Friday, March 22, 2013

भगतसिंह और उनके साथी क्रांतिकारियों के विचारों की सान पर . . .


भगतसिंह (28 सितम्बर 1907 - 23 मार्च 1931)
शहीदों के सपनों को याद करते हुए!
भगतसिंह और उनके क्रांतिकारी साथियों द्वारा भारत की आज़ादी के संघर्ष के दौरान इस्तेमाल किये गये यह दो शब्द आज भी हर न्यायप्रिय इंसान की आत्मा को झकझोर देते हैं। इन शहीदों के यह शब्द हमें सोचने के लिये मजबूर करते हैं कि आज आज़ादी के 66 साल बाद भी हर तरफ़ मौज़ूद बेकारी, गै़र-बराबरी और ग़रीबी का क्या कारण है? और हमारे सामने एक सवाल खड़ा हो जाता है कि इन शहीदों के सपने क्या थे और वे समाज और आज़ादी के बारे में क्या सोचते थे? भगसिंह को ज़्यादातर लोग असेम्बली में बम फेंकने वाले एक जोशली क्रान्तिकारी नौजवान के रूप में तो जानते हैं, लेकिन एक विचारक के रूप में लोग उन्हें नहीं जानते। उनके विचार, उनके सिद्धान्त आज भी ज़्यादातर लोगों के लिये अनजान हैं। असेम्बली में बम फेंकने के बाद जेल में रहते हुये भगतसिंह और उनके साथियों ने अनेक पुस्तकों का अध्ययन कियाइस दौरान भगतसिंह ने कई महत्वपूर्ण लेख लिखे जो 1986 में प्रकाशित किये गये। इन लेखों में भगतसिंह के क्रान्ति और समाज के निर्माण के बारे में उनके सारे मत बिल्कुल स्पष्ट रूप से सामने आते हैं। जेल में रहकर अध्ययन करते हुये भगत सिंह वैज्ञानिक समाजवाद को अपना चुके थे और अपने अन्तिम दिनों में रूसी क्रान्तिकारी नेता लेनिन का जीवन परिचय पढ़ रहे थे। वह सोवियत यूनियन में हुई समाजवादी सर्वहारा क्रान्ति से अत्यधिक प्रभावित थे। इसका अन्दाज़ा जेल से उनके द्वारा लिखे गये एक पत्र से लगाया जा सकता है, "लेनिन-दिवस के अवसर पर हम सोवियत रूस में हो रहे महान अनुभव और साथी लेनिन की सफलता को आगे बढ़ाने के लिये अपनी दिली मुबारक़बाद भेजते हैं। हम अपने को विश्व-क्रान्तिकारी आन्दोलन से जोड़ना चाहते हैं। मज़दूर राज की जीत हो।"
भगतसिंह और उनके साथी कैसी आज़ादी की बात कर रहे थे और कैसा समाज चाहते थे उसकी एक झलक अदालत में दिये गये उनके इस बयान में भी देखने को मिलती है,
"क्रांति से हमारा अभिप्रय है अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।

समाज का मुख्य अंग होते हुये भी आज मज़दूरों को उनके प्राथमिक अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने परिवार सहित दाने-दाने के लिये मुहताज हैं। दुनियाभर के बाज़ारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढकनेभर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं। इसके विपरीत समाज के जोंक शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा-सी बातों के लिये लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।

यह भयानक असमानता और ज़बरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनियाँ को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिये जा रहा है। यह स्थिति अधिक दिनों तक का़यम नहीं रह सकती। स्पष्ट है कि आज का धनिक समाज एक भयानक ज्वालामुखी के मुख पर बैठकर रंगरेलियाँ मना रहा है और शोषकों के मासूम बच्चे तथा करोड़ों शोषित लोग एक भयानक खड्ड की कगार पर चल रहे हैं।

सभ्यता का यह प्रसाद यदि समय रहते सँभाला न गया तो शीघ्र ही चरमराकर बैठ जायेगा। देश को एक आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। और जो लोग इस बात को महसूस करते हैं उनका कर्तव्य है कि साम्यवादी सिद्धान्तों पर समाज का पुनर्निर्माण करें। जब तक यह नहीं किया जाता और मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का शोषण, जिसे साम्राज्यवाद कहते हैं, समाप्त नहीं कर दिया जाता तब तक मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असम्भव है...।"
