Sunday, August 21, 2016

निराला के साहित्यिक उद्धरण (Nirala's Literary Quotes)



·         प्रकाश मिलने पर स्वभावतः लोगों को अँधेरे की स्थिति, दुःख मालूम हो जाते हैं, और उनका पहला वह भय दूर हो जाता है। दबे हुए जो होते हैं, दबना उनका स्वभाव बन जाता है। और जब न दबने वाली प्रवृत्ति बढ़ती है, तब दबानेवाली वृत्ति भी अपनी उसी शक्ति से बढ़ती रहती है। फिर जिसमें शक्ति अधिक हुई, उसकी विजय हुई।
·         कितने कष्ट हैं यहाँ, कितनी कमजोरियों से भरा हुआ संसार है यह, पद-पद पर कितनी ढोकरें लग चुकी हैं, पर सब लोग फिर भी समझते हैं - वे अक्षत हैं, वे ऐसे ही रहेंगे; तभी पूरी प्रसन्नता से हँसते हैं। बर्षा की बाढ़ की तरह कितने प्रकार के दुःख-कष्ट उन्हें उच्छ्वासित कर, डुबा-डुबाकर चले गए, पर दुःख जल से हटने के बाद कुछ ही दिनों में सूखकर फिर वैसे ही ठनकने लगे। इन लोगों के प्रमाद-स्वर में तन, मन और धन की ही गुलामी के तार बज रहे थे। बाते ईश्वर की करते हैं, पर ध्वनि संसार की होती है कि बह बड़े मौज में हैं - ईश्वर की बातचीत खाते-पीते हुए सुखी मनुष्यों का प्रलाप है।
·         जो गिरना नहीं चाहता, उसे कोई गिरा नहीं सकता; बल्कि गिराने के प्रयत्न से उसे और बल देना होता है।
·         संसार की प्रति प्रगति की सुलोचना स्त्री ही की नियामिका है, क्या एक बाजू कतर देने पर चिड़िया उड़ सकती है? स्त्रियों की दशा क्या ऐसी ही नहीं कर रखी यहाँ के कल्मष में डूबे, धर्म को ठेका कर रखनेवाले लोगों ने?
·         साधु (गुरुओं, बाबाओं, या मंदिर में भी) के पास प्रणाम करने के लिए जो जाएगा, वह जरूर पापी होगा; उसके एक या अनेक कृत पापों के स्मरण से जब उसे चैन नहीं पड़ता, तब वह साधु की तरफ दौड़ता है कि प्रणाम करके अपने आपका बोझ दूसरे पर लाद दे।

Tuesday, May 24, 2016

गोर्की के लेख व्यक्तित्व का विघटन का एक अंश (फासीवाद के उभार और वर्तमान के व्यक्तियों को समझने के लिये) - A Quote by Maxim Gorky



