with him, plus tens or hundreds of thousands of Soviet communists, were faithful followers of Lenin. They did in fact implement, bring into being, what Lenin wanted -- socialism. “Socialism in one country”, in fact.
They did not “fail to understand”, or “distort”, etc., Lenin's ideas. They fulfilled them.
Lenin, of course, was striving to embody and fulfill what Marx and Engels had concluded. And I believe he did understand Marx and Engels better than anybody before or since, and did in fact follow their teachings with intelligence and innovation.
But you can't “have it both ways.” If Stalin et al., faithfully followed Lenin, and Lenin et al. (for Lenin wasn't alone either) did likewise with Marx and Engels, then it follows that there are some fundamental problems -- flaws, if you will -- in this whole line of thought. Because it ended up right back with capitalism!
To put it another way: If WE, or the communists of the future, strive to do what Stalin, Lenin, Marx and Engels advocated, then AT BEST we are going to end up right back with capitalism.
But we will not have their excuse. They were the first, the pioneers. Pioneers always make mistakes. In fact, it is inevitable -- mistakes are a necessary part of any process.
But making the same mistake again is NOT a necessary part of the process. To make the same mistake again is to squander the lessons of both success and of failure that the predecessors in the communist movement have to teach us.
We have to learn from their mistakes, as well as their successes. Then we, at best, will make NEW mistakes, creative mistakes, mistakes “on a higher level” (in a Hegelian or dialectical sense). Along with new successes.
But, if we pretend that “Marx and Engels had all the answers”, or “Lenin had all the answers” (many Maoists literally believe that “Mao had all the answers”; many Trotskyists, of course, believe that “Trotsky had all the answers”) -- if we believe that, then we are guaranteed, AT BEST, to fall far short of what they achieved.
Marx said something about “first as tragedy, then as farce.” The tragedy of the international communist movement of the 20th century was that, ultimately, it failed.
Unless we figure out where they went wrong -- ALL of these figures -- then we are doomed to be the “farce.” And that would be a crime -- OUR crime.
So we have to look with a critical eye at ALL of our legacy.
Marx's favorite saying was: “De omnibus dubitandum” -- “Question everthing.” Marx would be the last person in the world to exclude himself from this questioning.
I hope these remarks are helpful. They are intended in a friendly spirit, Roger. Please take them as such!
I urge readers to study Keeran’s review, then to study this response of mine. Then obtain a copy of my book – from your local library, if they have it (and if they don’t, have them buy a copy) --and study it. Decide for yourselves.

