Tuesday, March 22, 2011

23 March 2011 (२३ मार्च २०११) . . . ! !

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२३ मार्च 2011 ! !

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ब्रिटिश सरकार नें डरके 23 मार्च 1931 को फाँसी दी थी
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ज्यादातर लोग सोच रहे होंगे, कि क्या हो गया, ये तो हर साल आता है? अब अगर कोई इन लोगों से उम्मीद करे कि ये अपने रोजमर्रा के छोटे से जीवन से बहार निकल कर देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चारो और मची लूट खसोट को रोकने के लिए कुछ करेंगे तो शायद यह एक मजाक जैसा लगेगा |


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लेकिन फिर भी आज २३ मार्च, शहीद दिवस, के दिन जब पूरे देश के नौजवानक्रिकेट में "व्यस्त" है, और ज्यादातर यह भी नहीं जानते कि २३ मार्च १९३१ को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी गयी थी; जब कि पूरा पूंजीवादी मीडिया कभी इसकी चर्चा नहीं करता, तो कम से कम हमें अपनें प्रयास से ही कुछ लोगों के कानों तक कुछ जानकारी पहुंचा देनी चाहिए इस सब के साथ-साथ हमारे आसपास कुछ और भी हो रहा हैं, जैसे नेताशाही घोटाले करनें में व्यस्त है !! अफसारशाही घूसखोरी में व्यस्त है!!  पूंजीवादी मुनाफाखोरी में व्यस्त हैं !! और साम्राज्यवादी दुसरे देशों के उद्योगों को लूटने में व्यस्त हैं !!  और जनता . . . .  !!
हो सकता है कि कुछ लोग जो अपनी रोजमर्रा की छोटी-छोटी समस्यायों के लिए सरकार को कोसनें के अलावा और कुछ भी नहीं करते, वे सायद कायरता सूचक अपनी बेबुनियाद बहसों से आगे बढकर कुछ महत्वपूर्ण बातों के बारे में भी सोच सकें |

ज्यादातर लोग बहस करते हुए दिखाते हैं कि उस पूंजीपति ने एक बड़ा घर बना लिया ! उस विशिष्ट व्यक्ति नें कुछ और पैसे जमा  कर लिए! सचिन नें एक और शतक बना लिया!.... लेकिन ये लोग उन अनेक लोगों के बारे में भूल चुके हैं जिनकी कुर्बानी की बदौलत आज ये हम विदेशी शोषण और खुली तानाशाही से आज़ाद होकर चैन की साँस ले पा रहे हैं, और जिनकी बदौलत "Indian and Dogs not allowed" वाले पोस्टर अब नहीं दिखाते | लेकिन फिर भी मेहनतकश जनता के शोषण की परिस्थितियां लगातार बदतर होती जा रहीं है| जिसके कारण आज-कल चोर और धोकेबाज़ (ये सच किसी से छिपा नहीं है! और जिसे यह भी नहीं पता उसको भारत का नागरिक कहलानें का कोई अधिकार नहीं !!) नेताशाही अफसरशाही और पूंजीपति वर्ग को इन क्रांतिकारी शहीदों के नाम से डर लगता है; लेकिन क्यों लगता है ? क्योकि कहीं इन शहीदो के साम्यवाद के विचार जिनको वे अपने छोटे से जीवन काल में  समझ चुके थे, वे विचार कही जनता के कानों में न पड़ जाएँ नहीं तो जनता उनकी चोरी को पकड़ लेगी और उनकी लूट-खसोट ज्यादा नहीं चल पयेगी !!

--> भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के साथी शिव वर्मा की किताब से कुछ विचार,
"आज जिस आज़ादी का उपभोग हम कर रहे हैं उसकी भव्य इमारत की बुनियाद डालने में . . . कितने ही ज्ञात तथा अज्ञात क्रांतिकारियों ने अपना रक्त और मांस गला दिया था| . . . क्या हम उसका उचित सम्मान कर रहे हैं?" (pg. १३१ संस्मृतियाँ शिव वर्मा)
"बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक में जहाँ एक तरफ देश की क्रांतिकारी शक्तियाँ करवटें बदल रही थीं और मजदूर तथा किसान जनता कुछ कर गुजरने के लिए कसमसा रही थी वहीँ देशद्रोही राजभक्त प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ हिन्दुओं और मुसलमानों को लड़ाकर जनता को पथ विमुख करने का प्रयास कर रही थीं| उसका विरोध करते हुए हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देकर घोषणा-पत्र में धार्मिक अन्ध-विशवास पर तीखा प्रहार किया गया था|" . . . ". .. हम भारतवासी क्या कर रहे हैं? पीपल की एक डाल टूटते ही हिन्दुओं की धार्मिक भावनाएं चोटिल हो उठती हैं| बुतों को तोड़ने वाले मुसलमानों कि ताजिये नाम के कागज़ के बुत का एक कोना फटते ही अल्लाह का प्रकोप जाग उठता है और फिर वह नापाक हिन्दुओं के खून से कम किसी वस्तु से संतुष्ट नहीं होता| मनुष्य को पशुओं से अधिक महत्व दिया जाना चाहिए लेकिन यहाँ भारत में वे लोग पवित्र पशु के नाम पर एक-दुसरे का सर फोड़ते हैं|" (pg. १५८ संस्मृतियाँ शिव वर्मा)


 "आन्दोलन के चढ़ाव-उतार के बीच प्रतिकूल वातावरण में कभी ऐसे भी क्षण आते हैं जब एक-एक कर सभी हमराही छूट जाते हैं| उस समय मनुष्य सांत्वना के दो शब्दों के लिए भी तरस उठता है| ऐसे क्षणों में भी विचलित न होकर  जो लोग अपनी राह नहीं छोड़ते, इमारत के बोझ से जिनके पैर नहीं लड़खड़ाते, कन्धे नहीं झुकते, जो तिल-तिल कर अपने आप को इसलिए गलाते रहते हैं, इसलिए जलाते रहते हैं कि दीये की जोत मद्धिम न पड़ जाये, सुनसान डगर पर अँधेरा न छा जाये, ऐसे लोगों की क़ुर्बानी और त्याग पहले वालों के मुक़ाबिले क्या अधिक नहीं है?" - (pg. २३ संस्मृतियाँ शिव वर्मा)
"क्रांतिकारियों का विश्वास है कि देश की जनता की मुक्ति केवल क्रांति द्वारा ही सम्भव है| क्रान्ति से हमारा अभिप्राय केवल जनता और विदेशी सरकार में सशस्त्र संघर्ष ही नहीं है, हमारी क्रांति का लक्ष्य एक नवीन न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था है| इस क्रांति का उद्देश्य पूंजीवाद को समाप्त करके श्रेणीहीन समाज की स्थापना करना और विदेशी तथा देशी शोषण से जनता को मुक्त कर उसे आत्म निर्णय द्वारा जीने का अवसर प्रदान करना है|" ". . . क्रांति देशी तथा विदेशी शोषण जैसे भयानक बोझ के नीचे कराहते लाखों-करोड़ों नंगे-भूखे मेहनतकशों को खुशियाँ और सम्रद्धि प्रदान करेगी| यह राष्ट्र को अपना असली रूप प्रदान करेगी| यह एक नए समाज और नए राज्य को जन्म देगी| यह सर्वहारा वर्ग की तानाशाही की स्थापना करेगी और सामाजिक जोंकों को हमेशा के लिए राजनीतिक सत्ता से निकल बाहर कर देगी|" (pg. १६१ संस्मृतियाँ शिव वर्मा)