"व्यक्तिवाद जिस समय अपनी मृत्युशैया पर अन्तिम साँसें गिन रहा था, उस समय पूँजीवाद, अपनी इच्छा के विरुद्ध समष्टि की पुरनर्सृष्टि कर रहा था और सर्वहारा वर्ग को एक ठोस नैतिक शक्ति में बलात् ढाल रहा था। धीरे-धीरे, किन्तु क्रमशः बढ़ती हुई गति से, इस शक्ति को यह चेतना प्राप्त होती गई कि विश्व की महान् समष्टि-शक्ति होने के नाते स्वतंत्र रूप से जीवन का पुनर्निर्माण करने का दायित्व अस पर ही है।
व्यक्तिवादियों को इस शक्ति का उदय होना ऐसा लगता है जैसे क्षितिज पर तूफानी बादलों की काली घटा घिर आई हो। यह शक्ति उनको उतनी ही डरावनी लगती है, जितनी शारीरिक मृत्यु, क्योंकि उनके लिए यह सर्वहारा वर्ग, जो संसार में तो एक नया जीवन फूँकने के लिये कटिबद्ध है, लेकिन आत्मा के इन अभिजात प्रतिनिधियों के बीच अपनी सहानुभूति बाँटने का इरादा नहीं रखता। इस स्थिति के प्रति जागरूक होने के कारण यह सज्जन सर्वहारा वर्ग से दिली नफ़रत करते हैं।
आध्यात्मिक दरिद्रता की स्थिति में पहुँचकर, विसंगतियों में फँसकर और हमेंशा समृद्धि के आरामदेह कोने में शरण लेने की हास्यास्पद और दयनीय चेष्टाओं में पड़कर, व्यक्ति विघटित हो रहा है और उसकी मानसिकता निरन्तर क्षद्र से क्षुद्रतर होती जाती है। इस बात की अनुभूति से और निराशा के आतंक से घबराकर, जिसे वह चाहे स्वीकार करता हो या स्वयं अपने-आपसे छिपाता हो, व्यक्तिवाद विक्षिप्त की तरह मुक्ति की तलाश में इधर-उधर भटकता फिर रहा है, और कभी अधिभौतिक तत्वज्ञान में डुबकी लगाता है, कभी पापाचार के कीचड़ में धँस जाता है, कभी ईश्वर की खोज करता है, तो कभी शैतान में विश्वास करने लगता है। उसकी समस्त खोज और व्याकुलता उसकी आसन्न मृत्यु की पूर्वसूचक है, और उसके भविष्य की ओर संकेत करती है जिसकी स्पष्ट चेतना उसे चाहे न हो, लेकिन जिसका तीखे रूप से वह अनुभव करने लगा है। आज का व्यक्तिवादी एक घबराहट भरे अवसाद के चंगुल में फंस गया है। वह अपना आपा और विवेक खो बैठा है और जीवन पर अपनी पकड़ कायम रखने के लिये जी-तोड़ कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी शक्ति दम तोड़ रही है और अब उसके पास अपनी चालाकी और धूर्तता के अलावा और कोई सहारा नहीं रहा, जिसे कुछ लोग मूर्खों का विवेक कहते हैं। अपने पूर्व-व्यक्तित्व का मात्र खोल ओड़े, आत्मा में थकान और मन में व्यग्र करने वाली आशंकाएँ लिये, वह अब कभी समाजवाद से इश्क फ़रमाता है तो कभी पूँजीवाद की खुशामद करता है, जबकि उसके अन्दर आसन्न मौत की पूर्वचेतना, उसकी क्षुद्र और बीमार मैं के विघटन की रफ़्तार को और भी तेज कर देती है। उसकी निराशा अब अक्सर एक भयंकर अनास्था का रूप ले लेती है और व्यक्तिवादी कल तक जिसकी पूजा करता आया था आज उसको उन्मादी की तरह नकारने और जलाने लगता है, क्योंकि नकारात्मकता की स्वभाविक परिणति इस तरह की उच्छृंखलता और गुंडागर्दी में ही होती है। मैं इस शब्द का प्रयोग करके उन लोगों का अपमान नहीं करना चाहता जो पहले से ही अपमानित किये जा चुके है, न तिरस्कृत लोगों का तिरस्कार करना चाहता हूँ – ज़िन्दगी स्वयं बड़ी कठोरता से उनके साथ ऐसा व्यवहार करती रही है—नहीं, मेरा मन्तव्य केवल यह है कि उच्छृंखलता और गुंडागर्दी दरअसल व्यक्ति के चरम विघटन का अकाट्य प्रमाण पेश करती है। यह शायद कोई पुराना मानसिक रोग है जो अपर्याप्त सामाजिक पोषण के कारण पैदा होता है, ज्ञानेद्रियों की कोई बीमारी है जो धीरे-धीरे कुंठित और सुस्त होती जाती है और परिवेश से प्रप्त प्रभावों को पर्याप्त तीव्रता से ग्रहण नहीं कर पाती और इस तरह व्यक्ति में एक प्रकार की बौद्धिक संज्ञाहीनता पैदा हो जाती है।
उच्छृंखल या गुंडा व्यक्ति ऐसा प्राणी होता है जिसमें सामाजिकता लेशमात्र को भी नहीं होती है। वह ऐस प्राणी होता है जो अपने आस-पड़ोस की दुनिया के साथ कोई ताल्लुक महसूस नहीं करता. हर प्रकार के जीवन-मूल्यों के प्रति अचेत होता है और धीरे-धीरे अपने-आपको नष्ट होने से बचाने की सहज वृत्ति भी खो देता है और अपने जीवन की कीमत से भी बेख़बर हो जाता है।"
-व्यक्तित्व का विघटन, मक्सिम गोर्की

Sunday, November 1, 2015

गोर्की और मुक्तिबोध के दो उद्धरण (Two Quotes of Gorky and Muktibodh)

