पिछले काफ़ी समय से टीवी पर एक कार्यक्रम को लेकर ख़ूब प्रचार-प्रसार किया जा
रहा है, सड़कों के किनारे बड़े-बड़े बैनर देखे जा सकते हैं, और लोगों को "ज़ागरुक" करने के एक प्रयास के रूप
में आमिर ख़ान को इस पूरे कार्यक्रम के हीरो के रूप में दिखाया जा रहा है। कई लोग उम्मीद
लगा कर बैठे हैं कि लोगों के बीच जागरुकता लाने के लिए और उन्हें आन्दोलित करने के
लिए यह एक सराहनीय प्रयास होगा जिससे कि देश की "उन्नति" के सभी रास्तों को साफ किया
जा सके।
छह मई को सुबह 11 बजे लोगों का इंतजार समाप्त हो गया और "सत्यमेव जयते" नाम के इस टीवी प्रोग्राम
का पहला प्रसारण लोगों नें देखा। जिसमें कन्या भ्रूण हत्या और महिलाओं की सामाजिक स्थिति के एक पहलू
की झलक को लेकर एक बातचीत को प्रस्तुत किया गया और कुछ उदाहरणों को दिखाकर वर्तमान
सामाज और पारिवार में महिलाओं की स्थिति के यथार्थ के एक छोटे से अंश को जैसे
का तैसा (as it is) रखने का एक प्रयास किया गया। कुछ लोगों का मानना है कि यह वास्तव में एक
सराहनीय प्रयास है, जो अब तक आँख-कान बंद रखने वाले समाज के मध्यवर्ग में और ज़्यादातर
नौजवानों में समाज की कुछ समस्याओं के प्रति भावनात्मक दृश्टिकोंण पैदा
करने का काम करेगा!
ध्यान से देखने के बाद ऐसा लगा कि एक ऐसा विषय लेने के बाद भी इसमें यथार्थ की
एक तस्वीर को दिखा कर छोड़ दिया गया और उसके किसी भी अन्य पहलू को दिखाने की कोई
कोशिश नहीं की गई। कन्या भ्रूण हत्या और महिलाओं की सामाजिक असमानता का कोई भी
तर्कसंगत विश्लेषण नहीं दिया गाया, सिवाय इसके कि जिन उदाहरणों को दिखाया गया
उनमें सम्मिलित लोगों के प्रति कानूनी कार्यवाही की जाए और इसे रोका जाना चाहिए
(और इसके लिए जनता को एस.एस.एस करने के लिए आन्दोलित किया गया!!)। लेकिन व्यक्ति को
अपने पारिवारिक और आसपास के आर्थिक, सामाजिक या राजनीतिक परिवेश को आलोचनात्मक
दृष्टि से देखने के लिए न कोई विचार ही देने की कोशिश की गई और न ही इसकी कोई
आवश्यकता स़ायद कार्यक्रम से ज़ागरुकता फ़ैलाने में लगे लोगों को लगती है।
वास्तव में यह समस्या मूल रूप से महिलाओं की आर्थिक गुलामी और सामाजिक दासता
से जुड़ी हुई है, जिसे कि पूरे कार्यक्रम के दौरान बड़ी चालाकी से दर्शकों के
सामने नहीं लाया गया। आज जिस प्रकार के पारिवारिक संबन्ध समाज में मौज़ूद हैं, जिस
प्रकार की सम्पत्ति आधारित पित्र-सत्तात्मक पारिवारिक संस्था समाज में बनी हुई
है, जो कि पुराने सामंतवादी मूल्यों का जनता द्वारा पीठ पर ढोने का नतीजा है,
वही आज समाज के रूढ़िवादी विचारों के रूप में अनेक कुप्रथाओं, विषमताओं और शोषण पर
आधारित संपत्ति-संबन्धों को जन्म दे रही हैं। एक बहुत छोटे स्तर तक यह पुराने
सामंती संस्कार टूट तो रहे हैं लोकिन पूरी आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था में कभी
भी इनके प्रति लोगों में सचेतन ज़ागरुकता लाने का प्रयास नहीं किया जाता, जिसका
फ़ायदा लोगों को बंधनों में जकड़ कर उनकी पहलकदमी को दबाने के रूप में अनेक प्रकार
से उठाया जाता है। वास्तव में पुराने संस्कारों को ढोने का प्रचलन और कन्या भ्रूण
हत्या जैसी घटनायें परिवार और समाज में महिलाओं की आर्थिक गुलामी से उपजी अनेक
घिनौनी कुरीतियों का ही एक हिस्सा हैं। क्योंकि हर सम्पत्तिधारी परिवार अपनी सम्पत्ति
का वारिस चाहता है, और गरीब परिवार लड़की के रूप में संतान नहीं चाहते क्योंकि उन्हें
वर्तमान शादी व्यवस्था के अनुसार लड़की के लिए दहेज का बोझ सर पर लेना पड़ेता है।
लेकिन मुख्य रुप से यह समस्या मध्य वर्ग और उच्च मध्य वर्ग में ज्यादा मौज़ूद है,