Monday, November 28, 2011

भारत में घरेलू काम में लगे मज़दूरों के निरंकुश शोषण का एक दृश्य

गुड़गाँव में, पिछले महीने एक घर में किराये पर रहने वाले मध्यवर्ग के कुछ लोगों के दो लैपटॉपों (कम्प्यूटरों) की चोरी हो जाने के शक में, घर के मालिक ने उसी दिन घर पर बिजली का काम करने आये एक मज़दूर को बुलाया और उसपर चोरी का इल्ज़ाम लगाकर खुद को सभी क़ानूनों से ऊपर समझते हुये उसके साथ मार-पीट की और बाद में पुलिस को बुलाकर उस मज़दूर को थाने ले गया। यह मज़दूर बिहार से गुड़गाँव में आकर पिछले 15 वर्षों से घरों में खाना बनानें के साथ ही बिजली के उपकरणों को ठीक करने का काम कर रहा है, जिसके कारण उस मज़दूर ने थानें में अपने कुछ सम्पर्कों, जिनके यहाँ वह काम करता था, उन्हें बुलाकर बातचीत करवाई, और अंत में उसे छोड़ दिया गया।
एक सामान्य मध्यवर्ग के व्यक्ति द्वारा सिर्फ इस लिये एक मज़दूर पर शक करना क्योंकि वो गरीब था, और मार-पीट करना वर्तमान समय में समाज के मध्य वर्ग में मौजूद गैर-जनवादी और फ़ासीवादी प्रवृत्तियों का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है, जो संविधान और कानून को कोई महत्व नहीं देते, क्योंकि वे एक सम्पत्ति के मालिक हैं, और वे जानते हैं कि पूरी पूँजीवादी व्यवस्था पूँजी के इशारों पर नाचती है।
यह घटना असंगठित क्षेत्र में घरेलू काम करने वाले अनेक मज़दूरों की वास्तविक समाजिक स्थिति को सबके सामने लाकर खड़ा कर देती है। यह किसी एक व्यक्ति के साथ घटित कोई घटना नहीं है, बल्कि घरेलू काम करके आपनी आजीविका कमाने के लिये मजबूर अनेक प्रवासी मज़दूरों के साथ इस प्रकार की घटनायें हर रोज़ होतीं हैं।
वर्तमान समय में घरेलू काम में लगे मज़दूरों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है, जो देश के अलग-अलग हिस्सों से पूँजी की मार से उजड़कर महानगरों, जैसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (दिल्ली, गुड़गाँव, नोयडा आदि.), बंगलौर, हैदराबाद, मुंबई, में आकर काम की तलाश करते हैं। यह मज़दूर घरों मे खाना बनाना, सफाई करना, माली का काम करना, घरों में बिजली और प्लम्बर का काम करना, घरों के सुरक्षा गार्ड, गाड़ी के निजी ड्राइवर, बच्चों की देख-रेख करने, जैसे अनेक काम करते हैं, और किसी प्रकार मुश्किल से अपनी और आपने परिवार की आजीविका कमा पाते हैं। इन सभी कामों में ज्यादातर बच्चे भी अपने माता या पिता के काम में हाथ बंटाते हैं। कई बार अवैध व्यापार के तहत शहर में लाकर बेचे गये अनेक बच्चे भी इस काम में बंधुआ मज़दूर की तरह काम कर रहे हैं। (श्रोत, "भारत में बाल तस्करी:: एक चिंता का विषय"- डा. इंतेज़ार ख़ान, डिपार्टमेन्ट आँफ सोसल वर्क, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली)
इस प्रकार के सभी कार्यों में लगे मज़दूरों के लिये स्वतंत्रता, समानता, शिक्षा, भ्रातत्व और एकता जैसे कल्पना में गढ़े गये पूँजीवादी जनवाद के नारों का कोई महत्व नहीं है, और आर्थिक असमानता की बेड़ियों में जकड़े हुये इनकी हालत एक ग़ुलाम के समान होकर रह गई है। जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण यह एक घटना है, जो एक नहीं बल्कि लाखों-करोड़ों घरेलू काम में या किसी और काम में लगे हुये गरीबों के जीवन की नंगी सच्चाई को विकाश की राह पर दौड़ रहे देश के प्रबुद्ध नागरिकों के सामने लाकर खड़ा कर देती है, और चीख-चीख कर कहती प्रतीत होती है कि पूँजीवादी जनतंत्र के नाम पर आर्थिक असमानता, बेरोज़गारी और ठेकाकरण के साथ कितने माध्यमों से उनकी स्वतंत्रता का गला घोंटा जा रहा है ।
देश के कई राज्यों में लगातार कम हो रहे रोज़गार के अवसरों के चलते उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों से अनेक गरीब मज़दूर और किसान परिवार उजड़कर रोजगार की तलाश में महानगरों की ओर आ रहे हैं। इन महानगरों में यह सभी मज़दूर काम की तलाश करते हैं, और कुछ परिवारों की महिलायें और बच्चे फ़ैक्टरियों में काम न मिलने के कारण या कुछ फ़ैक्टरियों में काम की बदतर परिस्थितियों में 12 से 16 घण्टे काम न कर पाने के कारण घरेलू काम करके पैसे कमाते हैं । इन महानगरों में मध्य-वर्ग और उच्च-मध्य वर्ग का जीवन यापन करने वाले आईटी और कम्प्यूटर क्षेत्र के इन्जीनियरों, डाँक्टरों, दुकानदारों आदि की संख्या में पिछले 20 से 30 सालों में तेजी से वृद्धि हुई है, जो देशी और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में काम करते हैं और भारत की मज़दूर आबादी की औसत आमदनी के काफी ज्यादा कमा लेते है। समाज के इस नये मध्य वर्ग और मज़दूरों के बीच का अन्तर लगातार तेजी से बढ़ रहा है, और यह वर्ग भी सरकारी अफसरों, छोटे-बड़े उद्योगपतियों की तरह अपने घरेलू काम करवाने के लिये मज़दूरों की तलाश करता है।
ऐसी पर्स्थितियों मे लगातार बढ़ रही मंहगाई और बेरोज़गारी के कारण एक गरीब मज़दूर अकेले अपनी कमाई से पूरे परिवार की आवश्यकतायें पूरी नही कर सकता जिसका नतीजा यह होता है कि कुछ गरीब परिवारों में पुरुष फैक्टरीयों में काम करते हैं, और महिलायें एवं बच्चे घरों में खाना बनाकर, सफाई करने, बच्चों की देखभाल करने जैसे काम करके पैसे कमाते हैं। इसके साथ ही अब कई पुरूष भी फैक्टरीयों में काम न मिलने के कारण घरों में खाना बनानें और सफाई करने जैसे कामों में लगे हुये हैं। घरेलू काम करने वाले इन मज़दूरों की आमदनी का कोई स्थाई ज़रिया नहीं होता, और न ही कोई वेतन भुगतान का पंजीकरण होता है, इनका वेतन और काम पूरी तरह से काम करवाने वाले परिवार की इच्छा पर निर्भर करता है, जिसके कारण यह लगातार एक जगह से दूसरी जगह काम बदलते रहते हैं। [पूरा आगे बढ़ा कर देखें....]

