Saturday, October 19, 2013

गुड़गाँव के “मल्टीब्राँण्ड” शॉपिंग सेन्टरों में विलासिता के सामान बेंचने में गुम मज़दूरों के जीवन की एक झलक ! !

देश के “विकास” में ढूढ़ने से भी नहीं मिलेगा आम जनता का हिस्सा!!
गुड़गाँव की बात होते ही लोगों की आँखों के सामने देश के औद्योगकि केन्द्र के रूप मे विकासमान एक शहर की तस्वीर घुमने लगती है। कोई व्यक्ति जब यहाँ आता है तो उसका सामना सबसे पहले बड़ी-बड़ी इमारतों, मल्टी-ब्राण्ड मालों और आईटी, साफ्टवेयर और आटोमोबाइल जैसी कम्पनियों की बड़ी-बड़ी इमारतों से होता है। यह तस्वीर उस गुड़गाँव की है जिसे भारत में औद्योगिक विकास के केन्द्र के रूप में टीवी अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं में दिखाया जाता है, या राजमार्ग संख्या आठ से गाड़ियों या बसों में बैठ कर गुज़रने वाले लोगों को दिखता है। इस गुड़गाँव के बीच एक दूसरा गुड़गाँव भी है, जो इस पहले गुड़गाँव की चमक-दमक के पीछे सभी की नज़रों से ओझल होकर अंधेरे में छुपा हुआ है। इन सभी इमारतों को बनाने वाले मज़दूरों से लेकर इनके रख-रखाव और इनमें काम करने वालों को सर्विस देने के लिये लाखों मज़दूर यहाँ काम करते हैं। हर दिन सुबह और शाम इस दूसरे गुड़गाँव की एक झलक हर औद्योगिक क्षेत्र की गलियों में और कापहेड़ा, मौलाहेड़ा, राजीव चौक, मानेसर जैसी मज़दूर बस्तियों के आस-पास के इलाकों में मज़दूरों के मेले के रूप में देखी जा सकती है। इस गुड़गाँव में रहने वाले लाखों मज़दूर पहले गुड़गाँव की चमक-दमक के लिये ज़रूरी सारी सुख-सुविधायें उपलब्ध कराते है और देश की जीडीपी को बढ़ाने के लिये दिन रात अमानवीय परिस्थितियों में काम करते हैं। वास्तव में गुड़गाँव की चमक-दमक का बोझ इस दूसरे गुड़गाँव में रहने वाले मज़दूरों के कन्धों पर रखकर ढोया जा रहा है, जो कि इस शहर में रहने वाले मध्य-वर्ग की सुविधाओं के लिए और देश की औद्योगिक की प्रगति के लिये धमनियों में रक्त के संचार की तरह दिन-रात काम में लगे रहते हैं।
पूरा बाज़ार देशी-विदेशी विलासिता के सामानो से पटा हुआ है और मध्यवर्ग के बीच इन सामानो को बेंचने के लिये कई शोपिंग सेन्टर यहाँ लगातार खुल रहे हैं। दुनिया के करोड़ों मज़दूरों द्वारा बर्बर हालातों में काम करके पैदा किया गया विलासिता का यह सामान इन शोपिंग मालों की "सुन्दरता" बढ़ाने के लिए सजा-धजा कर प्रदर्शन के लिए रखा जाता है। गुड़गाँव जैसे शहरों में रहने वाले मध्यवर्ग की ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए इन इलाकों के कोने-कोने में मल्टी नेशनल ब्राण्ड के शापिंग सेण्टर, जैसे बिग-बाज़ार, रिलायंस, विशाल और , ‘कैफे काँफी डे’, पिज्जा हाट और शराब के ठेके, खाने के रेस्टोरेंट सहित कई छोटी-छोटी दुकानें खुल रही हैं। गुड़गाँव की एक विशेषता यह है कि यहाँ चिकित्सालय या पुस्तकालय ढूँढ़ने पर भी मुश्किल से मिलते हैं, लेकिन शराब के ठेके हर गली-नुक्कड़ से लेकर शोपिंग मालों तक हर जगह मौज़ूद हैं। इसी को पूरी दुनिया में देश के विकास की तस्वीर के रूप में दिखाया जाता है। जो किसी को नहीं दिखाया जाता वह यह कि इन सभी दुकानों में मज़दूरों की एक बड़ी आबादी सेवा कार्यों में लगी है जो अत्यन्त दयनीय स्थिति में अपना गुजारा कर रही है। इनमें समान को घरों में पहुँचाने वाले, दुकानों में मदद करने वाले, रेस्तराओं में खाना बनाने और परोसने वाले से लेकर अनेक सर्विस कार्य करने वाले असंगठित और अकुशल मज़दूर