कभी-कभी कुछ ऐसे नैजवान मिलते हैं जो वर्तमान व्यवस्था के वैचारिक दमनकारी चरित्र के प्रति अलगाव से खुद को उत्पीणित महसूस करते हैं। लेकिन कुछ सकारात्मक कर पाने की जगह पर उनके आस-पास का माहौल उनके विचारों और व्यक्तित्व को हर स्तर पर कुचल कर एक कायर भीड़ में तब्दील कर रहा है। आज ऐसे नौजवानों को सही दिशा में सोचने और लम्पट भीड़ में सामिल हो जाने से रोकने के लिये सबसे पहली आवश्यकता तो यह है कि हर स्तर पर नये भविष्योन्मुख प्रगतिशील मूल्यों को उनके बीच पहुँचाया जाये और उन्हें एस संजीदा इंसान बनने के लिये प्रेरित किया जाये।
जैसा कि गोर्की ने आज से 80 साल पहले रूस के बारे में कहा था जो हमारे वर्तमान समाज में नोजवानों की स्थिति के बारे में काफी सटीक विवरण प्रस्तुत करता है,
जीवन की ठोस हक़ीकत इस बात की अधिकाअधिक पुष्टि कर रही है कि वर्तमान स्थिति में चैन का जीवन सम्भव नहीं, कूपमण्डूकी खुशहाली स्थाई नहीं हो सकती क्योंकि उस प्रकार की खुशहाली के आधार समस्त संसार से खत्म होते जा रहे हैं। .. समस्त संसार कूपमण्डूक झुँझलाहट, उदासी तथा आतंक के चंगुल में है; धनी कूपमण्डूक उदास होकर इस निरर्थक आशा से मनोरंजन का सहारा ले रहा है कि इससे वह आनेवाले कल के भय को दबा सकेगा; और इसलिये अश्लील भोग-विलास की अस्वस्थ लालसा, मैथुनिक विपथन और अपराध तथा आत्महत्याओं का चक्र चलता है। पुरानी दुनिया अवश्य ही जानलेवा रोग से ग्रस्त है और हमें उस संसार से शीघ्रतिशीघ्र अपना पिण्ड छुड़ा लेना चाहिये ताकि उसकी विषैली हवा कहीं हमें न लग जाये।
बीस वर्षों तक मैंने बापों और बेटोंमें शत्रुता के ऐसे अशिष्ट दृश्य देखे, उस प्रकार की विचारधारात्मक शत्रुता के नहीं, जिसका तुर्गनेव ने सुन्दर वर्णन किया है, बल्कि हर दिन की ऐसी पाषविक शत्रुता जो निजी सम्पत्ति की भावना रखने वाला बाप ऐसी भावना वाले बेटे के प्रति अनुभव करता है। ज्यों ही उस युग का युवक जीवन की समस्याओं में गहरी दिलचस्पी या अपने जानलेवा और असभ्य वातावरण के प्रति आलोचनात्मक होने की स्वाभाविक प्रवृत्ति प्रकट करता तो जागरूक बाप आलोचनात्मक प्रवृत्ति के व्यक्तित्व के चारों ओर शत्रुता का वातावरण खड़ा कर देते, युगों से चली आने वाली परम्परा से विश्वासघात का संदेह पैदा होता और इन सबके साथ सत्य का उपदेश आवश्यक था जो घूँसे, डण्डे, कोड़े या छड़ी की सहायता से दिया जाता। इस उपदेशका अन्त सामान्यतया इस तरह होता कि बेचारा विपदाग्रस्त व्यक्ति आदिम मानव की स्थिति में पहुँचा दिया जाता यानि बाप खुद अपने बेटों को अपनी कूपमण्डूकता प्रदान करते।”( लेखनकला और रचनाकौशल, गोर्की)
ऐसे में मुक्तिबोध का यह उद्धरण अत्यन्त सटीक है,