"क्मयूनिज्म या  समाजवाद का रास्ता ही देश के भविष्य का रास्ता है इस पर उसे पूरा विश्वास था| इसके यह माने नहीं कि उसने समाजवाद के सिद्धांत को समझ लिया था| समाजवाद क्या है? उसकी स्थापना किन उपायों से से संभव हो सकती है? भविष्य में समाजवादी समाज की रुपरेखा क्या होगी? आदि प्रश्नों की भी जानकारी उसके पास नहीं थी| वह सिर्फ़ इतना जनता था की पूँजीवादी समाज में श्रम करने वालों की पसीने की कमाई थोड़े-से पूंजीपतियों के हाथ में चली जाति है| इसके विपरीत समाजवादी समाजवादी समाज में न कोई अमीर होगा न कोई ग़रीब| कोई किसी का शोषण न कर सकेगा और न ही एक देश दूसरे देश को गुलाम बना कर रख सकेगा| मार्क्सवाद और कमयूनिज़्म की सैद्धांतिक जानकारी न रहने पर भी जिसने अपने जीवन में ग़रीबी के दिन देखे हैं, उस जीवन में कितना अपमान, कितनी कडुवाहट और कदम-कदम पर कितनी ठोकरें हैं इसका अनुभव किया है उसके निकट समाजवाद में गहरी निष्ठां पैदा करने के लिए उपरोक्त विश्वास ही काफ़ी है| राजगुरु भी अपने जीवन के अनुभवों से समाजवाद की ओर आकर्षित हुआ था| आगे चलकर इस आकर्षण ने गहरी निष्ठां एवं विश्वास का रूप ले लिया|" (pg. १०० संस्मृतियाँ शिव वर्मा)

"कुछ लोगों पर नेतागिरी ऐवं "नाम का नशा भूत बनकर सवार रहता है|" ऐसे लोग संघर्ष में उतरने से कतराते हैं और जोखिम के कामों से अपने आपको कोसों दूर  रखते हैं| वे बलिदान  और त्याग के बगैर ही नाम चाहते हैं - करे कोई और नाम हो उनका| ऐसे लोग दुनिया की आँखों में धूल झोंक कर  अगर अपना उल्लू सीधा न करें, "किसी की बढ़ती हुई स्पीड को यदि अपनी चाणक्य बुद्धि से ब्रेक न लगायें तो कहाँ जायें?" - दुर्गादेवी| (pg. १४८ संस्मृतियाँ शिव वर्मा)

"अंग्रेज़ी हुकूमत में भारत की आर्थिक तबाही पर घोषणा-पत्र ने कहा, "भारत के उद्दोग-धंधों के पतन और विनाश के बारे में बतौर गवाही क्या रमेशचन्द्र दत्त, विलियम डिगवी और दादा भाई नौरोजी के सारे ग्रन्थों को उद्धत करने की आवश्यकता होगी? क्या इस बात को साबित करने के लिए कोई प्रमाण लाना पड़ेगा कि अपनी उपजाऊ भूमि तथा खानों के बावजूद आज भारत सबसे गरीब देशों में एक है, कि भारत जो अपनी महान सभ्यता पर गर्व कर सकता था, आज बहुत पिछड़ा हुआ देश है जहाँ साक्षरता का अनुपात केवल पाँच प्रतिशत है| क्या लोग यह नहीं जानते कि भारत में सबसे अधिक लोग मरते हैं और वहाँ बच्चों की मौत का अनुपात दुनिया में सबसे ऊँचा है? प्लेग, हैजा, इन्फ़्लुएन्जा तथा इसी प्रकार की अन्य महामारियाँ आये दिन की व्याधियाँ बनती जा रही हैं|...क्या हमने अपने वाणिज्य और व्यवसाय को उनकी शैशव अवस्था में कुचला जाते नहीं देखा... |"  (pg. १५८ संस्मृतियाँ शिव वर्मा)

"और सच बात तो यह है कि जिसकी आँखों में सबके लिए आँसूं नहीं और जिसके हृदय में सबके लिए प्यार नहीं वह शोषक और अत्याचारी से घृणा भी नहीं कर सकता - अन्त तक उससे जूझ भी नहीं सकता|. . . "  (pg. ७० संस्मृतियाँ शिव वर्मा)

2 comments:

  1. R Kumar ji ... U r doing a great work ... I appreciate and I am with you.


    My Blog : Gandhi Ka Sach

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  2. आप इस कार्य में हमारे साथ हैं, यह अच्छी बात है,
    लेकिन किस तरह से आप साथ देना चाहते हैं,
    क्योंकि किसी उद्येश में साथ होने का अर्थ होता है, उसके लिए कुछ करना;
    तो यदि आप कुछ करना चाहते हो तो यह आज की स्थिति को देखते हुये काफी प्रगतिशील बात है;
    आप अपनें विचारों और अपनें सहयोग के रूप को थोड़ा और विस्तार से बता सकते हैं,

    You can further discuss and give your views on My Email: thesparkofchange@gmail.com

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