शामिल हैं। बड़े-बड़े रिटेल स्टोंरों की साथ अपना व्यापार करने वाले कुछ छोटे क्षेत्रीय व्यापारी भी अपनी दुकानों में काम के लिए मज़दूरों को रखते हैं, और इन मज़दूरों की काम की परिस्थितियों भी लगभग बड़े-बड़े ब्राण्डों की दुकानों में काम करने वाले मज़दूरों जैसी ही होती है, फर्क सिर्फ इतना है कि इनमें मालिक भी उनके साथ देखभाल करता है। जैसे-जैसे पूँजी का विस्तार हो रहा है और मल्टी ब्राण्ट किराना सेण्टर खुल रहे है इन सभी छोटी दुकानो का भविष्य भी अपने अन्त की ओर बढ़ रहा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि मध्य-वर्ग को सुविधायें देने के काम में लगे मज़दूर स्वयं उस सामान को कभी इस्तेमाल नहीं कर सकते जो इन शोपिंग सेण्टरों में बेंचा जाता है।
आम तौर पर लोगों का ध्यान इन कामों में लगे मज़दूरों के काम और जिन्दगी की हालात पर नहीं जाता। वास्तव में इन मज़दूरों की स्थिति भी कम्पनियों में 12 से 16 घण्टे काम करने वाले मज़दूरों जैसी ही है। इन सभी सेण्टरों में काम करने वाले यूपी-उत्तराखण्ड-बिहार-बंगाल-उड़ीसा-राजस्थान जेसे कई राज्यों से आने वाले लाखों प्रवासी मज़दूर दो तरह की तानाशाही के बीच काम करते हैं। एक ओर काम को लेकर मैनेजर या मालिक का दबाव लगातार इनके ऊपर बना रहता है और दूसारा जिस मध्य-वर्ग को सर्व करने के लिये उन्हें काम पर रखा जाता है उसका अमानवीय व्यवहार भी इन्हें ही झेलना पड़ता हैं। दुकानों और रेस्तराँ में यह मज़दूर लगातार काम के दबाव में रहते हैं, लेकिन ग्राहकों के सामने बनाबटी खुशी और सेवक के रूप में जाने की इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है। यह मज़दूर सिर्फ शारीरिक श्रम ही नहीं बेंचते बल्कि मानसिक रूप से अपने व्यक्तित्व और अपनी मानवीय अनुभूतियों को भी पूँजी की भेट चढ़ाने के लिये भी मज़बूर होते हैं। “आज़ाद” देश के इन सभी मज़दूरों को जिन्दा रहने के लिये ज़रूरी है कि किसी मालिक के मुनाफ़े के लिये मज़दूरी करें।
कुछ दुकानों में काम करने वाले मज़दूरों से बात करने पर वे बताते हैं कि वे सप्ताह के सातों दिन 13 से 14 घण्टे काम करते हैं, और उन्हें महीने की 4 से 6 हज़ार रुपये मज़दूरी मिलती है। कई क्षेत्रीय दुकानों और रेस्टोरेण्ट्स में 10 से 15 साल के बच्चे भी काम पर रखे जाते हैं, जो काम तो पूरा करते हैं लेकिन उनकी मज़दूरी दूसरों से काफी कम रखी जाती है। किसी भी मज़दूर को बीमार होने पर या त्योहारों पर कोई छुट्टी नहीं मिलती, बल्कि त्योहारों के दैरान इनपर काम का बोझ और बढ़ जाता है। इन्हें कई बार लगातार हर दिन 18 से 20 घण्टों तक ओबरटाइम करना पड़ता है ताकि त्योंहारों के दौरान खरीददारी पर टूट पड़ने वाले मध्य-वर्ग की ज़रूरत पूरी की जा सके। इन सभी मज़दूरों को छुट्टी अपनी मज़दूरी काटवाकर ही मिलती है। 24 घण्टे चलने वाली कुछ दुकानों में किसी भी मज़दूर को कभी भी ओवर टाइम के लिये रोक लिया जाता है, जो उसे बिना किसी शर्त के करना पड़ता है। इन सभी दुकानों में मज़दूरों को मनमानी शर्तों पर ठेके पर पर रखा जाता है और कोई भी श्रम कानून इनके लिए लागू नहीं होता। मालिक कभी भी इन्हें बिना शर्त काम से निकाला सकता है। मध्य-वर्ग के खाए-अघाये ग्रहकों की सुविधा की कीमत भी इन मज़दूरों को चुकानी पड़ती है। डोमिनोज और पिज्जा-हट जैसी दुकाने अपने ग्रहकों को आकर्षित करने के लिए 30 मिनट में डिलीबरी या फ्री-डिलीबरी के जो दावे करती हैं उसका बोझ भी मज़दूरों के ऊपर ही पड़ता है, क्योंकि यदि डिलीवरी में थोड़ी भी देर हो जाती है तो डिलीवरी करने वाले मज़दूर की मज़दूरी काट ली जाती है। ऐसी स्थिति में इन डिलीबरी करने वालों पर लगातार एक मनौवैज्ञानिक दबाव बना रहता है।