यदि व्यक्ति में मनुष्यता है तो, निश्चय ही वह अपने जीवन में प्रप्त वास्तविक मूर्त आदर्शों और लक्ष्यों की तरफ़ बढ़ेगा, उसे बढ़ना पड़ेगा। अपने जीवन की भीतरी तथा बाहरी प्रेरणाएँ उसे लक्ष्योन्मुक बनायेंगी ही, उन आदर्शों की और ठेलेंगी। वह अपने जीवन के अनुभवों का वैज्ञानिक अवलेकन करता रहेगा, और अपने तथा दूसरों के अनुभवों से वह सीखगा ही, उसे सीखना पड़ेगा। किन्तु - और यह सबसे बड़ा किन्तु है- आदमीं में इतनी मनुष्यता रहती ही नहीं। साथ ही उसका आभाव भी कभी नहीं होता। किसी में वह कम होती है, किसी में में ज़्यादा, किसी में बहुत ज़्यादा। जिसमें जितनी अधिक मनुष्यता होती है, उसका वास्तविक सामाजिक संघर्ष भी उसे अधिक से अधिक सिखलाता है, और उसे विकास के नये रास्ते बतलाता है। जिस प्रकार वैज्ञानिक दृष्टिकोंण के कारण हमारी समझ बढ़ती है, उसी प्रकार हमारी भीतरी मनुष्यता के कारण हमारा वैज्ञानिक दृष्टिकोंण भी लक्ष्ययुक्त आदर्शमय होता है। फलतः, उस वैज्ञानिक दृष्टिकोण का एक जीवन-व्यापी औचित्य सिद्ध होता है। यद दृष्टिकोंण निश्चय ही यान्त्रिक नहीं है। यान्त्रिकता परस्पर सम्बन्धों को, तथा जीवन प्रक्रियाओं के भीतरी गति श्रोत को, नहीं देखती, विकास को नहीं देखती। वैज्ञानिक दृष्टिकोण, वस्तुतः, यथार्थवादी दृष्टिकोण है, जो अपनी लक्ष्योन्मुखता के कारण ही तथ्य-संग्रह करता है। जिसकी जितनी बड़ी मनुष्यता होगी, निश्चय ही वह मनुष्य-जीवन के बारे में अधिक-से-अधिक ज्ञान रखेगा तथा उसे नवीन बनाता रहेगा।
मुश्किल यह है कि यह मनुष्यता अपनी लक्ष्य-प्रप्ति के लिये जिन संघर्षों की ओर व्यक्ति को ले जाना चाहती है, उस तरफ़ बहुत बार वह मुड़ता ही नहीं। और अगर मुड़ता है, तो गिरता-पड़ता। फलतः ज्ञान, इच्छा और क्रिया का सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाता, न वह हो सकता है। मनुष्यता के संदर्भ के बिना यदि ज्ञान, इच्छा तथा क्रिया में सामंजस्य स्थापित भी हो, तो वह लक्ष्यहीन सामंजस्य है। रीता सारसम्य है। प्रत्येक काल में मनुष्यता के साम्मुख, अपने उद्धार के कुछ विशेष लक्ष्य रहे हैं। उन लक्ष्यों की और जिस आदमी की भतरी मनुष्यता व्यावहारित सामाजिक क्षेत्र में जैसा और जितना संघर्ष करती है, उसी के अनुसार वह मनुष्य अपना अन्तर्वाह्य सन्तुलन और सामंजस्य स्थापित कर सकता है। निश्चय ही, स्वभाव-भेदानुसार मनुष्य के विभिन्न पक्षों का संयोजन तथा संतुलन भी भिन्न होगा। मनुष्यता के संघर्ष में पड़े हुए एक कलाकार का आन्तरिक संतुलन एक नेता के भीतरी सन्तुलन से निश्चय ही भिन्न होगा। किन्तु आन्तरिक सामंजस्य लक्ष्यहीन भी हो सकता है। उदाहरणतः, महाबलशाली स्वेच्छाचारी शासक अपने ज्ञान तथा इच्छानुसार, जनता-विरोधी कार्य भी कर सकता है।  उसमें विघटन नहीं होता । विघटन की क्रिया तो उन लोगों में सर्वाधिक होती है जो न पूरे लक्ष्यवान होते हैं, न गत-लक्ष्य; जो अधकचरे होते हैं और प्रवृत्तियों के वशीभूत होकर इधर-उधर भागते फिरते हैं।
सामंजस्य का प्रश्न मनुष्यता के सम्मुख उपस्थित अपने उद्धार के प्रधान लक्ष्यों के लिये चलनेवाले संघर्ष का प्रश्न है। वह जितना आत्मगत प्रश्न है, उससे कहीं ज्यादा वह सामाजिक प्रश्न है।” (कामायनी एक पुनर्विचार, मुक्तिबोध)