जैसा कि इस प्रोग्रम में एक उदाहरण भी दिया गया था। जब तक संपत्ति संबन्धों
पर आधारित परिवारों की संस्था को तोड़ा नहीं जाता और महिलाओं का एक आर्थिक
स्तंत्रता नहीं मिलेगी और उनका एक स्वतंत्र आस्तित्व नहीं होगा तब तक इस
प्रकार की विषमताओं को समाज से समाप्त नहीं किया जा सकता।
आज आधुनिक से आधुनिक परिवारों में भी महिलाओं को पुरुषों के अधीन माना जाता है
और उन्हें लड़के के रूप में संपत्ति के वारिस के पालन-पोषण और घर सम्भालने की जिम्मेदारी
दी जाती है, जिसके मालिक पुरुष होते हैं। जिसका एक स्वरूप यह है कि आज भी समाज में रिश्ते व्यक्तिगत और वैचारिक मानवीय संबन्धों के आधार पर नहीं, बल्कि पारिवारिक संपत्ति
संबन्धों के आधार पर होती हैं। आज जो पारवारिक संबन्ध हमारे समाज में मौज़ूद हैं
उसमें महिलाओं का कोई स्वतंत्र आस्तित्व ही नहीं होता और उन्हें पहले पिता और फिर
पति के अधीन माना जाता है (यह तो हिंदू विवाह के समय कहे जाने वाले वचनों में भी
स्पष्ट है)। जैसा कि एक घटना के रूप में इस कार्यक्रम में भी दिखाया गया कि कई जगह
शादी के लिए पिता अपनी बेटियों को बेंच देते हैं, क्योंकि उनकी मौज़ूदा आर्थिक
परिस्थितियों में जिंदगी और मौत का सवाल हमेशा उनके सिर पर मंडराता रहता है। एक और
उदाहरण तमिलनाड़ु का भी है, जहां पर दहेज की आदायगी के नाम पर बच्चियों से
कारखानों के मालिक गुलामी करवाकर मुनाफ़ा कमाने की होड़ में लगे हुए हैं (द हिंदू,
२८ मई २०११, यहाँ देखें)। इस तरह यदि देखा जाए तो
कन्या भ्रूण हत्या या बच्चियों को बेंचने और घरेलू हिंसा जैसी घटनायें महिलाओं की आर्थिक-सामाजिक
ग़ुलामी के ही अनेक कुरूपों का एक पहलू हैं।
ऐसी स्थिति में अनेक नौजवानों से बात करने पर भी पता चलता है कि वर्तमान
पारवारिक संस्था, शादी के तरीके और संबन्धों के रूपों को वह ठीक नहीं मानते, लेकिन
कोई सैद्धांतिक समझ न होने के कारण और वैचारिक रूप से काफी पिछड़े होने की बजह से
यह नौजवान (पुरुष और महिलायें) पुरानी परंपराओं को ढोते हुए यह अपने विचारों से
अनेक प्रकार के समझौते करते हुए लकीर के फ़कीर बने रहते हैं।
अब इस कार्यक्रम के मुद्धे को देखें तो समस्या की मुख्य बाद फ़िर से इसी सवाल
पर आ जाती है कि क्या इस प्रकार के कार्यक्रम सही में जनता को ज़ागरुक करने के लिए
बनाए जाते हैं। क्या इसमें जो सामाजिक समस्यायें दिखाई गईँ उनका सही विश्लेषण
प्रस्तुत नही किया जाना चाहिए था। और यदि ऐसा था तो पहले ही प्रसारण में पूरे
कार्यक्रम को अधूरे नतीजे और एक भावनात्मक अपील तक ही क्यों सीमित किया गया? एक
कारण तो यह कहा जा सकता है कि आज जिस प्रकार सामाजिक समस्याओं पर मध्यवर्ग के
लोगों के बीच भी थोड़ी चहल पहल का माहौल है उससे इस कार्यक्रम के प्रयोजकों को
काफ़ी मुनाफ़ा कमाने का भी मौका मिलेगा और जनता के धन पर अति-विलासिता की ज़िन्दगी
जीने वाले कुछ लोगों को जनता के बीच अपनी एक अच्छी छवि का प्रचार करने का मौका भी
मिल जाएगा। नहीं तो यदि इस प्रकार के कार्यक्रमों के माध्यम से पारिवारिक-समाजिक
संबन्धों की सही विवेचना जनता के सामने लाकर लोगों को जाग़रुक करने का यह कोई ठोस
प्रयास होता तो वर्तमान पारिवारिक संबन्धों का एक आर्थिक और राजनीतिक भण्डाफोड़ करना
आवश्यक हो जाता। और वर्तमान आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था द्वारा पैदा की
गईं अनेक विषमताओँ पर एक सवाल खड़ा किया जाता। लेकिन कार्यक्रम प्रयोजक और मेज़बान
कभी भी यह नहीं कर सकते थे क्योंकि अंततः सारी बात लोगों को अंधेरे में रखकर
मुनाफ़े कमाने की होड़ पर आकर समाप्त हो जाती है।