कई मज़दूरों से बात कर ने पर पता चला कि इनमें से ज़्यादातर नौजवान है, जो पहले किसी न किसी कम्पनी में काम कर चुके हैं, लेकिन वहाँ काम के दबाव और काम की अमानवीय परिस्थितियों के कारण उसे छोड़ कर बेहतर काम की तलाश में यहाँ आते हैं। कई मज़दूरों का कहना है कि कारखानों में लगातार एक साल काम करना उनके लिये सम्भव नहीं होता तो वे साल में कुछ दिन कभी रिक्शा चलाते हैं तो कभी इन सेवा कामों में अपनी किस्मत आजमाते हैं। लेकिन कुछ दिन काम करने के बाद उन्हें इसकी सच्चाई भी पता चल जाती है और फिर कहीं काम तलाश करने के लिये निकल पड़ते हैं। श्रम विभाग का कोई अधिकारी कभी इन मज़दूरों की हालात का जायज़ा लेने नहीं आता। जानकारी का कोई श्रोत भी इन मज़दूरों के पास नहीं है। ज़्यादातर मज़दूर अपने अधिकारों के बारे में भी नहीं जानते और न ही इन्हें इतिहास के अनेक मज़दूर आन्दोलनों और मज़दूरों के संघर्षों के बारे में कुछ पता है।
पूरी दुनिया में आज क्या चल रहा है और सरकारें उनके "उद्धार" के लिये क्या-क्या कर चुकी है, और क्या और करने जा रही है, इन सबकी जानकारी से बेख़बर यह मज़दूर सिर्फ दो वक्त की रोटी जुटाने के लिए लगातर 12 से 16 घण्टे काम में लगे रहते हैं। इनके पास न ही सोचने का कोई वक्त होता है और न अपने परिवार के साथ बिताने के लिए कोई समय। लगातार बढ़ रहे मध्य-वर्ग के बाज़ार में देश-विदेश की काम्पनियों में पैदा होने वाले विलासिता के सामान को बेंचने के लिए और देश की "तरक्की" में चार-चाँद लगाने के लिए यह मज़दूर इंसानों की तरह नहीं बल्कि मशीनों की तरह काम में लगे हुये हैं। हर शहर में एक बड़ी आबादी होने के बाबज़ूद किसी का ध्यान इनके आस्तित्व की ओर नहीं जाता। गुड़गाँव में देशी-विदेशी कम्पनियों का मुनाफ़ा बढ़ाने के काम पर लगे लाखों मज़दूरों की जिन्दगी की यह एक छोटी सी झलक भर है। वास्तव में कपड़ा बनाने से लेकर आटोमोबाइल बनाने और बड़ी-बड़ी इमारतें बनेने तक अनेक उद्योगों में काम पर लगे लाखों मज़दूर यहाँ अमानवीय परिस्थितियों में काम करते हैं, और उसी प्रकार की अमानवीय परिस्थितियों में बिना किसी सुविधा के मज़दूर बस्तियों में रहते हैं। पूरे देश में इस प्रकार के करोड़ों मज़दूरों को पूँजीवादी व्यवस्था में बिना किसी “भ्रष्टाचार” के सारे अधिकारों से बेदखल करके अंधेरी गन्दी बस्तियों में काम करते रहने के लिये धकेल दिया गया है।
मज़दूरों की इस स्थिति में संसदीय राजनीति में निर्लिप्त, खुद को भारत के मज़दूरों का प्रतिनिधि कहने वाली संसदीय वामपन्थी पार्टियों से जुड़ी किसी भी ट्रेड यूनियन का आधार इन मज़दूरों के बीच नहीं है। आज स्थिति यह है कि इन ट्रेडयूनियनों द्वारा कभी-कभी साल में एक या दो बार “एक दिन की हड़ताल” या “संसद मार्च” जैसे कर्मकाण्ड करके पूरे देश में अमानवीय परिस्थितयों में काम करने वाले मज़दूरों की क्रान्तिकारी पहलकदमी को कुचलने का काम किया जाता है। जो मज़दूरों के बीच यह भ्राम पैदा करता है कि कि मज़दूर ट्रेड यूनियनों का काम यही होता है (साल में दो बार कर्मकाण्ड करना!!)