व्यवस्था में जिस आमूल परिवर्तन की बात भगतसिंह कर रहे थे उसका अर्थ था एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण जहाँ एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के शोषण को असम्भव बना दिया जाये। वह एक ऐसे समाज के निर्माण का सपना देख रहे थे जहाँ सारे सम्बन्ध समानता पर आधारित हों और हर व्यक्ति को उसकी मेहनत का पूरा हक़ मिले। इसी क्रम में उस समय सत्ता हस्तानान्तरण हस्तान्तरण के लिये बेचैन और जनता की स्वत:स्फूर्त शक्ति को अपने राजनीतिक फ़ायदे के लिये इस्तेमाल कर रही कांग्रेस के बारे में भगतसिंह का कहना था कि सत्ता हस्तानान्तरण से दलित-उत्पीड़ि‍त जनता के जीवन में कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा जब तक एक देश द्वारा दूसरे देश और एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति के शोषण का समर्थन करने वाली व्यवस्था को ध्वस्त करके एक समानतावादी व्यवस्था की नींव नहीं रखी जायेगी। उनका मानना था कि तब तक मेहनतकश जनता का संघर्ष चलता रहेता। आज 66 साल के पूँजीवादी शासन में लगातार बढ़ रही जनता की बदहाली और शोषण अत्याचारों की घटनाओं से भगतसिंह की बातें सही सिद्ध हो चुकी है। भगत सिंह और उनके साथियों ने फाँसी से तीन दिन पहले 20 मार्च 1931 को गवर्नर को लिखे गए पत्र में कहा था, "यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने (भारतीय) जनता और श्रमिकों की आय पर अपना एकाधिकार कर रखा है चाहे एसे व्यक्ति अंग्रेज पूँजीपति और अंग्रेज या सर्वथा भारतीय ही हों, उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है। चाहे शुद्ध भारतीय पूँजीपतियों द्वारा ही निर्धनों का खू़न चूसा जा रहा हो तो भी इस स्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता।"
भगतसिंह मज़दूरों के क्रान्तिकारी संघर्ष के मार्क्सवादी सिद्धान्त के क़रीब पहुँच चुके थे और उन्होंने एक संगठित मज़दूर आन्दोलन के माध्यम से क्रान्तिकारी परिवर्तन के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने का नौजवानों से आह्वान किया था। 19 अक्टूबर 1929 को जेल से विद्यार्थियों के नाम लिखे गये अपने पत्र में भगतसिंह ने कहा था, "नौजवानों को क्रान्ति का यह सन्देश देश के कोने-कोने में पहुँचाना है, फ़ैक्‍ट्री-कारखानों के क्षेत्रों में, गन्दी बस्तियों और गाँवों की जर्जर झोपड़ियों में रहने वाले करोड़ों लोगों में इस क्रान्ति की अलख जगानी होगी जिससे आज़ादी आयेगी और तब एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य का शोषण असम्भव हो जायेगा।" वह सिर्फ़ साम्राज्यवादी शोषण का ही विरोध नहीं करते थे, बल्कि उनका मानना था कि जब तक समाज असमानता पर खड़ा रहेगा तब तक मेहनतकश जनता की स्थिति नहीं बदल सकती, "स्वतन्त्रता प्रत्येक मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। श्रमिक वर्ग ही समाज का वास्तविक पोषक है, जनता की सर्वोपरि सत्ता की स्थापना श्रमिक वर्ग का अन्तिम लक्ष्य है।"
भगतसिंह ने अपने सभी विचारों में व्यवस्था परिवर्तन और आर्थिक एवं राजनीतिक क्रान्ति खड़ी करने के लिये जनता को जागरुक करने और मेहनकश वर्ग को संगठित करने के लिये वर्ग-चेतना के विकास पर जोर दिया था। भगतसिंह के शब्दों में, "संगठनबद्ध हो जाओ। स्वयं कोशिशें किये बिना कुछ भी न मिल सकेगा। संगठनबद्ध हो अपने पैरों पर खड़े होकर पूरे समाज को चुनौती दो।... यह पूँजीवादी नौकरशाही तुम्हारी गुलामी का असली करण है। तुम असली सर्वहारा हो... संगठनबद्ध हो जाओ। तुम्हारी कुछ हानि न होगी। बस गु़लामी की जंज़ीरें कट जायेंगी। उठो, और वर्तमान व्यवस्था के विरुद्ध बग़ावत खड़ी कर दो। धीरे-धीरे होने वाले सुधारों से कुछ नहीं बन सकेगा। सामाजिक आन्दोलन से क्रान्ति पैदा कर दो तथा राजनीतिक और आर्थिक क्रान्ति के लिये कमर कस लो। तुम ही देश के मुख्य आधार हो, वास्तविक शक्ति हो..."