Saturday, November 12, 2011

"क्या करें" -चार्नेशेवेश्की ["इन दिनो तीसरा विकल्प जोर पकड़ रहा है"]

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चार्नेशेवेश्की (Chernyshevsky) के कुछ विचार, उपन्यास "क्या करें" से,
"वह ऐसी लक्षणिक स्थिति में पहुँच चुका था, जिसका सामना न किसी ढुलमुल को ही करना पड़ता है, बल्कि पूर्ण रूप से उन्मुक्त भावना वाले या पूरे के पूरे राष्ट्रों को अपने इतिहाश के दौरान करना पड़ता है। . . . . . . लोग एक ही दिशा में केवल इसलिए धक्कामुक्की करते हैं, क्योंकि उन्हें कोई ऐसी आवाज सुनाई नहीं पड़ती जो कहे - "अरे किसी दूसरे रास्ते जाने की कोशिश क्यों नहीं करते तुम ?" यह इशारा समझते ही पूरी की पूरी जनता पलट जाती है और विपरीत दिशा की और चल पड़ती है।"
"वह अपने साधारण जीवन से ही सन्तोष कर लेती और अर्थहीन आस्तित्व का जीवन जीने लगती । ऐसा समय भी था जब विलक्षण युवतियों और विलक्षण युवकों का भविष्य यही था -वे सब अच्छे-भले बुजुर्गों में बदल जाते थे और व्यर्थ ही अपना जीवन जीते थे। कभी दुनिया की ऐसी ही रीति थी, तब ऐसे भले लोग कम थे, जो इसे बदलने की सोचते। कोई भी मनुष्य अपने आस्तित्व को कुंठित किए बिना अकेला नहीं रह सकता। या तो निर्जीव बन जाओ अथवा नीचता से समझौता कर लो" . . . "इन दिनो तीसरा विकल्प जोर पकड़ रहा है -शालीन लोग एकजुट होने लगे हैं, प्रतिवर्ष उनकी बढ़ती हुई संख्या को देखते हुए यह अपरिहार्य ही है। समय आएगा जब यह सामान्य रीति हो जाएगा, और समय बीत जाने पर यह नियम सार्वजनिक हो जाएगा, क्योंकि तब केवल शालीन लोग ही होंगे।"

Sunday, November 6, 2011

जनसंख्या वृद्धि और संसाधनो की कमीं को लेकर फैलाई गईं अफवाहें . . .