। जिन हालात में देश के करोड़ों मज़दूर काम करते हैं, और जिस तरह इनके बीच अपनी स्थिति को लेकर असंतोष बड़ रहा है, समय-समय पर उसकी झलक स्वतः-स्फूर्त संघर्षों के रूप में सामने आती रहती है। आज पूरे देश में वह परिस्थितियाँ फिर से विकसित हो रही हैं कि देश की व्यापक मज़दूर आबादी के अधिकारों के लिये संघर्ष करते हुये उन्हें राजनीतिक रूप से शिक्षित किया जा सकता है और एक देशव्यापी मज़दूर आन्दोलन खड़ा किया जा सकता है। लेकिन यह संसदीय वामपन्थी पार्टियाँ मज़दूरों को ज़ागरुक करना तो दूर बल्कि उन्हें उनके क्रान्तिकारी लक्ष्य से गुमराह करके पूँजीवादी व्यवस्था के लिये एक सुरक्षा पंक्ति की भूमिका निभा रही हैं। ख़ैर यह अपने आप में अलग से एक विचार करने का एक बड़ा विषय है, इसकी इतनी चर्चा ही यहाँ सम्भव है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 90 फीसदी से अधिक लोगों का मासिक खर्च 4500 रु. से कम है। देश की इस 90 फीसदी आबादी को अपनी आमदनी किन परिस्थितियों में काम करके हासिल करती है इसका अन्दाज़ इन मज़दूरों को देख कर लगाया जा सकता है (द हिन्दू, 14 जुलाई 2013)। कोई भी संसदीय राजनीतिक पार्टी इन मज़दूरों की स्थिति के कारणों पर कोई बात नहीं करती। इस अमानवीय असमानता और मज़दूरों के शोषण पर चल रही पूरी पूँजीवादी व्यवस्था में हो रहे इस खुले भ्रष्टाचार का विरोध न तो केजरीवाल जैसे लोग करते हैं जो स्वयं को “आम आदमी” का नेता कहते हैं, और न ही कोई और संसदीय राजनीतिक पार्टी। दूसरे तो कई दशाब्दियों से यही कर रहे हैं, लेकिन नये उभरे आप पार्टी के नेता भी कभी देश की जनता की इस हालत पर कोई बात करने की जहमत नहीं उठाते। कांग्रेस हो या बीजेपी, सभी के शासन में देश के “विकास” से सापेक्ष रूप में मेहनत करने वाले इन 80 फीसदी से भी अधिक लोगों की बर्बादी में  इज़ाफा लगातार जारी है। आजकल हिन्दूवादी कट्टरपन्थी राजनीति की मुखिया बीजेपी मोदी के “विकास” के नाम पर भ्रामक प्रचार कर देश में एक साम्प्रदायिक माहौल बनाकर जनता को मूल मुद्दों से भटकाकर समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है, जिसका मुख्य उद्धेश्य है पूँजीवाद को खुले दमन का विकल्प देना जो आने वाले समय में घोर गरीबी और बर्बादी में जीने वाले मज़दूरों द्वारा उठाई जाने वाली न्याय की आवाज को कुचलने के काम आएगा। पूँजीवादी व्यवस्था का यह इतिहास रहा है कि जब लोगो को अपकी बदहाली बर्दास्त से बहर हो जाये तो उन्हें त्रिशूल और तलवार देकर हर-हर-महादेव और अल्ला-हो-अकबर के साथ आपस में लड़ा दो, और यह का काम तो हमारे यहाँ अभी से शुरू हो चुका है। देश में चलने वाले कई गैर सरकारी संगठन (NGO) भी कभी मज़दूरों की इन अमानवीय परिस्थितियों पर कोई सवाल नहीं उठने, बल्कि वास्तव में इनका अस्तित्व ही इसलिये है कि पूँजीवाद में जो आम मेहनतकश जनता बर्बाद होती है उसे कुछ सुधार कार्य करते हुये लोगों को शान्त बनाये रखें। मज़दूरों को यह सच्चाई समझनी होगी कि सभी संसदीय पार्टियाँ उनके लिये नहीं, बल्कि देशी-विदेशी बैंकरों, पूँजीवादी ठेकेदारों, उद्योगपतियों और दलालों की पार्टियाँ हैं, जो मज़दूरों की मेहनत से बने पूरे देश के सभी संसाधनो पर सरकार की मदद से अपने अधिकार को बनाये हुये है। संविधान के पन्नों में समाज को बनाने और चलाने वाली इस मेहनतकश आबादी को “समानता का अधिकार” मिला हुआ है, लेकिन इनके पास कोई सम्पत्ति नहीं है, और यदि है तो एक छोटा सा जमींन का टुकड़ा, जिसके कारण पूरे देश की यह आबादी आर्थिक रूप से पूरी तरह से पूँजीपतियों-ठेकेदारों के यहाँ उनकी मनमानी शर्तों पर अपना श्रम बेंचने के लिए मज़बूर हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के रहते इन मज़दूरों की स्थिति में कोई सुधार सम्भव है? आज ज़रूरी है कि यह सारे मज़दूर एक नये सिरे से एक व्यापर आर्थिक राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के लिये संगठित होकर पूँजीवादी शोषण दमन उत्पीणन के बिरुद्ध एक विकल्प खड़ा करने के लिये आगे आएँ।