सत्ता हथियाने के लिये लोगों को जाति और धर्म के नाम पर आपस में लड़ा कर अपना राजनीतिक फ़ायदा उठाने वाले लोगों का भी भगतसिंह ने खुला विरोध किया है। आपने आरम्भिक दिनों में लिखे गये लेख 'अछूत का सवाल' और जेल में अपने अन्तिम दिनों में लिखे गये 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' लेख में भगतसिंह ने असमानता का पक्ष पोषण करने वाली अनेक धार्मिक कुरीतियों तथा और जातीय असमानताओं तथा छुआ-छूत का खुलकर विरोध किया। ग़रीब मेहनतकश जनता को उनकी बदहाली के बारे में बेख़बर रखने के लिये धर्म और जाति का भ्रम फैलाने वाली सम्प्रदायिक ताक़तों और शोषण सम्बन्धों तथा मालिकों के हितों की हिफ़ाजत करने वाली राजनीति के बारे में भगतसिंह ने सीधे कहा था, "लोगों को परस्पर लड़ने से रोकने के लिए वर्ग-चेतना की ज़रूरत है। ग़रीब मेहनतकशों और किसानों को स्पष्ट समझा देना चाहिए कि तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं, इसलिए तुम्हें इनके हथकण्डों से बचकर रहना चाहिए और इनके हत्थे चढ़कर कुछ न करना चाहिए। ... कलकत्ते के दंगों में एक बात बहुत ख़ुशी की सुनने में आयी। वह यह कि वहाँ दंगों में ट्रेड यूनियनों के मज़दूरों ने हिस्सा नहीं लिया और न ही वे परस्पर गुत्थमगुत्था ही हुए, वरन सभी हिन्दू-मुसलमान बड़े फोरम से क़ारख़ानों आदि में उठते-बैठते और दंगे रोकने के यत्न करते रहे। यह इसलिए कि उनमें वर्ग-चेतना थी और वे अपने वर्गहित को अच्छी तरह पहचानते थे। वर्ग-चेतना का यही सुन्दर रास्ता है, जो साम्प्रदायिक दंगे रोक सकता है। 1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग कर दिया था। वे समझते थे कि धर्म व्यक्ति का व्यक्तिगत मामला है, इसमें दूसरे का कोई दख़ल नहीं। न ही इसे राजनीति में घुसाना चाहिए, क्योंकि यह सरबत को मिलकर एक जगह काम नहीं करने देता।"
जिस तरह मज़दूरों और किसानों को जातियों और धर्मों के नाम पर बाँटा जाता है, और उनकी एकजुट ताक़त को कमज़ोर किया जाता रहा है, वह वास्तव में पूँजीवादी सत्ता की मदद करता है जो कि पूँजी के हितों पर आपस में मज़दूरों के विरुद्ध एकजुट होते हैं। एक ओर सच्चाई यह है कि पूरे देश के हर जाति और हर धर्म के मज़दूरों की सबसे बड़ी आबादी एक जैसी स्थिति में काम करने के लिये मजबूर है, एक जैसी स्थिति में मज़दूर बस्तियों में रहती है। ऐसे में जाति और धर्म की पुरानी कुरीतियाँ टूट रही हैं, लेकिन अभी भी कई जगह मालिक और पूँजीपतियों के दलाल नेता हिन्दू-मुसलमान, बिहार-महाराष्ट्र या ऊँची और नीची जाति जैसे जनविरोधी नारे लगाकर मज़दूरों की ताक़त को कमज़ोर करने में सफल हो जाते हैं। व्यवस्था परिवर्तन के लिये क्रान्ति का जो आह्वान भगतसिंह ने किया था उसका उद्धेश्य था हर प्रकार के शोषण को अन्त करना और हर असमानता सूचक और लोगों के बीच भेदभाव करने वाली धार्मिक और जातीय रूढ़ियो का समाज से समूल नाश करना, और इनके आधार पर किये जाने वाले साम्प्रदायिक जाति-छुआछूत-शोषण जैसी हर चीज का अन्त करना। भगतसिंह ने कहा था, "धार्मिक अन्धविश्वास और कट्टरपन हमारी प्रगति में बहुत बड़े बाधक हैं। वे हमारे रास्ते के रोड़े साबित हुए हैं और हमें उनसे हर हालत में छुटकारा पा लेना चाहिये। 'जो चीज़ आज़ाद विचारों को बरदाश्त नहीं कर सकती उसे समाप्त हो जाना चाहिए।' इस काम के लिये सभी समुदायों के क्रन्तिकारी उत्साह वाले नौजवानों की आवश्यकता है।"