पिछले कुछ दिनो से दुनिया की जनसंख्या 7 विलियन पहुँच जाने पर अलग-अलग प्रकार के आंकड़ों को लेकर अनेक पूँजीवादी अर्थशास्त्रियों में बहशे चल रहीं हैं, जो जनसंख्या वृद्धि को हर समस्या का कारण सिद्ध करने की कोशिश में लगे हुए हैं।
अब द हिन्दू (1 नवंबर 2011: देखें) और विश्व बैंक द्वारा दिए गये कुछ आंकड़े देखें,
# सबसे अमीर ऊपर के 20 प्रतिशत लोगों द्वारा उपभोग किए जाने वाले संसाधनों का हिस्सा कुल उपलब्ध संसाधनों का 75 प्रतिशत है।
# सबसे गरीब नीचे के 20 प्रतिशत लोगों द्वारा उपभोग किए जाने वाले संसाधनों का हिस्सा कुल उपलब्ध संसाधनों का 1.5 प्रतिशत है। और,
# बाकी 60 प्रतिशत लोगों द्वारा उपभोग किए जाने वाले संसाधनों का हिस्सा कुल उपलब्ध संसाधनों का सिर्फ 23.5 प्रतिशत है।
[आगे बढ़ने से पहले यह ध्यान देना होगा कि यह आंकड़े पूरे विश्व के है, और यदि सिर्फ भारत के आंकड़े लिए जायें तो यह अन्तर जमीन और आसमान के समान होगा]
ऐसे में हर जगह समझदार लोगों के बीच ऐसी अफ़वाहें सुनने में मिल रही हैं जिनसे लगता है कि पूरी दुनिया में हर समस्या की जड़ सिर्फ जनसंख्या ही है, और यदि इसके लिए कुछ न किया गया तो पृथ्वी पर उपयोग के संसाधनों की कमी पड़ जायेगी। इस प्रकार की अफ़वाहें फैलाकर शोषण, दमन और प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष दोनो रूपो में ऊपर के कुछ लोगों द्वारा की जा रही चोरी को छुपाने के लिए ज्यादातर पूँजीवादी प्रचारक जी-तोड़ मेहनत करके कुछ अधूरे और अस्पष्ट आंकड़े प्रस्तुत करने की होड़ में लगे हुए हैं।
हर व्यक्ति, जो अपने दिमाग का थोड़ा भी स्तेमाल करेगा उसे यह आंकड़े देखकर स्वयं ही पता चल जाएगा कि समस्या जनसंख्या नहीं है बल्कि कारण कुछ लोगों द्वारा प्रकृतिक संपदा पर पूँजी की सहायता से किया गया क़ब्ज़ा है। जो अपने मुनाफे और अति विलासिता के लिए लगातार बहुसंख्यक जनता के शोषण में लिप्त हैं और किसानों व मज़दूरों द्वारा पैदा किए जाने वाले संपूर्ण सामाजिक उत्पादन के 75 प्रतिशत हिस्से का उपभोग कर रहे हैं । और दूसरी तरफ 80 प्रतिशत मेहनतकश जनता कुल उत्पादन के सिर्फ 25 प्रतिशत हिस्से में अपना जीवन यापन कर रही है। जबकि इसमें हर साल बर्बाद हो जाने वाले अनाज और नष्ट किए जाने वाले अन्य संसाधनों को नहीं गिना गया है।
विश्व बैंक के एक आंकड़े के अनुसार वर्तमान समय में पूरे विश्व की कुल श्रम शक्ति का 40 प्रतिशत अकेले भारत और चीन उपलब्ध करवाता, है जहां की मेहनतकश जनता अपने देशों के निजी पूँजीवादी उद्योगों और खेतों में काम करके पूरे विश्व के कुछ सम्पत्तिधारियों को (जो अपनी पूँजी इन देशों में निर्यात करके मुनाफ़ा कमाते हैं) अति विलासिता के सामान मुहैया करवाने के लिए जी तोड़ मेहनत करती हैं, जिन्हें बदले में अपने लिए दो बक्त की रोटी से कुछ अधिक नहीं मिलता।
इन आंकड़ो से इतना तो स्पष्ट है कि जनता की बदहाली जनसंख्या के कारण नहीं बल्कि पूँजीवाद की उस स्वभाविक गति का परिणाम है जो लगातार छोटे संपत्तिधारियों को बे-दखल करके पूरी सामाजिक प्रकृतिक सम्पदा को कुछ पूँजीधारकों के स्वार्थ, लोभ और निजी हितों की भेंट करती है और समाज की बहुसंख्यक आबादी को हर प्रकार की संपत्ति से मुक्त करके एक मज़दूर के रूप में वेतन-ग़ुलाम बना देती है।
लेकिन यह केन्द्रीकरण खुद अनेक तबाहिओं को जन्म देते हुए जनता के सामने इसे हटाकर एक नई व्यवस्था बनाने के अनेक कारण उपलब्ध कराता है। हम सभी लोग आज पूँजीवादी देशों में व्याप्त मंदी और महंगाई के कारण पैदा हो रहे बेरोज़गारी और गरीबी जैसे अनेक समस्याओं सहित जनता में बढ़ रहे असंतोष को देख सकते हैं, और स्पष्ट कहा जा सकता है कि पतन की कगार पर खड़ा और निजी-मालिकाने के हितों के लिए कुछ लोगों की सेवा में लिप्त पूँजीवाद मानव सभ्यता का अंतिम भविष्य नहीं हो सकता ।

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