मेरी ज्वाल, जन की ज्वाल होकर एक
अपनी उष्णता में धो चलें अविवेक
तू है मरण
, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ
तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।
- मुक्तिबोध

Saturday, September 7, 2013

अन्धविश्वास और सामाजिक असमानता के कुछ वैदिक तथा उपनिषदीय श्रोत


“दर्शन मानव मुक्ति का मस्तिष्क है और सर्वहारा वर्ग उसका हृदय। सर्वहारा वर्ग का उन्मूलन किये बिना दर्शन को एक वास्तविकाता नहीं बनाया जा सकता और दर्शन को एक वास्तविकता बनाये बिना सर्वहारा का उन्मूलन नहीं किया जा सकता।”

- कार्ल मार्क्स
अभी कुछ दिनों पहले एक पोस्ट पर कुछ लोगों ने संदेह करते हुए उसमें लिखी कुछ बातों के श्रोत माँगे थे। इस लेख में मूल रूप से हिन्दू समाज के लोगों द्वारा व्यक्तिगत स्तर पर किये जाने वाले कर्मकाण्डों की आलोचना की गई थी (मूल लेख देखें)। इसी बीच महाराष्ट्र में अन्धविश्वास के विरुद्ध जागरुकता का प्रचार करने वाले डा. दाभोलकर की कुछ गुण्डों द्वारा हत्या कर दी गई, फिर कुछ समय बाद आसाराम के विरुद्ध तंत्र-मंत्र के नाम पर एक बच्ची का योन शोषण करने की खबर लोगों के सामने आ चुकी है, और इस बीच चौरासी कोसी यात्रा के नाम पर देश के “हिन्दू साधुओं” और उसका विरोध करने वालों “मुसलमान के मसीहाओं” ने अपनी-अपनी चुनावी राजनीति के लिये वोट भी पक्के कर लिये हैं।
लोगों द्वारा बिना किसी जानकारी के लकीर का फकीर बनकर किये जाने वाले व्यक्तिगत कर्मकाण्ड प्रत्यक्ष रूप से उतने खतरनाक नहीं हैं, जितने कि “धर्मगुरुओं” द्वारा धर्म के नाम राजनीतिक प्रचार करना और लोगों में अन्धविश्वास फैलाना। यही धार्मिक विचार जब अपराधी किस्म के लोगों के हाथ लग जाते हैं, तो जनता के अन्धविश्वास का फायदा किस तरह उठाया जाता है यह लगातार सामने आ रहा है (देखें श्रोत 5)।
धार्मिक कर्मकाण्डों की उत्पत्ति और यदि भाववादी दर्शन के इतिहास को देखें तो जब मनुष्यों को प्रकृति के बारे में कोई जानकारी नहीं थी तब वे प्राकृतिक घटनाओं को किसी पराभौतिक शक्ति का रूप मानते थे और उसी प्रक्रिया में भूत-प्रेत-चमत्कार-झाड़-फूँक जैसी अन्धविश्वास की मान्यतायें भी पैदा हुई। तब मनुष्य को प्रकृति के नियमों का कोई ज्ञान नहीं था। इसलिये सभी धर्मग्रन्थों में लिखी बातों को उस दौर के आधार पर देखें तो इन प्राचीन धर्म ग्रन्थों को साहित्यिक तथा ऐतिहासक रचना के रूप में समझना चाहिये जो हमें उस दौर के मानव समाज की अवस्था और उनकी समझ की कुछ झलक प्रस्तुत करते हैं। नहीं तो भक्ति भाव से, विवेक को खूँटे पर टागने के बाद धर्म ग्रन्थों को पढ़ने की जो धारणा समाज में लोगों के बीच विकसित की जाती है वह उसका पूरा फायदा लोगों को धर्म के नाम पर मूर्ख बनाकर राजनीति करने वाले उठाते हैं और वर्गों में बंटे समाज में शासक वर्गों के हितो की रक्षा करते हैं।