धार्मिक कट्टरपन्थी राजनीति का विरोध करने के साथ ही भगतसिंह सामाजिक मूल्यों में व्याप्त धर्म  के यथास्थितिवादी और भाग्यवादी विचारों एवं स्वर्ग-नर्क जैसे अन्धविश्वासों का भी विरोध करते थे। भगतसिंह का कहना था, "धर्म का रास्ता अकर्मण्यता का रास्ता है, सब कुछ भगवान के सहारे छोड़ हाथ पे हाथ रखकर बैठ जाने का रास्ता है, निष्काम कर्म की आड़ में भाग्यवाद की घुट्टी पिला कर देश के नौजवानों को सुलानें का रास्ता। मैं इस जगत को मिथ्या नहीं मनाता। मेरे लिए इस धरती को छोड़ कर न कोई दूसरी दुनिया है न स्वर्ग। आज थोड़े-से व्यक्तियों ने अपने स्वार्थ के लिए इस धरती को नरक बना डाला है। शोषकों तथा दूसरों को गु़लाम रखने वालो को समाप्त कर हमें इस पवित्र भूमि पर फिर से स्वर्ग की स्थापना करनी पड़ेगी।"
आज जहाँ एक ओर देश की अर्थव्यवस्था लगातार उछाल पर है वहीं दूसरी ओर देश की 80 फ़ीसदी मेहनत-मज़दूरी करने वाली आबादी बेरोज़ग़ारी और घोर शोषण की हालत में जीने के लिये मजबूर है और देश की 77 फ़ीसदी आबादी रोजाना 20 रुपयों से भी कम आमदनी पर जी रही है। वर्तमान पूँजीवादी सत्ता द्वारा लगातार ठेकाकरण को बढ़ावा देने और श्रम का़नूनों को तिलांजलि देने के बाद आज पूरे देश की 93 फ़ीसदी मज़दूर आबादी बिना किसी श्रम क़ानून के ठेके पर काम कर रही है। ऐसी स्थिति में मज़दूरों के शोषण की नींव पर खड़ी वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था को चुनौती देने के लिये भगतसिंह के विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने कि तब थे जब कि भारत ब्रिटेन का उपनिवेश था। भगतसिंह का नाम आज भी भारत के हर कोने में जनता पर होने वाले जुल्म-अन्याय और शोषण के विरुद्ध जनता की आवाज़ का उसी स्तर पर प्रतिनिधित्व करता है जितना की तब करता था। यही कारण है कि आज कई दशाब्दियाँ बीत जाने के बाद भी वर्तमान सत्ता उनके विचारों को जनता की नज़रों से छुपाकर रखने के पूरे प्रयास करती है। और इसी डर से उस समय सत्ता पर क़ाबिज़ साम्राज्यवादी सत्ता और सत्ता हस्तानान्तरण की माँग कर रही कांग्रेस भी पूरे देश में बढ़ रहे उनके विचारों से घबरा गई थी।
अन्त में भगत सिंह के शब्दों में, "जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वे हिचकिचाते हैं। इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिये एक क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की ज़रूरत होती है, अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है।... लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को ग़लत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इन्सान की प्रगति रुक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिये यह ज़रूरी है कि क्रान्ति की स्पिरिट ताज़ा की जाये, ताकि इन्सानियत की रूह में हरकत पैदा हो।
"... क्रांति मानवजाति का जन्मजात अधिकार है जिसका अपहरण नहीं किया जा सकता।... प्रगति के समर्थक प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह पुराने विश्वास से सम्बन्धित हर बात की आलोचना करे, उसमें अविश्वास करे और उसे चुनौती दे।... निर्माण के लिए ध्वंस ज़रूरी ही नहीं, अनिवार्य है।"

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