Sunday, August 16, 2015

कार्ल मार्क्स - दर्शन के बारे में एक उद्धरण (Karl Marx - A Quotation On Philosophy)


"अपनी प्रकृति के अनुरूप आचरण करते हुए दर्शन ने पुरोहितों के संन्यासी-सुलभ वस्त्रों की अदला-बदली अख़बारों के हलके पारम्परिक परिधान से करने के लिए कभी पहल नहीं की है। बरहाल, दार्शनिक कुकुरमुत्तों की तरह तो होते नहीं जो यूँ ही ज़मीन फोड़कर निकल आयें, वे अपने युग, अपनी जाति की उपज होते हैं, जिनके अत्यन्त सूक्ष्म, मूल्यवान तथा अदृश्य रस दर्शन के विचारों मे प्रवाहित होते हैं। जो चेतना श्रमिकों के हाथों के माध्यम से रेलवे का निर्माण करती है वही दार्शनिकों के मस्तिष्कों में दार्शनिक प्रणालियाँ भी निर्मित करती है। विश्व से परे दर्शन का कोई अस्तित्व नहीं होता, ठीक वैसे ही जैसे मनुष्य के परे मस्तिष्क का अस्तित्व नहीं होता...। किन्तु दर्शन वस्तुत: ज़मीन पर अपने पैर रखकर खड़ा होने से पहले मस्तिष्क के माध्यम से अस्तित्वमान होता है, जबकि मानवीय कार्य-व्यापार के कई क्षेत्र ऐसे हैं जिनके पैर ज़मीन पर काफ़ी गहरे जमें हुए हैं तथा जो उस समय भी अपने हाथों से इस संसार के फल तोड़ने लग जाते हैं जब उन्हें यह गुमान तक नहीं होता कि सिर भी इस संसार का हिस्सा है, कि या संसार भी सिर का ही संसार है।
"चूँकि हर सच्चा दर्शन अपने युग का बौद्धिक सारतत्व होता है इसलिए जब दर्शन अपने समय की वास्तविक दुनिया के साथ न केवल आन्तरिक रूप से अपनी अन्तर्वस्तु के माध्यम से, बल्कि बाह्य रूप से अपने रूप के माध्यम से भी सम्पर्क में आता है तथा उसके साथ अन्तर्क्रिया करता है तो युग भी बोलने लगता है। तब दर्शन अन्य विश्ष्ट प्रणालियों के सम्बन्ध में दर्शन बन जाता है, समकालीन विश्व का दर्शन बन जाता है।"
(P.35-36, धर्म के बारे में – कार्ल मार्क्स)

Saturday, August 8, 2015

Alcoholism and Crime in Capitalism: Some Views and Quotes



Maxim Gorky about Industrial Workers (from novel ‘Mother’):  “The day was swallowed up by the factory; the machine sucked out of men’s muscles as much vigor as it needed. The day was blotted out from life, not a trace of it left. Man same another imperceptible step towards his grace; But he saw close before his the delight of rest, the joys of the odorous tavern and he was satisfied… The accumulated exhaustion of years had robbed them of their appetites, and to be able to eat they drank, long and deep, goading on their feeble stomachs with the biting, burning lash of vodka… Returning home they quarreled with their wives, and often beat them, unsparing of their fists. The young people sat in the taverns of enjoyed evening parties at one another’s houses, played the accordion, sang vulgar songs devoid of beauty, danced, talked ribaldry and drank. Exhausted with toil, men drank swiftly, and in every heart there awoke and grew an incomprehensible sickly irritation, It demanded and outlet. Clutching disquieting sensation, they fell on one another for mare trifles, with the ferocity of beasts, breaking into bloody quarrels which sometimes ended in serious injury and on occasions even in murder.” (P.253)
A Journalist about Farmers in Villages: “For centuries heavy drinking seemed an indispensable and necessary part of life. The endless grey monotony of peasant life with its constant threat of famine and spice-breaking toil, the dirt and degradation of squalid city slums, stifling atmosphere of merchants’ homes – all this was an appropriate frame for ‘vodka,’ one of the few words.” (P.250)*
Conclusion in the words of Philosopher Friedrich Engels: “Worker drinks primarily to escape from the suffering of his daily existence under capitalism: “… he must have something to make work worth his trouble to make the prospect of the next day endurable… (He seeks) the certainty of forgetting for an hour or two the wretchedness and burden of life.” (P.252)*
*Books: How Capitalism Was Restored in the USSR

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