धर्म  भाववादी दर्शन से जुड़ा हुआ है। भाववावी दर्शन (Idealism) का मूल सिद्धान्त है विचार को प्रधान मानना और भौतिक संसार को काल्पनिक। यानि समाज की व्यापक जनता की बर्बादी, समाज के कुछ परजीवी हिस्सों द्वारा मेहनतकश लोगों का शोषण, पशुओं की तरह काम करने के बाद भी ज़्यादातर लोगों को आराम की जिन्दगी न मिलना, यह सब काल्पनिक है या उनके पुराने जन्म के कर्मों का फल है!! इसी लिए समाज के खाये-अघाये लोगों में इस दर्शन के समर्थक बहुतायत में मिलते हैं, और इन्ही वर्गों के कारण यह दर्शन आज तक फल-फूल रहा है। इसका दोहरा फायदा शोषक वर्ग उठाते रहे हैं और आज भी उठा रहे हैं। पहला, समाज का जो तबका (इसमें आज कल के धर्म गुरू भी आते हैं) जनता की मेहनत पर अय्यासी कर रहा है और बिना किसी शारीरिक श्रम के सारी सुख सुविधाओं का उपभोग कर रहा है वह अपना पेट भरने के बाद, ए.सी. कमरे में लम्बी तान कर सोने से पहले सोचता है कि यह दुनिया तो “मिथ्या” है, और सब भगवान की “माया” है!! वहीं दूसरी ओर समाज का जो तबका सारी मेहनत से हर चीज का निर्माण करने के बावज़ूद एक कमरे में पाँच-सात लोगों के साथ जानवरों की तरह रहने के लिये मज़बूर हैं उसे धार्म के नाम पर यह विश्वास दिला दिया जाता है कि उसके सारे दुख उसके कर्मों का फल हैं, और हर वस्तु और घटना उसके “मन का भ्रम” है, यह दुनिया तो “काल्पनिक” है, इसलिये उसे किसी परमात्मा की भक्ति में तल्लीन रहकर अपने हर दुखों को सहन करना चाहिये!! इन दोनों दृश्टिकोणों का प्रत्यक्ष फायदा समाज के शोषक हिस्से को होता है और जनता को बर्बादी में ढकेलने वाली अपने हर नीच काम को धर्म के लबादे से ढंकने की कोशिश करता है।
यहाँ पर भाववादी दर्शन और भौतिकवादी दर्शन के सैद्धान्तिक मतभेदों पर बहस करने का कोई उपयोग नहीं होगा। लेकिन एक बाद जो इतिहास नें सिद्ध की है वह यह है कि जबसे समाज शोषक और शोषित वर्गों में विभाजित हुआ है तबसे दुनिया को देखने का भाववादी दृष्टिकोण और इसे मानने वाले लोगों का फायदा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शोषक वर्गों द्वारा अपने हितों की रक्षा के लिये उठाया गया हैं (देखें श्रोत 1)।
प्राचीन योगियों और मुनियों के “ब्रह्मज्ञान” (यानि सारे संसार का ज्ञान..) और उनकी “वैज्ञानिक सोच” की कई बातें हमें कुछ हिन्दू धर्म का समर्थन करने वाले लोगों से सुनने को मिलती हैं। लेकिन उस दैर की वैज्ञानिक समझ और “ब्रह्मज्ञान” की सीमा के प्रमाण हमें धर्म ग्रन्थों से ही मिल जाते हैं। इसका एक सबसे अच्छा उदाहरण है, हिन्दू पंचान्ग और “ब्रह्मज्ञान” रखने वाले लोगों की खगोलीय समझ। एक लम्बे दौर में हिन्दू पन्चांग का विकसित हुआ। इसके विश्लेषण के आधार पर हमें उस दौर के “खगोगशास्त्रियों” (आज यह शब्द प्रचिलित है!!) की दुनिया के बारे में जो समझ थी उसकी एक झलक मिल जाती है। तीसरी शताब्दी बी.सी. तक पहुँचते-पहुँचते हिन्दू पंचान्ग का निर्माण चन्द्रमा और सूरज की गति (यहाँ सूरज की गति पर ध्यान देना होगा!!) के आधार पर किया जा चुका था। इसमें माना गया था कि सुबह उगते समय सूरज कि गति तेज होती है जो धीरे-धीरे ऊपर उठने के साथ कम होती जाती है और जब यह ढलता है तो इसकी गति फिर तेज होने लगती है। उस समय यह भी माना जाता था कि चन्द्रमा सूरज से अधिक दूर है, उसकी गति सूरज से 13 गुना कम है और यह सूरज के पीछे छुप जाता है (देखें, “Development of Pancanga from Vedic times upto the present”, BASI, Vol. 26, pp. 75 – 90, 1998, By S.D Sharma, Indian Institute of Astrophysics, http://hdl.handle.net/2248/3516)।
यह समझ क्या प्रकट करती है? स्पष्ट रूप से उस समय के लोग सूरज को पृथ्वी के सापेक्ष गतिशील मानते थे जो आज गलत सिद्ध हो चुका है। जो लोग यह कहते हैं कि हिन्दू धर्म या किसी भी धर्म के “ब्रह्मज्ञानी” ऋषि-मुनि और “हिन्दू वैज्ञानिक” प्रचीन काल से ही सब कुछ जानते थे, उनसे इस समझ का श्रोत मांगने की ज़रूरत है, या फिर यह समाज ने प्रचिलित जनश्रुतियां हैं? क्योंकि हिन्दू धर्म ग्रन्थों में जो बातें लिखी हैं, वे आज के दौर में काफी असंगत नज़र आती हैं। यहाँ उस दौर की वैज्ञानिक सोच का मज़ाक नहीं उड़ाया जाना चाहिये। हमें यह नहीं कहना चाहिये कि उस समय के लोगों ने ऐसा क्यों कहा, जबकि आज सच कुछ और सही सिद्ध हो चुका है। किसी दौर की गलत समझ को उस दौर की सामाजिक स्थिति और विज्ञान के विकास की अवस्था के आधार पर समझना चाहिए क्योंकि हर दौर की कुछ भोतिक-सामाजिक सीमायें होती है। लेकिन दुनिया को समझने के जो औजार उस समय विकसित हुए थे, और प्रकृति का जितना अवलोकन करने में उस समय के लोग सक्षम थे उसके अनुरूप ही उस दौर के लोगों ने दुनिया के बारे में अपना दृश्टिकोंण बनाया। लेकिन जैसे-जैसे नये अनुसंधान हुये कई प्राचीन धारणाओं का खण्डन किया जा चुका है या उस प्रचान समझ को सुधारा जा चुका है। यह हिन्दू, ईसाई, इस्लाम सभी की धार्मिक मान्यताओं के बारे में सच है। इतिहास के भिन्न-भिन्न दौरों में संसार के हर भूभाग पर व्यक्तिगत स्तर पर कुछ लोगों ने महान खोजे की थीं, और यह खोजें भारत में भी हुईं हैं। इसलिये हर धार्मिक मान्यता और धर्म ग्रन्थों को तार्किक रूप से समझने के लिये सभी को प्रोत्साहित करना चाहिये, न कि उनका महिमामण्डन करने और उसकी पूजा करने के लिये। वास्तव में धार्मिक मान्यताओं का महिमामण्डन मुख्य रूप से हर दौर में शासक वर्गों के हितों की रक्षा के लिये तथा जनता को डराकर रखे के लिये अन्धविश्वास का प्रचार करने के लिये किया गया है (देखें श्रोत 3)। इसके कुछ श्रोत नीचे चित्रों में दिये हैं। जो लोग यह कहते हैं कि वैदिक लोग सब कुछ जानते थे और उनपर कोई सवाल नहीं उठाना चाहिये वह धारणा कितनी गलत है, बल्कि अंधविश्वासपूर्ण भी है, यह ऊपर दी गई वैदिक मनुष्यों की संसार के बारे में समझ के आधार पर लगाया जा सकता है (देखें श्रोत 2)।
ऐसे में जो लोग आज के विज्ञान की तुलना प्राचीन विज्ञान से करते हैं, और प्राचीन विज्ञान की कुछ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर उसका महिमाण्डन करते हैं, वह प्रत्यक्ष धोकेबाजी है और लोगों को धर्म का भूत दिखाकर डराकर रखने तथा अपने फायदे के लिये उन्हे बेबकूफ बनाकर रखने के समाज है। यह हिन्दू धर्म में भी होता रहा है और ईसाई-इस्लाम जैसे सभी धर्मों में भी मौजूद है।
अब आज-कल की धार्मिक प्रवृत्ति की बात करते हैं। धार्मिक रूझान रखने वाले तथा भाववादी दर्शन से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित लोगों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि ये लोग ज़्यादातर सुनी-सुनाई बातों करते सुने जाते हैं, या ज्यादा से ज्यादा कुछ लोग एक-दो लेख या कुछ श्लोकों को पढ़कर पूरा धर्म समझने की कोशिश करते हैं। कुछ लोग अभी भी यह मानते हैं कि प्राचीन धर्म ग्रन्थों में काफ़ी “विज्ञान” मौज़ूद था, और यह धर्म ग्रन्थ लोगों के बीच समानता का प्रचार करते थे। यह लोग अपने इन विचारों के समर्थन में “सर्व-धर्म-संभाव्”, “सर्वे भवन्तु सुखिनाम्”, “बसुंधैव कुटुम्भकम्” आदि जैसे कुछ श्लोंकों का हवाला देकर इसकी वास्तविकता को छुपा लेते हैं, या हो सकता है कि यह लोग खुद भी न जानते हों (देखें श्रोत 1)।
इस तरह की अवैज्ञानित-अतार्किक धारणाओं के प्रति हमें सजग होकर सोचना पड़ेगा। व्यक्तिगत स्तर पर लोगों का पराभौतिक सत्ता में विश्वास और कुछ पूजा के कर्मकाण्ड करना तबतक समाप्त नहीं हो सकता जबतक समाज में वर्गों का अस्तित्व मौज़ूद है और भौतिक रूप से समाज की व्यापक जनता शोषण की शिकार है। लेकिन जनता के इस विश्वास का फायदा उठाने वाले लोगों, और अन्धविश्वास का प्रचार करने वाले लोगों की असलियत को सबके सामने लाना ज़रूरी है, जिससे कम से कम वर्तमान समाज में मौज़ूद हर आम धारणा के प्रति लोगों में एक आलोचनात्मक दृश्टिकोंण विकसित हो सके। ईश्वरीय सत्ता, धर्म और आदर्शवाद के आधार पर समाज और लोगों का भला करने की बाते करने वाले या दुनिया को ही काल्पनिक मानने वाले ज्ञानी लोगों के सामने मैं हिन्दू धार्म ग्रन्थों के उद्धरण श्रोत सहित रख रहा हूँ। इनके आधार पर स्वयं भारतीय भाववादी दर्शन तथा धर्म के विचारों के प्रति एक आलोचनात्मक दृश्टिकोंण बनाया जा सकता है। यह कहना कोई तर्क नहीं होगा कि कुछ जगह धर्म ग्रन्थों में सही बाते भी हैं, लेकिन संपूर्ण रूप में धर्म के आधार पर कैसी सामाज बनाने की बात की गई थी उसके आधार पर ही समाज में धर्म की भूमिका को समझना होगा। एक पुरानी कहावत है कि सिर्फ हाथी की पूँछ देख को देख कर हाथी के बारे में धारणा नहीं बनानी चाहिये।
[चित्रो में दिये गये सभी उद्धरण पुस्तक “भारती दर्शन में क्या जीवंत क्या मृत” (देवीप्रसाद चटोपाध्याय, 2007 संस्करण, पीपीएच नई दिल्ली से प्रकासित) के पृष्ठ 167 - 179 से लिये गये हैं]
1. धर्म ग्रन्थों में असमानता सूचक प्रचार,
ब्राह्मणोअस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः
उरूतदस्य यद् वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत           (सूक्त, ऋग्वेद 10-90-12)
[इनका मुख ब्राह्मण हुआ, दोनो बाहुओं से क्षत्रिय बनाया गया, दोनो जंघाओं से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुआ।]




2. धार्मिक ग्रन्थ किस प्रकार लोगों को अतार्किक बनाते हैं, उसके कुछ उदाहरण,



3. किस तरह अन्धविश्वासों का प्रचार शासकों के हितों की रक्षा के लिये किया जाता था,

4. धर्म ग्रन्थों में स्त्री विरोधी मानशिकता का प्रचार,
इन्द्रश्चिद्घा तदब्रतीत् स्त्रिया अशांस्यं मनः,
उतो अह ऋतुं रघुम्                              (ऋग्वेद 8-33-17)
[इन्द्र ने कहा कि स्त्री के मन का शासन करना असंभव है। स्त्री की बुद्ध छोटी होती है।]

न वै स्त्रैपानि सख्यानि संति सालावृकाणां हृदयान्येता    (ऋग्वेद 10-95-15)
[स्त्रियों का प्रेम वा मैत्री स्थाई नहीं होती, स्त्रियों और वृक्कों का हृदय एक समान होता है]
मध्या यत्कर्त्वमभवदभीके कामं कृण्वाने पितरि युवत्याम्  (ऋग्वेद 10-61-6)

5. धर्म ग्रन्थों में तंत्र-मंत्र तथा अन्धविश्वास का प्रचार,
अदीक्षिता यदा नारी कर्णे मायां समुच्चरेत्.
शक्तयोअन्याः पूजनीया नाय् र्यस्ताअन कर्मणि..        (महानिर्वाण)

(ओझाओं-मौलवियों द्वारा झाड़-फूंक और "कयामत का दिन", जन्नत या स्वर्ग जैसी अन्धविश्वासपूर्ण व्यक्तिगत मान्यता रखने वाले इस्लाम तथा ईसाई धर्म की स्थिति भी इससे भिन्न नहीं है। लेकिन उसका प्रभाव भारतीय समाज पर उतना नहीं है, इसलिए श्रोतों की खोज करने की आवश्यकता अभी नहीं है, लेकिन उनपर भी ज़रूर लिखने की आवश्यकता है।)

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